परंतु कभी-कभी कुछ नारियां भी नारी तन मन का शरीर होते हुए अनुचित लालन पालन के परिवेश से विपरीत गलत शिक्षा दीक्षा हो जाने से नारी का मन परिवर्तन हो जाने से मानसिक रूप से पुरुष शारीरिक रूप से नारी होते हुए पुरुषों के समान आक्रामक मन वाली बलात्कारी मनोप्रवृत्ति की हो जाती है। उनकी भी सामान्यनिद्रा ना होकर असामान्य-निद्रा हो जाने से उनकी नींद उड़ी उड़ी रहती है वह बेचैन आत्मा ठीक से नहीं सो पाती है । वह भी अति ऊर्जावान होकर अपने तन मन से बलात्कार करने लग जाती हैं । नतीजा अपनी प्राकृतिक सौम्यता दयालुता कृपालुता मातृत्व वात्सल्यता को खोने लगती हैं । तब उनमें सेवक मन के बजाय अधिकारी मन बन जाने पर पुरुषोचित गुण लक्षण उदित हो जाते हैं। जिससे उनकी सृज्या प्रज्या प्रजनन क्षमता घट जाती है वे पुरुषों के समान विरजा होने लगती है।उनकी प्रजनन क्षमता अति कम हो जाने से वो बंध्या तक हो सकती हैं। नारी को सृजनशीला निर्माणी बनाने के लिए विधाता ने नर की तुलना में अधिक निद्रालू आलसी अल्प परिश्रमी अल्प ऊर्जाशील बनाया है । जिसके अत्पयधिक परिश्रमी प्रवृत्ति से उसका गर्भस्थ भ्रूण नष्ट न होने पाए । इसके विपरीत पुरुष को उच्च स्तरीय आक्रामक ऊर्जावान बनाया है जिसकी अतिरिक्त ऊर्जा को नए शुक्र रूप में ग्रहण करके नारी नए जीव का सृजन करने में समर्थ हो पाती है
उच्च रक्त शर्करा का कारण अति महत्वाकांक्षा का बढ़ा-बड़ा करके अनुच्छेदित असंभव अनावश्यक चिंतन प्रवृत्ति डर्रू-स्वभाव
वर्तमान समय में भारत में बिना रोग कारक से पीड़ित अनेकों नए रोग केवल मनुष्यों में आ गए हैं । जो बिना वायरस बैक्टीरिया सूक्ष्म और वृहद कृमि सूक्ष्म-आर्थ्रोपोडा जीवों के बिना संक्रमण के उत्पन्न हो गए हैं जिनके उत्पन्न हो जाने से अनेकों को मनुष्यों के जीवन में उनकी कार्य क्षमता घट जाने से उनको निजी समस्या पारिवारिक समस्या सामाजिक समस्याएं बढ़ जाने से अचानक से उन रोगी लोगों के कारण उनके निजीरोग राष्ट्रीय समस्या धर्म समस्या बन गए है । जो प्रत्येक मनुष्य को उसका जीवन जीने में उसकी शारीरिक मानसिक कार्य क्षमता को घटाकर उसके जीवन जीने में बाधा उत्पन्न कर रहे है । जैसे बिना किसी कार्य के रक्त में अनावश्यक उच्चस्तरीय शर्करा जनित व्याधियां प्रमेह मधुमेह (शुगर) ब्लडप्रेशर , बिना किसी दर्द डर /भय के शरीर में भीतर गांठ आंतरिक अगों में कैंसर, शरीर पर बाहर हथेलियां पैरों में गांठ, त्वचा पर प्राकृतिक रंग से हटकर काले लाल कत्थई खुजई अप्राकृतिक धब्बे उत्पन्न होने लगे है । जिसका मूल कारण मन में बेचैनी से मन में गांठ लग जाने पर अनावश्यक असंभव अप्राकृतिक चिंतन से बिना वायरस बैक्टीरिया संक्रमण के तरह-तरह के नवीनतम रोग उत्पन्न हो रहे हैं । जिनका मुख्य कारण मनुष्य के मन में उसके निजी पारिवारिक सामाजिक जीवन पद्धति स्तर से दो-तीन स्तर ऊंचे स्तर की जीवन प्रणाली की सोच रखने की मनोवृति असंभव अनावश्यक महत्वाकांक्षा का पनपना है । या उसके मन में अति उच्चस्तरीय महत्वाकांक्षाओं का मन में बैठ जाना है। जो उसकी प्राकृतिक रूप से जीवन जीने की मौलिक चिंतन पद्धति कार्य पद्धति को विकृत करके उसके मन को व्यग्र सुपर उग्र बेचैन बनाकर उसकी नींद उड़ा देता है। जिससे वह रात में ठीक से 5 से 6 घंटे की एक नींद नहीं सो पाता है । उसकी निद्रा भूख मल मूत्र वेग अप्राकृतिक हो जाते हैं। शारीरिक जैविक क्रियाएं मंद या अनियंत्रित हो जाने से वह अनिद्रा (रात में ठीक से एक पूरी नीद नहीं सो पाता ) अजीर्णता ( उसको खाया पिया ठीक से नहीं पचता) कब्जियत(उसे पुरीषक्षय अल्प मल शुष्क मल लीद जैसा आता है )मूत्रबाधा का रोगी (बहुमूत्र अल्पमूत्र रुक-रुक कर आता है) वह बिना संक्रमण का रोगी बन जाता है। उपरोक्त इन सभी रोगों का कारण उसके मन में/उसके प्राण में उसके अपने शरीर के साथ स्वंय ब्लात्कार करने की मानवीय प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। जिससे वह परिश्रम से थका हुआ होने पर भी काम करने लगता है करता रहता है। जब उसकी यह स्वयं बलात्कारी प्रवृत्ति उसके तन मन लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त निर्धारित जैविक सीमा मानकों से आगे बढ़ जाती है । तो बेचैनी से उसके अवचेतन मन की सेटिंग खराब हो जाती है उसके सपनों में नारी पात्रों की संख्या बढ़जने से मन में अतिरिक्त अनावश्यक भय बैठ जाने का पता लगता है जिससे उसको निद्रा समस्या उत्पन्न हो जाती है। अनिद्रा समस्या के रोगी का उसकी निद्रा का उसकी शरीर लिंग की आवश्यकता के निर्धारत मानकों से कम हो जाना है। वह अपने तन मन शरीर की प्रकृति प्रदत्त निश्चित लिंगीय पहचान के अनुसार नर नारी के प्राकृतिक शरीर रूप रचना के अनुसार व्यवहार नहीं करता । जैसे पुरुष शरीर होते हुए वह अधिक भय के मन मे बैठ जाने पर वह निर्भय निडर आक्रामक मन: स्थिति का पुरुष नहीं रहता , अपितु स्त्री सामान डर्रू शंकालु चिंतन करने वाला अनावश्यक चिंतन करने वाला लड़ाई झगड़े से बचाने वाला पंगाहीन व्यर्थ की निरर्थक चिंताएं करने वाला चिंतालु मनुष्य हो जाता है ।* अनावश्यक बलात्कार सहन करना दूसरों का अप्रिय व्यवहार बर्दाश्त करना उसकी नियति मनोवृति हो जाती है या वह अपने शरीर के मन के साथ खुद से ही बलात्कार करने लगता है, इतना ही नहीं वह दूसरे लोगों को भी अपने तन मन के साथ बलात्कार करने की अनुमति देने लेने लगता है वह सर्व सुलभ सहयोगी हातिम भाई बन जाता है*। वह अपने दूसरों के अनावश्यक काम के भार से दबा हुआ भी थकित तन मन: स्थिति में चाय पी पी कर जाग-जाग कर थका हुआ भी काम करता रहता है अपने तनमन को विश्राम नहीं करने देता।
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