जीव के कार्य करने कार्य क्षमता को प्रभावित करने की जैविक \ पुण्य अग्नि कितने प्रकार की है?

जीवों के  शरीर  जिस अग्नि के प्रभाव से बनते हैं वह गर्भाशय अग्नि कहीं जाती है । इसके अलावा जीवो के शरीर में जिस अग्नि के प्रभाव से कार्य करने की क्षमता होती हैं वह शरीर अग्नि कही जाती है । जीव के शरीर के अंदर जो भी कार्य हो रहा है या सृष्टि में कहीं पर भी कार्य हो रहा है उस कार्य को संपन्न कराने वाली शरीर अग्नि उसमें तीन रूपों में अंदर, मध्य, वाहय, रूप से स्थित होती है हम वही अग्नि प्रभाव को पेशिय ऊर्जा स्तर को देखते हैं अंदर मध्य की अग्नि प्रभाव को नहीं देखते हैं इसके अलावा यह अग्नि अनेक दूसरे नामों से भी पुकारी जाती है जैसे जात वेदा अग्नि  ( किसी एक जाति विशेष समूह के अंतर्गत ऊर्जा स्तर जैसे ब्राह्मणों में बौद्धिक योग्यता , क्षत्रिय जाति में फुर्तीलापन वैश्य जाति में धूर्तता  ) नचिकेता अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक मनुष्य के निजी शरीर में ऊर्जा स्तर) पाप अग्नि के अंतर्गत   ( किसी मनुष्य में अकारण अचानक हिंसा का ऊर्जा स्तर )   पुण्य अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक विशेष मनुष्य में उसके कुल में उसकी जाति में उसके अनुयाई समर्थक लोगों में एक निश्चित कार्य पूर्णता का ऊर्जा स्तर जिससे उनका जीवन खुशहाल समृद्ध बनता है  ) सामान्य जीवन अग्नि जैविक  जिसके अनुसार जीवों का जीवन सुख दुख के मध्य ईश्वरीय शक्ति कृपा, ऐश्वर्या कृपा पितर माता-पिता गुरु कृपा होते हुए अपना जीवन दूसरे लोगों की दुआ बददुआ की प्रभावशक्ति से जीते हैं। । उपरोक्त इन सभी जीवन जीने की जैविक अग्नि में पुण्य अग्नि का विशेष महत्व ह । जिसके आधार पर साधारण आत्मा भी ईश्वरीय शक्तियुक्त समानसिद्ध होता है । पुण्य अग्नि वाला पुरुष सामन्य आत्मा बल प्रभाव से बढ़ाकर महान परमात्मा स्तर तक अपना प्रभाव बढ़ा लेताहै ।
संसार में विशेष संभव अलौकिक कार्य विशेष ज उनकी पुण्य अग्नि के प्रभाव से संभव होते हैं । जैसे राज योग परिवार में समाज में देश में शासन सत्ता लाभ केवल पुण्यअग्नि के प्रभाव से संभव होता है । बल और बद्धि समय के प्रभाव से परिवर्तन शील होते हैं । इसके प्रभाव से कभी निर्बल बलवानों पर भारीपढते हैं , कभी मूर्ख विद्वानों पर भारी पडते हैं । परंतु पुण्यशीला आत्माओं पर हर कोई आसानी से वर्चस्वशील प्रभावी नहीं हो सकता । जैसे राम औरकृष्णा मैं संभव अलौकिक कार्य किए थे।

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