इस जीवन लक्ष्य की प्राप्ति को पाने के लिए प्रत्येक जीव ने अपने लिए आवश्यक कर्म करने के लिए जीवन माध्यम सामग्री सम्यक उचित जैविक ऊर्जा का चयन किया है । जिसके सम्यक परिमाण के अनुसार वह एक निश्चित लिङ्गधारी प्राणी नर या मादा शरीर धारण करता है । अधिक ऊर्जावान एक नर लिंगी या अल्प ऊर्जावान एक मादा लिंगी के शरीर का चयन करता है। परंतु सृष्टि नियंता प्रकृति या ईश्वर ने इसमें भी घपला कर दिया है या लोचा हो गया ।
प्रकृति में हमें सामान्य तौर पर नहीं अपितु कभी-कभी कहीं पर इसका विपरीत भी देखा जाता है जिसके अनुसार अल्प ऊर्जावान नारी लिंगी प्राणी कभी-कभी अति ऊर्जावान नर लिंगी प्राणी पर भारी पड़ती हुई यह सिद्ध कर देती है कि नारी नर से कम नहीं , ना शारीरिक ऊर्जा क्षेत्र में ना मानसिक ऊर्जा क्षेत्र में बल्कि कभी-कभी तो वह नर प्राणी के लिए चुनौती ही नहीं उत्पन्न अपितु उस पर प्रभावी सिद्ध हो जाती है । प्रत्येक जीव एक पक्षीय प्रदर्शित लिङ्गधारी गुंण होते हुए भी दूसरे पक्ष के विपरीत लिङ्गीय लक्षणों को दबाकर छिपाए रहता है । जैसे नर प्राणी में नारी प्राणी के गुणधर्म छिपे रहते हैं । जिससे नर सदैव नर जैसे गुणों का प्रदर्शन नहीं करता अपितु नर में नारीयों जैसे अल्प ऊर्जावान गुणधर्म परिलक्षित होने लगते हैं । जिससे इस अर्ध नारीश्वर धारणा के अनुसार इस सृष्टि में उपद्रव संघर्ष की संभावना प्रत्येक प्राणी को आजीवन बनी रहती है। इसका परिणाम यह आता है कि सृष्टि में बुद्धिमान मूर्ख पर भारी पड़ते हैं बलवान निर्बल पर भारी पड़ते हैं यह नियम है । परंतु कभी-कभी मूर्ख भी विद्वानों पर अपनी अकड़ू अकाट्य तर्कशील ज्ञान बल पर विद्वानों पर भारी पड़ जाते हैं और निर्बल प्राणी के हाथों बलवान मारे जाते हैं ।
हम सृष्टि में प्रकृति में मूर्ख उस मनुष्य को कहते हैं जिसमें चेतना का विकास वंछित प्रकार का नहीं हो पाया है। जैसा हम उसमें चेतना का विकास करना चाहते हैं जैसा वह अपने लिए हितकारी विकासशील समृद्ध शाली विकसित होना चाहता है। जिसको हम शिक्षा देकर शिक्षित और बुद्धिमान बनाना चाहते थे । हम उस अनपढ़ अशिक्षित मंदबुद्धि को प्रबुद्ध महाबुद्धिमान व्यक्ति बनाकर उसका विकास करना चाहते थे। परंतु वह बुद्धिहीन अशिक्षित होने से न प्रगति करना सीख पाया, न विकास करना सीख पाया अपितु प्रगति की फिराक में अपनी मानसिक क्षमता से ज्यादा ज्ञान अर्जित करके बौद्धिक रूप से भ्रमित हो जाने पर उसकी प्रगति शीलता की चाल रुक गई। विकास के फेर में/ लालच में उसका पतन हो रहा है । वह न अपना विकास कर पा रहा है न अपने जीवन को प्रगतिशीलता से जी रहा है उसकी जीवन पद्धति जैविक संघर्ष मंडल में गिरकर फंस जाने पर विकृत हो गई है । ऐसी विकृत मानसिकता वाला शिक्षित व्यक्ति एलजीबीटी ए आई क्यू ई LGBTAIQE की एक नवीनतम मानव सामाजिक ग्रुप में न अपना दीर्घकालीन हित समझ पाया है ना दूसरों का दीर्घकालीन हित को समझ पाया है। जिसके मूर्खतापूर्ण धूर्त कार्यों से अक्सर दूसरों का हित के लालच में हित के प्रयास में हितकर प्रयास करने पर हित होता रहता है । परंतु वह अपना हित करने के लालच में अक्सर अपना भी अहित करता रहता है । तरह-तरह की अपनों के लिएअज्ञात अरिष्ट आशंकाओं में व्यर्थ मानसिक चिंता करता हुआ अपनी मानसिक ऊर्जा का अपवहन चालन संवहन विकिरण द्वारा करता रहता है। उसको अपना अहित बोध नहीं होता है , तो दूसरों का हित बोध उनका की प्रगति को देखकर आवश्यक होता रहता है ।
परंतु जो मनुष्य अपने बौद्धिक कार्यों द्वारा जानबूझकर अपना हित करने में कुशल दूसरों का अहित करने में पारंगत हो जाता है। वह मूर्ख नहीं हो सकता है। यह मूर्ख बौद्धिक चैतन्य जागरूकता के आधार पर बुद्धिमानों में भी उनके अनेक प्रकार के होते हैं जिनको उनके कर्मकांडी लक्षणों के द्वारा उनको पहचाना जा सकता है । इनके दिमाग की सेटिंग खराब और विकृत होती है। इनके दिमाग की सेटिंग निजीकृत हितकारी ना होते हुए इनकी माता-पिता गुरु मित्र रिश्तेदार संबंधी के द्वारा दूसरों के लिए पर हितकारी परोपकारी होती है परंतु अपने लिए हानिकारक होती है। यह मानसिक रूप से बामन के बैल होते हैं जो ना अपने लिए उपयोगी होते हैं ना दूसरों के लिए उपयोगी होते हैं। इनके पास अपने विचार विचरणा नहीं होती । यह सदैव दूसरों के शब्दों का उपयोग प्रयोग अपनी वार्तालाप के दौरान करते हैं।
यह मूर्ख विद्वान शिक्षित लोग अपने मानसिक ऊर्जा का उपयोग सदुपयोग करना नहीं जानते कि कब उसे अपने दिमाग का उपयोग करना है ? कब दिमाग को आराम देना है ? इनका अपने दिमाग के स्मृति पक्ष पर नियंत्रण नहीं होता जबकि विस्मृति अनियंत्रित होती है अक्सर उनके दिमाग से उनके लिए उपयोगी बातें भी फिसलते रहती हैं। इनके दिमाग में आपात कालीन स्थिति के लिए संचित रिजर्व ऊर्जा नहीं होती, थकने के बाद इनको बुरी तरह नींद आ जाती है इनका नींद पर नियंत्रण नहीं होता इनको नींद अधिक मात्रा में आती रहती है।
चेतन्य मूर्ख, निरक्षर मूर्ख, अशिक्षित मूर्ख, साक्षर मूर्ख , धूर्त शिक्षक, विद्वान मूर्ख इनमें हम अपना ध्यान विद्वान मूर्ख और धूर्त लोगों पर फोकस करके चलेंगे जिनके दिमाग की सेटिंग गलत शिक्षा-दीक्षा से होती है, यह अपने निजी व्यवहार में गलत कल्पना/असंभव परिकल्पनाएं करते रहते हैं। अनुपयोगी विपरीत बौद्धिक चिंतन में समय व्यतीत करते हैं जिससे ना इनका भला होता है ना उसका भला होता है ! जिसके लिए यह चिंतन कर रहे होते हैं । यह ओवर थिंकिंग / नियंत्रित कल्पना परिकल्पनाओं को करने वाली व्यर्थ की बातें करने वाली बकवादी मनोरोगी होते हैं। यह लोगों से मिल कर उनसे उपयोगी वार्तालाप करना नहीं चाहते जिससे इनमें कम्युनिकेशन स्किल नहीं होती है । यह अपने लिए उपयोगी सामाजिक महाशय महाजन लोगों से संपर्क करना नहीं जानते, इन मूर्ख विद्वानों में जिम्मेदारी पूर्णता का सामाजिक बंधन बनाने के लिए अपने हितकारी लोगों से मिलना जुड़ना चिपकना नहीं आता ।
इन विद्वान मूर्ख जनों को उपयोगीता पूर्ण समद्ध लोगों से बौद्धिक आर्थिक सामाजिक लाभ लेना नहीं आता । गलत अनूपयोगी विकृत भयंकर अपराधी साहित्य अध्ययन करना इनकी पहचान है। इन विद्वान मूर्ख लोगों के अनेक विचित्र असंभव असंभव कृत्य कर्म कार्य होते हैं । जिनसे उनके दिमाग की खराब सेटिंग की पहचान हो जाती है यह पढ़ लिखकर भी जीवन में अधिकतर फेल होते रहते हैं। यह आजीवन अपने लिए उपयोगी पढ़ाई नहीं पड़ते अपितु अपने लिए अनुपयोगी पढ़ाई में पढ़कर अपना अध्ययन का समय व्यर्थ होते हैं । यह विद्वान मूर्ख जन अपने जीवन में अक्सर तरह-तरह की सामाजिक आर्थिक राजनीतिक भौतिक रासायनिक जविक समस्याओं से प्रभावित रहते हैं तरह-तरह के असंक्रमित रोग जैसे उच्च रक्त शर्करा / शुगर, ब्लड प्रेशर , कैंसर बीमार रहते हैं जो इनके गलत खतरनाक भौतिक चिंतन से इनमें उत्पन्न होते हैं। ऐसे में जो मनुष्य पढ़ा लिखा शिक्षित होते हुए भी तरह-तरह के राजरोगों से ग्रस्त है जो अतिधूर्त बुद्धि के उपयोग और लालच की अति से बारंबारता की पुनरावृत्ति से उत्पन्न होते हैं जैसे यक्ष्मा टीवी उच्च रक्त शर्करा कैंसर हाथ पैर शरीर में गांठगट्टे, चेहरे पर झाइयां चंडालता मलिनता कालिख रोगों से ग्रस्त है। तरह-तरह की आर्थिक सामाजिक राजनीतिक पारिवारिक शरीर स्वास्थ समस्याओं में गिरा घिरा हुआ है तरह-तरह की समस्याओं से प्रभावित है उसे हम शिक्षित नहीं कह सकते वह पढ़ा-लिखा व्यक्ति विद्वान मूर्ख कहा जा सकता है। आज की तारीख में ऐसी पढ़ी-लिखी विद्वान मूर्ख शिक्षकों की भरमार हो गई है यह गलत गलत खतरनाक साहित्य लिख रहे हैं । यह विद्वान मूर्ख स्कूलों मे शिक्षक अध्यापक नियुक्त होकर शिक्षा देने के कार्य के दौरान छात्रों का बौद्धिक नाश कर रहे हैं।
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