रक्त का उच्च शर्करा व्याधि रोग प्रमेह मधुमेह कैसे होता है

सभी प्राणियों के शरीर की तन मन धन की सक्रियता और निष्क्रियता उन प्राणियों के द्वारा अपनाए गए स्वीकार किए गए शब्दों की ध्वनि की आवृत्ति आयाम तारत्व तारतम्य पर आधारित  कर्तव्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा की निरंतर दैनिक उपलब्धि मात्रा मंत्र मंत्री हित हिट प्रभाव पर निर्भर है। किसी भी मनुष्य को पूर्णतया निरोग होने के लिए शरीर के रोग निदान के लिए औषधि से रोग निदान के लिए सद्ज्ञान सत्यज्ञान का होना परम आवश्यक है । कारण की अवचेतन मन सदैव सत्य को स्वीकार करता है । सत्यता के साथ रहते हुए शांतचित से शरीर की जैविक क्रियाओं  का क्रियान्वयन करता हुआ प्रत्येक मनुष्य  को उसकी जातक आयु के अनुसार उसकी निश्चित जीवन अवधि तक जीने देता है। परंतु हाइपोकांड्राइसिस मनोरोगी का मन असत्य बातों को भी सहजता से स्वीकार करने लगता है । जब उसके मन में सत्य बातें अधिकांश मात्रा प्रमाण में एकत्रित हो जाती हैं तो उसकी मन मरने बुझने क्लेशित होने के जीवन विकल्प के अनुसार अपनी सेटिंग फिर से चेंज करने का प्रयास करने लगता है मन मरने पर पूरी तरह से परिवर्तित होकर नया मन बनने का प्रयास करता है यदि मन पूरी तरह से बदलकर नया हो जाता है तो व्यक्तित्व पूरी तरह से बदल जाता है अवसादी अपराधी महात्मा हो सकता है, साधारण लोग अपराधी बन जाते हैं । यदि मन बुझने/दवने लगता है तो व्यक्ति अवसाद और अपराध की और चलने लगता है। यदि क्लेषित या मां की मालीनता के अनुसार दुखी  रहने लगता है तो मन मैं संचित क्लेश और दुख के अनुसार शरीर में तरह-तरह के विषय रसायन बनने से व्यक्ति तरह-तरह के शारीरिक मानसिक रोगों में ब्लड प्रेशर शुगर कैंसर डिप्रेशन चिंतन हीनता पागलपन में चला जाता है। अधिकतर ऐसे परम चिंतनशील लोगों की मुखाकृति और शरीर क्रशय/कमजोर पिचका चेहरा से दुबला कमजोर शरीर युक्त होते जाते हैं। कारण है शरीर के रक्त में उपलब्ध शर्करा का सम्यक समुचित प्रयोग ना कर पाने से रक्त का शर्करा स्तर बढ़ जाता है।
      लचर/भृष्ट अधिकांश बहुसंख्यक प्राणी अपने जीवन को असत्यता से जीते हुए कम आयु जीवन जीते हैं। परंतु जो लोग अपने जीवन को सत्यता ईमानदारी के अनुसार इशिता पर आधारित ईश्वरीय और प्राकृतिककृतिक नियमों से जीते हैं। उनका जीवन काल दीर्घायु होता है। परंतु जो लोग ईश्वरीय नियमों की अवहेलना करते हुए अपने जीवन को असत्यता और भ्रम कीअधिकता से जीते हैं इसका उनके अवचेतन मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सभी प्राणियों का अवचेतन मन अशांत  होने पर दुखी होकर जातक की आयु को नियंत्रित रखते हुए कम से काम करने का  प्रयास करता है अत्यंत दुखी होने पर उसकी आयु काम करने की कोशिश करता है दुख की अति से यह प्राणी को अकाल मौत मरने तक को बाध्य कर देता है। अवचेतन मन के क्रियाकलाप को शरीर को उसकी आवश्यकता के अनुसार ऊर्जा तूषणा स्थिति की व्यवस्था करने से अवचेतन मन का कार्य व्यवहार समझा पहचाना जा सकता है। यह महात्मा जनों की आयु बढ़ता है सामाजिक सांसारिक जनों को जातक आयु देता है सामाजिक लोगों की जातक आयु को रोगों से क्षय/कम करता है दुष्ट लोगों की जातक आयु को कुशाध्य असाध्य रोग उत्पन्न करके उनको समय से पहले समाप्त करने का प्रयास करता रहता है । उन्हें जीवन नियंत्रित करने वाले रज रोग  टीवी कैंसर एचआईवी आदि रोगों से अकाल मौत में मरने को बाध्य करता रहता है । 

प्रमेहसे उत्पन्न मधुमेह उच्च रक्त शर्करा व्याधि को रोग माना जाता है। जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से प्रमेय रोग नहीं अपित सत्य जनी व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार जीवन जीने के लिए ब्रह्मांड से प्रदत्त तूषणा ऊर्जा की निरंतर नैतिक व्यवस्था है । जो मनुष्य को उसकी इच्छा वासना आकांक्षा कर्म सस्कार  की अधिकता महत्वाकांक्षा के अनुसार प्राप्ति है। अल्प ज्ञानियों के लिए मधुमेह ही शरीर में समस्त रोगों का कारण है। दुष्ट जनों और अज्ञानयों के जीवन को नियंत्रित करने दुष्टकर्म की मात्रा के अनुसार उनके जीवन को समय से पहले समाप्त करने की यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था है। 
   आज आध्यात्मिकता के अभाव में , सत्यज्ञान से जीवन जीने की ईश्वरीय निर्देश पद्धति के अभाव में प्रमेय व्याधि मनुष्य की सामान्य जीवन पद्धति का बहुसंख्यक मानव आबादी का समस्याप्रद रोग बन गया है। जबकि यह कोई शरीर में संक्रमण या संक्रामक रोग नहीं है सूक्ष्म जीवों से वायरस बैक्टीरिया कृमि सूक्ष्म-आर्थ्रोपोडा जीवो की उपस्थिति से उत्पन्न शारीरिक रोग नहीं है ।  अपितु यह मनुष्य की सामान्य जीवन पद्धतिKLMNO के अनुसार अपना जीवन सामान्य तरीके से ना जी पाने के कारण अपने जीवन स्तर से अत्यधिक उच्च स्तर वाली कामनाओं उच्च महत्वाकांक्षाओं और आत्महीनता के बाइपोलर डसऑर्डर की संयुक्ति से दिमाग में बैठाने से उत्पन्न एक मनोरोग होता है । जो बाद में उसके मेटाबॉलिक सिस्टम को डिस्टर्ब करके उसके मेटाबॉलिक डिस ऑर्डर्स से उसके शरीर की जैविक ऊर्जा व्यवस्था प्रणाली को छिन्न भिन्न करके अनियंत्रित करके शारीरिक रोग में बदल जाता है । 
   प्रत्यय प्राणी के  अवचेतन मन संरचना बनावट के प्रभाव के अनुसार मनुष्य में जैविक आयु परिवर्तन चक्र चलता है जिसकी अति परिमाण में भ्रम और असत्यता ज्ञान संचय अनुसार वृद्धावस्था का आगमन कुछ मनुष्यों को समय पर कुछ को समय से पहले वृद्धा अवस्था का आगमन होता है। परंतु कभी-कभी अक्सर गलत शिक्षा दीक्षा गलत गुरु जनों के सानिध्य से ईश्वर और प्रकृति के आदेश नियमों की अवहेलना करने से प्रमेह व्याधि उत्पन्न हो जाता है या किसी निम्न स्तरीय आत्मा के उच्च स्तरीय परिवार में उत्पन्न होने पर निम्न बौद्धिक भौतिक स्तर होने से  या उच्च स्तरीय संत महात्मा कुकर्म दोष से आत्मा के निम्न स्तरीय परिवार मे उत्पन्न होने पर परिवार समाज में अति अनावश्यक संघर्षों की अधिकता से उसके मन-मस्तिष्क में  डर बैठ जाने से भी पारिवारिक संस्कार भेद विविधता से प्रमेह व्याधि रोग उत्पन्न  होता है।          जब तक  प्राणी के शरीर में उसको अपना जीवन जीने के लिए आवश्यक जैविक ऊर्जा निर्धारित जीवन पद्धति के अनुसार उपलब्ध होती है उसके मन में उसके जाति कुल वंश परिवार स्तर के अनुसार आकांक्षाएं होती है । जिनको वह अपने हित के अनुसार अपने निकट परिवार जनों से सीख कर एकत्रित करता है । जिनके मन में महत्वाकांक्षा नहीं होती उसको प्रमेह रोग नहीं हो सकता है। परंतु जब उसके मन में उसके जाति परिवार कुल स्तर से बहुत उच्च स्तर की महत्वाकांक्षाएं उसके मन मस्तिष्क में जमकर स्थिर हो जाती है ।  परंतु उस उच्च स्तरीय जीवन प्रणाली के लिए उसको ब्रह्मांड में  तूषणी ऊर्जा उसकी जैविक इच्छा के अनुसार उपलब्ध नहीं होती जिससे उसकी मन अशांत क्लेषित होने लगता है । मन की बेचैनी के अनुसार उसके रक्त वाहिकाओं में शर्करा का स्तर उसकी आवश्यकता के स्तर से उच्च रहने लगता है । तो उसके शरीर के अंग इंद्रियां दिमाग ठीक-ठाक काम नहीं करता है उसे ओवर थिंकिंग का मनोरोग हो जाता है , जिसमें बिना काम के सोचने का बिना काम के काम करने का रोग उत्पन्न हो जाता है जिसमें पहले इंद्रीहीनता बहरापन अंधापन उत्पन्न होता है बाद में शारीरिक ऊर्जा नियंत्रक अंग यकृत  पेनक्रियाज/ अग्नाशय ग्रंथिया विकार युक्त होकर धीरे-धीरे अपनी क्षमता क्षरिता उत्पन्न होने से रक्त का शर्करा स्तर सामान्य ना होने पर असामान्य उच्च ग्लाइसीमिया निम्न रक्त शर्करा स्तर हाइपोग्लासीमिया जैसी वृद्धावस्था के लक्षण उत्पन्न होने लगताहैं जिसमें वह हाइपर ग्लिकेमिया उत्पन्न होने पर रक्त शर्करा स्तर अत्यधिक बढ़ जाने पर मानसिक अवसाद और निष्क्रिय अवस्था में बिऐ किसी काम के चुपचाप बैठा-बैठा भी हाथ-पैर हिलाता चलाता रहता है। वृद्धावस्था में इसे पर्किंसन हाथ पैर कांपने का रोग उत्पन्न होता है । हाइपोग्लाइसीमिया की स्थिति में रक्त शर्करा स्तर सामान्य से कम हो जाने पर अपने जीवन को सक्रिय जीवन जीने के बजाय अपने जीवन को निष्क्रिय तरीके से आलसी निकम्मा होकर जीने लगता है ।    परंतु जिसका मस्तिष्क सक्रिय रहता है शरीर अनावश्यक रूप से बिना काम के काम करता रहता ह। उसे तूषणी अपनी जैविक इच्छा ऑन को पूरा करने के लिए आवश्यक ब्राह्मणी उत्पादन ऊर्जा/ब्राह्मंडीय प्रोडक्ट निर्माण कार्य की   की सही समझ ना होने से उसका दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है उसे यह बोध नहीं रहता कि इस समय क्या काम करना आवश्यक है ? और क्या अनावश्यक काम किया जा रहा है? वह बिना किसी रोग के पहली अवस्था में जैविक स्तर से उच्च महत्वाकांक्षा का मानसिक रोगी बन जाता है । तरह-तरह की कल्पना करता हुआ परिकल्पना रचता हुआ अपने वैचारिक जगत में पागलपन अवस्था में खोया रहने लगता है ।  जिसमें वह अपनी मानसिक ऊर्जा का व्यर्थ अकारण अपव्यय अनुपयोगी विचार चिंतन करता रहता है। जब सामान्य जीवन पद्धति के दौरान आवश्यकता के अनुसार अपने लिए उपयोगी विचार चिंतन की सामान्य विचार पद्धति के स्थान पर अपनी सामान्य जीवन पद्धति में विशेष जैविक स्तर की आवश्यकता से अधिक उच्च स्तर की जीवन पद्धति की विचार पद्धति अपनाने लगता है ।जब आनियंत्रित विचार प्रणाली में  अति उच्च स्तर की महत्वाकांक्षाएं अत्यधिक मात्रामें सम्मिलित हो जाती हैं । तब मनुष्य के जीवन को उसकी आदतों के अनुसार चलाने वाले अवचेतन मन पर अनावश्यक दवाव पड़ने लगता है । जिससे मनुष्य का मस्तिष्क अकारण कर्म के अनावश्यक कर्म में व्यस्त  रहने लगता है । वह अनुपयोगी अनावश्यक सूचनाओं पर अमूर्त चिंतन करनेलग जाता है।  ऐसे में उसके मस्तिष्क के अनावश्यक रूप से सक्रिय रहने पर उसके रक्त में शर्करा स्तर सामान्य से उच्च रहने लगता है। उसके दिमाग की सेटिंग डिस्टर्ब हो जाती है। इसका कारण उसे मनुष्य का अपन शरीर को अपनी आदतों के अनुसार चलने वाली अवचेतन मन की सेटिंग का खराब हो जाना है।
       उल्लेखनीय तथ्य यह है सभी जीव अपने जीवन को अपनी आदतों के अनुसार कम ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीते हैं  यदि जीव अपने जीवन को सक्रिय अवस्था में अत्यधिक मानसिक ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो उनके लिए अपने जीवन को जीना असंभव हो जाता है। अत्यधिक जाकर मानसिक ऊर्जा के उपयोग करने सेअवचेतन मन की सेटिंग खराब होने के साथ ही शरीर के संचालनकी सेटिंग भी अपने आप बिगड़ने लगती है। उसका उसके हृदय से नियंत्रण अनियंत्रित हो जाने से उसके हदय की धड़कन उसकी नाड़ी लगातार लंबे समय तक नियंत्रित न रहते हुए अनियंत्रित हो जाती है। उसके हृदय की धड़कन कभी अपने आप अचानक ही बढ़ जाती है तो कभी अपने आप अचानक घट जाती है जिससे उसके मस्तिष्क को पहुंचने वाले जीवन सिग्नल का तारत्र्व्य बिगड़ जाता है । उसका दिमाग उसका स्वास्थ्य सही होते हुए भी उसके दिमाग को गलत जीवन सिग्नल भेजने लगता है जैसे थकान से निद्रा उत्पन्न होने पर , भूख से रक्त शर्करा का स्तर गिरने पर उसको जीवन संकट की सूचना मृत्युक्षण की आपत्तिजनक स्थिति के रूप में भेजने लगता है। अब तू मरेगा मर सकता है तेरे जीवन को खतरा है। मल मूत्र त्याग जैसे आवश्यक कार्य करते समय उसमें भी जल्दी का सिग्नल भेजना लगता है जिससे मलमूत्र त्याग का तार्तव्य बिगड़ जाता है कब्ज रहने लगती है पेशाब रूक रुक उतरने लगता पितज प्रमेह उषण मूत्रता उत्पन्न होने लगती है। दोनों आंखों में एक साथ दृष्टि ध्यान केंद्रित करने के बजाय एक आंख में दृष्टि ध्यान केंद्रित करता हुआ दूसरे दृष्टि केंद्र आंखकी अनदेखी बेगौरी लंबे समय तक होने से अनजाने में आंखों मे दृष्टि दोष की समस्या उत्पन्न होने लगती है । एक नेत्र की ज्योति कम होते होते दृष्टि मंडता धुंधलापन उत्पन्न होने से बढ़कर से आगे दृष्टिखत्म तक हो जाती है दूसरे नेत्र की ज्योति सामान्य होती है तब पहले नेत्र में नेत्र दृष्टि मैं धुंधलापन उत्पन्न होने पर दृष्टि अक्षमता उत्पन्न होने पर मोतियाबिंद पर जाकर रुकती है । रक्त में शर्करा का सामान्य स्तर 70 से 200 तक है 200 से आगे 300 तक पहले यकृत पितदोष बाद में नेत्र दृष्टि दोष 400 से आगे किडनी दोष उत्पन्न होकर यह अंग खराब या निष्क्रिय भी हो जाते हैं।

मूर्ख विद्वान अल्प शिक्षित शिक्षक लोग कौन होते हैं कितने प्रकार के होते हैं इनकी क्या पहचान है।

यह प्रश्न बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी मनोवैज्ञानिक व्याधि समस्या पर आधारित है। जिसके अनुसार एक जीव का जीवन दो धुर्वो के दो शीर्ष प्रगति बिंदु उत्थान और पतन के बीच में फंसकर भ्रमित जैसा हो गया है उसे समझ नहीं आ रहा है कि उसके लिए क्या अच्छा है? क्या बुरा है? क्या श्रेष्ठ है? क्या अश्रेष्ठ है ? उसकी समझ नहीं आ रहा कि उत्थान के रूप में ऊंची गति करते हुए विकास के अंतिम उत्कर्ष बिंदु तक पहुंचा जाए या पतन के रूप में जीवन के सबसे नीचे अंतिम विकास बिंदु पर अधोगति से गिरते चलते हुए अंतिम निम्न स्तरीय बिंदु पतन तक पहुंच जाए ।
   इस जीवन लक्ष्य की प्राप्ति को पाने के लिए प्रत्येक जीव ने अपने लिए आवश्यक कर्म करने के लिए जीवन माध्यम सामग्री सम्यक उचित जैविक ऊर्जा का चयन किया है । जिसके सम्यक परिमाण के अनुसार वह एक निश्चित लिङ्गधारी प्राणी नर या मादा शरीर धारण करता है । अधिक  ऊर्जावान एक नर लिंगी या अल्प ऊर्जावान एक मादा लिंगी के शरीर का चयन करता है। परंतु सृष्टि नियंता प्रकृति या ईश्वर ने इसमें भी घपला कर दिया है या लोचा हो गया । 
        प्रकृति में हमें सामान्य तौर पर नहीं अपितु कभी-कभी कहीं पर इसका विपरीत भी देखा जाता है जिसके अनुसार अल्प ऊर्जावान नारी लिंगी प्राणी कभी-कभी अति ऊर्जावान नर लिंगी प्राणी पर भारी पड़ती हुई यह सिद्ध कर देती है कि नारी नर से कम नहीं ,  ना शारीरिक ऊर्जा क्षेत्र में ना मानसिक ऊर्जा क्षेत्र में बल्कि कभी-कभी तो वह नर प्राणी के लिए चुनौती ही नहीं उत्पन्न अपितु उस पर प्रभावी  सिद्ध हो जाती है । प्रत्येक जीव एक पक्षीय प्रदर्शित लिङ्गधारी गुंण होते हुए भी दूसरे पक्ष के विपरीत लिङ्गीय लक्षणों को दबाकर छिपाए रहता है । जैसे नर प्राणी में नारी प्राणी के  गुणधर्म छिपे रहते हैं । जिससे नर सदैव नर जैसे गुणों का प्रदर्शन नहीं करता अपितु नर में नारीयों जैसे अल्प ऊर्जावान गुणधर्म परिलक्षित होने लगते हैं । जिससे इस अर्ध नारीश्वर धारणा के अनुसार इस सृष्टि में उपद्रव संघर्ष की संभावना प्रत्येक प्राणी को आजीवन बनी रहती है। इसका परिणाम यह आता है कि सृष्टि में बुद्धिमान मूर्ख पर भारी पड़ते हैं बलवान निर्बल पर भारी पड़ते हैं यह नियम है । परंतु कभी-कभी मूर्ख भी विद्वानों पर अपनी अकड़ू अकाट्य तर्कशील ज्ञान बल पर विद्वानों पर भारी पड़ जाते हैं और निर्बल प्राणी के हाथों बलवान मारे जाते हैं । 
      हम सृष्टि में प्रकृति में मूर्ख उस मनुष्य को कहते हैं जिसमें चेतना का विकास वंछित प्रकार का नहीं हो पाया है। जैसा हम उसमें चेतना का विकास करना चाहते हैं  जैसा वह अपने लिए हितकारी विकासशील समृद्ध शाली विकसित होना चाहता है। जिसको हम शिक्षा देकर शिक्षित और बुद्धिमान बनाना चाहते थे । हम उस अनपढ़ अशिक्षित मंदबुद्धि को प्रबुद्ध महाबुद्धिमान व्यक्ति बनाकर उसका  विकास करना चाहते थे। परंतु वह बुद्धिहीन अशिक्षित होने से न प्रगति करना सीख पाया, न विकास करना सीख पाया अपितु प्रगति की फिराक में अपनी मानसिक क्षमता से ज्यादा ज्ञान अर्जित करके बौद्धिक रूप से भ्रमित हो जाने पर उसकी प्रगति शीलता की चाल रुक गई। विकास के फेर में/ लालच में उसका पतन हो रहा है । वह न अपना विकास कर पा रहा है न अपने जीवन को प्रगतिशीलता से जी रहा है उसकी जीवन पद्धति जैविक संघर्ष मंडल में गिरकर फंस जाने पर विकृत हो गई है । ऐसी विकृत मानसिकता वाला शिक्षित व्यक्ति एलजीबीटी ए आई क्यू ई LGBTAIQE की एक नवीनतम मानव सामाजिक ग्रुप में न अपना दीर्घकालीन हित समझ पाया है ना दूसरों का दीर्घकालीन हित को समझ पाया है। जिसके मूर्खतापूर्ण धूर्त कार्यों से अक्सर दूसरों का हित के लालच में हित के प्रयास में हितकर प्रयास करने पर हित होता रहता है । परंतु वह अपना हित करने के लालच में अक्सर अपना भी अहित करता रहता है । तरह-तरह की अपनों के लिएअज्ञात अरिष्ट आशंकाओं में व्यर्थ मानसिक चिंता करता हुआ अपनी मानसिक ऊर्जा का अपवहन चालन संवहन विकिरण द्वारा करता रहता है। उसको अपना अहित बोध नहीं होता है , तो दूसरों का हित बोध उनका की प्रगति को देखकर आवश्यक होता रहता है । 
    परंतु जो मनुष्य अपने बौद्धिक कार्यों द्वारा जानबूझकर अपना हित करने में कुशल दूसरों का अहित करने में पारंगत हो जाता है। वह मूर्ख नहीं हो सकता है। यह मूर्ख बौद्धिक चैतन्य जागरूकता  के आधार पर बुद्धिमानों में भी उनके अनेक प्रकार के होते हैं जिनको उनके कर्मकांडी लक्षणों के द्वारा उनको पहचाना जा सकता है । इनके दिमाग की सेटिंग खराब और विकृत होती है। इनके दिमाग की सेटिंग निजीकृत हितकारी ना होते हुए इनकी माता-पिता गुरु मित्र रिश्तेदार संबंधी के द्वारा दूसरों के लिए पर हितकारी परोपकारी होती है परंतु अपने लिए हानिकारक होती है। यह मानसिक रूप से बामन के बैल होते हैं जो ना अपने लिए उपयोगी होते हैं ना दूसरों के लिए उपयोगी होते हैं। इनके पास अपने विचार विचरणा नहीं होती । यह सदैव दूसरों के शब्दों का  उपयोग प्रयोग अपनी वार्तालाप के दौरान करते हैं।
          यह मूर्ख विद्वान शिक्षित लोग अपने मानसिक ऊर्जा का उपयोग सदुपयोग करना नहीं जानते कि कब उसे अपने दिमाग का उपयोग करना है ? कब दिमाग को आराम देना है ? इनका अपने दिमाग के स्मृति पक्ष पर नियंत्रण नहीं होता जबकि विस्मृति अनियंत्रित होती है अक्सर उनके दिमाग से उनके लिए उपयोगी बातें भी फिसलते रहती हैं। इनके दिमाग में आपात कालीन स्थिति के लिए संचित रिजर्व ऊर्जा नहीं होती, थकने के बाद इनको बुरी तरह नींद आ जाती है इनका नींद पर नियंत्रण नहीं होता इनको नींद अधिक मात्रा में आती रहती है।
     चेतन्य मूर्ख, निरक्षर मूर्ख, अशिक्षित मूर्ख, साक्षर मूर्ख , धूर्त शिक्षक, विद्वान मूर्ख इनमें हम अपना ध्यान विद्वान मूर्ख और धूर्त लोगों पर फोकस करके चलेंगे जिनके दिमाग की सेटिंग गलत शिक्षा-दीक्षा से होती है, यह अपने निजी व्यवहार में गलत कल्पना/असंभव परिकल्पनाएं करते रहते हैं। अनुपयोगी विपरीत बौद्धिक चिंतन में समय व्यतीत करते हैं जिससे ना इनका भला होता है ना उसका भला होता है !  जिसके लिए यह चिंतन कर रहे होते हैं । यह ओवर थिंकिंग / नियंत्रित कल्पना परिकल्पनाओं को करने वाली व्यर्थ की बातें करने वाली बकवादी मनोरोगी होते हैं।  यह लोगों से मिल कर उनसे उपयोगी वार्तालाप करना नहीं चाहते जिससे इनमें कम्युनिकेशन स्किल नहीं होती है । यह अपने लिए उपयोगी सामाजिक महाशय महाजन लोगों से संपर्क करना नहीं जानते, इन मूर्ख विद्वानों में जिम्मेदारी पूर्णता का सामाजिक बंधन बनाने के लिए अपने हितकारी लोगों से मिलना जुड़ना चिपकना नहीं आता । 
    इन विद्वान मूर्ख जनों को उपयोगीता पूर्ण समद्ध लोगों से बौद्धिक आर्थिक सामाजिक लाभ  लेना नहीं आता । गलत अनूपयोगी विकृत भयंकर अपराधी साहित्य अध्ययन करना इनकी पहचान है। इन विद्वान मूर्ख लोगों के अनेक विचित्र असंभव असंभव कृत्य कर्म कार्य होते हैं । जिनसे उनके दिमाग की खराब सेटिंग की पहचान हो जाती है यह पढ़ लिखकर भी जीवन में अधिकतर फेल होते रहते हैं। यह आजीवन अपने लिए उपयोगी पढ़ाई नहीं पड़ते अपितु अपने लिए अनुपयोगी पढ़ाई में पढ़कर अपना अध्ययन का समय व्यर्थ होते हैं । यह विद्वान मूर्ख जन अपने जीवन में अक्सर तरह-तरह की सामाजिक आर्थिक राजनीतिक भौतिक रासायनिक जविक समस्याओं से प्रभावित रहते हैं तरह-तरह के असंक्रमित रोग जैसे उच्च रक्त शर्करा / शुगर, ब्लड प्रेशर , कैंसर बीमार रहते हैं जो इनके गलत खतरनाक भौतिक चिंतन से इनमें उत्पन्न होते हैं। ऐसे में जो मनुष्य पढ़ा लिखा शिक्षित होते हुए भी तरह-तरह के राजरोगों से ग्रस्त है जो अतिधूर्त बुद्धि के उपयोग और लालच की अति से  बारंबारता की पुनरावृत्ति से उत्पन्न होते हैं जैसे यक्ष्मा टीवी उच्च रक्त शर्करा कैंसर  हाथ पैर शरीर में गांठगट्टे, चेहरे पर झाइयां चंडालता  मलिनता कालिख  रोगों से ग्रस्त है। तरह-तरह की आर्थिक सामाजिक राजनीतिक पारिवारिक शरीर स्वास्थ समस्याओं में गिरा घिरा हुआ है तरह-तरह की समस्याओं से प्रभावित है उसे हम शिक्षित नहीं कह सकते वह पढ़ा-लिखा व्यक्ति विद्वान मूर्ख कहा जा सकता है। आज की तारीख में ऐसी पढ़ी-लिखी विद्वान मूर्ख शिक्षकों की भरमार हो गई है यह गलत गलत खतरनाक साहित्य लिख रहे हैं । यह विद्वान मूर्ख स्कूलों मे शिक्षक अध्यापक नियुक्त होकर शिक्षा देने के कार्य के दौरान छात्रों का बौद्धिक नाश कर रहे हैं।

जीवन में मौत छपी है मौत में जीवन छिपा है ऐसे में जीवन में मौत और मौत में जीवन की पहचान कैसे करेंगे

 Quantum immortality and suicidal attempt क्वांटम इम्मोर्टालिटी और सुसाइडल अटेम्प @  क्वान्टम अमरता और स्वयंमृत्यु की अवधारणा के अनुसार सभी जीवो में उत्पन्न होने के पश्चात अमरता की भावना होती है ।  परंतु वह जन्म द्वारा उत्पन्न होकर जीवन जीते हुए धीरे-धीरे एक निश्चित समय अवधि के पश्चात मृत्यु के आगोश में जाकर समाते हुए समाप्त होकर अदृश्य लोक में चले जाते हैं। कुछ जीव तेजी से एक साथ एकदम शरीर नष्ट होने पर समाप्त हो जाते हैं परंतु कुछ जीव धीरे-धीरे पूर्ण जीवन आयु अवधि पश्चात शरीर के होते हुए भी धीरे-धीरे वृद्धावस्था के पश्चात मृत्यु द्वारा नष्ट होते हैं तो कुछ वृद्धावस्था से पहले रोग द्वारा आयु क्षय से जातक आयु से पहले मारकर नष्ट हो जाते हैं । अत्यधिक चैतन्य बौद्धिक रूप से बलिष्ठ जीवों को जीवन  को जीने  की प्रक्रिया के दौरान  जातक को जीवन पूरा होने के पश्चात मृत्यु प्राकृतिक रूप से आती है । तो अल्प चैतन्य कम बौद्धिक जीवों को  जीवन जीने के दौरान  जीवन के मध्य में क्षणिक ,  यकायक अचानक मृत्यु  अप्राकृतिक रूप से अकाल मृत्यु आ जाती है । किसी भी जीव का जन्म जीवन  मृत्यु जैसी जैविक क्रिया एक समान अचानक नहीं होती , किसी को मृत्यु धीरे धीरे किश्तों में इंद्रिय-हीनता से अंगहीनता से विकलांगता से आती है। जिससे  मरने से पहले कोई अंधा हो जाता है कोई बहरा हो जाता है कोई अपाहिज असहाय हो जाता है। प्राणरक्षा के लिए तीव्र गति से नहीं चल पाता है। अंत तक कोई ना कोई ऐसी प्राण वायु शक्ति अवश्य है जो सभी जीवो की जीवन अवधि का नियमन और संचालन कर रही है। जिसके प्रभाव से कोई भी जीव अभी तक सृष्टि पर अमर नहीं हो सका है।  सभी जीव एक निश्चित जीवन अवधि के बाद मृत्यु द्वारा समाप्त हो जाती है। १ 

     प्रत्येक  जीव के जन्म से पहले उसके उत्पन्न होने की भूमिका बनती है । तो उसके मरने से पहले उसके मरने की भूमिका बनती है । अक्सर लोग शिक्षा के दौरान जीवन विषय  पर बहुत अधिक चर्चा करते हैं, परंतु जीवन में मत्यु पक्ष की अनदेखी करते रहते हैं । यदि मनुष्य शिक्षा के दौरान जीवन में शिक्षा लेने के साथ-साथ मृत्यु की शिक्षा भी लेते रहें मृत्यु ज्ञान चर्चा सुनते रहें तो उनके पास मृत्यु विषय प्रकरण पर काफी संज्ञानी ज्ञान हो जाता है । जिसको जीवन जीने के साथ-साथ मृत्यु विषय को भी समझने की जिज्ञासा लग जाती है । उसे जीवन में मृत्यु विषय पर काफी ज्ञान हो जाता है । वह जीवन में छिपी हुई मृत्यु और मृत्यु में छिपे हुए जीवन को समझने पहचाने लगता है । जिससे वह अपने आप को अकाल मौत से काफी सीमा तक बचाकर अपनी जातक मौत मरता है । जब भी मृत्यु का अवसर आता है या उस मनुष्य को मौत घेर लेती है । तभी वह अपनी जागरूकता से अकाल मौत के घेरे में से खुद को निकाल कर अपने जीवन की  रक्षा करने में कामयाब हो जाता हैं ।  जो लोग  जन्म जीवन मरण प्रक्रिया के ज्ञान प्रपंच इंद्रजाल को यथार्थ में समझ जाते हैं । वह अपने ज्ञान विवेक बल से काफी सीमा तक अकाल मृत्यु से/अप्राकृतिक मृत्यु से बचते हए अपने जीवन को पूर्णत सामान्य जातक अवधि तक जीते हैं , प्राकृतिक मृत्यु या काल मृत्यु के द्वारा उनका जीवन समाप्त होता है ।  सभी के जीवन में मृत्यु के अनेक असंख्य  मोंके के आते हैं , परंतु बुद्धिमान विवेकशील लोग बुद्धि विवेक के प्रभाव से मृत्यु को चकमा देकर अपने जीवन में अधिकांश बार बच जाते हैं ।    ( २)
   जो मनुष्य हर बार मृत्यु के फंदे से मृत्यु को चकमा देकर बच जाता है वह कोई विशेष उद्देश्य लक्ष्य लेकर धरती पर आया है। असाधारण मनुष्य है। सभी लोगों के जीवन में जन्म जीवन अमरता और मृत्यु की प्रक्रिया एक  द्विशाखिय वृक्ष पर जीवन जीने जैसी है । जिसमें एक वृक्ष की एक शाखा जीवन की है तो दूसरी शाखा मृत्यु की है । उल्लेखनीय बात है यह जीवन और मृत्यु दोनों शाखाएं एक दूसरे के समानांतर आजीवन अंतहीन होकर चलती रहती हैं । इन दोनों पर ही जीवन मैं सभी जीव जीवन और मृत्यु शाखाओं पर प्रत्येक जीव बारी-बारी से अक्सर बुद्धि बल विवेक के अनुसार जीता है । जीवन शाखा पर 75% जीवन अवसर है तो 25 प्रतिशत मृत्यु अवसर छुपी होती है तो मृत्यु शाखा पर 75% मृत्यु के अवसर और 25% जीवन के अवसर छुपे होते हैं । इतना ही नहीं यह मृत्यु लिंग शरीर में भी प्रतिष्ठित है । जैसे सभी बुद्धिमान और हिंसक जीवों में नर उच्च ऊर्जावान होने से मृत्यु कर्म के संचालक होते हैं नंर अपने जीवन की सुविधा सुरक्षा के लिए दूसरे जीवों को अकारण अचानक व्यर्थ भी मारते रहते हैं । तो  नारी जीव अल्प ऊर्जावान होने से वे भी मृत्यु के कारण बन जाती हैं कभी नर नारी की प्राप्ति के लिए आपस में लड़ लड़कर एक दूसरे को मार देते हैं तो कभी नारियां भी प्रसव के दौरान आसानी से अपने आप मरती मरती जाती हैं या दूसरों से दूसरों को मरवाती रहती हैं ।  इस प्रकार से जिनको जीवन में मौत और मौत में जीवन की समझ हो जाती है वह जीवन में मौत को देखते हुए समझकर अपने जीवन की अपने विवेक से रक्षा करने में कामयाब हो जाते हैं।     (३)

     जो भी लोग विवेकशील हैं जिनको मृत्यु का समय पूर्व दिशा विवेक उत्पन्न हो जाता है या उनका जीवन आयु शेष होने पर दूसरे लोग खतरा भापकर उनको खतरनाक घातक घटना से पहले चेतावनी देने लग जाते हैं ।  ऐसे में घाती घायल या मरने वाले  लोग अपने जीवन की आशा में  जीवन शाखा पर जीते हुए तुरंत मृत्यु क्षण आने पर जीवन शाखा छोड़कर मृत्यु शाखा पर जीवन की आशा में तेजी से चले जाते हैं।  जिस पर 25% जीवन की संभावना होती है इसे रिस्क लेना दुस्साहस पंगेबाजी या मौत से टकराना कहा जाता है ।  जीवन  में मौत असफलताओं , असमर्थता , धनहानि निर्धनता गरीबी और रोगों के रूप में छपी हुई है । मौत में जीवन प्रियता  सफलताओं के , समर्थ वान , समृद्धि धानिकता धन लाभ , विराट वृद्धि , उत्तम स्वास्थ्य सुख समृद्धि समर्थवान  रूप में साथ छिपा हुआ है । इसका पता इसका एहसास हमको तब होता है । जब हम जीवन में असफल होने लगते हैं । कोई कोई तो असफलता से इतना दुखी निराश हो जाता है कि वह आत्महत्या कर के अपने जीवन को समय से पहले खुद समाप्त कर लिया करता है  ।  जो असफलता का सामना नहीं कर पाता वह मृत्यु के पूर्व चरण अवसाद में जाकर एकांतवासी एकाकी असामाजिक होकर शेष जीवन को क्षण मृत्यु की आशा में जीने की  कोशिश करने लगता है ।  यदि उसे सफलता असंभव लगती है सफलता की आशा नहीं रहती तो वह असफल होने पर असफलता का दंश/ डंक  न सह पाने से असफलता द्वारा डंस लिया जाता है सफलता की आशा छोड़ देता है। अवसाद में चला जाता है ।  तो वह असफलता से पीड़ित होकर हृदय आघात से उसका जीवन समाप्त हो जाता है ।  यदि वह आशावादी है तो सफलता की आशा में असफलता के पश्चात उत्पन्न अवसाद डिप्रेशन से प्रभावित होकर मृत्यु के प्रथम चरण अवसाद डिप्रेशन में जाकर समाज से अलग  एकाकी एकांतवासी होकर विशेष चिंतनशील अपने जीवन को आशावादी तरीके से जीवन जीने का प्रयास करने लगता है ।     (४)
       
      जीवन में निरंतर असफलताओं की अधिकता होने के कारण जीव की आयु  धीरे धीरे कम होती चली जाती हैे । जीव जातक आयु से पूर्व असफलता फैलियर से परेशान होकर  समय से पहले अपने जीवन के पूरा होने की सोच बनने लगते हैं , कोई कोई तो अपनी आयु पूरी कर देता है । निराशावादी जातक आयु मानव की निर्धारित 100 वर्ष से पहले तरह-तरह के उपायों द्वारा समय से पहले मर जाता है ।  जिन लोगों के जीवन में सफलताओं की संख्या अधिक होती है उनका शरीर निरोग रहता है । वह सुखी समर्थ धनी समृद्धवान  अपने जीवन में कम से कम मानसिक तनाव से या मानसिक तनाव रहित होकर जीते हैं । वह अपनी जीवन आयु को पूरी तरह जीते हुए जातक आयु पूरी करने पर प्राकृतिक मौत मरते हैं ।  जबकि आशावादी लोगों के जीवन में असफलताएं मार्ग परिवर्तन का सूचक होती हैं । आशावादी लोग हर असफलता पर अपना मार्ग बदलते हुए सफलता की आशा में लक्ष्य और उद्देश्य बदल बदल कर अपने जीवन को जातक आयु तक अपने जीवन को पूरा जी पाने में कामयाब हो जाते हैं।  इसे  समझने के लिए सभी जीवों के जीवन के ग्राफ  वृत्त या कर्ब ग्राफ  का अध्ययन किया जाता है । जो जीवन में शून्य पर से शुरू होता है ऊपर उठना चला जाता है एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंचने पर वह  थोड़ी देर के लिए वहां ठहरता / रुकता है इसके बाद फिर नीचे गिरना/उतरना  शुरू हो जाता है ।। इस अर्ध वृत्तीय ग्राफ में जीवन का वह भाग जिसमें जीव शरीर रूप से विचार रूप से लगातार ऊपर उड़ता चला जा रहा था जिसमें वह वृद्धि और गति से विस्तार भाव प्राप्त होकर निरंतर नामित प्रचारित होता जा रहा था । वह पूर्वाध भाग बचपन और जवानी वाला जीवन भाग है ।। परंतु इसके बाद का अर्ध उत्तरीय भाग  जिसमें वह निरंतर क्षय  और गति हीनता से हानि को प्राप्त होता हुआ धीरे-धीरे विस्तारहीन होता हुआ नाम हीनता की ओर चला जा रहा है वह वृद्धावस्था  है जिसके पश्चात वह मरकर  1 दिन विलुप्त हो जाएगा । उसकी यह जीव के जीवन की दृश्य फिल्म लुप्तप्रायः अवस्था मृत्यु कही गई है ।    (५)

      इस मृत्यु के अंतर्गत जीव में उसके अंदर अपनी जीवन फिल्म मैं जीवन अभिनय करने के लिए रिक्तता की पूर्ति करने के लिए  न पात्रता भाव  होगा , ना योग्यता भाव होगा , ना  दक्षता भाव होगा , ना क्षमता भाव  होगा , अपितु वह जीव एक अन्य निर्जीव के समान गीली मिट्टी जैसा एक मुलायम पिंड होगा जिससे काटा पीटा जा सकता है । जिस पर उसे कोई भी एतराज नहीं होगा है ।  वह जीवंत पिंड अब जीवन गुंण लक्षण हीन  जैव चुम्बकीय, जैवविद्युत , जैव रसायन जीवन गुंण खोकर चैतन्यता हीन नामहीन हो चुका है । उसने शब्द नाम के धन खंड उर्जा प्रदान भाव संवाद को धारण करना छोड़ दिया है । अब वह शब्द नाम के अनुसार ध्वनि खंड ऊर्जा को अनुभव नहीं करता है ।।  जब वह शब्द नामधारी बौद्धिक जीव था तब उसने नाम के ध्वनि खंड को धारण किया था । अब जब वह चैतन्यता रहित नाम हीन हो गया है ।  उसने शब्द नाम के ध्वनि खंड ऊर्जा को छोड़ दिया है ।।  इस प्रकार से शब्द धारिता नामित होना जीवन है , शब्द नाम हीनता मृत्यु है । यह जीव का पहला गुण है । जिसे वह चेतना में सबसे पहले नाम रूप से स्वीकार करता है , धारण करता है ।  जब वह जिंदा था तो अपने को ना काटने पीटने देना तोड़ने फोड़ने देता था तब उसकी वह पिंड की अवस्था जीवन अवस्था कही गई थी । लेकिन मुलायम निर्जीव अवस्था विरोधी अवस्था मृत्यु कही गई  है । यह इकोलॉजी / वातावरण परिस्थिति प्रतिक्रिया के अनुसार ।    (६)

      प्रत्येक  जीव अपने आप को पूर्ण तो अनुभव करता है लेकिन वह वास्तव में पूर्ण नहीं होता। अपितु  प्रत्येक जीव की पूर्णता तब सार्थक सिद्ध होती है जब वह अपने जैसा दूसरा जीव बनाने में समर्थ हो जाता है। इस विशेष कर्म को वह संपत्ति कर्म संतान निर्माण और शिष्य निर्माण के रूप में करता है । जब वह संतान के समान अनुयाई समर्थक शिष्य बनाने में असमर्थ हो जाता है । तब तक वह अपने अर्ध भाव‌ कर्मा की रिक्तता अवस्था जीवन लक्ष्य के अनुसार निर्धारित दैनिक मानवीय पशुज समान कर्म करने में रहता है 
। वह अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करने के लिए भूलों पर अपने मायावी कर्म के लिए निश्चित दूसरे जीवों के अस्तित्व को बाधित करता मिटाता रहता है , उसकी यह कर्म करने के भाव की रिक्तता जीवन भर ऊपरि मुख से भोजन अंतर्ग्रहण द्वारा अधोमुख योषांग लिंग और योनि द्वारा परस्पर एक दूसरे के शरीर अंश रज और शुक्र को खाते हुए पूरे होने का प्रयास करते रहने में पूरी होती दिखाई देती है ।  अपने पूरक अर्ध  रिक्त भाव की पूर्ति के लिए दूसरे प्राप्त जीव को अपने रिक्तभाव में भरने का पूर्ण प्रयत्न भूख और मैथुन से करता है । परंतु पूर्ण नहीं होता पूर्ण होने के भ्रम में बना रहता है ।  एक संपूर्ण जीव के दो अर्धभाव भ्रमित करने वाले  नर नारी भाव कहे गए हैं । जिनके अंदर नर के अंदर जन्म निर्माणी भाव कम मृत्यु विनाशी भाव अधिक होता है नारी के अंदर जन्म निर्माणी भाव अधिक , मृत्यु विनाशी  भाव कम का गुण पाया जाता है । परंतु कभी-कभी दोनों नर नारी जीव के दैनिक जीवन व्यवहार में इसके विपरीत गुण परिलक्षित होता है ।     (७)

   नर लिङ्गीय जीव अधिक ऊर्जावान होने से मृत्यु मार्ग गामी होने की ओर से शीघ्रता करता है । जबकि नारी अल्प ऊर्जावान होने से धीमे धीमे मृत्यु मार्ग गामिनी होती है । वह मृत्यु से अधिकतम बच सकने की कोशिश करती है । परंतु वह नर को  मृत्यु मार्ग पर तेजी से चलाने के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन जाती है । नर नारी जीव को अपना निजी सहायक समझते हुए उसे सदा सदा के लिए उसे स्थाई रूप से निजी सेविका के रूप में प्राप्त  करने के लिए अधिक हिंसाभाव अपनाते हुए नर अन्य जीवो की हिंसा करने में लगा रहता है । जिससे उसके द्वारा हिंसित हुए उसी के भ्राता  समान जीव ही उसके हिंसा दायक मृत्यु का कारण बनते हैं । परंतु इस नंर में अपना जीवन जीने की अवस्था में जो हिंसा का स्रोत है जो हिंसा उत्पन्न करता करवाता है वह हिंसक जीव नामित नारी कहा जाता है । इस प्रकार से दोनों नरनारी जीव हिंसा करते हुए तीव्र हिंसा द्वारा संसार को हिंसाग्रस्त करते दिखाई देते हैं जबकि वह मंद हिंसा द्वारा आपस में भी एक दूसरे की हिंसा करते हुए एक दूसरे को भी हिंसित करते रहते है । उनकी इस आपसी मंद हिंसा कर्म मिथुन के द्वारा नए जीवन का नित्य जन्म होता रहता है ।     (८)

      जीवो का जन्म भी वह प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक जीव अदृश्य जगत से दृश्य जगत में आता है परंतु आता हुआ दिखाई नहीं देता । इसी प्रकार से जन्म के समानांतर मृत्यु भी जीव के जीवन की वह अदृश्य प्रक्रिया है जिसमें जीव दृश्य जगत से अदृश्य जगत में जाता रहता है , परंतु जाता हुआ दिखाई नहीं देता । इस प्रकार से जन्म मरण हर जीव के जीवन के आदि और अंत की क्रियाएं हैं । जिनके अंदर तरह-तरह के धर्म कर्म के प्रभाव से सृष्टिम विभिन्न जाति धर्म कक्षा में तरह-तरह के जीव आ रहे हैं जा रहे हैं । वास्तव में यदि देखा जाए तो मृत्यु की प्रक्रिया  अधिक लंबी प्रक्रिया है परंतु जिसके  प्रमाण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं । इसी तर्क ज्ञान से समझा जा सकता है जिसमें प्रत्येक जीव अपने स्मृति गुण होने के बावजूद पूर्व जन्म के गुणधर्म कर्मों को भूल जाता है । जबकि जीवन एक अल्प  क्षणिक प्रक्रिया है , जिसका प्रमाण रिकॉर्ड वर्तमान में उपलब्ध होता है । इसमें हम अपना ध्यान मिथुन के दौरान मृत्यु की ओर केंद्रित करके चलते हैं । जिसे हम जीवन कहते हैं वह मृत्यु की सहायक जीवन प्रक्रिया है जिसमें जीव को मृत्यु  तक जाने के लिए उसे जीवन जीते हुए जाना होता है बिना जन्म लिए मत्यु  का विधान नहीं है । प्रत्येक जीव के जन्म लेने के साथ ही मृत्यु भी जुड़ जाती है वह उस जीव के जीवन का निर्धारण करती है । यदि जीव अपनी जाति अवधि के अनुसार मरता है तो वह प्राकृतिक मौत / मनुज मौत कही जाती है ।  यदि जीव अपनी जाति अवधि से पूर्व मरता है तो उसे अकाल मौत / पशुज मौत कहा जाता है । इस प्रकार से जीवन में ही मृत्यु भी छिपकर जीव के साथ जीवन भर चलती रहती है ।      (९)

 जिस जीव ने जीवन में मृत्यु को जीवन के साथ चलते हुए देख लिया तो उसने जीवन को समझ लिया वह अपने जीवन को पूर्ण जातकआयु तक जी पानी में कामयाब हो जाता है । सभी जीवनधारी जीवों में जीवन को  मौत ढूंढ रही है जीवन की हिंसा करने वाले प्राणियों के रूप में जैसे हिंसक पशु शेर भालू कुत्ता सांप जीवन को हिसित करने वाले सांड भैंसा हाथी गैडा आदि मनुष्य में मनुष्य की हिंसा करने वाले तरह-तरह के अपराधी लोग और शत्रु जनों , ठगों के रूप में जो भी मनुष्य इन हिंसा करने वाले पशु और मनुष्यों को उनकी चेष्टा को  समझ जाते हैं वह इसे हिंसित होने में बच जाते हैं वह मृत्यु के यम पाश से छूट जाते हैं अन्यथा यह यमराज के यमदूत कहे जाते हैं ।
      जीवन की पूर्णता मृत्यु के पश्चात भी समाप्त नहीं होती अपितु जीवन की सतत निरंतर के रूप में बार-बार जन्म लेकर पुनर्जन्म के द्वारा उच्च विकसित योनियों में जन्म लेकर सभी जीव अपने जीवन का विकास करते हुए जीवन यात्रा मार्गों में जीवन जीते हुए चलते रहते हैं । जीवन  जीने का मतलब यह नहीं कि हमें अपने-अपने जीवन को जातक जीवन आयु तक जीना है , या जीवन कब छिन जाए पता नहीं ..।  जब जीव पैदा होता है तो उसे उसके साथ साथ उसी क्षण से मरना शुरू कर देता है । ये दोनों जन्म मरण जीवन क्रियाएं ऐनाबोलिक क्रियाएं  निर्माणकारी तथा कैटाबोलिक क्रियाएं जीवन को विनाशकारी (छिपा छिपे नाशकारी ) कही जाती हैं । नाशकारी तब कही जाती हैं जब इनके कार्य कर्म प्रभाव से नाश /नष्ट होता हुआ दिखाई देने लगता है । ।   प्रत्येक जीव के जीवन की अवधि उसके जन्मदिन के अनुसार निर्धारित होती है कि वह अपना जीवन इतने साल जी चुका है , अब उसे अपना जीवन जीने के लिए एक साल और चाहिए  .  जबकि उसे जो वह 1 साल जीवन अतिरिक्त जीने के लिए मिली है वह उसकी 1 साल जीवन जीने के लिए नहीं मिली बल्कि वह मृत्यु की ओर आने वाला मृत्यु मार्ग का समय होता है , जिसे वह जीवन समझता है ।  धीरे-धीरे इस जीवन प्रक्रिया में साल दर साल गिनते हुए जीवन पूरा हो जाता है ।  हम अपना परिचय इस प्रकार देते हैं कि हम इतना जीवन जी चुके जबकि सत्य तो यह है कि हम साल  एक और जीवन जीने के लालच में  एक साल और तेजी से मृत्यु लक्ष्य की ओर करीब जा रहे होते हैं ।  जबकि इस जीवन जीने की इस प्रक्रिया में हम जीना और मरना एक साथ कर रहे होते हैं । हम क्षण क्षण जी रहे हैं और क्षण- क्षण मौत के निकट जा रहे होते हैं । जीना मरना एक संगठित प्रक्रिया से हो रहा है । लेकिन हम जीवन को पकड़े हुए हैं मृत्यु को दूर समझे हुए हैं ।  इसी क्षण में हम यदि मृत्यु को भी याद कर लें तो हमें अपनी शेष जीवन अवधि का पता अपनी अंतरात्मा से पता लग जाता है । कि अब हमारा जीवन कितना और शेष है जबकि वह वाक्य भी हमारा अपना निजी वाक्य होता है जिसे  हम अपनी अवचेतन मन में डालते रहते हैं ।     (१०)
      जीवन को जीने के लिए मृत्यु की समझ का होना जरूरी है , मृत्यु को पाने के लिए जीवन को जीना बहुत जरूरी है । मृत्यु सीधे नहीं आती । इसकी तैयारी करनी पड़ती है  इस मृत्यु की तैयारी को हम जीवन पथ कहते हैं । जीवन पथ में जीवन इसलिए है कि हम मृत्यु की तैयारी कर रहे हैं ।  जीवन और मृत्यु दोनों ही एक जैसी बात में हम जीवन को पकड़ कर जी रहे होते हैं । जबकि हम उस समय मर भी रहे होते हैं । लेकिन हम अगले मृत्यु के क्षण को पकड़ कर अपना जीवन बढ़ा समझ लेते हैं ।  कि अभी हमें यह कार्य और करना है अभी हमारा यह जीवन लक्ष्य परम आवश्यक कार्य वो बाकी बचा है ।  जबकि एहसास ही नहीं चलता , फिक्र ही  नहीं होता कि उस क्षण में हम कहीं ना कहीं अपना जीवन गंवा रहे हैं । यदि हम इस पर ध्यान देंगे तो समझेंगे तभी हम जीवन की वास्तविकता से परिचित होंगे हमारा वास्तविक जीवन का आनंद हमें उसी क्षण मिलेगा   ।     (११)
     जब हम यह समझ जाएंगे कि जीवन और मृत्यु दोनों एक ही हैं बस फर्क अनुभव करने का है ।  इस जीवन मृत्यु के क्षण को अनुभव करने के हमारे जीवन में हर क्षण अवसर असंख्य बार आते हैं । पर हम हर बार हरिद्वार को देखते हुए  अनदेखा करके आगे बढ़ जाते हैं ।  वैसे इस  मृत्यु  की पहचान है *विचार हीनता की स्थिति * जो हमको हर जीवन लक्ष्य कार्य के पूर्ण होने के पश्चात अनुभव होती रहती है ।  स्वादिष्ट भोजन खाया मन तृप्त हुआ , भोजन के बाद भोजन विचार बंद । यह है भोजन मृत्यु ।।  अब जब भूख लगेगी भोजन की इच्छा होगी तो जीवन में भोजन फिर से उत्पन्न कर जीवन जीवंत हो जाएगा । हम भोजन खाएंगे भोजन खाने के लिए फिर से जीवित हो जाएंगे । दूसरा उदाहरण योन आनंद या मिथुन /मैथुन का आनंद  ,  इसके अंदर भी मृत्यु का प्रत्यक्ष अनुभव होता है जब जीव सफल मैथुन पश्चात आनंद की अवस्था में चला जाता है तो वह लंबे-लंबे सांस लेता हुआ निढाल निश्वास होकर मृतक के समान  गिर जाता है तब कहा जाता है आनंद आया ।  जबकि वह उस क्षण समय में मृत्यु के आगोश में का समय होता है जिसमें वह निष्क्रिय हो जाता है। यदि मैथुन क्रिया में जीव श्वास असामान्य लम्बी लम्बी शरीर निढाल  हो कर नहीं  गिरता है तो तब तक मैंथुन आनंद   सफल नहीं माना जाता ।  ऐसे में मैथुन आनंद की प्राप्ति नहीं होती है । कहने का मतलब यह है जिसे हम आनंद कहते हैं वह जीवन के अंत की और मृत्यु के पूर्व क्षणिक अवस्थाएं हैं जिनको हम अक्सर अनदेखा अनसुना अनसोचा करते हुए जीते हैं।    (१२)

     निद्रा मृत्यु की लघु क्षणिक स्थित है मृत्यु दीर्घकालीन निद्रा है  ।  रात्रि में अच्छी तनाव रहित आसक्ति रहित, स्वप्न रहित निद्रा चाहिए तो रात्रि निद्रा में विघ्न दायक तत्व प्रबल आसक्ति, भयंकर विचारों से अपने मन को विश्राम दने के लिए  मन की निद्रा स्थिति का रक्षण करने के लिए रात्रि पूर्व दिन में इन कर्म के  क्रिया कलाप क्षणों को स्वीकार नहीं करना होगा ,  अपने मन को मानसिक कार्य संकल्प क्षण  देने से बचना होगा मन को जब हम सोने से पहले संकल्प दे देते हैं तो निंद्रा पूर्व दिए गए संकल्प के प्रभाव से मन विश्राम नहीं कर पाता  है। कमोबेश यही स्थिति हम सभी जीव अपने मरने से पहले अपने अगले जन्म की भूमिका बनाने के लिए  संकल्प कर्म प्रभाव से फिर से पैदा कर देते है मृत्यु के पश्चात ठीक से विश्राम नहीं कर पाते , जबकि विशेष मानव परम ज्ञानीजन अपनी जीवन प्रगति के लिए महामानव विधायक जन, मनु पुरुष इंद्र परुष युग पुरुष बनने के लिए मृत्यु क्षण में अपने मन को पूर्ण संकल्पहीन करके मृत्यु अवस्था के पश्चात दीर्घकालीन विश्राम करते हैं । जिसे मोक्ष कहा जाता है ।। इस प्रकार से हम अपने मन में अत्यधिक संकल्प बार-बार कर अपने मन को संकल्प से इतना  बोझिल कर लेते हैं कि हम रात्रि में स्वप्न प्रभाव से सो नहीं पाते और अपना अगला जीवन अच्छा बनाने के लिए मृत्यु के पश्चात  भी मन को पूर्ण दीर्घकालीन विश्राम नहीं करने देते । जीवन में प्रगति करनी है जन्म मरण प्रक्रिया पर नियंत्रण करना है मोक्ष लेना है तो हमें अपने मन को संकल्प देने संकल्प करने की विधा विद्या को सिखाना होगा। जो लोग अपने मन को इंद्रजाल एक संकल्प प्रपंच से नहीं बचा पाती वह साधारण सी सामान्य जीव मानव मनुष्य पशु स्तर तक ही अपना जीवन जी पाते हैं  ।     (१३)

      अपना जीवन को पूरा जातक स्तर तक जीना धर्म ह .. जीवन की रक्षा से प्राणों की रक्षा प्राणी धर्म है , प्राणों की रक्षा यौवन की रक्षा हेतु प्रज्या नियंत्रण प्राणी का विशेष  धर्म है।

     जन्म और मृत्यु के बारे में अनेक बातें कही जाती हैं लेकिन एक बात सामान्य ज्ञान से यह कही जाती है  कि  हम जैसा जीवन जीते हैं वैसी ही मृत्यु पाते है ।  जबकि इसके विपरीत एक दूसरी बात भी है कि  जैसा हम जीवन जी रहे हैं यह जरूरी नहीं कि मृत्यु भी वैसी ही हो । वह उसके विपरीत भी आ सकती है उससे अच्छी  हो सकती है मृत्यु महोत्सव  धार्मिक कर्मकांड रुप में , दृश्य मृत्यु अच्छी कही जाती है । यदि मरने के किसी दुर्घटना वश ‌शरीर क्षत विक्षत होकर विकृत हो जाए या मृतक करने से पहले किसी रोग से पीड़ा पाए आत्महत्या कर ले ।  मृतक का संस्कार धार्मिक कर्म काँड पूरी तरह से नहीं किए जाते हैं तो मृत्यु  अधूरी बुरी कही  जाती है ।  इसमें हम अपना ध्यान एक वाक्य की ओर लक्षित करके चलेंगे जिसमें यह कहा जाता है जैसा जीवन हम घटित हो कर जीते हैं ,  वैसे ही मृत्यु होगी ,  यदि जीवन में शांति और विवेक है तो मृत्यु के समय भी शांति और विवेक रहेगा हमारा अपनी मृत्यु की क्षणों में विवेक हीनता संकल्पहीनता वसे चलित होना खराब मृत्यु को सूचित करता है । संकल्प के नियंत्रण  संकल्प- विकल्प द्वारा अगले जन्म की प्रतीक्षा में हमारा मृत्यु पर नियंत्रण होगा अभी हम ठीक से मोक्ष लेकर जीवन में महापुरुष से युग पुरुष स्तर तक की प्रगति कर सकेंगे ।   (१४))
   परंतु यदि जीवन में हमें किसी माता-पिता गुरु ने सम्यक रूप से सोच विचार करना विचारणा से निजी हितकारी सोच उत्पन्न होना , जीवन लक्ष्य पूर्ति के लिए सही सम्यक प्रण करना , सही उचित सम्यक संकल्प करना नहीं सिखाया  ,  हमको संकल्प करना नहीं आया तों हम उचित सही सटीक संकल्प नहीं सीख पाने से अपने जीवन को जितना ज्यादा अशांति और विवेक हीनता से जिएंगे  तो मृत्यु भी उतनी ही भयंकर चिंता कलेश युक्त होगी । यदि हमने आवश्यक वछनीय अपनी आत्मज्ञान प्राण ज्ञान के अनुसार अपने लिए आवश्यक संकल्प करना नहीं सीखा , लोगों की सुनी सुनाई बातों से , अनावश्यक सभव  कथन संकलन जैसे अध्ययन मोबाइल दूरदर्शन दर्शन से अपनी अनुचित अनावश्यक संकल्प प्राण विधा विद्या बनाने लगे , तो ऐसे भ्रम संकल्पों से हम अपने जीवन को आजीवन दूसरों के विचारों पर आधारित होकर जिएंगे हमारे जीवन की डोर हमारे हाथ से छूट जाएगी हम आंखों के होते हुए अंधे कानों के होते हुए बहरे मन के होते हुए विदैह  और बेमन के  अपने विचार जीवन को बैगोरी से जीते हुए मूर्ख मति गति से जीते हुए मृत्यु भी मूर्ख की तरह प्राप्त करेंगे । यदि जीवन में विवेक समीक्षा विवेचना लक्ष्य उद्देश्य पूर्ति नहीं सीखा , जिससे व्यर्थ  की चिंता अवसाद और तनाव रहा है तो मृत्यु प्रज्ञा हीनता विवेक हीनता से भय में घटित होगी । यदि जीवन में होश हवास ध्यान विवेक की प्रचुरता रही है तो मृत्यु भी होश ध्यान और विवेक में होगी । इसलिए यदि चाहते हो कि मृत्यु सुंदर हो तो जीवन को सुंदर बनाने के लिए जीवन में चिंतन मनन ध्यान  विवेक निर्णय क्षमता को उत्पन्न करते हुए जीवन जीने का अभ्यास करते हुए जीवन में पूर्ण तृप्त होने का प्रयत्न करना होगा । यदि मृत्यु एक महोत्सव की तरह आए तो जीवन को बसंत बनाना पड़ेगा जैसा जीवन के साथ हमारा व्यवहार होगा हमारे साथ वैसा ही व्यवहार मृत्यु करेगी । कोई अंतर नहीं कोई भेद नहीं कोई विविधता नहीं मृत्यु पीड़ा हीन अवस्था मूर्छा में घटित होती है । मरने से पहले व्यक्ति बेहोश हो जाता है जीवन भी मूर्छा में जिया जाता है।  बहुत कम लोग अपने जीवन को चैतन्यता के साथ जीते हैं जो अपने जीवन से जागरूकता से जीते हैं वह अपने जीवन में प्रगति करते हुए विकास करते हैं ।      (१५)
    पैदा होने से पहले सभी जीवव्यक्ति प्रसव की अवस्था में प्रकृति के द्वारा फिर से बेहोश हो जाते हैं  जिससे उसको नया जीवन जीने में पूर्व जन्म की  स्मृति ना बचे । कारण की पुरानी जन्म की पुरानी कटुक स्मृति के प्रभाव से नया जन्म भी कोई भी नया जीव ठीक से नहीं जी पाता है जिस प्रकार से जब शांत पूरी निद्रा नहीं होती थकान नहीं उतरती तो अगला दिन भी तनाव बढ़ जाने से ठीक से नहीं जिया जाता है।जिन लोगों में यह विलक्षण स्मृति प्रभा का प्रभाव गुंण होता है । वह ओवर थिंकर चिंतालु स्वभाव के , हरदम भयभीत डर-डर कर अपने जीवन को जीते हैं ।  वह अपने  अगले क्षण के लिए अगले भविष्य को भी पिछली बुरी स्मृति स्थिति प्रभाव में ठीक से नहीं जी पाते हैं । जिन लोगों में अपने पूर्व जन्म की कटुक स्मृति संचित बची रह जाती है ,  उन बुरी स्मृतियों के प्रभाव से वह वर्तमान जीवन भी ठीक से नहीं जी पाते हैं।      (१६)

          निद्रा से पूर्व की अनिद्रा की अवस्था या तंद्रा अवस्था होती है। उस पूर्व अवस्था की अनेक  पूर्व अवस्थाओं में यदि ध्यान को जमा कर स्मृति वश्लेषण  करने की विद्या विधा का ज्ञान साधारण जनों को हो जाता है तो वह भी विशेष जान क्षमता विवेक विवेचना समीक्षा लक्ष्य पूर्ति से महाजन युग पुरुष स्तर तक प्रगति करते चले जाते हैं । जब कभी सभी जीवो का वर्तमान जीवन उनके पूर्व जन्म की स्मृति में शेष बच  लघु स्वप्न में चल रहा होता है । स्वप्न में भी कोई जीव अपनी मृत्यु को नहीं देखा करता है । हमारे अवचेतन मन का नियंता हमारा आत्मा मृत्यु जैसे विषय पर अति संवेदनशील होता है । स्वप्न के पश्चात जैसे ही मनुष्य की वह उसकी चेतना लौटती है । तब जो भी परलोक का घटित होता है । वह पुरानी चेतना में विलुप्त हो जाती है । जागने पर जागरूकता के साथ नई चेतना की तैयारी  हो जाती है । ऐसे में जो बच्चे जन्म के समय ही प्रसव अवस्था में बेहोश नहीं होते  मृत्यु दर्शन कर लेते हैं अपने विवेक से वह जन्म लेते ही मर जाते हैं । परंतु जिनमें जन्म लेते समय मृत्यु दर्शन की इच्छा नहीं होती जिनका विवेक  दृष्टिकोण जन्म जीवन के प्रति आशातमक होता है । वह अपने जीवन को भय से जीना शुरू कर देते हैं । जन्म से पहले मृत्यु दर्शन कर लेने से भी वह डर के मारे सब कुछ भूल जाते हैं । असहाय महसूस करने के कारण वे रोने लगते हैं परंतु जो बच्चे जिनका विवेक जागृत हो जाता है वह नहीं रोते  है जैसे नानक और तुलसीदास । जी्व के मन में इच्छाएं बहुत है लेकिन उन इच्छाओं को पूरा करने के लिए शरीर में शक्ति नहीं, मन में विचार नहीं, मस्तिष्क में ज्ञान सूचना नहीं , ऐसी असहाय अवस्था में बालक के सामने मात्र एक रोने का विकल्प बचता है ।    (१७)
   ऐसे में कुछ मूर्ख लोग जो अपने को विद्वान समझते हैं उनका एक वाक्य आता है कि जब एक दिन मरना ही है तो हम क्यों जी रहे हैं तो इसका सही जवाब यही है कि हम मरने के लिए ही जी रहे हैं , यह सब कुछ मृत्यु पर निर्भर करेगा कि वह उत्सव बनकर आएगी  या हमारी दुर्गति बनाने आएगी । ऐसे में एक सुंदर विचार यही है कि यदि जीवन को आनंद में जीना है तो रोजाना मरने का प्रयास करो बेफिक्री से तनाव रहित पूरी निद्रा लेकर सोओ जिसमें स्वप्न न हों , निद्रावस्था में स्वप्न का आना तनाव आसक्ति जीप के द्वारा लिए गए अनावश्यक संकल्प की पहचान है । जो स्वप्न में भी सुखः दुखों का अहसास करा देती है कि  हम बिना निद्रा की तैयारी किए सो गए ,, सोने से पहले हमने मन को आसक्ति तनाव से मुक्त नहीं किया यदि हम स्वप्न रहित निद्रा में सोना सीख जायेंगे त़ो दिन में अच्छा तनाव आसक्ति रहित जागरूक जीवन जीना सीख जायेंगे  ।    (१८)

    विधी दायक संतुष्टि दायक स्वादिष्ट भोजन करो इससे तुम्हारी भोजन इच्छा मृत्यु भोजन करते समय  हो जाएगी । तृप्ति दायक आरामदायक निद्रा का आराम लो इससे मृत्यु सोते में हो जाएगी । परम आनंद कर्म मिथुन का आनंद लो इससे मृत्यु मैथुन अवस्था मुद्रा में हो जाएगी ।।   एक बार जो जी्व आनंद के  सुख को जागृत अवस्था में देख लेता है महसूस करने लगता है फिर उसे आनंद प्राप्त करने में भय नहीं लगता वह मृत्यु से नहीं डरता है और अपने जीवन को जीना सीख जाता है । क्योंकि प्रत्येक जीव के जीवन में जीवन  के संग-संग मरने की प्रक्रिया चल रही है । बस अपनी नजर जीवन पक्ष  पर जमाए रहो या जीवन में  बार-बार अनेकों बार मृत्यु दर्शन करते हुए जीवन को जीते रहो । जीवन पर  नजर जमाओ मृत्यु दर्शन क्षण पर नजर मत जमाओ । मृत्यु दर्शन क्षण पर नजर जमाना मृत्यु विषयक विचारों को अपने मन में बोकर अपना जीवन शंका ग्रस्त करते हुए अपने जीवन में बर-बार डर-डर कर जीना पड़ता है । मृत्यु दर्शन को देखने के बाद मृत्यु पक्ष की अनदेखी करते हुए आगे जीवन दर्शन की आशा में अपने विवेक को जागृत रखना  यह इच्छा विवेक चिंतन ध्यान अवस्था पर निर्भर करता है कि तुमको जीवन दर्शन करने में ज्यादा आनंद आ रहा है तो तुम जीवन मार्ग में चलते रहोगे  या तुमको इंद्रिय हीनता  परम अंतर्मुखी होने पर जीवन जीने कै अंधापन या बहरापन  से आनंद आने लगा है । इतने पर भी यदि तुम जागृत होकर संसार की अवहेलना में लगे हो अपना जीवन जीते हुए भी संसार की अनदेखी कर रहे हो तो तुमको मृत्यु मार्ग दर्शन करने में आनंद आने लगा है अब तुम मृत्यु मार्ग पर वृद्धता की ओर चल पढ़ोगे । जीवन के प्रति आसक्ति भाव घटने लगेगा जीवन के प्रति संसार के प्रति विरक्ति भाव बढ़ने लगेगा  कर्म कार्य भाव घटने लगेगा जीवन के प्रति उदासीन त्याग भाव बढ़ने के तुम अपने आप मृत्यु मार्ग में चल पड़े हो।जीवन हो या मृत्यु मनुष्य को बस उसमें आनंद का ध्यान चिंतंन पर जागरूक रहना ह । तुम जीवन के जिस भी पक्ष पर जागरूक रहोगे तुम्हारी चेतना तुमको इस जीवन पथ पक्ष की ओर जीवन   जिआने लगेगी अर्थात जीवन जीना भी जीत की इच्छा पर निर्भर करता है मृत्यु भी जीव की क्षय क्षण पर निर्भर करती है बस ध्यान चिंतन क्षण पर जागरूक रहने की जरूरत है!    (१९)
        इस पर आशुतोष दाधीच के विचार:-  मृत्यु काल की सब सामग्री तैयार है मरने से पहले कफन तैयार है नया कफन बनाने के लिए कपास मरने से पहले तैयार हो चुका है कपास से नया कपड़ा बन चुका है । करने वाले के लिए ना नया कपास उगाना है नयाक नया कपड़ा नहीं बनाना है।  जरा सा करने का अपने ही करके देख लो मुर्दे को उठाने के लिए आदमी तैयार हैं मृत्यु कार्य की पूर्णता करने के लिए नए आदमी नहीं बन , नए आदमी बनने के लिए नये बच्चे पैदा नहीं करने । जलाने की जगह भी नहीं ढूँढनी  सब कुछ तैयार है कुछ नया नहीं लेना पड़ेगी फ्री है जलाने के लिए लकड़ी भी तैयार है परंतु इस मृत्यु कर्म के दायित्व को तुम स्वयं पूरा नहीं कर सकते इसलिए यह मृत्यु का  दायित्व दूसरे का है । अर्थात मरना भी जीव की इच्छा पर ही चलता है। इसमें लकड़ी के लिए नए वृक्ष नहीं लगाने पड़ेंगे केवल स्वास बंद होने की देर है श्वास बंद होते ही यह सब सामग्री अपने आप जुट जाएगी ।      (२०)
इसी प्रकार से जन्म लेने के लिए आपसे पहले आपको जन्मदाता बाप जन्मदायिनी मां और सहायिका दाई धाय पहले तैयार मिलेंगे‌  ।      (२०)
      मृत्यु के पश्चात का  अब जीवन का दूसरा पाठ जिसमें मृत्यु को भयंकर पीड़ादायक खतरनाक जीवन के विपरीत परिस्थितियों को  समझा जाता है यह गति उन अज्ञानी लोगों को प्राप्त होती है  जिन्होंने जीवन को तय अपनी इच्छा के अनुसार अपने ढंग से पूर्णता से लक्ष्य पूरित करके नहीं  जिया होता । जो अपने जीवन लक्ष्य से भ्रमित होकर अपना जीवन लक्ष्य अपनी जीवन दिशा दूसरे लोगों के कहे अनुसार अपनाने से अपने जीवन को दूसरों के दिशा दशा निर्देशन के अनुसार जीने का प्रयत्न करते  हैं । उन लोगों की मौत अक्सर कष्टकारी पीड़ादाई अनुभव इसलिए होती है क्योंकि उस मौत का चयन उन लोगों ने अपने लिए स्वयं नहीं किया बल्कि उस मौत का चयन भी उन लोगों के अनुसार अपनी जीवन पद्धति दूसरे के कहे अनुसार अपनाने के साथ  किया था ।         (२१)
    आजकल की भौतिकवादी सम्मान की आर्थिक सोच के चलते अब लोग मृत्यु से भी रोजगार करने लगे हैं । आज की तारीख में व्यक्ति का मरना भी बहुत अधिक महंगा हो गया है । अधिकतर धनी समर्थ समृद्ध लोग व्यक्ति को मृत्यु अवस्था के पूर्व मृत्यु अवस्था निवारण केंद्र अस्पताल में ले जाकर भर्ती कर देते हैं । जिसमें यदि मनुष्य की प्राकृतिक व्रत मृत्यु नहीं होती है । अस्पताल जीवनदाई केंद्र हैं जीवन हरण केंद्र नहीं , अस्पताल में व्यक्ति रोगी की अवस्था में जाता है । जो रोग से ठीक हो कर वापस घर आ जाता है । परंतु जिन लोगों की व्रत मृत्यु का समय आ जाता है ऐसे मनुष्य अस्पताल में भी ठीक नहीं होते अस्पताल में भी मर जाते हैं । ऐसे में उस अस्पताल के संचालक और डॉक्टर मरे हुए मनुष्य के परिवार से काफी अधिक मात्रा में आर्थिक दंड वसूलते हैं यहां तक कि मरने वाले व्यक्ति के परिवार पर उस व्यक्ति के अस्पताल में मरने पर बहुत अधिक प्रमाण में कर्ज चड़ जाता है । बात यहीं पर नहीं रुकती है मरने के पश्चात उस मनुष्य को यदि वह हिंदू नहीं है । तो उसके क्रियाकलाप में मृत्यु कर्म करने पर आर्थिक खर्च दफन करने में कफन दफन का खर्च थोड़ा आता है । यदि मरने वाला व्यक्ति हिंदू है तो ऐसे में उसका मृत्यु कर्म करने पर कफन जलन कर करने में इतना अधिक खर्च आता है । कि मनुष्य का दिवालिया तक निकलने की आशंका बन जाती है । मरने के पश्चात मृतक परिवार में मृत्यु भोज  -  मृत्यु भोज के पश्चात ब्रह्मभोज -  ब्रह्म भोज के पश्चात जाति भोज - जाति भोज के पश्चात वार्षिक अंत्येष्टि -  वार्षिक अंत्येष्टि  के बाद प्रत्येक वर्ष श्राद्ध कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदू धर्म में जन्म लेना और मरना भी महंगा पड़ता है ।  हिंदू धर्म में जन्म और जीवन मरण की प्रक्रियाएं  पंडितों के बड़े भाई ज्योतिषी लोगों /रोजी रिजक दाता अफसरों और मालिकों के आधीन हो जाती है जो जीवन जीवा  का  अतिरिक्त व्यर्थ शोषण कराती है ।जिसमें मनुष्य अपनी पूरी मानव जातक आयु न जीकर जातक आयु से पहले तरह तरह के रोगों में घिर कर, हृदयाघात मस्तिष्क आधात से समय पूर्व मरने को बाध्य हो जाता है।       (२२)
    यह तो था उस काल मौत का वर्णन जिसमें व्यक्ति एक निश्चित अवधि प्रवृत्ति कॉल मौत सामाजिक  मृत्य का वर्णन ।
अब इससे भी दूसरा मृत्यु का एक दूसरा और पक्षक। अकाल मौत या आकस्मिक मृत्यु और खतरनाक मृत्यु का कारण है जिसे अकाल मौत कहा गया है ।  जिसमें अस्पताल का खर्च ने जुड़ जाने से साथ-साथ अदालत का ,  पुलिस का भी खर्च शामिल हो जाता है और जो व्यक्ति अकाल मौत का कारण बना है उस व्यक्ति के साथ पारिवारिक रंजिश का संबंध बन जाने से मनुष्य का जीवन और भी ज्यादा खतरनाक स्थिति में चला जाता है । ऐसे में जो व्यक्ति अकाल मौत मर गया वह मर गया परं लोग उस अकाल मौत का कारण बने व्यक्ति से दुश्मनी मान लेते हैं ऐसे में दोनों पक्षों के मध्य खूनी रंजिश का खेल शुरू हो जाता है ।   दोनों पक्ष के लोग अधिकांशतः  अकाल मौत मरने लगते हैं । शायद ही कोई भाग्यशाली व्यक्ति होता ह जो संघर्ष स्थान को छोड़कर भाग जाता है वही अपनी प्राकृतिक मौत मर पाता है । नहीं तो जो लोग अकाल मृत्यु और संघर्ष स्थल पर स्थान पर अड़कर जमे रहते हैं ।वह अक्सर अकाल मौत मरते रहत फौजदारी में , परंतु जो लोग फौजदारी के संघर्ष के बाद बच जाते हैं उनके जीवन का अधिकांश का  दुर्पयोग अदालतों में मुकदमे बाजी में जिला न्यायालय उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय में व्यतीत होता है परंतु मृत्यु का न्याय नहीं मिल सकता ऐसे में नासमझ लोग मृत्यु को  रोग बनाकर अपनी संतान को देकर दुनिया से जाते रहते हैं । मृत्यु को ठीक ना समझ पाने के कारण ...ः। (२३)

वर्तमान में समाज में कितने प्रकार की शिक्षा पद्धतियाँ व्याप्त हैं ?

शिक्षा शब्द का आशय स्वयं बोलता है :-- सीखो अच्छा "  यह जीवों की यह जैविक प्रक्रिया अन्य जीवों की तुलना में मनुष्य में जन्म लेने के बाद तेजी से आरंभ हो जाती हैं, जैसे ही उसमें जीवन जीने की इच्छा के प्रति चेतना जागने लगती है । उसमें अपना जीवन जीने , अपने जीवन को बचाने ,, अपने जीवन को सुरक्षा देने की भावना आने लगती है ।  जिससे वह लघु मानव शैशवावस्था में जन्म लेने के 20 दिन बाद से ही वह समाज में वातावरण में सभी से सीखने लग जाता है शिशु में सीखने की प्रक्रिया पूर्व जन्म की स्मृति के आधार पर जन्म के समय मौजूद होती है । जन्म लेने के बाद चेतन उदित होने पर जागरूकता उत्पन्न होने पर 20 दिन बाद से ही वह शिशु अपने जीवन के लिए हितकारी शुरुआती जीवन उपयोगी लाइफ टिप्स जिन्हें सम्मिलित रूप से आरंभिक शिक्षा कहा जाता है वह सीखने का प्रयत्न आरंभ कर देता है ।    

     आमतौर पर शिक्षा का व्यापक अर्थ स्कूली शिक्षा को समझा जाता है परन्तु बच्चे स्कूल जाने से पहले घर परिवार के समाज से जीवन प्रक्रिया के काफी आरंभिक चरण  अपनी अपनी सामाजिक स्थितिक अनुसार सीख चुके होते हैं परंतु उनकी यह परिवार में शिक्षा सीखने की प्रगतिदार अत्यंत मंद होती है इस शिक्षा को तीव्र गति से सीखने के लिए बच्चे सामूहिक शिक्षण केंद्र विद्यालय स्कूल या मदरसा मैं शिक्षा द्वारा अच्छा सीखने के लिए बचपन से जाना आरंभ कर देते है ।   शिक्षा एक निश्चित धार्मिक सामाजिक जीवन राष्ट्रीय योजना के अंतर्गत निश्चित स्थान विद्यालय में निर्धारित पाठ्यक्रम पड़ने पर ही संपन्न होती है । लोग उसे ही शिक्षा कहते हैं ।।        जबकि मेरे विचार से शिक्षा की यह परिभाषा पूरी तरह से ठीक नहीं है । मेरे विचार से शिक्षा बच्चा जन्म के 15 दिन बाद से ही पहले महीने में तीसरे महीने से तेजी से सीखना शुरू कर देता है । जिसमें वह  अपने को दूसरों की अप्रिय प्रेरणा अप्रिय संवेदनशीलता से उनके अप्रिय व्यवहार से बचने का प्रयास शुरू कर देता है । इस दौरान बच्चे की मां के शैशव गान लोरियों का प्रभाव उस बच्चे पर पड़ने लगता है । यदि वह लोरियां अच्छी-अच्छी गाती सुनाती है । तो बच्चे का विकास अलग दिशा में चलने लगता है । यदि रहे बच्चे को मां लोरियां नहीं सुनाती है तो बच्चे में संवाद सवेदनशीलता  // कम्युनिकेशन स्किल का विकास रुक सा जाता है । वह दूसरों की बातें सुनना पसंद नहीं करता दूसरों की सुनाई बातों पर गौर नहीं करता । इसमें गौर करने की बात यह है कि जो मां बच्चे को हर समय अधिकतम लोरियां सुनाती रहती है । परंतु बच्चा कभी कभी मूड होने पर ही उन लोरियों के गान को सुनकर स्वीकार कर पाता है ।  

   उसके बाद जब वह 1 वर्ष का हो जाता है तो उसमें सीखने की प्रक्रिया और भी ज्यादा  तेजी से विकसित होने लगती है । जिसमें वह अपने जीवन के लाइफ टिप्स परिवार के लोगों मां से अधिकतम पिता से न्यूनतम  को देखकर और वातावरण के दूसरे लोग पशु पक्षी आदि की अप्रिय संवेदनशीलता को समझ कर तेजी से सीखता है । इस सीखने की प्रक्रिया में जब वह 2 साल का हो जाता है तो उसके सीखने की प्रक्रिया में मां बाप के अलावा घर परिवार के लोग जुड़ जाते हैं , वह उनसे भी सीखने लगता है ।  जब वह 5 वर्ष के पश्चात घर से बाहर निकल कर स्कूल  जाना शुरू कर देता है तो वह बाहर घर समाज परिवार और वातावरण सभी से सीखने लगता है । सीखने की प्रक्रिया जीवन में पैदा होने से शुरू हो जाती है जो सामान्य लोगों में स्कूली शिक्षा के रूप में 20 वर्ष तक चलती है ,  परंतु  कुछ ऐसे लोग होते हैं जो मरते दम तक सीखते रहते हैं ऐसे लोगों को लचीली  बुद्धि वाले परम बुद्धिमान विवेकशील लोग समझा जाता है ।।

      सीखने की प्रक्रिया में अधिकतर लोग सिर्फ स्कूली शिक्षा को शिक्षा समझकर स्कूली शिक्षा को सीखने पर जोर देते हैं जबकि मेरे अनुभव के अनुसार हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब और किस किस तरह से स्कूली शिक्षा से हटकर शिक्षा के अन्य औपचारिक वैकल्पिक स्रोत जैसे सत्संग * , सभा * , पंचायत *, गोष्ठी * ,मित्रों की मंडली से* , अपने बड़े छोटे सभी लोगों की बातें सुनकर के अपने को शिक्षित करते रहते हैं । जिसे पर्सनालिटी डेवलपमेंट कहते हैं । आमतौर पर पाठ्यक्रम की शिक्षा को ही शिक्षा माना गया है । लेकिन मेरे विचार से बच्चा स्कूल में जाकर पाठ्यक्रम से ज्यादा अपने स्कूल के सहपाठियों से , कमतर निजी मनन चिंतन से ज्यादा  , परन्तु स्कूल  के शिक्षकों के निर्देशन में क्रियाकलापों से ज्यादा  सीखते हैं ।  

   जिन के मन पर   सहपाठियों का ज्यादा रंग चढ़ जाता है वह स्कूली पाठ्यक्रम की शिक्षा में स्कूल शिक्षक प्रदत्त शिक्षा में कम रुचि लेते हैं । स्कूल की शिक्षा से दूर चले जाते हैं । जिसे  असामाजिक शिक्षा या अपराधी शिक्षा कहा जा सकता है । जो बच्चे घर से बाहर मानव समाज में स्कूली  समाज से हटकर  असामाजिक अनुपयोगी शिक्षा अपने हित के लिए के लिए सीखते हैं जो बकवाद बकवास गपशप कही जाती है। स्कूली शिक्षा की तुलना मे उस गप्पू शिक्षा को मुफ्त में प्राप्त असामाजिक लोगों से प्राप्त  शिक्षा को अपने लिए हितकारी ज्यादा अच्छा उपयोगी समझते है । उस असमाजिक अनुपयोगी शिक्षा को अपनाकर अपराध जगत में चले जाते हैं । असामाजिक दृष्टिकोण अपना लेते हैं ।,  
   जिनके मन पर स्कूली शिक्षा और  शिक्षा शिक्षकों का रंग चढ़ता है । वह स्कूली पाठ्यक्रम से जुड़ कर के परिवार समाज और राष्ट्र की उपयोगी विचार धारा से जुड़ कर के समाज के लिए उपयोगी शिक्षित नागरिक बन जाते हैं ।। 
         जिन छात्रों के मन में शिक्षा द्वारा निजी हित या सामाजिक हित में चिंतन मनन विचारण  के गुंण अवसर के अनुसार नयी अपने लिए हितकारी सोच  उत्पन्न हो जाती है. यह अपने जीवन में अपने लिए प्रायोरिटी वरीयता तय करना सीख जाते हैं इसके अलावा यह है समाज के दूसरे लोगों के बकवादी बातें व्यर्थ के ज्ञान पर ध्यान नहीं देते । मात्र वहीं छात्र समाज के दिशा निर्देशक उच्च कोटि के व्यापारी उद्योगपति  राजनीतिकार प्रशासनिक अधिकारी बन पाते हैं ।  जो छात्र शिक्षकों की शिक्षा से  ज्यादा अभिप्रेरित हो जाते हैं वह शिक्षा के दौरान या उच्च शिक्षा प्राप्त करके निजी हित कम सामाजिक हित अधिकतम उपयोगी ज्ञान सूचना अपने मन में संचित करके बुद्धि मन विवेक शीलता से शिक्षक लेखक सहित्यकार पत्रकार आदि सामाजिक जगत में या समाज के अन्य जगत में सेवा दाता बन जाते हैं । परंतु जो मित्रों की ओर ज्यादा अभिप्रेरित हैं और उनकी मित्र मंडली भी अच्छे लोगों की है तो वह मित्रों की संगत से अच्छी निर्माणात्मक दिशा की ओर चल पड़ते हैं यदि मित्रों की मंडली संगत अच्छी नहीं है तो वे विनाश आत्मक दिशा अपराध जगत की ओर चल पड़ते हैं।   ऐसे में शिक्षा को मात्र स्कूली शिक्षा तक सीमित करके शिक्षा को छोटा ना समझते हुए शिक्षा के प्रति दायरे को बढ़ा करते हुए हम अपनी सोच को यदि लर्निगमाइंड या सतत शिक्षा का बना लेते हैं अर्थात इस दुनिया में हमें प्रत्येक जीव प्रत्येक मनुष्य कुछ ना कुछ हमको सिखा रहा है । हम सभी से कुछ ना कुछ सीख रहे होते हैं । अब यह बात अलग है कि हमने क्या कुछ अलग सीखा जो उपयोगी था या हमारे लिए अनुपयोगी था जो शिक्षा के पश्चात निरर्थक सिद्ध हुआ । जिसके शिक्षण में हमारा धन और समय व्यर्थ गया जिसके शिक्षा का हमने अपने निजी जीवन में कोई लाभ नहीं उठाया ऐसी निरस्तकारी शिक्षा को व्यर्थ शिक्षा कहा जाता है । 
    इस सीखने की प्रक्रिया में यदि मनुष्य अच्छे आध्यात्मिक गुरु के संपर्क में आ जाते हैं जो उन्हें चिंतन मनन की मौलिक साधनाएं विधि सिखा देते हैं जिससे उनका अपने निजी जीवन संचालक मस्तिष्क के अवचेतन मन से संपर्क करना आ जाता है । तो ऐसे अवचेतन मन से  नियंत्रित संपर्कित  छात्र अपने जीवन में सबसे अधिक प्रगति करते हैं । वे छात्र यदि कहीं भटकते हैं गलती करते हैं तो ऐसे में उन्हें उनके अवचेतन मन से आने वाली निजी अंतर चेतना आवाज समय-समय पर रोक कर उचित दिशा में मार्ग   निर्देशित करती रहती है । इस प्रकार से यह सामान्य लोगों और छात्रों की लीक से हटकर अपने मंन की अवचेतन मन की बात को सुनते हुए अपने मन के अवचेतन स्तर से जीने वाले छात्र अपने जीवन में अधिकतम प्रगति करते हैं ।       @परंतु कुछ लोग इनसे भी ऊपर होते हैं जो अपने अवचेतन मन को नियंत्रित करना अपने अवचेतन मन को आवश्यक निर्देश देकर नियंत्रित करना सीख जाते हैं । उनमें से नियंत्रित अवचेतन मन मस्तिष्क वाले छात्र और अधिक तरक्की करते हैं परंतु जो छात्र अपने मन के सुपर चेतन स्तर सुपर ईगो से जीते हैं वे छात्र समाज के संचालक फरिश्ते और सर्वोत्तम उपयोगी नागरिक बनते हैं । इस प्रकार से शिक्षा में मस्तिष्क नियंत्रण विचार नियंत्रण की विधा का महत्व सबसे अधिक और सर्वोपरि है जिसके आधार पर हमारा विवेक कार्य करता है।
         यह हमारी निजी विवेक पर निर्भर करता है इसमें हम यदि सुनना समझना सोचना और बोलना इस प्रक्रिया को सही तरीके से सीख जाते हैं जिसे ज्ञान मार्ग कहा जाता है । जिसे सुने सबकी करें मन की ,,  तभी हम सही मायनों में शिक्षित हो पाते हैं । अन्यथा दूसरे लोगों के हर किसी की बात को ध्यान देकर सुनने के बाद उसे ज्यों का त्यों अपनालेने पर वह उसकी बात हमारे दिमाग में बैठती चली जाती हैं जो हमको ‌हाईपोकोन्डरियास का मनोरोगी बना दिया करती है , जिससे उसके बाद  निरर्थक बातों की अधिकता के कारण हमारा दिमाग निरर्थक बातों पर आधारित निरर्थक क्रिया कलाप के अनुसार अनियंत्रित निर्थक व्यवहार करने लगता है । जिससे हम समाज में परिवार में फेल होते दिखाई देते हैं । इस फेल होने की प्रक्रिया से बचने के लिए शिक्षा का अहम पक्ष सेल्फ माइंडसेटिंग या अपने दिमाग की अपने आप सेटिंग करना और सैल्फ ब्रेनवॉश आना चाहिए यह बहुत जरूरी है । यदि सेल्फ माइंडसेटिंग का फंडा हमारे दिमाग में आ जाता है , और हम अपने दिमाग को अपने हिसाब से सेट करना सीख जाते हैं । तो हमारे दिमाग पर दूसरों का शब्दों का जादू प्रभाव नहीं चल पाता ।। ऐसे में हम अपने जीवन में अधिकतम तरक्की करते हैं , परंतु जो लोग अल्प शिक्षित हैं जिनके परिवार में शिक्षित नहीं हैं अगर उन्हें अपनी तरक्की करनी है तो ऐसे में उन्हें दूसरे लोगों के शब्दों को ग्रहण करना उनकी मजबूरी है ,  उनका विकास दूसरे लोगों को देखकर उनके प्रेरणा शब्दों को सुनकर  होता है । इन दूसरे लोगों के शब्दों को ग्रहण करते समय हमें इस बात का खास ध्यान रखना पड़ता है । हमें जो दूसरे लोग शब्द दे रहे हैं क्या वह अपराधी मनोवृति के लोग हैं ? या सामान्य श्रेष्ठ लोग हैं , या असामान्य श्रेष्ठ लोग हैं या असामान्य सामान्य प्रकार के अपराधी सोच के भ्रमित करने वाले धुर्वे धुर्रा धूर्त राजनीतिक  लोग हैं । ऐसे में हम अपनी तरक्की सिर्फ उन धार्मिक लोगों के विचारों के ऊपर आधारित होकर कर सकते हैं । जिनकी सोच सामान्य या असामान्य रूप से श्रेष्ठ लोगों की श्रेणी में होती है ।।
      ऐसे में माइंडसेटिंग में हमें इस बात का भी विशेष ध्यान रख कर के हमें उन लोगों के विचारों को अहमियत नहीं देनी चाहिए , जिन लोगों के विचार निरर्थक हमें भ्रमित करने वाले किंकर्तव्यविमूढ़ किंकर बनाने वाले हैं । हमें समाज उपयोगी विचार देने वाली लोगों के विचार सुनने चाहिए परिवार के उपयोगी लोगों के विचार सुनने चाहिए तभी हम अपने विचार विश्लेषण द्वारा दूसरों के विचारों से भी लाभ उठाकर तरक्की कर सकते हैं । विचारों की प्रक्रिया श्रृंखला उस दूध के समान होती है , जिसमें बहुत अधिक परिमाण में पानी अल्प परिमाण में पोषक वसा आदि तत्व होते हैं । ऐसे में हम अपना ध्यान मात्र मानसिक पोषण विचारों  (पोषक प्रोटीन और वसा पर रखना चाहिए ना कि पानी पर क्योंकि पानी और पोषक प्रोटीन भी मट्ठा के रूप में बाहर निकल जाती है ) इस प्रकार से मक्खन और घी के रूप में हम न्यूनतम उच्च उत्तम विचारों का संग्रह अपने पास कर पाते हैं । सभी तरह के विचारों के संग्रह का कारण मध्य शब्द चित्र दृश्यंकन युक्त ज्ञान है। जो ऊर्जा से पूरित ऊर्जा से युक्त होता है । 
    फ्रायड के अनुसार हर शब्द एक सूक्ष्म ऊर्जा पिंड बम स्वरूप होता है । हमारा मन मस्तिष्क जिस प्रकार के शब्दों को संचित करता है उन शब्दों के अनुसार हमारे विचारों द्वारा संचालित हमारे मस्तिष्क में ऊर्जा भरती चली जाती है । बोला गया प्रत्येक शब्द ऊर्जावान होता है वह नकारात्मकता/सकारात्मकता  दोनों के प्रभाव युक्त होता है यह हमारी इच्छा मर्जी पर निर्भर है कि हम सकारात्मक शब्दों को ग्रहण करें नकारात्मक शब्दों का त्याग करें। इस प्रकार से अध्ययन किए गए ज्ञान के द्वारा दूसरे लोगों‌ से प्राप्त मार्गदर्शी ज्ञान से हमारा मन दूसरे लोगों से मिले  शब्दों  चित्रों दृश्य दर्शन के प्रभाव से अपने आप नियंत्रित होता चला जाता है ।
   इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमें शब्दों चित्रों दृश्य दर्शन के प्रति अत्यंत संवेदी और जागरूक रहते हुए शब्दों चित्रों दार्शनिक  के ज्ञान ग्रहण करने सुनने से पहले जागरूक होकर गौर करके वक्ता को देखकर ही वक्ता के शब्द सुनने चाहिए कि वक्ता  राजनीतिक भूत है या सच्चा धार्मिक मनुज है ।। इसी बात को हम और आगे बढ़ाते हुए अपनी शिक्षा को जो स्कूल में शिक्षा ले रहे हैं । उसमें भी संवेदी होकर स्कूल में दाखिल होते समय आगे के लेख को पढ़ते हुए :----  जागरूक होकर स्कूल में जागरूक रहना चाहिए कि स्कूल में शिक्षा के छः:६ प्रकार की शिक्षा में से कौन-कौन सी शिक्षा में दी जा रही है
 जिसमें से हम केवल 1  आदर्शवादी शिक्षा को अपने लिए ग्रहण करें ,2 प्रकृति वादी शिक्षा को दूसरों के लिए ग्रहण करें ,3 प्रयोजनवादी शिक्षा को समाज के लिए ग्रहण करें , 4  यथार्थवादी शिक्षा को बोलने दूसरों सुनाने के लिए संयम संज्ञान से ग्रहण करें ,  5 आदेशात्मक अवसरवादी शिक्षा को अफसरों के अनुसार उपयोग करें ,,6 रहस्यवादी छलिया ज्ञान करण खोजी शिक्षा को अपने दिमाग की मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए अवश्य सीखना चाहिए । 
यदि हम शिक्षा संस्थानों में स्कूलों में इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे तभी हम शिक्षा को सही मायनों में समग्र रूप से ग्रहण करते हुए अपने जीवन को सिद्ध सार्थक बनाने में कामयाब हो पाएंगे ।
       वर्तमान समय में  पहले पांच प्रकार के विद्यालय  अनुभव अनूभूतियाँ किए गए हैं अंतिम छतवान रहस्यवादी शिक्षा देने वाले स्कूल समाज में नहीं ह । जो वासना ,कामना धर्म धारण , कर्म विधि ,कर्म बंधन , शिक्षा स्थानांतरण , शिक्षा पद्धति , शिक्षा के गुण नियंत्रण के अनुसार अनुभव किए गए हैं । परंतु छठा ज्ञान चैनल रहस्यवादी शिक्षा रहस्य उद्धघाटन  पाखंड खंडन को गोपनीय /गुप्त  रखा गया है।
1:- आदर्श वादी शिक्षा यह शिक्षा ब्रह्मवाद के अनुसार या ईश्वरीय चैतन्यता विधान नियम आदर्शवाद के अनुसार संचालित होती है । जिसमें वासना  संस्कार भाव  जो  जीव के निजी   चेतना में संचित रहते हैं । वह उत्तम शिक्षा के प्रभाव से बाहर निकल कर प्रस्फुटित होते हैं तो अधम /पतनकारी शिक्षा  प्रभाव से दवे के दवे रह जाते हैं । इस शिक्षा में धर्म कर्म भाव  जीव की आवश्यकता के अनुसार निश्चित है इस प्रकार की शिक्षा में शिष्य का स्थान प्रमुख गुरु का स्थान द्वितीय है । इसमें शिष्य अपनी रुचि की और आवश्यकता के अनुसार अधिकतम अधिगम करता है । इस प्रकार की शिक्षा ही मनुष्य को जीवन में अधिकतम प्रगति विकास कराने में सक्षम है यह शिक्षा सार्वजनिक सत्य भौतिक * सत्य नीति * कथन पर आश्रित है । जो लोग अपने निजी जीवन में सत्य को जितने अंश में निजी तौर पर तथा परिवार में संचित करते हैं वह उतनी ही तरक्की कर के अगले स्तर में चले जाते हैं। जो लोग सत्य को नहीं स्वीकार करते सत्य से बचते हैं वह अपने उसी जीवन स्तर में बने रहते हैं जिसमें वह पैदा हुए थे ।।। इस शिक्षा की कर्म विधि में शिक्षा के दोनों पूरक  सोपान गुरु और शिष्य को एक दूसरे के हितों को देखते हुए उनकी  क्षमता पात्रता योग्यता दक्षता क्षमता   के अनुसार शिक्षा दी जाती है । जिसका परिणाम अधिकतम अधिगम के रूप में आता है । इसमें कर्म बंधन का नियम दोनों पूरक गुरु शिष्य सोपानों /चरणों  में गुरु प्राण या नर समान दाता भाव  शिष्य  इंद्री या नारी ग्रहणकर्ता  भाव समान  शिष्य का महत्व होता है । यह शिक्षा * देवत्व विधि शिक्षा पद्धति शिक्षा * कही जाती है जिसमें गुरु और शिष्य के मन में, कर्म में, धर्म में, वचन में हिंसा की संभावना न्यूनतम होती है हिंसा हिंसा विवेक को प्रधानता दी जाती है ।  आदर्श वादी शिक्षा अहिंसा वादी शिक्षा कही जाती है। यह आदर्शवादी शिक्षा नीति प्रधान होती है जो समाज के 90% लोगों के विचारों के अनुसार 90% लोगों को संतुष्ट करती है परंतु 10% लोग अति विकासवादी विचारणा के कारण इससे असंतुष्ट रहते हैं।
        परंतु वर्तमान समय के परिपेक्ष में देखते हुए यह आदर्शवादी शिक्षा  मनुष्य को मूर्ख बनाने की ओर धूर्त लोगों का एक कदम बन गया है। जिसमें साधारण मनुष्य में ईश्वर उचित गुण भरने का प्रयास किया जा रहा है । प्रत्येक मनुष्य से उसके ईश्वर स्वरूप में प्रतिष्ठित होने की आशा की जाती है ।जो  कि असंभव है मनुष्य जीव भावधारी होने के कारण किसी भी स्थिति में पूर्णतया ईश्वर नहीं बन सकता वह ईशिता गुण अवश्य सीख सकता है । यदि वह ईश्वर होता तो जीव अवस्था में जन्म लेकर पैदा ना होता परंतु अवतारवाद के सिद्धांत से इससे सही सिद्ध करने का प्रयास किया गया है जो उचित नहीं है । साधारण लोग को सच और इमानदारी का भयंकर पाठ पढ़ा कर उसमें ईश्वरयता लाने का प्रयास किया जाता है। जिससे वह मनुष्य स्वयं को ईश्वर बनने समझने के फेर में सब को नियंत्रित करने में लग जाता है। उसमें अकारण सभी से लड़ाई झगड़ा करने , संघर्ष करने, सभी को नियंत्रित करने का ईश्वरीय गुण आने की सोच बन जाती है जो उचित नहीं है । जबकि प्रकृति में वास्तविक जीवन में जीव का ईश्वर बन्ना मिथ्या कल्पना है इस मिथ्या कल्पना के चलते लोग धूर्तता पूर्ण जीवन प्रणाली अपनाते हैं । दूसरों को सत्य मार्ग पर चलने का आदेश निर्देश देते हैं जबकि वह अपने निजी जीवन में उतने ही ज्यादा सत्य से दो असत्य की ओर चलते हुए लक्षित होते हैं । इस आदर्श वादी  शिक्षा के संचालक लोग अपने स्तर पर अपनी भ्रष्टता  दुष्टता दूसरों को धोखा देना लक्ष्य से भ्रमित करने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं । 
2:-  प्रकृतिवादी या इंद्र वादी भाव के रूप में जानी जाती है । जो शिक्षा में विस्तार वाद या बृहस्पति की सोच सूचक होती है यह शिक्षा रीति रिवाज  प्रधान शिक्षा होती है। इस शिक्षा में प्रजा में से आधे लोग सदैव राजा या शासक हित प्रधान होते हैं आधे लोग स्वहित   प्रधान  विद्रोही कहे जाते हैं इस प्रकार से यह समाज की भ्रम व्यवस्था की शिक्षा कही जाती है जिसमें लोग सदैव भ्रम में रहते हैं । प्रकृति भी सभी जीवो को नियंत्रित करने के प्रयास में उन सभी जीवों को जन्म देकर मरने तक उनको नियंत्रित करने के प्रयास में  पीड़ित करने  मारने में लगी रहती है । जो जीव प्रकृति की मार उष्णन शीतलन को सहन करने में समर्थ हो जाते हैं । वे सक्षम और समर्थवान कहे जाते हैं , जो प्रकृति की मार को सहन नहीं कर पाते वह अकाल मौत मर जाते हैं क्योंकि वह जीवन जीने में सक्षम नहीं होते हैं । 
      प्रकृति के द्वारा सृष्टि नियंत्रण के गुण को जो लोग समझ सीख जाते हैं वह समाज के दूसरे लोगों को नियंत्रित करने के लिए राज धर्म अपनाकर समाज के निजी लोग और दूसरे समाज के दूसरे लोग सभी को नियंत्रित करने के लिए राजधर्म से तरह-तरह के नीति नीति नियम बनाकर समाज संचालन करने में लगे रहते हैं ।
   यह प्रकृति वादी शिक्षा राज प्रवृत्ति के लोगों द्वारा जनता के लोगों को नियंत्रित करने के लिए शासक वर्ग के द्वारा लोगों को नियंत्रित करने की दिशा में उनको मानसिक गुलामी की ओर ले जाती है । दुष्ट क्षत्रिय लोगों के द्वारा अपनी सभ्यता संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिए दूसरी प्रकार की सभ्यता संस्कृति को नष्ट करने के लिए संस्कृति के युगपरुष बनने के प्रयास , संस्कृति के संचालक इंद्रपुरुष बनने के प्रयत्न , संस्कृति के रक्षक राज पुरुषओं के कोशिश  द्वारा संचालित की जाती है ।  इसमें शिक्षा का धर्म भय से प्रजा नियंत्रण तथा प्रजा को मूर्ख बनाना प्रधान होता है । इसकी कर्म विधि पशुज प्रकार की मारा पीटी /मारकाट से दूसरे जीवों को नियंत्रित करने की होती है । इसमें कर्म बंधन का गुण या शिक्षा के पूरक सोपान गुरु स्वामी के रूप में शिष्य सेवक के रूप में अपने अपने दायित्व को स्वीकार करते हुए शिक्षा ग्रहण करते हैं । यह शिक्षा क्षत्रिय प्रकार की शिक्षा कही जाती है । जो हिंसा पर आधारित होती है इसमें गुरु शिष्य का अधिकतम शोधन करने के लिए ताड़न या मारा पीटी पर ज्यादा ध्यान रखते हैं । यह शिक्षा प्रकृति वादी शिक्षा भी कही जा सकती है जो सर्वश्रेष्ठ जीवितम के जीवन लक्ष्य के अनुसार चलती है । इसमें गुरु शिष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए उन संस्कृति मूल्यों के वाहक  शिष्यों  संस्कृति मूल्यों के वाहन बनाने के लिए प्रचार प्रसार के लिए मारपीट विधा से  उष्णन  करता है । इस प्रकार की प्रकृति वादी शिक्षा से मारपीट की शिक्षा से अक्सर कभी-कभीशिष्यों का उत्थान मूल्यांकन के स्थान पर अवमूल्यन पतन होता है जिससे शिष्य की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है या वह विपरीत मति गति से उल्टा चलकर पतन के गर्त में लुप्त हो जाता है।।
3:- प्रयोजन /प्रयोग वादी शिक्षा इस प्रकार की शिक्षा पद्धति में वैश्य वासना भाव मतलब मंत्वय आर्थिक विकास समृद्धि प्रधान होता है । जिसके अंतर्गत शिक्षा का उद्देश्य गति और परिणाम निश्चित नियंत्रित करने वाले लोगों की सोच वणिक या व्यापारी प्रकार की होती है । इस प्रकार की  शिक्षा का धर्म आधार लालच है । इस प्रकार की मतलब शिक्षा में लोगों में अपने अपने निजी संविधान अपने अपने कुल के अनुसार बनाने की होड़ बन जाती है जिससे समाज में परिवार में निजी संविधानओं की बहुलता के कारण तरह तरह की सामाजिक * कुरीतियां * उत्पन्न हो जाती हैं यह प्रयोजनवाद ई शिक्षा कभी गुरु के हित में जाती है तो कभी शिष्य के हित में जाती है इस शिक्षा में एक पक्षीय हित साधन होता है इस शिक्षा में सर्व हित साधन संभावना का सामाजिक शिक्षा विकल्प स्पष्ट होता है जिससे इसे  धूर्तता पूर्ण शिक्षा कहा जाता है। जिसमें इसके दोनों पूरक सोपान इसके दाता गुरु व्यापारी तथा शिष्य  ग्राहक दोनों की मनोवृति लालची होती है । 
  लोभी गुरु - लालची चेला ,  करें नर्क में ठेलम्  ठेला ः
   इसमें गुरु शिष्य का शोषण करने की मनोवृति रखता है और शिष्य गुरु से मुफ्त में ज्ञान लेने की सोच रखता है । जिससे यह प्रयोजन वादी मतलबी शिक्षा अपना परिणाम न्यूनतम देती है। इसके दोनों पूरक सोपान गुरु शिष्य घाटे में रहते हैं । गुरु अपने ज्ञान को पूर्ण रूप से शिष्यों को दे नहीं पाता ,शिष्य गुरु के ज्ञान को अपनी अधिकतम क्षमता से ले नहीं पाता ।
  गुरु शिष्य दोनों अपने अपने उद्देश्यों के प्रति लक्ष्यों के प्रति ध्यान रखते हुए इस शिक्षा विधि से शिक्षा प्राप्त करते हैं । यह शिक्षा विधि की कर्म विधि मनुज प्रकार की है । जिसमें कर्म बंधन क्षणिक औपचारिकता मात्र होता है । जिसमें गुरु व्यापारी छात्र ग्राहक और दोनों ही धन आश्रित मनोवृति के होते हैं । इस प्रकार की शिक्षा का नियंत्रण धन के द्वारा , धनकुबेर ओं के द्वारा,,  धनी लोगों कारपोरेट वर्ल्ड के हित में किया जाता है ।
4:- यह यथार्थवादी शिक्षा भीड़ वाद आशीर्वाद विघटन वादी शिक्षा विधि पर आश्रित है जो यजुर्वेद के अध्याय 30 के प्रथम से अंतिम श्लोक वृत्ति भाव निरुपण पर  शुद्ध वासना भाव से युक्त होती है। जो प्रत्येक जीव के सम्यक विकास के अनुसार आधारित होती है यदि प्रत्येक जीव का पूर्ण विकास होगा तो फिर जीव क्यों कर सामाजिक अवस्था में रहेगा ? ऐसे में यह है समाज विघटनकारी शिक्षा कहने को तो  सबका साथ सबका विकास # पर आधारित कही जाती है परंतु यह समाज का ,परिवार का धर्म-कर्म स्तर तक नष्ट  कर देती है जब प्रत्येक मनुष्य अपना अपना निजी विकास करने की सोचने लगता है तो वह दूसरों के विनाश में जुट जाता है जिससे पहले घर टूटते हैं परिवार टूटते हैं , कुल टूटते हैं जातियां टूटती हैं धर्म टूटते हैं अंत में राष्ट्र भी टूटने लगते हैं । इस प्रकार की शिक्षा से समाज से लेकर राष्ट्र तक सर्वत्र अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है कोई किसी के नियंत्रण में रहना पसंद नहीं करता कोई किसी की रुचि अभिरुचि का ध्यान नहीं रखता, कोई किसी की  भावना इच्छाओं को समझने की कोशिश नहीं करता सभी अपने आप को जिम्मेदारियों से मुक्त रखते हुए ऐसे समाज की इच्छा रखते हैं कि उन लोगों का ध्यान मान सम्मान समाज के दूसरे लोग रखें लेकिन वह समाज के लोगों का ध्यान रखें ना रखें यह उनका निजी जीवन विकल्प है जो पूर्णतया दायित्व हीन है । परंतु उन्हें इस दायित्व हीन अवस्था में सभी सामाजिक सुविधा सुरक्षा के समस्त अधिकार सुरक्षित निर्बाध बने रहने चाहिए।
 इस यथार्थ वादी शिक्षा का धर्म कर्मपरिणाम अनुभव संग्रह आधारित होता हैं इसके कर्म विधि गुरु स्वयं दायित्व हीन परंतु दूसरे लोगों शिष्यों को उनका दायित्व देने समझाने वाले आप ही सरकार या अधिकारी मनोवृति के लोग होते हैं , परंतु शिक्षा ग्रहण करने वाले शिष्य  स्वयं दायित्व हीन होते हैं । इसका कर्म बंधन मजबूरी है  जिसके अंतर्गत गुरु अपने प्रशासनिक अधिकारियों के नियंत्रण में रहते हुए छात्रों को शिक्षा देते हैं तो छात्र अपने कुल परिवार के नियंत्रण में रहते हुए बेमन से ऐसी शिक्षा ग्रहण करने को बाध्य होते हैं । 
   इसमें गुरु अधिकारी मनोवृति का तथा छात्र बेगारी मजदूर मनोवृति का होता है । इसका नियंत्रण अधिकारीगण के द्वारा होता है इसके दो प्रकार हैं एक शूद्र वादी शिक्षा  जिसमें शिष्य /लोग  दुखी मन से शिक्षा ग्रहण करके दुखी परिणाम देते हैं यह यथार्थवादी शिक्षा जो छात्रों और लोगों के मन में भ्रम उत्पन्न पूर्ण करने वाली परिणाम हीन शिक्षा कही जा सकती है। जो औपचारिकता पूर्ण वार्तालाप से शुरू और बंद होती है । जिसका उद्देश्य स्पष्ट नहीं होता जिससे शिक्षित होने वाले छात्र शूद्र मानसिक अवस्था में सदैव शोक पूर्ण &  रुद्र  , विपिन गरीब दरिद्रता निर्धनता अवस्था में रहते हैं यह छात्र सुख शांति से दूर दिशाहीन स्थिति में सदैव निजहित चिंतन रत रहते हैं । परंतु इन छात्रों में अपने लिए भी सोचने की क्षमता नहीं होती । कारण कि इनमें सोचने की क्षमता व्यापक अध्ययन भ्रम पूर्ण परिणाम और अनुभव से आती है । जब यह अवस्था आती है उससे पहले यह छात्र शिक्षण संस्थानों से बाहर निकल जाते हैं । यह छात्र साक्षर होते हैं परंतु ज्ञानी नहीं ।। जो सदैव अशांत मानसिक अवस्था में शोक और रौद्र अवस्था में रहते हैं । यह नौकरी से मजदूरी से दूसरे के आधीन रहकर यह कर्म करते हैं । परंतु इनके कर्म का फल इनके अधिकारी अधिक भाव में शोषण कर जाते हैं ।
दूसरा  विशिष्ट अशुद्रता का प्रकार है जिसमें छात्र सभी वर्णों के अपने-अपने वर्ण के अनुसार बिना कर्म किए धन अर्जन करना सीख जाते हैं   जिसे शिक्षा से समाज में अपराधीकरण हो जाता है । ऐसी अशुद्र लोग या छिपे हुए शुद्र लोग जो शिक्षा करने तो स्कूल में जाते हैं परंतु शिक्षा को सही रूप से नहीं सीख पाते । अपितु वे :-
धनं धर्मम् आधारं , धनं परं सुख साधनम्  बिना कर्मम् उद्देश्य पूरितं
   का मंत्र आत्मबोध प्रज्ञा विधि से बिना गुरु के पढ़ाई सीख जाते हैं उनके दिमाग में धन के लिए विशेष स्थान होता है वह जीवन का लक्ष्य धन को समझते हैं और आजीवन येन केन प्रकारेण से धन ऐंठने में लगे रहते हैं ।  जैसे धूर्त या अब्राह्मण लोग मंदिर में मूर्ति स्थापना करके लोगों को मूर्त दर्शन कराकर  बिना ज्ञान शिक्षा दिए लोगों से हाथ उठाकर आशीर्वाद मुद्रा से सम्मोहन करके धन उठाते हैं ।  धूर्त क्षत्रप लोग सदैव समाज के लोगों को भय देकर उनसे हफ्ता वसूली, मासिक वसूली, वार्षिक वसूली के द्वारा बिना कर्म के धन उठते हैं , उन लोगों की सुरक्षा भी नहीं करते । दूसरी ओर गुप्त या अवैश्य लोग व्यापार में  मिलावट करना , कम तोलना आदि अनेक विधि से ग्राहकों को ठगते रहते हैं। हद तो अशूद्र मजदूर लोग कर देते हैं जो मालिक से पैसा लेकर भी उसका काम नहीं करते और बिना कर्म किए ही मालिक से ज्यादा से ज्यादा मजदूरी लेने के लालच में लगे रहते हैं ।
     यह शिक्षा का सर्व से निकृष्टतम परिवार समाज के लिएअधम गति दायक अनीति का प्रकार कहा जाता है । जो सर्वत्र उपद्रव उत्पात पैदा करने वाला शिक्षा मंत्र है जिसमें समता समानता का धूर्तता  पूर्ण उद्देश्य निहित है । कारण कि समाज मनुष्य प्रकृति तभी तक संचालित जीवन से चल रहे हैं जब तक वह अपूर्ण है यदि वे पूर्णता प्राप्त करने लगते हैं तो उनकी गति मंद मंथर समाप्त हो जाती है ।
 जिसमें सभी शिक्षित अशिक्षित लोग परम दुखी मन से , परम दुखी करने वाला कर्म मंत्र  धर्म- हीन, कर्म -हीन , विपरीतमति , विपरीत- परिणाम , धूर्तता , छल कपट प्रपंच मंत्र से समाज परिवार को दुखी करना और स्वयं दुखी रहना है ।
5:- नौकर शाही शिक्षा  आदेशवादी शिक्षा  संभावना उत्पन्न करने वाली शिक्षा मीटिंग वाली शिक्षा अधिकारी शिक्षा यह शिक्षा का पांचवा प्रकार कहा जाता है जो अफसर के आदेश निर्देश के अनुसार संचालित होती  है अफसर स्वयं शासन के सर्वोच्च कर्मचारियों /उच्च अधिकारियों के द्वारा आदेश निर्देश के अनुसार संचालित होते हैं । इस  शिक्षा के द्वारा सभी के मन में शिक्षा के परिणामों को लेकर शंका संभावनाएं बनी रहती हैं । परंतु इस शिक्षा में सभी कार्य में सहयोग करने वाले लोग सत्य / असत्य आंकड़े भेज करके अपने अपना दायित्व पूरा कर लेते हैं या अपना अपना आपा बचा लेते हैं । यह बाबू वादी शिक्षा कही जाती है जो मीटिंग या गुप्त वार्ता निर्देश विधि के द्वारा चलती है यह पूर्णतया गोपनीय प्रकार की शिक्षा कही जाती है जिसमें धूर्तता दुष्टता की पराकाष्ठा होती है  इसके परिणाम व्यक्ति के सम्मुख शीघ्र आ जाते हैं जब प्रिय परिणाम आते हैं तो व्यक्ति खुश होता है और जब अप्रिय परिणाम आते हैं तो व्यक्ति दुखी होता है या व्यक्ति को दंडित किया जाता है उसे आर्थिक धन वसूला जाता है उसका स्थान परिवर्तन कर दिया जाता है या उसकी सेवा समाप्त कर दी जाती है ।
 6* रहस्यमयी शिक्षा, वर्तमान काल की कलयुगीन शिक्षा जो लोगों की दुष्ट दूषित बुद्धि को देखते हुए सृष्टि विधाता ब्रह्मा के मंतव्य अनुसार मनीष जानो महर्षियों ने विद्वान लोगों को शब्दों के नकारात्मक ऊर्जा  बम प्रभाव से बचने के लिए शब्दों को ऊर्जा ही अल्प ऊर्जामय या ऊर्जा हीन निष्फल शब्द कर दिया है ।
 जिससे सभी भाषा संस्कृतिओं में विपर्यस्त / का दोष उत्पन्न हो गया है । एक शब्द के अनेक अर्थ हो जाने से लोग भ्रमित हो गए हैं । शब्द निष्प्रभावी ऊर्जा हीन/ कालकीलित / उत्कीलित हो गए हैं । जिससे बिना गुरु के निर्देशन में किया गया अध्ययन निष्फल / व्यर्थ साबित हो रहा है शब्द ज्ञान स्रोत पुस्तकें निष्प्रभावी हो गई हैं । लोग रिद्धि सिद्धि हीन आध्यात्मिकता दोषयुक्त /अल्प ज्ञानी/ अर्ध ज्ञानी /भ्रमित बुद्धि युक्त हो गए हैं । ऋषि लोगों की वाणी अमोघ ना हो करके श्रीहीन हो गई है ।। वरदान शाप निष्फल हो गये है । सभी लोग अभिशापित शिक्षा ले रहे हैं । शब्द से बने मंत्र छंदयुक्त छद्म छलिया हो गए हैं । जिनका आशय/ मतलब छिपा हुआ हो गया है। जो हर किसी को ठीक से सही समझ में नहीं आता । ऐसा विचित्र कौतुक मनीष जनों ने लोगों को सत्य / ब्रह्मज्ञान  न सहन  कर पाने की स्थिति के कारण किया है । जबकि भ्रमित ज्ञान के द्वारा विद्वान ज्ञान चर्चा के दौरान लोगों के उत्तेजित होकर भड़कने की विषम परिस्थिति के दौरान उत्पन्न सघर्ष से अपनी रक्षा कर लेते हैं । परंतु आज भी ऐसी विचित्र रहस्यमई भ्रमित शिक्षा से उत्पन्न विचित्र परिस्थितियों के युगीन शिक्षा में ज्ञान से उत्पन्न रिद्धि सिद्धि का प्रभाव यथावत है जिनके पास थोड़ा बहुत सत्याग्यान है वे रिद्धि-सिद्धि युक्त समर्थ धनाढ्य है ।ऐसी में शब्दों का मर्म स्पष्ट करने वाली रहस्यवादी शिक्षा जो मनुष्य को दार्शनिक बनती है विद्वान बनती है उसमें लोगों को रहस्य उद्घाटन करने के समझाने के कला विज्ञान को श्रैष्ठ माना है । आज के युग मेंहर किसी को उसकी पात्रता योग्यता क्षमता दक्षता जाने समझे बिना उसको  सही स्पष्ट सटीक अर्थ बताना खतरनाक/ वर्जित है। इस रहस्यमई शिक्षा के प्रभाव से विद्वान गुनिया लोग भ्रमित लोगों की सभा में संघर्ष लड़ाई झगड़ों से से बचें रहते हैं । यह रहस्योद्घाटन  करने वाली छिपे हुए छंदीय ज्ञान को प्रकट करने वाली शिक्षा मनुष्य में अतींद्रिय क्षमता उत्पन्न करने वाली है ।  मनुष्य को विशेष  दार्शनिक बनाने वाली उच्च शिक्षा आत्मज्ञानी शिक्षा प्राण प्रतिष्ठा युक्त ज्ञान की शिक्षा की चर्चा समाज में सुलभता से नहीं होती ।

हमारी श्राद्ध वंशावली कैसे हैं

हमारी श्राद्ध वशावली
पूर्णमासी सर्व पितृ बाबा दिलसुख के पिताजी नवरंग नवरंग के पिताजी ज्योति 
दोज - पिताजी रामचरण शर्मा और उनके दादा दिलसुख 
तीज - 
चौथ :- हमारे बाबा वसुदेव
पंचमी:- बाबा झम्मन और पिताजी की दादी 
छट:- सर्व सत्ती दादी
सातवें 
आठवें:- बाबा मोहर सिंह जमीन घेरा 
नौंवी:- कन्हैया बाबा 
दसवीं:- 
एकादशी:- अम्मा और पिताजी की ताई
द्वादशी :- दादी भूरी * पिताजी ने बताया 
तृयोदशी: भूरी दादी 
चतुर्दशी :- 
अमावस्या:- 
बाबा यादराम का मालूम करना है 

जीव के कार्य करने कार्य क्षमता को प्रभावित करने की जैविक \ पुण्य अग्नि कितने प्रकार की है?

जीवों के  शरीर  जिस अग्नि के प्रभाव से बनते हैं वह गर्भाशय अग्नि कहीं जाती है । इसके अलावा जीवो के शरीर में जिस अग्नि के प्रभाव से कार्य करने की क्षमता होती हैं वह शरीर अग्नि कही जाती है । जीव के शरीर के अंदर जो भी कार्य हो रहा है या सृष्टि में कहीं पर भी कार्य हो रहा है उस कार्य को संपन्न कराने वाली शरीर अग्नि उसमें तीन रूपों में अंदर, मध्य, वाहय, रूप से स्थित होती है हम वही अग्नि प्रभाव को पेशिय ऊर्जा स्तर को देखते हैं अंदर मध्य की अग्नि प्रभाव को नहीं देखते हैं इसके अलावा यह अग्नि अनेक दूसरे नामों से भी पुकारी जाती है जैसे जात वेदा अग्नि  ( किसी एक जाति विशेष समूह के अंतर्गत ऊर्जा स्तर जैसे ब्राह्मणों में बौद्धिक योग्यता , क्षत्रिय जाति में फुर्तीलापन वैश्य जाति में धूर्तता  ) नचिकेता अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक मनुष्य के निजी शरीर में ऊर्जा स्तर) पाप अग्नि के अंतर्गत   ( किसी मनुष्य में अकारण अचानक हिंसा का ऊर्जा स्तर )   पुण्य अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक विशेष मनुष्य में उसके कुल में उसकी जाति में उसके अनुयाई समर्थक लोगों में एक निश्चित कार्य पूर्णता का ऊर्जा स्तर जिससे उनका जीवन खुशहाल समृद्ध बनता है  ) सामान्य जीवन अग्नि जैविक  जिसके अनुसार जीवों का जीवन सुख दुख के मध्य ईश्वरीय शक्ति कृपा, ऐश्वर्या कृपा पितर माता-पिता गुरु कृपा होते हुए अपना जीवन दूसरे लोगों की दुआ बददुआ की प्रभावशक्ति से जीते हैं। । उपरोक्त इन सभी जीवन जीने की जैविक अग्नि में पुण्य अग्नि का विशेष महत्व ह । जिसके आधार पर साधारण आत्मा भी ईश्वरीय शक्तियुक्त समानसिद्ध होता है । पुण्य अग्नि वाला पुरुष सामन्य आत्मा बल प्रभाव से बढ़ाकर महान परमात्मा स्तर तक अपना प्रभाव बढ़ा लेताहै ।
संसार में विशेष संभव अलौकिक कार्य विशेष ज उनकी पुण्य अग्नि के प्रभाव से संभव होते हैं । जैसे राज योग परिवार में समाज में देश में शासन सत्ता लाभ केवल पुण्यअग्नि के प्रभाव से संभव होता है । बल और बद्धि समय के प्रभाव से परिवर्तन शील होते हैं । इसके प्रभाव से कभी निर्बल बलवानों पर भारीपढते हैं , कभी मूर्ख विद्वानों पर भारी पडते हैं । परंतु पुण्यशीला आत्माओं पर हर कोई आसानी से वर्चस्वशील प्रभावी नहीं हो सकता । जैसे राम औरकृष्णा मैं संभव अलौकिक कार्य किए थे।

संस्कृति युद्ध, धर्म युद्ध, कर्म युद्ध /क्रूसेड वार आदि कितने प्रकार के युद्ध हुआ करते हैं?

क्रूसेड वार /संस्कृति युद्ध /जीवन में युद्ध पद्धति  के अंतर्गत युद्ध का मतलब होता है '-'…
, किसी भी मनुष्य का बिना कारण बिना विचार बिना दिमाग अकारण दूसरों को दुश्मन समझते हुए उन्हें सह परिवार से समाज नष्ट करने की मानवीय  हिंसा की प्रवृत्ति , ययह युद्धकी प्रवृत्ति केवल मनुष्य में पाई जाती है पशुओं में नहीं पाई जाती है।  जिसके अतर्गत एक मनुष्य अनेक मनुष्य के समूह को नष्ट करने की  अकारण हिंसक प्रवृत्ति रखता है । मनुष्य की यह  हिंसा प्रवृत्ति उसकी सेना उसके मंतव्य की समर्थक मित्र मडली की संख्या के बाहुबल पर निर्भर करती है । यदि मनुष्य व्यापक अकेला हिंसा करता है तो उसकी यह हिंसक प्रवत्ति तो संघर्ष लड़ाई कहींजाती है । परंतु जब एक मनुष्य अपने दिमाग के हिंसा को अनेक मनुष्य के दिमाग में बौकर या बीजारोपण करके अनेकलोगों के अकारणहिंसा को हिंसा के स्तर को सीमित सेलेकर असीमितहिंसा अनंत हिंसा की ओर ले जाताहै के जिसमें मानवीय  हिंसा सीमाहीन होने लगती है  एक क्षेत्र के। लोग दूसरे क्षेत्र के लोगों को अकारण करने नष्ट करने पर उद्यत हो जाते हैं ।   तू यह सीमाहीन नियम हीन हिंसा युद्ध कहीं जाती है जिसमें हिंसक सीमा क्षेत्र का दायरा उसे क्षेत्र विशेष में व्याप्त हिंसा पर निर्भर करता है । जब यह हिंसा दो परिवारों के बीच कारण बनती है तो इसे पारिवारिक हिंसा कहा जाता हैं। परंतु जब यह हिंसा परिवार के स्तर से आगे बढ़कर जाति धर्म के स्तर पर उतर आती है तो इसे सामूहिकहिंसा सांप्रदायिक हिंसा कहां जाता है । जब इस सामूहिक सांप्रदायिक हिंसा का कारण जाति बनती है तो इससे जाति जब यह सामूहिक हिंसा का कारण धर्म बनता है तो इसे धार्मिक हिंसा या धर्म युद्ध /  क्रूसेडर वार \  संस्कृति युद्ध । आदि अनेक हिंसक शब्दावलियों से विभूषित किया जाता है । जब यह हिंसा राष्ट्रीय व्यापक क्षेत्र में फैल जाती है तो इस ग्रह युद्ध कहा जाता है । जब यह सामूहिक हिंसा दो राष्ट्रों के बीच आयोजित होती है जिसमें एक राष्ट्र के लोग दूसरे राष्ट्र के लोगों को कारण मरने पर उदित हो जाते हैं। तब इस राष्ट्र युद्ध कहते हैं।। जब दो या दो से अधिक राष्ट्र अकारण एक दूसरे से उलझ कर हिंसक होकर एक दूसरे राष्ट्र को नष्ट करने का उद्यम करने लगते हैं तो इस महायुद्ध कहा जाता है जब यह हिंसा का डेरा धरती के व्यापक गोलार्ध में फैल जाता है तब इसे विश्व युद्ध कहा जाता है। 
          वर्तमान समयमें इस्लामी संस्कृति दुनियामें मौजूद अन्य सभी संस्कृतियों के विनाश पर नष्ट करने पर उद्योग चल रहा है । यह अतीत के पुराने समय में अनेक  संस्कृतियों को पूर्व में समाप्त कर चुकी है जैसे अरब क्षेत्र में यहूदी इजरायल सस्कृति , पुराने ग्रीस   की यूनानी  सस्कृति , मिश्र इजिप्ट की संस्कृति , तुर्की की उस्मानिया संस्कृति , पर्शिया फारस बेबीलोन की इराक की सभ्यता संस्कृति , ईरान की पर्शियन पारसी संस्कृति , वर्तमान समय में इसका विशेष संघर्ष यूरोपकी क्रिश्चियन इसाई संस्कृति , भारतीय क्षेत्रकी हिंदू सस्कृति के अंतर्गत यह भारतीय क्षेत्रमें पाकिस्तान अफ़गानिस्तान कश्मीर बंगाल केरल क्षेत्र में हिंदू संस्कृति को विलुप्त कर चुकी है । वर्तमान समय में इसका व्यापक विरोध सघर्ष हिंदी भाषीक्षेत्र उत्तर प्रदेश राजस्थान बिहार मध्य प्रदेश हिमाचल प्रदश पंजाब क्षेत्रमें चल रहा है। जबकि यह पूर्वोत्तर भारत पर अपना आधिपत्य हिंदीभाषी क्षेत्र पर स्थापित कर चुकीहै ।