सभी प्राणियों के शरीर की तन मन धन की सक्रियता और निष्क्रियता उन प्राणियों के द्वारा अपनाए गए स्वीकार किए गए शब्दों की ध्वनि की आवृत्ति आयाम तारत्व तारतम्य पर आधारित कर्तव्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा की निरंतर दैनिक उपलब्धि मात्रा मंत्र मंत्री हित हिट प्रभाव पर निर्भर है। किसी भी मनुष्य को पूर्णतया निरोग होने के लिए शरीर के रोग निदान के लिए औषधि से रोग निदान के लिए सद्ज्ञान सत्यज्ञान का होना परम आवश्यक है । कारण की अवचेतन मन सदैव सत्य को स्वीकार करता है । सत्यता के साथ रहते हुए शांतचित से शरीर की जैविक क्रियाओं का क्रियान्वयन करता हुआ प्रत्येक मनुष्य को उसकी जातक आयु के अनुसार उसकी निश्चित जीवन अवधि तक जीने देता है। परंतु हाइपोकांड्राइसिस मनोरोगी का मन असत्य बातों को भी सहजता से स्वीकार करने लगता है । जब उसके मन में सत्य बातें अधिकांश मात्रा प्रमाण में एकत्रित हो जाती हैं तो उसकी मन मरने बुझने क्लेशित होने के जीवन विकल्प के अनुसार अपनी सेटिंग फिर से चेंज करने का प्रयास करने लगता है मन मरने पर पूरी तरह से परिवर्तित होकर नया मन बनने का प्रयास करता है यदि मन पूरी तरह से बदलकर नया हो जाता है तो व्यक्तित्व पूरी तरह से बदल जाता है अवसादी अपराधी महात्मा हो सकता है, साधारण लोग अपराधी बन जाते हैं । यदि मन बुझने/दवने लगता है तो व्यक्ति अवसाद और अपराध की और चलने लगता है। यदि क्लेषित या मां की मालीनता के अनुसार दुखी रहने लगता है तो मन मैं संचित क्लेश और दुख के अनुसार शरीर में तरह-तरह के विषय रसायन बनने से व्यक्ति तरह-तरह के शारीरिक मानसिक रोगों में ब्लड प्रेशर शुगर कैंसर डिप्रेशन चिंतन हीनता पागलपन में चला जाता है। अधिकतर ऐसे परम चिंतनशील लोगों की मुखाकृति और शरीर क्रशय/कमजोर पिचका चेहरा से दुबला कमजोर शरीर युक्त होते जाते हैं। कारण है शरीर के रक्त में उपलब्ध शर्करा का सम्यक समुचित प्रयोग ना कर पाने से रक्त का शर्करा स्तर बढ़ जाता है।
लचर/भृष्ट अधिकांश बहुसंख्यक प्राणी अपने जीवन को असत्यता से जीते हुए कम आयु जीवन जीते हैं। परंतु जो लोग अपने जीवन को सत्यता ईमानदारी के अनुसार इशिता पर आधारित ईश्वरीय और प्राकृतिककृतिक नियमों से जीते हैं। उनका जीवन काल दीर्घायु होता है। परंतु जो लोग ईश्वरीय नियमों की अवहेलना करते हुए अपने जीवन को असत्यता और भ्रम कीअधिकता से जीते हैं इसका उनके अवचेतन मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सभी प्राणियों का अवचेतन मन अशांत होने पर दुखी होकर जातक की आयु को नियंत्रित रखते हुए कम से काम करने का प्रयास करता है अत्यंत दुखी होने पर उसकी आयु काम करने की कोशिश करता है दुख की अति से यह प्राणी को अकाल मौत मरने तक को बाध्य कर देता है। अवचेतन मन के क्रियाकलाप को शरीर को उसकी आवश्यकता के अनुसार ऊर्जा तूषणा स्थिति की व्यवस्था करने से अवचेतन मन का कार्य व्यवहार समझा पहचाना जा सकता है। यह महात्मा जनों की आयु बढ़ता है सामाजिक सांसारिक जनों को जातक आयु देता है सामाजिक लोगों की जातक आयु को रोगों से क्षय/कम करता है दुष्ट लोगों की जातक आयु को कुशाध्य असाध्य रोग उत्पन्न करके उनको समय से पहले समाप्त करने का प्रयास करता रहता है । उन्हें जीवन नियंत्रित करने वाले रज रोग टीवी कैंसर एचआईवी आदि रोगों से अकाल मौत में मरने को बाध्य करता रहता है ।
प्रमेहसे उत्पन्न मधुमेह उच्च रक्त शर्करा व्याधि को रोग माना जाता है। जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से प्रमेय रोग नहीं अपित सत्य जनी व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार जीवन जीने के लिए ब्रह्मांड से प्रदत्त तूषणा ऊर्जा की निरंतर नैतिक व्यवस्था है । जो मनुष्य को उसकी इच्छा वासना आकांक्षा कर्म सस्कार की अधिकता महत्वाकांक्षा के अनुसार प्राप्ति है। अल्प ज्ञानियों के लिए मधुमेह ही शरीर में समस्त रोगों का कारण है। दुष्ट जनों और अज्ञानयों के जीवन को नियंत्रित करने दुष्टकर्म की मात्रा के अनुसार उनके जीवन को समय से पहले समाप्त करने की यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था है।
आज आध्यात्मिकता के अभाव में , सत्यज्ञान से जीवन जीने की ईश्वरीय निर्देश पद्धति के अभाव में प्रमेय व्याधि मनुष्य की सामान्य जीवन पद्धति का बहुसंख्यक मानव आबादी का समस्याप्रद रोग बन गया है। जबकि यह कोई शरीर में संक्रमण या संक्रामक रोग नहीं है सूक्ष्म जीवों से वायरस बैक्टीरिया कृमि सूक्ष्म-आर्थ्रोपोडा जीवो की उपस्थिति से उत्पन्न शारीरिक रोग नहीं है । अपितु यह मनुष्य की सामान्य जीवन पद्धतिKLMNO के अनुसार अपना जीवन सामान्य तरीके से ना जी पाने के कारण अपने जीवन स्तर से अत्यधिक उच्च स्तर वाली कामनाओं उच्च महत्वाकांक्षाओं और आत्महीनता के बाइपोलर डसऑर्डर की संयुक्ति से दिमाग में बैठाने से उत्पन्न एक मनोरोग होता है । जो बाद में उसके मेटाबॉलिक सिस्टम को डिस्टर्ब करके उसके मेटाबॉलिक डिस ऑर्डर्स से उसके शरीर की जैविक ऊर्जा व्यवस्था प्रणाली को छिन्न भिन्न करके अनियंत्रित करके शारीरिक रोग में बदल जाता है ।
प्रत्यय प्राणी के अवचेतन मन संरचना बनावट के प्रभाव के अनुसार मनुष्य में जैविक आयु परिवर्तन चक्र चलता है जिसकी अति परिमाण में भ्रम और असत्यता ज्ञान संचय अनुसार वृद्धावस्था का आगमन कुछ मनुष्यों को समय पर कुछ को समय से पहले वृद्धा अवस्था का आगमन होता है। परंतु कभी-कभी अक्सर गलत शिक्षा दीक्षा गलत गुरु जनों के सानिध्य से ईश्वर और प्रकृति के आदेश नियमों की अवहेलना करने से प्रमेह व्याधि उत्पन्न हो जाता है या किसी निम्न स्तरीय आत्मा के उच्च स्तरीय परिवार में उत्पन्न होने पर निम्न बौद्धिक भौतिक स्तर होने से या उच्च स्तरीय संत महात्मा कुकर्म दोष से आत्मा के निम्न स्तरीय परिवार मे उत्पन्न होने पर परिवार समाज में अति अनावश्यक संघर्षों की अधिकता से उसके मन-मस्तिष्क में डर बैठ जाने से भी पारिवारिक संस्कार भेद विविधता से प्रमेह व्याधि रोग उत्पन्न होता है। जब तक प्राणी के शरीर में उसको अपना जीवन जीने के लिए आवश्यक जैविक ऊर्जा निर्धारित जीवन पद्धति के अनुसार उपलब्ध होती है उसके मन में उसके जाति कुल वंश परिवार स्तर के अनुसार आकांक्षाएं होती है । जिनको वह अपने हित के अनुसार अपने निकट परिवार जनों से सीख कर एकत्रित करता है । जिनके मन में महत्वाकांक्षा नहीं होती उसको प्रमेह रोग नहीं हो सकता है। परंतु जब उसके मन में उसके जाति परिवार कुल स्तर से बहुत उच्च स्तर की महत्वाकांक्षाएं उसके मन मस्तिष्क में जमकर स्थिर हो जाती है । परंतु उस उच्च स्तरीय जीवन प्रणाली के लिए उसको ब्रह्मांड में तूषणी ऊर्जा उसकी जैविक इच्छा के अनुसार उपलब्ध नहीं होती जिससे उसकी मन अशांत क्लेषित होने लगता है । मन की बेचैनी के अनुसार उसके रक्त वाहिकाओं में शर्करा का स्तर उसकी आवश्यकता के स्तर से उच्च रहने लगता है । तो उसके शरीर के अंग इंद्रियां दिमाग ठीक-ठाक काम नहीं करता है उसे ओवर थिंकिंग का मनोरोग हो जाता है , जिसमें बिना काम के सोचने का बिना काम के काम करने का रोग उत्पन्न हो जाता है जिसमें पहले इंद्रीहीनता बहरापन अंधापन उत्पन्न होता है बाद में शारीरिक ऊर्जा नियंत्रक अंग यकृत पेनक्रियाज/ अग्नाशय ग्रंथिया विकार युक्त होकर धीरे-धीरे अपनी क्षमता क्षरिता उत्पन्न होने से रक्त का शर्करा स्तर सामान्य ना होने पर असामान्य उच्च ग्लाइसीमिया निम्न रक्त शर्करा स्तर हाइपोग्लासीमिया जैसी वृद्धावस्था के लक्षण उत्पन्न होने लगताहैं जिसमें वह हाइपर ग्लिकेमिया उत्पन्न होने पर रक्त शर्करा स्तर अत्यधिक बढ़ जाने पर मानसिक अवसाद और निष्क्रिय अवस्था में बिऐ किसी काम के चुपचाप बैठा-बैठा भी हाथ-पैर हिलाता चलाता रहता है। वृद्धावस्था में इसे पर्किंसन हाथ पैर कांपने का रोग उत्पन्न होता है । हाइपोग्लाइसीमिया की स्थिति में रक्त शर्करा स्तर सामान्य से कम हो जाने पर अपने जीवन को सक्रिय जीवन जीने के बजाय अपने जीवन को निष्क्रिय तरीके से आलसी निकम्मा होकर जीने लगता है । परंतु जिसका मस्तिष्क सक्रिय रहता है शरीर अनावश्यक रूप से बिना काम के काम करता रहता ह। उसे तूषणी अपनी जैविक इच्छा ऑन को पूरा करने के लिए आवश्यक ब्राह्मणी उत्पादन ऊर्जा/ब्राह्मंडीय प्रोडक्ट निर्माण कार्य की की सही समझ ना होने से उसका दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है उसे यह बोध नहीं रहता कि इस समय क्या काम करना आवश्यक है ? और क्या अनावश्यक काम किया जा रहा है? वह बिना किसी रोग के पहली अवस्था में जैविक स्तर से उच्च महत्वाकांक्षा का मानसिक रोगी बन जाता है । तरह-तरह की कल्पना करता हुआ परिकल्पना रचता हुआ अपने वैचारिक जगत में पागलपन अवस्था में खोया रहने लगता है । जिसमें वह अपनी मानसिक ऊर्जा का व्यर्थ अकारण अपव्यय अनुपयोगी विचार चिंतन करता रहता है। जब सामान्य जीवन पद्धति के दौरान आवश्यकता के अनुसार अपने लिए उपयोगी विचार चिंतन की सामान्य विचार पद्धति के स्थान पर अपनी सामान्य जीवन पद्धति में विशेष जैविक स्तर की आवश्यकता से अधिक उच्च स्तर की जीवन पद्धति की विचार पद्धति अपनाने लगता है ।जब आनियंत्रित विचार प्रणाली में अति उच्च स्तर की महत्वाकांक्षाएं अत्यधिक मात्रामें सम्मिलित हो जाती हैं । तब मनुष्य के जीवन को उसकी आदतों के अनुसार चलाने वाले अवचेतन मन पर अनावश्यक दवाव पड़ने लगता है । जिससे मनुष्य का मस्तिष्क अकारण कर्म के अनावश्यक कर्म में व्यस्त रहने लगता है । वह अनुपयोगी अनावश्यक सूचनाओं पर अमूर्त चिंतन करनेलग जाता है। ऐसे में उसके मस्तिष्क के अनावश्यक रूप से सक्रिय रहने पर उसके रक्त में शर्करा स्तर सामान्य से उच्च रहने लगता है। उसके दिमाग की सेटिंग डिस्टर्ब हो जाती है। इसका कारण उसे मनुष्य का अपन शरीर को अपनी आदतों के अनुसार चलने वाली अवचेतन मन की सेटिंग का खराब हो जाना है।
उल्लेखनीय तथ्य यह है सभी जीव अपने जीवन को अपनी आदतों के अनुसार कम ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीते हैं यदि जीव अपने जीवन को सक्रिय अवस्था में अत्यधिक मानसिक ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो उनके लिए अपने जीवन को जीना असंभव हो जाता है। अत्यधिक जाकर मानसिक ऊर्जा के उपयोग करने सेअवचेतन मन की सेटिंग खराब होने के साथ ही शरीर के संचालनकी सेटिंग भी अपने आप बिगड़ने लगती है। उसका उसके हृदय से नियंत्रण अनियंत्रित हो जाने से उसके हदय की धड़कन उसकी नाड़ी लगातार लंबे समय तक नियंत्रित न रहते हुए अनियंत्रित हो जाती है। उसके हृदय की धड़कन कभी अपने आप अचानक ही बढ़ जाती है तो कभी अपने आप अचानक घट जाती है जिससे उसके मस्तिष्क को पहुंचने वाले जीवन सिग्नल का तारत्र्व्य बिगड़ जाता है । उसका दिमाग उसका स्वास्थ्य सही होते हुए भी उसके दिमाग को गलत जीवन सिग्नल भेजने लगता है जैसे थकान से निद्रा उत्पन्न होने पर , भूख से रक्त शर्करा का स्तर गिरने पर उसको जीवन संकट की सूचना मृत्युक्षण की आपत्तिजनक स्थिति के रूप में भेजने लगता है। अब तू मरेगा मर सकता है तेरे जीवन को खतरा है। मल मूत्र त्याग जैसे आवश्यक कार्य करते समय उसमें भी जल्दी का सिग्नल भेजना लगता है जिससे मलमूत्र त्याग का तार्तव्य बिगड़ जाता है कब्ज रहने लगती है पेशाब रूक रुक उतरने लगता पितज प्रमेह उषण मूत्रता उत्पन्न होने लगती है। दोनों आंखों में एक साथ दृष्टि ध्यान केंद्रित करने के बजाय एक आंख में दृष्टि ध्यान केंद्रित करता हुआ दूसरे दृष्टि केंद्र आंखकी अनदेखी बेगौरी लंबे समय तक होने से अनजाने में आंखों मे दृष्टि दोष की समस्या उत्पन्न होने लगती है । एक नेत्र की ज्योति कम होते होते दृष्टि मंडता धुंधलापन उत्पन्न होने से बढ़कर से आगे दृष्टिखत्म तक हो जाती है दूसरे नेत्र की ज्योति सामान्य होती है तब पहले नेत्र में नेत्र दृष्टि मैं धुंधलापन उत्पन्न होने पर दृष्टि अक्षमता उत्पन्न होने पर मोतियाबिंद पर जाकर रुकती है । रक्त में शर्करा का सामान्य स्तर 70 से 200 तक है 200 से आगे 300 तक पहले यकृत पितदोष बाद में नेत्र दृष्टि दोष 400 से आगे किडनी दोष उत्पन्न होकर यह अंग खराब या निष्क्रिय भी हो जाते हैं।
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