प्रत्येक जीव के जन्म से पहले उसके उत्पन्न होने की भूमिका बनती है । तो उसके मरने से पहले उसके मरने की भूमिका बनती है । अक्सर लोग शिक्षा के दौरान जीवन विषय पर बहुत अधिक चर्चा करते हैं, परंतु जीवन में मत्यु पक्ष की अनदेखी करते रहते हैं । यदि मनुष्य शिक्षा के दौरान जीवन में शिक्षा लेने के साथ-साथ मृत्यु की शिक्षा भी लेते रहें मृत्यु ज्ञान चर्चा सुनते रहें तो उनके पास मृत्यु विषय प्रकरण पर काफी संज्ञानी ज्ञान हो जाता है । जिसको जीवन जीने के साथ-साथ मृत्यु विषय को भी समझने की जिज्ञासा लग जाती है । उसे जीवन में मृत्यु विषय पर काफी ज्ञान हो जाता है । वह जीवन में छिपी हुई मृत्यु और मृत्यु में छिपे हुए जीवन को समझने पहचाने लगता है । जिससे वह अपने आप को अकाल मौत से काफी सीमा तक बचाकर अपनी जातक मौत मरता है । जब भी मृत्यु का अवसर आता है या उस मनुष्य को मौत घेर लेती है । तभी वह अपनी जागरूकता से अकाल मौत के घेरे में से खुद को निकाल कर अपने जीवन की रक्षा करने में कामयाब हो जाता हैं । जो लोग जन्म जीवन मरण प्रक्रिया के ज्ञान प्रपंच इंद्रजाल को यथार्थ में समझ जाते हैं । वह अपने ज्ञान विवेक बल से काफी सीमा तक अकाल मृत्यु से/अप्राकृतिक मृत्यु से बचते हए अपने जीवन को पूर्णत सामान्य जातक अवधि तक जीते हैं , प्राकृतिक मृत्यु या काल मृत्यु के द्वारा उनका जीवन समाप्त होता है । सभी के जीवन में मृत्यु के अनेक असंख्य मोंके के आते हैं , परंतु बुद्धिमान विवेकशील लोग बुद्धि विवेक के प्रभाव से मृत्यु को चकमा देकर अपने जीवन में अधिकांश बार बच जाते हैं । ( २)
जो मनुष्य हर बार मृत्यु के फंदे से मृत्यु को चकमा देकर बच जाता है वह कोई विशेष उद्देश्य लक्ष्य लेकर धरती पर आया है। असाधारण मनुष्य है। सभी लोगों के जीवन में जन्म जीवन अमरता और मृत्यु की प्रक्रिया एक द्विशाखिय वृक्ष पर जीवन जीने जैसी है । जिसमें एक वृक्ष की एक शाखा जीवन की है तो दूसरी शाखा मृत्यु की है । उल्लेखनीय बात है यह जीवन और मृत्यु दोनों शाखाएं एक दूसरे के समानांतर आजीवन अंतहीन होकर चलती रहती हैं । इन दोनों पर ही जीवन मैं सभी जीव जीवन और मृत्यु शाखाओं पर प्रत्येक जीव बारी-बारी से अक्सर बुद्धि बल विवेक के अनुसार जीता है । जीवन शाखा पर 75% जीवन अवसर है तो 25 प्रतिशत मृत्यु अवसर छुपी होती है तो मृत्यु शाखा पर 75% मृत्यु के अवसर और 25% जीवन के अवसर छुपे होते हैं । इतना ही नहीं यह मृत्यु लिंग शरीर में भी प्रतिष्ठित है । जैसे सभी बुद्धिमान और हिंसक जीवों में नर उच्च ऊर्जावान होने से मृत्यु कर्म के संचालक होते हैं नंर अपने जीवन की सुविधा सुरक्षा के लिए दूसरे जीवों को अकारण अचानक व्यर्थ भी मारते रहते हैं । तो नारी जीव अल्प ऊर्जावान होने से वे भी मृत्यु के कारण बन जाती हैं कभी नर नारी की प्राप्ति के लिए आपस में लड़ लड़कर एक दूसरे को मार देते हैं तो कभी नारियां भी प्रसव के दौरान आसानी से अपने आप मरती मरती जाती हैं या दूसरों से दूसरों को मरवाती रहती हैं । इस प्रकार से जिनको जीवन में मौत और मौत में जीवन की समझ हो जाती है वह जीवन में मौत को देखते हुए समझकर अपने जीवन की अपने विवेक से रक्षा करने में कामयाब हो जाते हैं। (३)
जो भी लोग विवेकशील हैं जिनको मृत्यु का समय पूर्व दिशा विवेक उत्पन्न हो जाता है या उनका जीवन आयु शेष होने पर दूसरे लोग खतरा भापकर उनको खतरनाक घातक घटना से पहले चेतावनी देने लग जाते हैं । ऐसे में घाती घायल या मरने वाले लोग अपने जीवन की आशा में जीवन शाखा पर जीते हुए तुरंत मृत्यु क्षण आने पर जीवन शाखा छोड़कर मृत्यु शाखा पर जीवन की आशा में तेजी से चले जाते हैं। जिस पर 25% जीवन की संभावना होती है इसे रिस्क लेना दुस्साहस पंगेबाजी या मौत से टकराना कहा जाता है । जीवन में मौत असफलताओं , असमर्थता , धनहानि निर्धनता गरीबी और रोगों के रूप में छपी हुई है । मौत में जीवन प्रियता सफलताओं के , समर्थ वान , समृद्धि धानिकता धन लाभ , विराट वृद्धि , उत्तम स्वास्थ्य सुख समृद्धि समर्थवान रूप में साथ छिपा हुआ है । इसका पता इसका एहसास हमको तब होता है । जब हम जीवन में असफल होने लगते हैं । कोई कोई तो असफलता से इतना दुखी निराश हो जाता है कि वह आत्महत्या कर के अपने जीवन को समय से पहले खुद समाप्त कर लिया करता है । जो असफलता का सामना नहीं कर पाता वह मृत्यु के पूर्व चरण अवसाद में जाकर एकांतवासी एकाकी असामाजिक होकर शेष जीवन को क्षण मृत्यु की आशा में जीने की कोशिश करने लगता है । यदि उसे सफलता असंभव लगती है सफलता की आशा नहीं रहती तो वह असफल होने पर असफलता का दंश/ डंक न सह पाने से असफलता द्वारा डंस लिया जाता है सफलता की आशा छोड़ देता है। अवसाद में चला जाता है । तो वह असफलता से पीड़ित होकर हृदय आघात से उसका जीवन समाप्त हो जाता है । यदि वह आशावादी है तो सफलता की आशा में असफलता के पश्चात उत्पन्न अवसाद डिप्रेशन से प्रभावित होकर मृत्यु के प्रथम चरण अवसाद डिप्रेशन में जाकर समाज से अलग एकाकी एकांतवासी होकर विशेष चिंतनशील अपने जीवन को आशावादी तरीके से जीवन जीने का प्रयास करने लगता है । (४)
जीवन में निरंतर असफलताओं की अधिकता होने के कारण जीव की आयु धीरे धीरे कम होती चली जाती हैे । जीव जातक आयु से पूर्व असफलता फैलियर से परेशान होकर समय से पहले अपने जीवन के पूरा होने की सोच बनने लगते हैं , कोई कोई तो अपनी आयु पूरी कर देता है । निराशावादी जातक आयु मानव की निर्धारित 100 वर्ष से पहले तरह-तरह के उपायों द्वारा समय से पहले मर जाता है । जिन लोगों के जीवन में सफलताओं की संख्या अधिक होती है उनका शरीर निरोग रहता है । वह सुखी समर्थ धनी समृद्धवान अपने जीवन में कम से कम मानसिक तनाव से या मानसिक तनाव रहित होकर जीते हैं । वह अपनी जीवन आयु को पूरी तरह जीते हुए जातक आयु पूरी करने पर प्राकृतिक मौत मरते हैं । जबकि आशावादी लोगों के जीवन में असफलताएं मार्ग परिवर्तन का सूचक होती हैं । आशावादी लोग हर असफलता पर अपना मार्ग बदलते हुए सफलता की आशा में लक्ष्य और उद्देश्य बदल बदल कर अपने जीवन को जातक आयु तक अपने जीवन को पूरा जी पाने में कामयाब हो जाते हैं। इसे समझने के लिए सभी जीवों के जीवन के ग्राफ वृत्त या कर्ब ग्राफ का अध्ययन किया जाता है । जो जीवन में शून्य पर से शुरू होता है ऊपर उठना चला जाता है एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंचने पर वह थोड़ी देर के लिए वहां ठहरता / रुकता है इसके बाद फिर नीचे गिरना/उतरना शुरू हो जाता है ।। इस अर्ध वृत्तीय ग्राफ में जीवन का वह भाग जिसमें जीव शरीर रूप से विचार रूप से लगातार ऊपर उड़ता चला जा रहा था जिसमें वह वृद्धि और गति से विस्तार भाव प्राप्त होकर निरंतर नामित प्रचारित होता जा रहा था । वह पूर्वाध भाग बचपन और जवानी वाला जीवन भाग है ।। परंतु इसके बाद का अर्ध उत्तरीय भाग जिसमें वह निरंतर क्षय और गति हीनता से हानि को प्राप्त होता हुआ धीरे-धीरे विस्तारहीन होता हुआ नाम हीनता की ओर चला जा रहा है वह वृद्धावस्था है जिसके पश्चात वह मरकर 1 दिन विलुप्त हो जाएगा । उसकी यह जीव के जीवन की दृश्य फिल्म लुप्तप्रायः अवस्था मृत्यु कही गई है । (५)
इस मृत्यु के अंतर्गत जीव में उसके अंदर अपनी जीवन फिल्म मैं जीवन अभिनय करने के लिए रिक्तता की पूर्ति करने के लिए न पात्रता भाव होगा , ना योग्यता भाव होगा , ना दक्षता भाव होगा , ना क्षमता भाव होगा , अपितु वह जीव एक अन्य निर्जीव के समान गीली मिट्टी जैसा एक मुलायम पिंड होगा जिससे काटा पीटा जा सकता है । जिस पर उसे कोई भी एतराज नहीं होगा है । वह जीवंत पिंड अब जीवन गुंण लक्षण हीन जैव चुम्बकीय, जैवविद्युत , जैव रसायन जीवन गुंण खोकर चैतन्यता हीन नामहीन हो चुका है । उसने शब्द नाम के धन खंड उर्जा प्रदान भाव संवाद को धारण करना छोड़ दिया है । अब वह शब्द नाम के अनुसार ध्वनि खंड ऊर्जा को अनुभव नहीं करता है ।। जब वह शब्द नामधारी बौद्धिक जीव था तब उसने नाम के ध्वनि खंड को धारण किया था । अब जब वह चैतन्यता रहित नाम हीन हो गया है । उसने शब्द नाम के ध्वनि खंड ऊर्जा को छोड़ दिया है ।। इस प्रकार से शब्द धारिता नामित होना जीवन है , शब्द नाम हीनता मृत्यु है । यह जीव का पहला गुण है । जिसे वह चेतना में सबसे पहले नाम रूप से स्वीकार करता है , धारण करता है । जब वह जिंदा था तो अपने को ना काटने पीटने देना तोड़ने फोड़ने देता था तब उसकी वह पिंड की अवस्था जीवन अवस्था कही गई थी । लेकिन मुलायम निर्जीव अवस्था विरोधी अवस्था मृत्यु कही गई है । यह इकोलॉजी / वातावरण परिस्थिति प्रतिक्रिया के अनुसार । (६)
प्रत्येक जीव अपने आप को पूर्ण तो अनुभव करता है लेकिन वह वास्तव में पूर्ण नहीं होता। अपितु प्रत्येक जीव की पूर्णता तब सार्थक सिद्ध होती है जब वह अपने जैसा दूसरा जीव बनाने में समर्थ हो जाता है। इस विशेष कर्म को वह संपत्ति कर्म संतान निर्माण और शिष्य निर्माण के रूप में करता है । जब वह संतान के समान अनुयाई समर्थक शिष्य बनाने में असमर्थ हो जाता है । तब तक वह अपने अर्ध भाव कर्मा की रिक्तता अवस्था जीवन लक्ष्य के अनुसार निर्धारित दैनिक मानवीय पशुज समान कर्म करने में रहता है
। वह अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करने के लिए भूलों पर अपने मायावी कर्म के लिए निश्चित दूसरे जीवों के अस्तित्व को बाधित करता मिटाता रहता है , उसकी यह कर्म करने के भाव की रिक्तता जीवन भर ऊपरि मुख से भोजन अंतर्ग्रहण द्वारा अधोमुख योषांग लिंग और योनि द्वारा परस्पर एक दूसरे के शरीर अंश रज और शुक्र को खाते हुए पूरे होने का प्रयास करते रहने में पूरी होती दिखाई देती है । अपने पूरक अर्ध रिक्त भाव की पूर्ति के लिए दूसरे प्राप्त जीव को अपने रिक्तभाव में भरने का पूर्ण प्रयत्न भूख और मैथुन से करता है । परंतु पूर्ण नहीं होता पूर्ण होने के भ्रम में बना रहता है । एक संपूर्ण जीव के दो अर्धभाव भ्रमित करने वाले नर नारी भाव कहे गए हैं । जिनके अंदर नर के अंदर जन्म निर्माणी भाव कम मृत्यु विनाशी भाव अधिक होता है नारी के अंदर जन्म निर्माणी भाव अधिक , मृत्यु विनाशी भाव कम का गुण पाया जाता है । परंतु कभी-कभी दोनों नर नारी जीव के दैनिक जीवन व्यवहार में इसके विपरीत गुण परिलक्षित होता है । (७)
नर लिङ्गीय जीव अधिक ऊर्जावान होने से मृत्यु मार्ग गामी होने की ओर से शीघ्रता करता है । जबकि नारी अल्प ऊर्जावान होने से धीमे धीमे मृत्यु मार्ग गामिनी होती है । वह मृत्यु से अधिकतम बच सकने की कोशिश करती है । परंतु वह नर को मृत्यु मार्ग पर तेजी से चलाने के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन जाती है । नर नारी जीव को अपना निजी सहायक समझते हुए उसे सदा सदा के लिए उसे स्थाई रूप से निजी सेविका के रूप में प्राप्त करने के लिए अधिक हिंसाभाव अपनाते हुए नर अन्य जीवो की हिंसा करने में लगा रहता है । जिससे उसके द्वारा हिंसित हुए उसी के भ्राता समान जीव ही उसके हिंसा दायक मृत्यु का कारण बनते हैं । परंतु इस नंर में अपना जीवन जीने की अवस्था में जो हिंसा का स्रोत है जो हिंसा उत्पन्न करता करवाता है वह हिंसक जीव नामित नारी कहा जाता है । इस प्रकार से दोनों नरनारी जीव हिंसा करते हुए तीव्र हिंसा द्वारा संसार को हिंसाग्रस्त करते दिखाई देते हैं जबकि वह मंद हिंसा द्वारा आपस में भी एक दूसरे की हिंसा करते हुए एक दूसरे को भी हिंसित करते रहते है । उनकी इस आपसी मंद हिंसा कर्म मिथुन के द्वारा नए जीवन का नित्य जन्म होता रहता है । (८)
जीवो का जन्म भी वह प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक जीव अदृश्य जगत से दृश्य जगत में आता है परंतु आता हुआ दिखाई नहीं देता । इसी प्रकार से जन्म के समानांतर मृत्यु भी जीव के जीवन की वह अदृश्य प्रक्रिया है जिसमें जीव दृश्य जगत से अदृश्य जगत में जाता रहता है , परंतु जाता हुआ दिखाई नहीं देता । इस प्रकार से जन्म मरण हर जीव के जीवन के आदि और अंत की क्रियाएं हैं । जिनके अंदर तरह-तरह के धर्म कर्म के प्रभाव से सृष्टिम विभिन्न जाति धर्म कक्षा में तरह-तरह के जीव आ रहे हैं जा रहे हैं । वास्तव में यदि देखा जाए तो मृत्यु की प्रक्रिया अधिक लंबी प्रक्रिया है परंतु जिसके प्रमाण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं । इसी तर्क ज्ञान से समझा जा सकता है जिसमें प्रत्येक जीव अपने स्मृति गुण होने के बावजूद पूर्व जन्म के गुणधर्म कर्मों को भूल जाता है । जबकि जीवन एक अल्प क्षणिक प्रक्रिया है , जिसका प्रमाण रिकॉर्ड वर्तमान में उपलब्ध होता है । इसमें हम अपना ध्यान मिथुन के दौरान मृत्यु की ओर केंद्रित करके चलते हैं । जिसे हम जीवन कहते हैं वह मृत्यु की सहायक जीवन प्रक्रिया है जिसमें जीव को मृत्यु तक जाने के लिए उसे जीवन जीते हुए जाना होता है बिना जन्म लिए मत्यु का विधान नहीं है । प्रत्येक जीव के जन्म लेने के साथ ही मृत्यु भी जुड़ जाती है वह उस जीव के जीवन का निर्धारण करती है । यदि जीव अपनी जाति अवधि के अनुसार मरता है तो वह प्राकृतिक मौत / मनुज मौत कही जाती है । यदि जीव अपनी जाति अवधि से पूर्व मरता है तो उसे अकाल मौत / पशुज मौत कहा जाता है । इस प्रकार से जीवन में ही मृत्यु भी छिपकर जीव के साथ जीवन भर चलती रहती है । (९)
जिस जीव ने जीवन में मृत्यु को जीवन के साथ चलते हुए देख लिया तो उसने जीवन को समझ लिया वह अपने जीवन को पूर्ण जातकआयु तक जी पानी में कामयाब हो जाता है । सभी जीवनधारी जीवों में जीवन को मौत ढूंढ रही है जीवन की हिंसा करने वाले प्राणियों के रूप में जैसे हिंसक पशु शेर भालू कुत्ता सांप जीवन को हिसित करने वाले सांड भैंसा हाथी गैडा आदि मनुष्य में मनुष्य की हिंसा करने वाले तरह-तरह के अपराधी लोग और शत्रु जनों , ठगों के रूप में जो भी मनुष्य इन हिंसा करने वाले पशु और मनुष्यों को उनकी चेष्टा को समझ जाते हैं वह इसे हिंसित होने में बच जाते हैं वह मृत्यु के यम पाश से छूट जाते हैं अन्यथा यह यमराज के यमदूत कहे जाते हैं ।
जीवन की पूर्णता मृत्यु के पश्चात भी समाप्त नहीं होती अपितु जीवन की सतत निरंतर के रूप में बार-बार जन्म लेकर पुनर्जन्म के द्वारा उच्च विकसित योनियों में जन्म लेकर सभी जीव अपने जीवन का विकास करते हुए जीवन यात्रा मार्गों में जीवन जीते हुए चलते रहते हैं । जीवन जीने का मतलब यह नहीं कि हमें अपने-अपने जीवन को जातक जीवन आयु तक जीना है , या जीवन कब छिन जाए पता नहीं ..। जब जीव पैदा होता है तो उसे उसके साथ साथ उसी क्षण से मरना शुरू कर देता है । ये दोनों जन्म मरण जीवन क्रियाएं ऐनाबोलिक क्रियाएं निर्माणकारी तथा कैटाबोलिक क्रियाएं जीवन को विनाशकारी (छिपा छिपे नाशकारी ) कही जाती हैं । नाशकारी तब कही जाती हैं जब इनके कार्य कर्म प्रभाव से नाश /नष्ट होता हुआ दिखाई देने लगता है । । प्रत्येक जीव के जीवन की अवधि उसके जन्मदिन के अनुसार निर्धारित होती है कि वह अपना जीवन इतने साल जी चुका है , अब उसे अपना जीवन जीने के लिए एक साल और चाहिए . जबकि उसे जो वह 1 साल जीवन अतिरिक्त जीने के लिए मिली है वह उसकी 1 साल जीवन जीने के लिए नहीं मिली बल्कि वह मृत्यु की ओर आने वाला मृत्यु मार्ग का समय होता है , जिसे वह जीवन समझता है । धीरे-धीरे इस जीवन प्रक्रिया में साल दर साल गिनते हुए जीवन पूरा हो जाता है । हम अपना परिचय इस प्रकार देते हैं कि हम इतना जीवन जी चुके जबकि सत्य तो यह है कि हम साल एक और जीवन जीने के लालच में एक साल और तेजी से मृत्यु लक्ष्य की ओर करीब जा रहे होते हैं । जबकि इस जीवन जीने की इस प्रक्रिया में हम जीना और मरना एक साथ कर रहे होते हैं । हम क्षण क्षण जी रहे हैं और क्षण- क्षण मौत के निकट जा रहे होते हैं । जीना मरना एक संगठित प्रक्रिया से हो रहा है । लेकिन हम जीवन को पकड़े हुए हैं मृत्यु को दूर समझे हुए हैं । इसी क्षण में हम यदि मृत्यु को भी याद कर लें तो हमें अपनी शेष जीवन अवधि का पता अपनी अंतरात्मा से पता लग जाता है । कि अब हमारा जीवन कितना और शेष है जबकि वह वाक्य भी हमारा अपना निजी वाक्य होता है जिसे हम अपनी अवचेतन मन में डालते रहते हैं । (१०)
जीवन को जीने के लिए मृत्यु की समझ का होना जरूरी है , मृत्यु को पाने के लिए जीवन को जीना बहुत जरूरी है । मृत्यु सीधे नहीं आती । इसकी तैयारी करनी पड़ती है इस मृत्यु की तैयारी को हम जीवन पथ कहते हैं । जीवन पथ में जीवन इसलिए है कि हम मृत्यु की तैयारी कर रहे हैं । जीवन और मृत्यु दोनों ही एक जैसी बात में हम जीवन को पकड़ कर जी रहे होते हैं । जबकि हम उस समय मर भी रहे होते हैं । लेकिन हम अगले मृत्यु के क्षण को पकड़ कर अपना जीवन बढ़ा समझ लेते हैं । कि अभी हमें यह कार्य और करना है अभी हमारा यह जीवन लक्ष्य परम आवश्यक कार्य वो बाकी बचा है । जबकि एहसास ही नहीं चलता , फिक्र ही नहीं होता कि उस क्षण में हम कहीं ना कहीं अपना जीवन गंवा रहे हैं । यदि हम इस पर ध्यान देंगे तो समझेंगे तभी हम जीवन की वास्तविकता से परिचित होंगे हमारा वास्तविक जीवन का आनंद हमें उसी क्षण मिलेगा । (११)
जब हम यह समझ जाएंगे कि जीवन और मृत्यु दोनों एक ही हैं बस फर्क अनुभव करने का है । इस जीवन मृत्यु के क्षण को अनुभव करने के हमारे जीवन में हर क्षण अवसर असंख्य बार आते हैं । पर हम हर बार हरिद्वार को देखते हुए अनदेखा करके आगे बढ़ जाते हैं । वैसे इस मृत्यु की पहचान है *विचार हीनता की स्थिति * जो हमको हर जीवन लक्ष्य कार्य के पूर्ण होने के पश्चात अनुभव होती रहती है । स्वादिष्ट भोजन खाया मन तृप्त हुआ , भोजन के बाद भोजन विचार बंद । यह है भोजन मृत्यु ।। अब जब भूख लगेगी भोजन की इच्छा होगी तो जीवन में भोजन फिर से उत्पन्न कर जीवन जीवंत हो जाएगा । हम भोजन खाएंगे भोजन खाने के लिए फिर से जीवित हो जाएंगे । दूसरा उदाहरण योन आनंद या मिथुन /मैथुन का आनंद , इसके अंदर भी मृत्यु का प्रत्यक्ष अनुभव होता है जब जीव सफल मैथुन पश्चात आनंद की अवस्था में चला जाता है तो वह लंबे-लंबे सांस लेता हुआ निढाल निश्वास होकर मृतक के समान गिर जाता है तब कहा जाता है आनंद आया । जबकि वह उस क्षण समय में मृत्यु के आगोश में का समय होता है जिसमें वह निष्क्रिय हो जाता है। यदि मैथुन क्रिया में जीव श्वास असामान्य लम्बी लम्बी शरीर निढाल हो कर नहीं गिरता है तो तब तक मैंथुन आनंद सफल नहीं माना जाता । ऐसे में मैथुन आनंद की प्राप्ति नहीं होती है । कहने का मतलब यह है जिसे हम आनंद कहते हैं वह जीवन के अंत की और मृत्यु के पूर्व क्षणिक अवस्थाएं हैं जिनको हम अक्सर अनदेखा अनसुना अनसोचा करते हुए जीते हैं। (१२)
निद्रा मृत्यु की लघु क्षणिक स्थित है मृत्यु दीर्घकालीन निद्रा है । रात्रि में अच्छी तनाव रहित आसक्ति रहित, स्वप्न रहित निद्रा चाहिए तो रात्रि निद्रा में विघ्न दायक तत्व प्रबल आसक्ति, भयंकर विचारों से अपने मन को विश्राम दने के लिए मन की निद्रा स्थिति का रक्षण करने के लिए रात्रि पूर्व दिन में इन कर्म के क्रिया कलाप क्षणों को स्वीकार नहीं करना होगा , अपने मन को मानसिक कार्य संकल्प क्षण देने से बचना होगा मन को जब हम सोने से पहले संकल्प दे देते हैं तो निंद्रा पूर्व दिए गए संकल्प के प्रभाव से मन विश्राम नहीं कर पाता है। कमोबेश यही स्थिति हम सभी जीव अपने मरने से पहले अपने अगले जन्म की भूमिका बनाने के लिए संकल्प कर्म प्रभाव से फिर से पैदा कर देते है मृत्यु के पश्चात ठीक से विश्राम नहीं कर पाते , जबकि विशेष मानव परम ज्ञानीजन अपनी जीवन प्रगति के लिए महामानव विधायक जन, मनु पुरुष इंद्र परुष युग पुरुष बनने के लिए मृत्यु क्षण में अपने मन को पूर्ण संकल्पहीन करके मृत्यु अवस्था के पश्चात दीर्घकालीन विश्राम करते हैं । जिसे मोक्ष कहा जाता है ।। इस प्रकार से हम अपने मन में अत्यधिक संकल्प बार-बार कर अपने मन को संकल्प से इतना बोझिल कर लेते हैं कि हम रात्रि में स्वप्न प्रभाव से सो नहीं पाते और अपना अगला जीवन अच्छा बनाने के लिए मृत्यु के पश्चात भी मन को पूर्ण दीर्घकालीन विश्राम नहीं करने देते । जीवन में प्रगति करनी है जन्म मरण प्रक्रिया पर नियंत्रण करना है मोक्ष लेना है तो हमें अपने मन को संकल्प देने संकल्प करने की विधा विद्या को सिखाना होगा। जो लोग अपने मन को इंद्रजाल एक संकल्प प्रपंच से नहीं बचा पाती वह साधारण सी सामान्य जीव मानव मनुष्य पशु स्तर तक ही अपना जीवन जी पाते हैं । (१३)
अपना जीवन को पूरा जातक स्तर तक जीना धर्म ह .. जीवन की रक्षा से प्राणों की रक्षा प्राणी धर्म है , प्राणों की रक्षा यौवन की रक्षा हेतु प्रज्या नियंत्रण प्राणी का विशेष धर्म है।
जन्म और मृत्यु के बारे में अनेक बातें कही जाती हैं लेकिन एक बात सामान्य ज्ञान से यह कही जाती है कि हम जैसा जीवन जीते हैं वैसी ही मृत्यु पाते है । जबकि इसके विपरीत एक दूसरी बात भी है कि जैसा हम जीवन जी रहे हैं यह जरूरी नहीं कि मृत्यु भी वैसी ही हो । वह उसके विपरीत भी आ सकती है उससे अच्छी हो सकती है मृत्यु महोत्सव धार्मिक कर्मकांड रुप में , दृश्य मृत्यु अच्छी कही जाती है । यदि मरने के किसी दुर्घटना वश शरीर क्षत विक्षत होकर विकृत हो जाए या मृतक करने से पहले किसी रोग से पीड़ा पाए आत्महत्या कर ले । मृतक का संस्कार धार्मिक कर्म काँड पूरी तरह से नहीं किए जाते हैं तो मृत्यु अधूरी बुरी कही जाती है । इसमें हम अपना ध्यान एक वाक्य की ओर लक्षित करके चलेंगे जिसमें यह कहा जाता है जैसा जीवन हम घटित हो कर जीते हैं , वैसे ही मृत्यु होगी , यदि जीवन में शांति और विवेक है तो मृत्यु के समय भी शांति और विवेक रहेगा हमारा अपनी मृत्यु की क्षणों में विवेक हीनता संकल्पहीनता वसे चलित होना खराब मृत्यु को सूचित करता है । संकल्प के नियंत्रण संकल्प- विकल्प द्वारा अगले जन्म की प्रतीक्षा में हमारा मृत्यु पर नियंत्रण होगा अभी हम ठीक से मोक्ष लेकर जीवन में महापुरुष से युग पुरुष स्तर तक की प्रगति कर सकेंगे । (१४))
परंतु यदि जीवन में हमें किसी माता-पिता गुरु ने सम्यक रूप से सोच विचार करना विचारणा से निजी हितकारी सोच उत्पन्न होना , जीवन लक्ष्य पूर्ति के लिए सही सम्यक प्रण करना , सही उचित सम्यक संकल्प करना नहीं सिखाया , हमको संकल्प करना नहीं आया तों हम उचित सही सटीक संकल्प नहीं सीख पाने से अपने जीवन को जितना ज्यादा अशांति और विवेक हीनता से जिएंगे तो मृत्यु भी उतनी ही भयंकर चिंता कलेश युक्त होगी । यदि हमने आवश्यक वछनीय अपनी आत्मज्ञान प्राण ज्ञान के अनुसार अपने लिए आवश्यक संकल्प करना नहीं सीखा , लोगों की सुनी सुनाई बातों से , अनावश्यक सभव कथन संकलन जैसे अध्ययन मोबाइल दूरदर्शन दर्शन से अपनी अनुचित अनावश्यक संकल्प प्राण विधा विद्या बनाने लगे , तो ऐसे भ्रम संकल्पों से हम अपने जीवन को आजीवन दूसरों के विचारों पर आधारित होकर जिएंगे हमारे जीवन की डोर हमारे हाथ से छूट जाएगी हम आंखों के होते हुए अंधे कानों के होते हुए बहरे मन के होते हुए विदैह और बेमन के अपने विचार जीवन को बैगोरी से जीते हुए मूर्ख मति गति से जीते हुए मृत्यु भी मूर्ख की तरह प्राप्त करेंगे । यदि जीवन में विवेक समीक्षा विवेचना लक्ष्य उद्देश्य पूर्ति नहीं सीखा , जिससे व्यर्थ की चिंता अवसाद और तनाव रहा है तो मृत्यु प्रज्ञा हीनता विवेक हीनता से भय में घटित होगी । यदि जीवन में होश हवास ध्यान विवेक की प्रचुरता रही है तो मृत्यु भी होश ध्यान और विवेक में होगी । इसलिए यदि चाहते हो कि मृत्यु सुंदर हो तो जीवन को सुंदर बनाने के लिए जीवन में चिंतन मनन ध्यान विवेक निर्णय क्षमता को उत्पन्न करते हुए जीवन जीने का अभ्यास करते हुए जीवन में पूर्ण तृप्त होने का प्रयत्न करना होगा । यदि मृत्यु एक महोत्सव की तरह आए तो जीवन को बसंत बनाना पड़ेगा जैसा जीवन के साथ हमारा व्यवहार होगा हमारे साथ वैसा ही व्यवहार मृत्यु करेगी । कोई अंतर नहीं कोई भेद नहीं कोई विविधता नहीं मृत्यु पीड़ा हीन अवस्था मूर्छा में घटित होती है । मरने से पहले व्यक्ति बेहोश हो जाता है जीवन भी मूर्छा में जिया जाता है। बहुत कम लोग अपने जीवन को चैतन्यता के साथ जीते हैं जो अपने जीवन से जागरूकता से जीते हैं वह अपने जीवन में प्रगति करते हुए विकास करते हैं । (१५)
पैदा होने से पहले सभी जीवव्यक्ति प्रसव की अवस्था में प्रकृति के द्वारा फिर से बेहोश हो जाते हैं जिससे उसको नया जीवन जीने में पूर्व जन्म की स्मृति ना बचे । कारण की पुरानी जन्म की पुरानी कटुक स्मृति के प्रभाव से नया जन्म भी कोई भी नया जीव ठीक से नहीं जी पाता है जिस प्रकार से जब शांत पूरी निद्रा नहीं होती थकान नहीं उतरती तो अगला दिन भी तनाव बढ़ जाने से ठीक से नहीं जिया जाता है।जिन लोगों में यह विलक्षण स्मृति प्रभा का प्रभाव गुंण होता है । वह ओवर थिंकर चिंतालु स्वभाव के , हरदम भयभीत डर-डर कर अपने जीवन को जीते हैं । वह अपने अगले क्षण के लिए अगले भविष्य को भी पिछली बुरी स्मृति स्थिति प्रभाव में ठीक से नहीं जी पाते हैं । जिन लोगों में अपने पूर्व जन्म की कटुक स्मृति संचित बची रह जाती है , उन बुरी स्मृतियों के प्रभाव से वह वर्तमान जीवन भी ठीक से नहीं जी पाते हैं। (१६)
निद्रा से पूर्व की अनिद्रा की अवस्था या तंद्रा अवस्था होती है। उस पूर्व अवस्था की अनेक पूर्व अवस्थाओं में यदि ध्यान को जमा कर स्मृति वश्लेषण करने की विद्या विधा का ज्ञान साधारण जनों को हो जाता है तो वह भी विशेष जान क्षमता विवेक विवेचना समीक्षा लक्ष्य पूर्ति से महाजन युग पुरुष स्तर तक प्रगति करते चले जाते हैं । जब कभी सभी जीवो का वर्तमान जीवन उनके पूर्व जन्म की स्मृति में शेष बच लघु स्वप्न में चल रहा होता है । स्वप्न में भी कोई जीव अपनी मृत्यु को नहीं देखा करता है । हमारे अवचेतन मन का नियंता हमारा आत्मा मृत्यु जैसे विषय पर अति संवेदनशील होता है । स्वप्न के पश्चात जैसे ही मनुष्य की वह उसकी चेतना लौटती है । तब जो भी परलोक का घटित होता है । वह पुरानी चेतना में विलुप्त हो जाती है । जागने पर जागरूकता के साथ नई चेतना की तैयारी हो जाती है । ऐसे में जो बच्चे जन्म के समय ही प्रसव अवस्था में बेहोश नहीं होते मृत्यु दर्शन कर लेते हैं अपने विवेक से वह जन्म लेते ही मर जाते हैं । परंतु जिनमें जन्म लेते समय मृत्यु दर्शन की इच्छा नहीं होती जिनका विवेक दृष्टिकोण जन्म जीवन के प्रति आशातमक होता है । वह अपने जीवन को भय से जीना शुरू कर देते हैं । जन्म से पहले मृत्यु दर्शन कर लेने से भी वह डर के मारे सब कुछ भूल जाते हैं । असहाय महसूस करने के कारण वे रोने लगते हैं परंतु जो बच्चे जिनका विवेक जागृत हो जाता है वह नहीं रोते है जैसे नानक और तुलसीदास । जी्व के मन में इच्छाएं बहुत है लेकिन उन इच्छाओं को पूरा करने के लिए शरीर में शक्ति नहीं, मन में विचार नहीं, मस्तिष्क में ज्ञान सूचना नहीं , ऐसी असहाय अवस्था में बालक के सामने मात्र एक रोने का विकल्प बचता है । (१७)
ऐसे में कुछ मूर्ख लोग जो अपने को विद्वान समझते हैं उनका एक वाक्य आता है कि जब एक दिन मरना ही है तो हम क्यों जी रहे हैं तो इसका सही जवाब यही है कि हम मरने के लिए ही जी रहे हैं , यह सब कुछ मृत्यु पर निर्भर करेगा कि वह उत्सव बनकर आएगी या हमारी दुर्गति बनाने आएगी । ऐसे में एक सुंदर विचार यही है कि यदि जीवन को आनंद में जीना है तो रोजाना मरने का प्रयास करो बेफिक्री से तनाव रहित पूरी निद्रा लेकर सोओ जिसमें स्वप्न न हों , निद्रावस्था में स्वप्न का आना तनाव आसक्ति जीप के द्वारा लिए गए अनावश्यक संकल्प की पहचान है । जो स्वप्न में भी सुखः दुखों का अहसास करा देती है कि हम बिना निद्रा की तैयारी किए सो गए ,, सोने से पहले हमने मन को आसक्ति तनाव से मुक्त नहीं किया यदि हम स्वप्न रहित निद्रा में सोना सीख जायेंगे त़ो दिन में अच्छा तनाव आसक्ति रहित जागरूक जीवन जीना सीख जायेंगे । (१८)
विधी दायक संतुष्टि दायक स्वादिष्ट भोजन करो इससे तुम्हारी भोजन इच्छा मृत्यु भोजन करते समय हो जाएगी । तृप्ति दायक आरामदायक निद्रा का आराम लो इससे मृत्यु सोते में हो जाएगी । परम आनंद कर्म मिथुन का आनंद लो इससे मृत्यु मैथुन अवस्था मुद्रा में हो जाएगी ।। एक बार जो जी्व आनंद के सुख को जागृत अवस्था में देख लेता है महसूस करने लगता है फिर उसे आनंद प्राप्त करने में भय नहीं लगता वह मृत्यु से नहीं डरता है और अपने जीवन को जीना सीख जाता है । क्योंकि प्रत्येक जीव के जीवन में जीवन के संग-संग मरने की प्रक्रिया चल रही है । बस अपनी नजर जीवन पक्ष पर जमाए रहो या जीवन में बार-बार अनेकों बार मृत्यु दर्शन करते हुए जीवन को जीते रहो । जीवन पर नजर जमाओ मृत्यु दर्शन क्षण पर नजर मत जमाओ । मृत्यु दर्शन क्षण पर नजर जमाना मृत्यु विषयक विचारों को अपने मन में बोकर अपना जीवन शंका ग्रस्त करते हुए अपने जीवन में बर-बार डर-डर कर जीना पड़ता है । मृत्यु दर्शन को देखने के बाद मृत्यु पक्ष की अनदेखी करते हुए आगे जीवन दर्शन की आशा में अपने विवेक को जागृत रखना यह इच्छा विवेक चिंतन ध्यान अवस्था पर निर्भर करता है कि तुमको जीवन दर्शन करने में ज्यादा आनंद आ रहा है तो तुम जीवन मार्ग में चलते रहोगे या तुमको इंद्रिय हीनता परम अंतर्मुखी होने पर जीवन जीने कै अंधापन या बहरापन से आनंद आने लगा है । इतने पर भी यदि तुम जागृत होकर संसार की अवहेलना में लगे हो अपना जीवन जीते हुए भी संसार की अनदेखी कर रहे हो तो तुमको मृत्यु मार्ग दर्शन करने में आनंद आने लगा है अब तुम मृत्यु मार्ग पर वृद्धता की ओर चल पढ़ोगे । जीवन के प्रति आसक्ति भाव घटने लगेगा जीवन के प्रति संसार के प्रति विरक्ति भाव बढ़ने लगेगा कर्म कार्य भाव घटने लगेगा जीवन के प्रति उदासीन त्याग भाव बढ़ने के तुम अपने आप मृत्यु मार्ग में चल पड़े हो।जीवन हो या मृत्यु मनुष्य को बस उसमें आनंद का ध्यान चिंतंन पर जागरूक रहना ह । तुम जीवन के जिस भी पक्ष पर जागरूक रहोगे तुम्हारी चेतना तुमको इस जीवन पथ पक्ष की ओर जीवन जिआने लगेगी अर्थात जीवन जीना भी जीत की इच्छा पर निर्भर करता है मृत्यु भी जीव की क्षय क्षण पर निर्भर करती है बस ध्यान चिंतन क्षण पर जागरूक रहने की जरूरत है! (१९)
इस पर आशुतोष दाधीच के विचार:- मृत्यु काल की सब सामग्री तैयार है मरने से पहले कफन तैयार है नया कफन बनाने के लिए कपास मरने से पहले तैयार हो चुका है कपास से नया कपड़ा बन चुका है । करने वाले के लिए ना नया कपास उगाना है नयाक नया कपड़ा नहीं बनाना है। जरा सा करने का अपने ही करके देख लो मुर्दे को उठाने के लिए आदमी तैयार हैं मृत्यु कार्य की पूर्णता करने के लिए नए आदमी नहीं बन , नए आदमी बनने के लिए नये बच्चे पैदा नहीं करने । जलाने की जगह भी नहीं ढूँढनी सब कुछ तैयार है कुछ नया नहीं लेना पड़ेगी फ्री है जलाने के लिए लकड़ी भी तैयार है परंतु इस मृत्यु कर्म के दायित्व को तुम स्वयं पूरा नहीं कर सकते इसलिए यह मृत्यु का दायित्व दूसरे का है । अर्थात मरना भी जीव की इच्छा पर ही चलता है। इसमें लकड़ी के लिए नए वृक्ष नहीं लगाने पड़ेंगे केवल स्वास बंद होने की देर है श्वास बंद होते ही यह सब सामग्री अपने आप जुट जाएगी । (२०)
इसी प्रकार से जन्म लेने के लिए आपसे पहले आपको जन्मदाता बाप जन्मदायिनी मां और सहायिका दाई धाय पहले तैयार मिलेंगे । (२०)
मृत्यु के पश्चात का अब जीवन का दूसरा पाठ जिसमें मृत्यु को भयंकर पीड़ादायक खतरनाक जीवन के विपरीत परिस्थितियों को समझा जाता है यह गति उन अज्ञानी लोगों को प्राप्त होती है जिन्होंने जीवन को तय अपनी इच्छा के अनुसार अपने ढंग से पूर्णता से लक्ष्य पूरित करके नहीं जिया होता । जो अपने जीवन लक्ष्य से भ्रमित होकर अपना जीवन लक्ष्य अपनी जीवन दिशा दूसरे लोगों के कहे अनुसार अपनाने से अपने जीवन को दूसरों के दिशा दशा निर्देशन के अनुसार जीने का प्रयत्न करते हैं । उन लोगों की मौत अक्सर कष्टकारी पीड़ादाई अनुभव इसलिए होती है क्योंकि उस मौत का चयन उन लोगों ने अपने लिए स्वयं नहीं किया बल्कि उस मौत का चयन भी उन लोगों के अनुसार अपनी जीवन पद्धति दूसरे के कहे अनुसार अपनाने के साथ किया था । (२१)
आजकल की भौतिकवादी सम्मान की आर्थिक सोच के चलते अब लोग मृत्यु से भी रोजगार करने लगे हैं । आज की तारीख में व्यक्ति का मरना भी बहुत अधिक महंगा हो गया है । अधिकतर धनी समर्थ समृद्ध लोग व्यक्ति को मृत्यु अवस्था के पूर्व मृत्यु अवस्था निवारण केंद्र अस्पताल में ले जाकर भर्ती कर देते हैं । जिसमें यदि मनुष्य की प्राकृतिक व्रत मृत्यु नहीं होती है । अस्पताल जीवनदाई केंद्र हैं जीवन हरण केंद्र नहीं , अस्पताल में व्यक्ति रोगी की अवस्था में जाता है । जो रोग से ठीक हो कर वापस घर आ जाता है । परंतु जिन लोगों की व्रत मृत्यु का समय आ जाता है ऐसे मनुष्य अस्पताल में भी ठीक नहीं होते अस्पताल में भी मर जाते हैं । ऐसे में उस अस्पताल के संचालक और डॉक्टर मरे हुए मनुष्य के परिवार से काफी अधिक मात्रा में आर्थिक दंड वसूलते हैं यहां तक कि मरने वाले व्यक्ति के परिवार पर उस व्यक्ति के अस्पताल में मरने पर बहुत अधिक प्रमाण में कर्ज चड़ जाता है । बात यहीं पर नहीं रुकती है मरने के पश्चात उस मनुष्य को यदि वह हिंदू नहीं है । तो उसके क्रियाकलाप में मृत्यु कर्म करने पर आर्थिक खर्च दफन करने में कफन दफन का खर्च थोड़ा आता है । यदि मरने वाला व्यक्ति हिंदू है तो ऐसे में उसका मृत्यु कर्म करने पर कफन जलन कर करने में इतना अधिक खर्च आता है । कि मनुष्य का दिवालिया तक निकलने की आशंका बन जाती है । मरने के पश्चात मृतक परिवार में मृत्यु भोज - मृत्यु भोज के पश्चात ब्रह्मभोज - ब्रह्म भोज के पश्चात जाति भोज - जाति भोज के पश्चात वार्षिक अंत्येष्टि - वार्षिक अंत्येष्टि के बाद प्रत्येक वर्ष श्राद्ध कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदू धर्म में जन्म लेना और मरना भी महंगा पड़ता है । हिंदू धर्म में जन्म और जीवन मरण की प्रक्रियाएं पंडितों के बड़े भाई ज्योतिषी लोगों /रोजी रिजक दाता अफसरों और मालिकों के आधीन हो जाती है जो जीवन जीवा का अतिरिक्त व्यर्थ शोषण कराती है ।जिसमें मनुष्य अपनी पूरी मानव जातक आयु न जीकर जातक आयु से पहले तरह तरह के रोगों में घिर कर, हृदयाघात मस्तिष्क आधात से समय पूर्व मरने को बाध्य हो जाता है। (२२)
यह तो था उस काल मौत का वर्णन जिसमें व्यक्ति एक निश्चित अवधि प्रवृत्ति कॉल मौत सामाजिक मृत्य का वर्णन ।
अब इससे भी दूसरा मृत्यु का एक दूसरा और पक्षक। अकाल मौत या आकस्मिक मृत्यु और खतरनाक मृत्यु का कारण है जिसे अकाल मौत कहा गया है । जिसमें अस्पताल का खर्च ने जुड़ जाने से साथ-साथ अदालत का , पुलिस का भी खर्च शामिल हो जाता है और जो व्यक्ति अकाल मौत का कारण बना है उस व्यक्ति के साथ पारिवारिक रंजिश का संबंध बन जाने से मनुष्य का जीवन और भी ज्यादा खतरनाक स्थिति में चला जाता है । ऐसे में जो व्यक्ति अकाल मौत मर गया वह मर गया परं लोग उस अकाल मौत का कारण बने व्यक्ति से दुश्मनी मान लेते हैं ऐसे में दोनों पक्षों के मध्य खूनी रंजिश का खेल शुरू हो जाता है । दोनों पक्ष के लोग अधिकांशतः अकाल मौत मरने लगते हैं । शायद ही कोई भाग्यशाली व्यक्ति होता ह जो संघर्ष स्थान को छोड़कर भाग जाता है वही अपनी प्राकृतिक मौत मर पाता है । नहीं तो जो लोग अकाल मृत्यु और संघर्ष स्थल पर स्थान पर अड़कर जमे रहते हैं ।वह अक्सर अकाल मौत मरते रहत फौजदारी में , परंतु जो लोग फौजदारी के संघर्ष के बाद बच जाते हैं उनके जीवन का अधिकांश का दुर्पयोग अदालतों में मुकदमे बाजी में जिला न्यायालय उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय में व्यतीत होता है परंतु मृत्यु का न्याय नहीं मिल सकता ऐसे में नासमझ लोग मृत्यु को रोग बनाकर अपनी संतान को देकर दुनिया से जाते रहते हैं । मृत्यु को ठीक ना समझ पाने के कारण ...ः। (२३)