हमारी श्राद्ध वंशावली कैसे हैं

हमारी श्राद्ध वशावली
पूर्णमासी सर्व पितृ बाबा दिलसुख के पिताजी नवरंग नवरंग के पिताजी ज्योति 
दोज - पिताजी रामचरण शर्मा और उनके दादा दिलसुख 
तीज - 
चौथ :- हमारे बाबा वसुदेव
पंचमी:- बाबा झम्मन और पिताजी की दादी 
छट:- सर्व सत्ती दादी
सातवें 
आठवें:- बाबा मोहर सिंह जमीन घेरा 
नौंवी:- कन्हैया बाबा 
दसवीं:- 
एकादशी:- अम्मा और पिताजी की ताई
द्वादशी :- दादी भूरी * पिताजी ने बताया 
तृयोदशी: भूरी दादी 
चतुर्दशी :- 
अमावस्या:- 
बाबा यादराम का मालूम करना है 

जीव के कार्य करने कार्य क्षमता को प्रभावित करने की जैविक \ पुण्य अग्नि कितने प्रकार की है?

जीवों के  शरीर  जिस अग्नि के प्रभाव से बनते हैं वह गर्भाशय अग्नि कहीं जाती है । इसके अलावा जीवो के शरीर में जिस अग्नि के प्रभाव से कार्य करने की क्षमता होती हैं वह शरीर अग्नि कही जाती है । जीव के शरीर के अंदर जो भी कार्य हो रहा है या सृष्टि में कहीं पर भी कार्य हो रहा है उस कार्य को संपन्न कराने वाली शरीर अग्नि उसमें तीन रूपों में अंदर, मध्य, वाहय, रूप से स्थित होती है हम वही अग्नि प्रभाव को पेशिय ऊर्जा स्तर को देखते हैं अंदर मध्य की अग्नि प्रभाव को नहीं देखते हैं इसके अलावा यह अग्नि अनेक दूसरे नामों से भी पुकारी जाती है जैसे जात वेदा अग्नि  ( किसी एक जाति विशेष समूह के अंतर्गत ऊर्जा स्तर जैसे ब्राह्मणों में बौद्धिक योग्यता , क्षत्रिय जाति में फुर्तीलापन वैश्य जाति में धूर्तता  ) नचिकेता अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक मनुष्य के निजी शरीर में ऊर्जा स्तर) पाप अग्नि के अंतर्गत   ( किसी मनुष्य में अकारण अचानक हिंसा का ऊर्जा स्तर )   पुण्य अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक विशेष मनुष्य में उसके कुल में उसकी जाति में उसके अनुयाई समर्थक लोगों में एक निश्चित कार्य पूर्णता का ऊर्जा स्तर जिससे उनका जीवन खुशहाल समृद्ध बनता है  ) सामान्य जीवन अग्नि जैविक  जिसके अनुसार जीवों का जीवन सुख दुख के मध्य ईश्वरीय शक्ति कृपा, ऐश्वर्या कृपा पितर माता-पिता गुरु कृपा होते हुए अपना जीवन दूसरे लोगों की दुआ बददुआ की प्रभावशक्ति से जीते हैं। । उपरोक्त इन सभी जीवन जीने की जैविक अग्नि में पुण्य अग्नि का विशेष महत्व ह । जिसके आधार पर साधारण आत्मा भी ईश्वरीय शक्तियुक्त समानसिद्ध होता है । पुण्य अग्नि वाला पुरुष सामन्य आत्मा बल प्रभाव से बढ़ाकर महान परमात्मा स्तर तक अपना प्रभाव बढ़ा लेताहै ।
संसार में विशेष संभव अलौकिक कार्य विशेष ज उनकी पुण्य अग्नि के प्रभाव से संभव होते हैं । जैसे राज योग परिवार में समाज में देश में शासन सत्ता लाभ केवल पुण्यअग्नि के प्रभाव से संभव होता है । बल और बद्धि समय के प्रभाव से परिवर्तन शील होते हैं । इसके प्रभाव से कभी निर्बल बलवानों पर भारीपढते हैं , कभी मूर्ख विद्वानों पर भारी पडते हैं । परंतु पुण्यशीला आत्माओं पर हर कोई आसानी से वर्चस्वशील प्रभावी नहीं हो सकता । जैसे राम औरकृष्णा मैं संभव अलौकिक कार्य किए थे।

संस्कृति युद्ध, धर्म युद्ध, कर्म युद्ध /क्रूसेड वार आदि कितने प्रकार के युद्ध हुआ करते हैं?

क्रूसेड वार /संस्कृति युद्ध /जीवन में युद्ध पद्धति  के अंतर्गत युद्ध का मतलब होता है '-'…
, किसी भी मनुष्य का बिना कारण बिना विचार बिना दिमाग अकारण दूसरों को दुश्मन समझते हुए उन्हें सह परिवार से समाज नष्ट करने की मानवीय  हिंसा की प्रवृत्ति , ययह युद्धकी प्रवृत्ति केवल मनुष्य में पाई जाती है पशुओं में नहीं पाई जाती है।  जिसके अतर्गत एक मनुष्य अनेक मनुष्य के समूह को नष्ट करने की  अकारण हिंसक प्रवृत्ति रखता है । मनुष्य की यह  हिंसा प्रवृत्ति उसकी सेना उसके मंतव्य की समर्थक मित्र मडली की संख्या के बाहुबल पर निर्भर करती है । यदि मनुष्य व्यापक अकेला हिंसा करता है तो उसकी यह हिंसक प्रवत्ति तो संघर्ष लड़ाई कहींजाती है । परंतु जब एक मनुष्य अपने दिमाग के हिंसा को अनेक मनुष्य के दिमाग में बौकर या बीजारोपण करके अनेकलोगों के अकारणहिंसा को हिंसा के स्तर को सीमित सेलेकर असीमितहिंसा अनंत हिंसा की ओर ले जाताहै के जिसमें मानवीय  हिंसा सीमाहीन होने लगती है  एक क्षेत्र के। लोग दूसरे क्षेत्र के लोगों को अकारण करने नष्ट करने पर उद्यत हो जाते हैं ।   तू यह सीमाहीन नियम हीन हिंसा युद्ध कहीं जाती है जिसमें हिंसक सीमा क्षेत्र का दायरा उसे क्षेत्र विशेष में व्याप्त हिंसा पर निर्भर करता है । जब यह हिंसा दो परिवारों के बीच कारण बनती है तो इसे पारिवारिक हिंसा कहा जाता हैं। परंतु जब यह हिंसा परिवार के स्तर से आगे बढ़कर जाति धर्म के स्तर पर उतर आती है तो इसे सामूहिकहिंसा सांप्रदायिक हिंसा कहां जाता है । जब इस सामूहिक सांप्रदायिक हिंसा का कारण जाति बनती है तो इससे जाति जब यह सामूहिक हिंसा का कारण धर्म बनता है तो इसे धार्मिक हिंसा या धर्म युद्ध /  क्रूसेडर वार \  संस्कृति युद्ध । आदि अनेक हिंसक शब्दावलियों से विभूषित किया जाता है । जब यह हिंसा राष्ट्रीय व्यापक क्षेत्र में फैल जाती है तो इस ग्रह युद्ध कहा जाता है । जब यह सामूहिक हिंसा दो राष्ट्रों के बीच आयोजित होती है जिसमें एक राष्ट्र के लोग दूसरे राष्ट्र के लोगों को कारण मरने पर उदित हो जाते हैं। तब इस राष्ट्र युद्ध कहते हैं।। जब दो या दो से अधिक राष्ट्र अकारण एक दूसरे से उलझ कर हिंसक होकर एक दूसरे राष्ट्र को नष्ट करने का उद्यम करने लगते हैं तो इस महायुद्ध कहा जाता है जब यह हिंसा का डेरा धरती के व्यापक गोलार्ध में फैल जाता है तब इसे विश्व युद्ध कहा जाता है। 
          वर्तमान समयमें इस्लामी संस्कृति दुनियामें मौजूद अन्य सभी संस्कृतियों के विनाश पर नष्ट करने पर उद्योग चल रहा है । यह अतीत के पुराने समय में अनेक  संस्कृतियों को पूर्व में समाप्त कर चुकी है जैसे अरब क्षेत्र में यहूदी इजरायल सस्कृति , पुराने ग्रीस   की यूनानी  सस्कृति , मिश्र इजिप्ट की संस्कृति , तुर्की की उस्मानिया संस्कृति , पर्शिया फारस बेबीलोन की इराक की सभ्यता संस्कृति , ईरान की पर्शियन पारसी संस्कृति , वर्तमान समय में इसका विशेष संघर्ष यूरोपकी क्रिश्चियन इसाई संस्कृति , भारतीय क्षेत्रकी हिंदू सस्कृति के अंतर्गत यह भारतीय क्षेत्रमें पाकिस्तान अफ़गानिस्तान कश्मीर बंगाल केरल क्षेत्र में हिंदू संस्कृति को विलुप्त कर चुकी है । वर्तमान समय में इसका व्यापक विरोध सघर्ष हिंदी भाषीक्षेत्र उत्तर प्रदेश राजस्थान बिहार मध्य प्रदेश हिमाचल प्रदश पंजाब क्षेत्रमें चल रहा है। जबकि यह पूर्वोत्तर भारत पर अपना आधिपत्य हिंदीभाषी क्षेत्र पर स्थापित कर चुकीहै ।