उपरोक्त में से जो जिस मनुष्य के पास जितनी अधिक मात्रा में है ,जिसकी जितने ज्यादा लोगों को आवश्यकता है ।वह अपनी क्षमता ,दक्षता के अनुसार लोगों की समाज की जरुरत को पूर्ति अपने मानक नियमों /शर्तों के आधार पर कराकर अपना उपयोगिता उपलब्धि मानक मूल्य तय /निर्धारित करके प्राप्त करता है /वसूली करता है। वह उसका धन /लाभ मानक मूल्य है । यदि वह इसे अपने मिशन धर्म कर्म के अनुसार वसूली पूरी तरह से नहीं कर पाता है तो परेशान / दुखी होता है ,जिसे हानि कहा जाता है । यदि वह अकेला व्यक्ति मानव समाज में आपूर्तिकर्ता संसाधन स्रोत स्वामी है , लोगों की/की ; तब वह ऐसी परिस्थिति में धन का अधितम लाभ प्राप्त करता है ।जिसे व्यापार पर एकाधिकार या मोनोपॉली कहते हैं ।। यदि उसके जैसे समान आपूर्तिकर्ता अनेक लोग समाज के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति /उपलब्धता क्रय विक्रय श्रृंखला संचालन करते हैं तो यह समाज में व्यापार की संयुक्त अवस्था बाजार /मार्केट कमेटी व्यवस्था बन जाती है ।जिससे लाभांश कम /घट जाता है ।अब एक वस्तु उपलब्धि खपत का लाभ अनेक लोग लेने लगते हैं।जब समाज में एक विशेष वस्तु की उपयोगिता बढ़ जाती है तो उसकि उपलब्धता कम हो जाती है जिससे उसका उपयोगिता उपलब्धता समानुपात मानक मूल्य गड़बड़ा जाता है, विचलित हो जाता है । जिससे समाज में एक वस्तु के या अनेक वस्तुओं के पूर्तिकर्ता , उपलब्ध कर्ता /दाता दुकानदार और एक और अनेक वस्तुओं के खरीदने वाले ग्राहक ,लेने वाले व्यवस्था बन जाती है । जिसे वस्तुओं की क्रयविक्रयी व्यापार वयवसथा बड़ा बाजार कहते हैं ।
जो अपना और अपनी वस्तु की उपयोगिता का मूल्य अपने आप लगाते हैं ।वे अपनी उपयोगिता के अनुसार अधिक मूल्य लेकर धनी बनते जाते हैं । जिनमें अपनी उपयोगिता का स्वव मूल्यांकन करने का गुण नहीं होता है जो समाज को मनुष्य को उपयोगी उत्पादन नहीं करते हैं। वे दूसरे लोगों की शर्तों के अनुसार धन देकर अपना जीवन जीते हुए निरंजन निर्धन गरीब दरिद्रता भिक्षावृत्ति से अपमानित महसूस करते हुए जीवन जीते हैं ।
जिन लोगों में सक्रिय अतिरिक्त ऊर्जावान होने से समाज को परिवार को देने की बात / भावना ,उत्पादन क्षमता अधिक होती है उनकी उपलब्धता विक्रय अधिक होती है ।उनमेँ लेने की भावना कम होती हैउनकी क्रयशक्ति कम होती है वे समाज में परिवार में दाताभाव धारी ,दाताराम समाज में परिवार में पोषणकर्ता वृद्ध भाव उपयोगी विचारवान नर / धनी व्यक्ति बनते हैं ।। जिन लोगों में निष्क्रियता अधिक होने से कम ऊर्जावान होने से लेने की बात / भावनाअधिक होती है उनकी आपूर्ति खपत क्रयशक्ति अधिक होती है । उनमेँ समाज को परिवार को देने की इच्छा भावना न होने से उनमें विक्रय शक्ति कम होती है । जिससे वे समाज में परिवार में शोषणकर्ता बालक भाव उपयोगी विचार हीन निर्धन गरीब व्यक्ति बने रहते हैं ।।
धन का जीवों में उनके शरीर का आकार आकृति स्फूर्ति से सहसंबंध है ।लेकिन हम मनुष्य जाति में इसे परमाणु के कक्षा ऊर्जा नियम K ( kinetic ) जीने लायक ऊर्जा , L ( labour) परिश्रम /मेहनत लायक ऊर्जा , M ( mechanical energy)मशीन की तरह काम करना /सामान्य से अधिक ऊर्जा , O ( operating regularly) लंबे समय तक कार्य करते हुए रहना ,अधिक ऊर्जा वाले , N ( Non stop worker or officer to regulat maintain mission work ) किसी भी लिए गए कार्य को उसकि अंतिम परिणिति फाईनल रिजल्ट तक पहुंचाने तक बीच में नहीं रुकना ।जिन लोगों का ऊर्जा स्तर M , N , O वाला होता है वे अपनी शारीरिक मानसिक ऊर्जा स्तर के अनुसार अपने जीवन में बौद्धिक विकास क्षेत्रों में और शारीरिक श्रम निर्माण क्षेत्रों में तरह तरह का उत्पादन देकर तरक्की /प्रगति करते हैं । लेकिन जिन लोगों का ऊर्जा स्तर K , L स्तर का होता है जिनमें केवल जीवन जीने मात्र भावना इच्छा होती है ।जो अपना जीवन जीने के प्रति जागरूक नहीं होते हैं उनके जीवन की कमान /नियंत्रण दूसरे अधिक ऊर्जा वाले , धूर्त ,कुर्रा ,मुर्रा , व्यापारी ,व्यावसायिक लोग ले लिया करते हैं ।उनको गलत ज्ञान , भ्रम ज्ञान , अज्ञान , विपरीत ज्ञान , अपूर्ण ज्ञान देकर अपना मुर्गा, बकरा ,बैल ,कुत्ता बनाते हैं ।जो बाद में सबका मुर्गा ,बकरा, बैल ,गाय भैंस ,कुत्ता बनकर स्वयं आदमी होते हुए दूसरे आदमियों को आदमपशु रुप से समाज में परिवार में अपमानजनक परिस्थितियों में अपना जीवन जीने देते हैं धन के गुलाम बना कर , मानसिक लालच देकर उसमें आवश्यकता या कमी / रिक्तता भाव स्थाई रूप से बनाकर । जो अपने बच्चों को भी अपने वाला जीवन ढर्रा सिखाकर अपना जीवन पूरा करके चले जाते हैं ।
धन का जीवों के शरीर में ऊर्जा स्थिति ,निजी ऊर्जा ईकाई माईट्रोकोन्डिया , तथा माईट्रोकोन्डिया की कार्य पद्धति : खाद्य पदार्थों के जारण से शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पादन तथा जीवों के द्वारा खाये गये खाने से सीधा संबंध है ।माईट्रोकोन्डिया मनुष्य और स्तनपायी सभी प्राणियों में माता की ओर से आते हैं ।पिता के माईट्रोकोन्डिया निषेचन प्रक्रिया से पहले ही अण्डाणु से बाहर रहकर नष्ट हो जाते हैं ।साईटोप्लाज्मिक इनहैरिटैंस नियम के अनुसार सभी बच्चों का ऊर्जा स्तर उनकी मां के आधार पर निर्धारित होता है ।पिता पर बच्चों का ऊर्जा स्तर निर्धारित नहीं होता है ।जिससे लोकोक्ति है , हिरनी के जने जाये मट्ठे /आलसी /सुस्त नहीं होते हैं । शेरनी के बच्चे लड़ाई झगड़े मरने से नहीं डरते वे अपने से बड़े हाथी पर भी वार किया करते हैं ।धन की प्रक्रिया मां के द्वारा सिखाई गयी जीवन पद्धति पर निर्भर करती है।
जो देना जानता है जिसने विवेकपूर्ण तरीके से मांग आपूर्ति के तारतम्यता को ध्यान में रखते हुए देना सीख लिया वह आवश्यकता का मानक तय मूल्य अपनी मर्जी से लेता है वसूलकर्ता है वह अमीर /धनी बनता है ।यह बात अलग है विचारणीय है कि वह समाज को परिवार को क्या उपयोगी दे रहा है शब्द या वस्तु या अन्न /दर्शन विचार आवश्यकता पूर्ति ।। जो लेना जानता है ,जिसने लेना सीखा है खाना सीखा है देना नहीं ऐसा दीन /धर्म कर्म हीन मनुष्य अपनी बढ़ी हुई अति आवश्यकता व्यर्थ की अनावश्यक वस्तुओं को खरीदता हुआ सदैव कंगाल गरीब निरधन बना रहता है । अपनी सामाजिक उपयोगिता का मानक मूल्य खुद तय नहीं करना जानता है । अपनी सामर्थ्य हीन /क्षमता हीन / दक्षता हीन होने से, उपलब्धता आवश्यकता से प्रभावित होकर /वशीभूत होकर , मजबूरी वश अधिक दक्षिणा , क्षमता मूल्य देने को बाध्य मजबूर होता है ।अधिक देता है । वह शोषित होता है। ,जिससे वह आजीवन गरीब, निर्धन, मजबूर ,मजदूर ,दरिद्र, शोषित बना रहता ।।
जिसने शिक्षित होकर उत्तम शिक्षा पाकर अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण करना सीख लिया ,अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अपने आप करना सीख लिया ,जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अपनी मांग के अनुसार अपने आप स्वयं कर लेता है अधिकतम अपने लिए अपना निर्माण कार्य स्वयं/खुद कर लेता है । अपनी जरूरत से अधिक ज्ञान प्राप्त करके वहआत्म निर्भर स्वलंबी बन कर शोषण और शोषक व्यवस्था पर अपनी आवश्यकताओं को निर्धारित ,नियंत्रित करना सीख लेता है । समझ लिया करता है । पूरा कर लिया करता है ।। वह कम रुपया होने पर भी ,कम मानक शासकीय धन /मुद्रा अवस्था में गरीब /अल्पधनी /या निर्धन अवस्था में सुख शांति संतोष से चैन /शकून के साथ बिना विचलित हुए मन से जीना सीख लिया करता है ।
परंतु जिसका अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण नहीं रहता है ।जो आत्मनिर्भर स्वालंबी नहीं है ।जो दूसरे लोगों की आवश्यकताओं को अपनी आवश्यकता /जरूरत मानने /समझने लगता है ।जिसका आवश्यकता विवेक खत्म /समाप्त हो जाता है । ऐसे मूर्ख मनुष्य की आवश्यकताओं को दूसरे व्यावसायिक व्यापारी लोग अपने नियंत्रण में लेकर ,दूसरे लोगों की आवश्यकताओं को भी अपने नियंत्रण में लेना ,नियंत्रित करना सीख लिया करते हैं ।। विज्ञापन ,प्रचार , प्रसार ,नाम विस्तार विधा द्वारा ।। ऐसे अनियंत्रित आवश्यकता वाले मूर्ख /मूढ़मति ,वज्रबटुक बुद्धि मानव का जीवन सदैव दरिद्रता ,वामन, वामपंथी, शूद्र ,अशूद्र ,सेवक, श्रमिक ,मजदूर लोगों का जीवन सदैव गरीबी रेखा से नीचले स्तर पर जीवन रेखा भिक्षुण अवस्था भिक्षावृत्ति में दूसरे लोगों से सदैव कुछ न कुछ मांगते हुए व्यतीत होता है ।
कोई भी मनुष्य अपने आप में पूरी तरह से आत्मनिर्भर स्वालंबी नहीं हो सकता है उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरे लोगों के पास जाना होगा ,और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए दूसरे लोगों को अन्न धन शासकीय मुद्रा रुपयों का लालच देना ही पड़ेगा । हम सभी लालच के वशीभूत होकर तरह तरह के परिवारिक सामाजिक ,शासकीय ,धार्मिक संगठन बनाकर सामूहिकता रुप से गांव शहरों में रहते हैं ।ये सभी संगठन समाज मनुष्य धन के आश्रित होकर कार्य करते हैं ।
अक्षरज्ञान मनुष्य समाज की आवश्यकता है ।। पशु समाज की नहीं ।।
जो लोग अपनी आवश्यकता से अधिक अक्षर ज्ञान को संचित / संग्रहित कर लेते हैं ,वे अपने अक्षर ज्ञान में से समाज को प्रवाचक रूप से ,शासकीय ,निजी ,शिक्षण संस्थानों को शिक्षक रुप में , वकील , चिकित्सक , सलाहकार मनुष्य सामाजिक संगठन तंत्रों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी क्षमता, दक्षता को देखते हुए समय समय पर आंशिक तौर से अपने संचित विचारों को अक्षरओं मौखिक लिखित रूप से देते रहते हैं ।और अपने बुद्धि कौशल के अनुसार दान दक्षिणा सलाह सुविधा शुल्क रुप में धन अन्न शासकीय मुद्रा आदि लेते रहते हैं । जैसे गुरु जन ,शिक्षक, निदेशक, निर्देशक , ऋषि मुनि,पंडित, कथाकार, कहानीकार, गायक, लेखक, वकील , चिकित्सक, जज, प्रशासनिक अधिकारी, लिपिक, सचिव , IAS,IPS,IFS,IES,&etc .
रक्षण कार्य मानव की,समाज तंत्र की, घरसमाज की ,दुर्बल लोगों की आवश्यकता है ।।
जो लोग अपनी निजी आवश्यकता से अधिक शक्ति क्षमता दक्षता प्राप्त /हासिल कर लेते हैं सामान्य लोगों की तुलना में, या शक्ति के संसाधनों /हथियार आदि का संग्रह कर लेते हैं । लड़ाई झगड़े युद्ध कौशल में सामान्य लोगों से ज्यादा निपुण होते हैं ।वे समाज के निर्बल डर्रू भयमान लोगों को समय समय पर अभय भाव देते हुए उनका डर दूर करते हुए मनुष्य का, समाज का रक्षण कार्य करते हैं ।वे सुरक्षा कर्मी रुप गार्डस पुलिस, सैनिक ,गुंडई रुप से अपना जीवन यापन :जीविकोपार्जन करते हैं।
स्वास्थ्य सेहत मानव समाज की आवश्यकता है ।।
जो लोग अपनी आवश्यकताओं से अधिक स्वास्थ्य ज्ञान ,चिकित्सा सहायता आदि का संग्रह कर लेते हैं।बाद में वे धीरे धीरे आवश्यकताओं के अनुसार लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं इसके बदले में वे समाज से सिस्टम से दान दक्षिणा अन्न धन शासकीय मुद्रा अपने जीवन हितार्थ लेते हैं दूसरों को देने के लिए , वे चिकित्सक नर्स ,पैरामेडिकल तरीकों से जीविकोपार्जन करते हैं ।शेष का विस्तार करते हुए पाठक गण अपनी ओर से जोड़ कर स्वयं समझ लेंगे ।