प्रत्येक जीव की गतिविधियां उसके नियंत्रण केंद्र मन मेँ भरी पूर्व सूचनाएं ज्ञान पर निर्भर करती हैं जो उसके दिमाग में ध्वनि व चित्रों के रूप में शब्द श्रंखला वाक्य चित्र श्रृंखला वीडियो के द्वारा उसके मस्तिष्क में भरी/डाली जाती हैं ।जो स्थिर होकर स्मृति के रूप अर्जित ज्ञान ज्ञापन ज्ञापति में बदलकर उसे ज्ञानी बनाया करती हैं ।जो और भी आगे भविष्य में निरंतरता से स्थिर स्थित होकर दीर्घकालीन स्थित स्थिर गुण अनुवांशिकता गुणों में बदल जाती हैं इन्ही अनुवांशिक गुण लक्षणों की उपस्थिति आधार पर जीव की आकृति आकर भाव गुण प्रभाव ,अभाव ,स्वभाव ,कार्य पद्धति का निर्माण होता है। दुनिया में सभी ज्ञानी अज्ञानी अल्पज्ञानी जीव एक दूसरे जीव के आकृति (शरीर) आकार (शरीर दशा दिशा अवस्था )भाव (शरीर की कार्य क्षमता स्थिति )को देखते हैं ।। उस जीव के प्रभाव (अच्छा बुरा करने की क्षमता )अभाव(साधन उपलब्धता में कमी )स्वभाव (अपने भावों का साधना नियंत्रण कला प्रतिक्रिया)सुभाव (अपने लिए अच्छी प्रतिक्रिया)दुर्भावना(दूसरे के लिए बुरी प्रतिक्रिया )शायद ही कोई देख पाने में समर्थ होता है।सामान्यत साधारण जीवों को ये जीव का अपना निजी क्रिया व्यवहार नहीं दिखाई देता है जिस पर उसकी सभी प्रकार की गतिप्रगति, दुरगति सदगति निर्भर करती हैं ।
यदि जीव अति महत्वपूर्ण आवश्यक वांछित सूचनाएं ज्ञान के रूप में माता पिता गुरु जनों से ले लेता है तो उसकी प्रगति सदगति निर्धारित तय हो जाती है । यदि जीव को आवश्यक वांछित सूचनाएंसही तरीके से ज्ञान रूप में मां बाप गुरु दे देते हैं तो प्रगति निश्चित है ।। यदि उसे वे जीवन की वांछित आवश्यक सूचनाएं नहीं मिलती हैं या वह नहीं लेता है तो उसकी दुर्गति अधोगति निश्चित /तय है।चाहे इस ज्ञान दाता प्रक्रिया में मां बाप गुरु गूंगे मूक हैं कारण उनका अज्ञानी अल्पज्ञानी अशिक्षित हो या वे भय वश सभ्यता संस्कृति संसकार वश ज्ञान ज्ञापन के समय वाकछल कौशल प्रयुक्त करते हों ।जानते हुए, जानबूझकर, भय लालच वश सही सद् ज्ञान देना उचित न समझते हो ंं , संसारिक ज्ञान बखेड़ों झगड़ों से बचने के लिए। द्रोणाचार्य, शंम्मूक प्रकरण ।। सही सूचनाएं सटीक ज्ञान विकास प्रगति की दिशा के मार्ग को खोलतीं हैं तो दूसरी ओर गलत सूचनाएँ भ्रमित ज्ञान जीवों को विनाश भटकाव के मार्ग में धकेलते हुए उनका जीवन उद्देश्य लक्ष्य बदलाव करके उन्हें पतन के गर्तों में ऐसा बुरी तरह से गिरा देती हैं कि उनकी संतति /संतान भी उस पतन के गर्त गरीबी दरिद्रता निर्धनता के गर्त /गड्ढे में से बाहर नहीं निकल पाती है।
मैं स्वयं इस ज्ञान छल कपट की भ्रमज्ञान से उत्पन्न समस्याओं से इतना परेशान हुआ कि इन्होंने मुझे समय से पहले जवान करके समय से पहले बुड्ढा कर दिया ।इसका मतलब/रहस्य मुझे 55साल के बाद समझ में आया जिसे में बयां कर रहा हूँ ।:-हमारे जीवन में विकास और विनाश के मध्य में नियंत्रण अवस्था होती है जिसमें हम अपना जीवन दूसरों के प्रभाव से नियंत्रित होकर जिया करते हैं ।जो लोग अपने नियंत्रण को अपने हाथ में ले लेते हैं उनकी प्रगति सद्गति होती है और जिनके मन मस्तिष्क का नियंत्रण दूसरे के हाथ में चला जाता है उसकी दुर्गति /अधोगति निश्चित है ।और जो इन दोनों के मध्य में रहता है वह जब स्वतंत्र होता ह खुशी होता है और जब दूसरे फिरोंन बुद्धि लोगों का साथ होता है तब दुखी /परेशान होता है ।ये फिरोंन बुद्धि लोग बने ही दूसरे लोगों को परेशान करने के लिए और नियुक्ति इनकी प्रकृति करती है । ये ना खुद से दूर होते हैं न अपने उत्पीड़क जीव को दूर होने देते हैं । मजा आता है ईनको कमजोर लोगों को झूठमूठ का दुश्मन बना कर कमजोर असहयोगी लोगों से नूराँ /दिखावटी कुश्ती लड़कर कमजोर लोगों की हड्डियाँ चटकाने में।सभी जीवों का जीवन विकास और विनाश के मध्य संघर्ष अवस्थाओं में रहता है जब तक संघर्ष ह संघर्ष में लड़ने की बचने की जीवन प्रियता से भागने की इच्छा होते हुए कर्मफल परिणाम देखने की जीवन जीने की इच्छा है, तभी तक जीवन है। संघर्ष खत्म होने पर विरक्ति भाव उत्पन्न होता है जिसके बाद जीव पहले कर्म भाव त्याग कर अकर्मण्य होता है फिर कोई भी कर्मफल परिणाम देखने की इच्छा न होने पर परमपलायनवादी बनकर मृत्यु मार्ग पर चल पड़ता है। यह जीवन संघर्ष मरने के बाद समाप्त होता है यह जीवन संघर्ष मनुष्य की जागरूकता आवश्यक जीवन सूचनाओं के संग्रह पर निर्भर करता है जो रीति रिवाज नीति/नियम कानून :अनीति कुरीति के मध्यांक मेँ रहता है।जिसमें अज्ञान की अधिकता से विनाश , सत्य ज्ञान की अधिक मात्रा में होने से विकास और असत्य ज्ञान ,भ्रमज्ञान, मित्थ्या ज्ञान काल्पनिक ज्ञान ,विपरीत ज्ञान से जीवन में निरंतरता बनती है ।
जिन लोगों मेँ अपनी निजी मानसिक ऊर्जा क्षमता शारीरिक ऊर्जा क्षमता का सही सटीक आँकलन स्वयं करने का गुण नहीं होता है जिसे निजी ऊर्जा स्तर स्टैमिना या देरी तक अपनी ऊर्जा को आप प्रयोग करने का गुण नहीं होता है अर्थात जिनकी सोच प्रथम ईश्वरीय द्वितियक प्राकृतिक न होकर तृतीय मानवीय मूल्यों संवेदनाओं पर आधारित होती है या चतुर्थ श्रेणी पशु भाव प्रधान मतलब और स्वार्थ पर आधारित होती है वे जीवन में कम से भी कम प्रगति करते हैं ।जीवन भर परेशान भ्रमित अवस्था में रहते हैं ।।जिन लोगों का ऊर्जा स्तर परमाणु कक्षा KLMNOके अनुसार K से काईनेटिक Lसे लेबर /मजदूर M मशीनी या मैकेनिकल N नोटोरियस काम को पूरा करने के लिए लगातार लगे रहते हैं एक काम को पूरा करने पर दूसरा काम में फिर से लग जाते हैं धुन्नीराम टाईप , Oसे सभी को नियंत्रण करने में रूचि रखते हैं हर काम को लेकर करने लग जाते हैं चाहे इनसे वह काम नहीं आता है। इनको चुनौती /चेतावनी प्रिय है ।।
परंतु जो लोग अपनी मानसिक क्षमता शारीरिक क्षमता को स्वयं पहचान ने का गुण होता है जिनका निजी ऊर्जा स्तर स्टैमिना उच्च स्तरीय होता है नींद कम आलस्य नहीं होता है देरी तक अपनी ऊर्जा को आप प्रयोग करने का गुंण होता है ।जो देर तक सोच विचार करने की काम करने की कला सीख लेते हैं या उनमें यह गुंण अनुवांशिक होता है उनकी माता का ऊर्जा स्तर उच्च होता है ऐसे लोग अपने जीवन को ईश्वरीय विधान नियमों के अनुसार अपने जीवन को प्राकृतिक रूप से जीते हैं ।जीवन में प्रगति तरक्की सद् गति यही करते हैं ।इनके जीवन में और लोगों की तुलनामें समस्याएं बाधाएँ कम से कम तर आती हैं ।अपने जीवन को ईश्वरीय आदेशानुसार जीने के गुंण से ईश्वर सदैव इनको अपनी छत्रछाया मेँ रखता है ईनकी असमय कुसमय में मदद करता है और प्रकृति के नियमों के अनुसार जीने से प्रकृति इनकी सुरक्षा आप करती है ।इनको आयु से पहले नहीं मरने देती है।जबतक कि इनका जीवन उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता है। इनके सभी संसारिक कार्य पूरे नहीं हो जाते हैं ये दुनिया से जल्दी नहीं जाते हैं ।
जो लोग अपने जीवन को मानव नियम से जीते हैं ये अनिश्चितता से अपने जीवन को कृत्रिमता से जीते हैं ये मानव समाज में सम्मानित जीवन जीते हैं ।इनके जीवन में भ्रम की प्रधानता होती है ।इनको कभी अच्छे कर्म का फल अच्छा तो कभी बुरा मिलता है जिससे ये अनिर्णायक भ्रम अवस्था में होते हैं कभी कामयाब तो कभी नहीं नाकामयाब वजह यह है कि यह तत्व ज्ञानी /सत्य ज्ञानी न होकर सत्व ज्ञानी शार्ट कट वाले होते हैं । और जो अपने जीवन को पशु ज नियम पूर्ण अनिश्चितता से जीते हैं वे तो क्या उनकी संतति /संतान भी दुखों से घिरी हुई रहती है ।ये केवल अपने जीने के लिए भी कम से कम परिश्रम करनेवाले आल्सी भीरु लालची होते हैं ।ये अपने जीवन को पूरी तरह से दूसरों के नियंत्रण में जीते हैं पराधीन गरीब लोग ।
गरीब लोगों में निजी ऊर्जा उपयोग करने की समझ नहीं होती है इनका स्टैमिना (देरी तक काम करने की क्षमता) ऊर्जा स्तर कम होता है क्यों कि ये ऊर्जा स्रोत भोजन के प्रति जागरूक नहीं होते हैं।इनकी सोच सिर्फ अप तक या अपने दिमाग तक भी नहीं होती है। यह अपने हित को आप नहीं पहचानता है। अपने हित के लिए आप खुद नहीं सोच सकता है। इनकी सोच बंद होती है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ बुद्धि अपने हित के लिए दूसरे लोगों से चाहता है कि दूसरे लोग उसके हित के लिए सोचें लेकिन वह अपने हित में सोचने वाले को धन्यवाद देना नहीं चाहता है उसे हर चीज बिना श्रम के मुफ्त में चाहिए । नतीजा धन्यवाद भी मुफ्त में नहीं मिलता है दाता के दरवाजे ऐसे मुफ्त खोरा समाज के लिए बंद रहते हैं ।अब वह अपना जीवन जीये अपने हाल से , कोई भी बुद्धि जीवी ऐसे फोकटा के हित सोचने को अपना समय क्यों खराब करेगा ।
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