आत्म ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है और इसमें सबसे मुख्य बाधा क्या है ?


आत्मज्ञान जीव की निजी बहिर्मुखी और अंतरमुखी मानसिक अवस्था पर स्वयं का नियंत्रण होना है जिसमें जीव का निजी जीवन मृत्यु पर नियंत्रण करना शारीरिक अवस्था रक्त दाब /चाप का अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करके अपने ब्लड प्रेशर को स्वेच्छा अनुसार नियंत्रित रखना सीखना पड़ता है । आत्मज्ञान के बाद मनुष्य का अपने मस्तिष्क में उठने वाले अनियंत्रित विचारों पर नियंत्रण हो जाता है ।जब विचारों पर नियंत्रण हो जाता है तो विचारों पर आश्रित/आधारित कर्म क्रियाओं वाले शरीर के मानसिक शारीरिक यौनिक केंद्रों पर ज्ञान से नियंत्रण आ जाने पर अंततः आत्मा, प्राण, कर्म क्रियाओं आचार विचार अहार विहार व्यवहार पर भी नियंत्रण करना आता है।

ये सभी मानसिक शारीरिक यौनिक कर्म क्रियाएं नियंत्रण में रखना असंभव लगता है, परन्तु जब आत्म ज्ञान हो जाता है तो जीव इन असंभव आत्मिक क्रियाओं को पहले चरण में उत्तम/श्रेष्ठ गुरु से समझता है । फिर इन आत्मिक ( मानसिक) प्राणिक (यौनिक) जैविक (शारीरिक) क्रियाओं को विभिन्न साधनाओं के द्वारा स्वयं समझा ,स्वयं किया, स्वयं नियंत्रण करना (स्व नियंत्रण) सीखा जाता है । महर्षि महेश योगी आत्म ज्ञान विद्या के ज्ञाता थे वे अब इस भौतिक जगत में नहीं रहे । इस विद्या को आंशिक रुप से जग्गी वासुदेव जानते हैं ।यदि इसे सीखना चाहते हैं तो ईशा फाउंडेशन में जाकर समझियेगा फिर सीखने के बाद तरह तरह की पंचतमात्राओं पांचों ज्ञान इंद्रियों पाँचों कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण करना सीखना होगा तरह तरह की स्वयं साधनाओं के द्वारा ।

आत्मज्ञान में सबसे बड़ी बाधा फोक्टी ज्ञान ध्यान इच्छा है।जिसमें स्वयं सीखे बिना दूसरे लोगों को सिखाने की गुरुगद्दी हथिया लेने की पड़ती है । आत्मज्ञानी गुरु जनों का अकाल अभाव है ।आत्मज्ञान का साहित्य उपलब्ध नहीं है। आत्मज्ञान की तीन पुस्तकें हैं 1पातंजल प्रदीप गीता प्रैस की स्वामी ओमानंद व सोमतीर्थ ,2 श्रीराम शर्मां की गायत्री महा विज्ञान तीनों भाग 3ट्रांसकेंडेंटल मैडिटेशन लेखक राबर्ट कीट वैलेस ।

उपरोक्त सभी पुस्तकें मैंने स्वयं पढ़ी हैं ।

क्या अवसाद का इलाज संभव है?


अवसाद का इलाज संभव है । संभव ही नहीं अब पूर्णतया संभव हो चुका है । परंतु इसमें कमी यह है कि अवसाद का इलाज दीर्घकालिक है । अवसाद को ज्योतिष के अनुसार तरह-तरह की दशा महादशा विदिशा विपरीत दशा कहा गया है । इसके अनुसार अवसाद को समाप्त होने में यदि उत्तम चिकित्सक मिल जाए और अवसाद के कारण का पता चल जाए तभी अवसाद को समाप्त होने में 1 साल 5 साल 20 साल तक लग सकते हैं ।

अवसाद के लिए सबसे पहले श्रीराम शर्मा की किताब चेतन अचेतन अवचेतन सुपर चेतन मन पढ़ें । अपनी मानसिक स्थिति परिस्थिति को स्वयं समझें । अवसाद का मुख्य कारण हैं मनुष्य के मन का जीते जी मन मर जाना और तन जिंदा रहना । ऐसा मनुष्य जिसका मन मर जाता है वह कुछ भी ठीक से नहीं सोच पाता मरा मन मुर्दा दिल ईंसान सदैव मरी बात सोचता है , जिससे मरे मन वाला व्यक्ति समाज से अलग थलग कटा कटा सा रहने लगता है । सामाजिक , धार्मिक , राजनीतिक, परिवारिक , क्रिया कलाप और कार्यों में रुचि नहीं लेता ।और एक दिन अकेला एकांत वासी एकांकी होकर समाज से अलग होता हुआ चला जाता है ।और अंत में अवसाद की अंतिम अवस्था में यदि अवसाद का इलाज नहीं किया / सोचा गया तो अवसाद ग्रस्त व्यक्ति आत्महत्या कर लिया करता है ।अवसाद ग्रस्त व्यक्ति पलायन वादी होता है घर छोड़कर बाहर भाग जाया करता है ,तनाव से परेशान होकर ।। अब अवसाद लाइलाज नहीं है इसका इलाज संभव है बस जरूरत है थोड़ा सा लंबे समय तक प्रतीक्षा करने की उचित अवसाद मानसिक चिकित्सक के मिलने की , और अवसादी मनुष्य को व्यस्त मस्त रखने के लिए तरह तरह के मानसिक सामाजिक क्रियाकलापों में व्यस्त करने के लिए आर्थिक व्यय करने की ।। अक्सर अवसाद ग्रस्त व्यक्तियों के अवसाद का अधिकतम कारण ऐसी समस्या होता है जिसका उन्हें हल नहीं दिखाई देता , नहीं सूझता है । यदि अवसाद ग्रस्त व्यक्ति को सत्य ज्ञान दे दिया जाए उसे अवसाद का कारण पता लग जाए तो वह स्वयं ही अवसाद को खत्म कर दिया करता है । बात यह है कि अवसाद मनुष्य के निजी मानसिक परिवर्तन के द्वारा ही संभव है । इसमें चिकित्सक का रोल और समाज का रोल दूसरे स्तर पर आता है इसके लिए अच्छी क्वालिटी की किताबें पढ़नी चाहिए जैसे रॉबर्ट्स स्काटी की जीवन की राह ,, नॉर्मल पीर की सकारात्मक सोच की सकारात्मक शक्ति ,, जसेफ मर्फी की अवचेतन मन की शक्ति ,,नेपोलियन हिल की सही सोचिये -अमीर बनिए ,, रोमेश शर्मा की आत्मा चित्त परिवर्तन ,,आदि अनेक मानसिक समस्याओं से पीड़ित लोगों के लिए किताबें लिखी गई हैं परंतु अवसाद के लिए खर्च करना तो पड़ेगा कोरा के लेखक मंडल वाले आपको किताब नहीं भेज सकते ।

यह मैंने आपको अपना निजी अनुभव शेयर किया है अब से लगभग 10 साल पहले मैं भी 2011 में अवसाद या डिप्रेशन की रेंज में आ गया था बल्कि अवसाद से पीड़ित हो गया था मारे भय के मेरे हाथ पैर कांपने लगे थे । सोचने समझने की शक्ति बहुत ही कम रह गई थी । परंतु आज मै सामान्य हूं मैंने पहले श्रीराम शर्मा की पुस्तक चेतन अचेतन सुपर चेतन मन पड़ी इससे मुझे अपने मरे मन की अनुभूति का एहसास हुआ इसके बाद मैंने अपने मन में प्राण फूंकने के लिए अन्य लेखकों की अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ी और खुद को अध्ययन में व्यस्त कर दिया और इतना ही नहीं उसके बाद मैंने डायरी लेखन का भी कार्य शुरू कर दिया नतीजा यह हुआ कि मुझे अवसाद या डिप्रेशन से निकलने में लगभग 9-10 साल लगे हैं।

तर्कसंगत विचारधारा (लॉजिकल थिंकिंग) को हमारे अंदर कैसे विकसित करें ?


तर्कसंगत विचारधारा या लॉजिकल थिंकिंग के लिए मनुष्य के गहन तम विशाल अध्ययन की आवश्यकता होती है ःइसके अलावा उसे व्यापक सामाजिक संबंधों की समझ होनी चाहिए जिसमें वह ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलकर अपनी समस्या उनके सामने रखकर उनसे प्राप्त मिले हुए उत्तरों को अपनी बहु विकल्प के रूप में प्रयोग कर सकें । अक्सर जब भी कोई लोग बात करते हैं तो उसके बारे में प्रमाण मांगते हैं और व्यक्ति का प्रमाण प्रस्तुत कर देना ही लॉजिकल थिंकिंग कहा जाता है । लॉजिकल थिंकिंग एक अदालती भाषा है जिसका उपयोग वकील लोक अदालत में अपने वाक्य व्यंग वालों को तर्क के रूप में चलाने में उपयोग करते हैं । यह प्रमाण सबसे पहले आसानी से व्यक्ति अपने द्वारा पढ़ी गई निजी पुस्तक से देता है ,तो वह दृढ़ता से देता है उस पर लोगों को विश्वास जल्दी हो जाता है । इसके अलावा यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति की बात को अपने तर्क से उड़ाना उखाड़ना चाहता है तो वह उसके लिए तरह-तरह के अपवाद का सहारा लेता है ः यह अपवाद तर्क लोगों के द्वारा मिलकर लोगों से ही सीखे जाते हैं ।या फिर गहनतम्ध्ययन में इस अपवाद तर्क कला का पता लग जाता है । मनुष्य वाक तीर चलाने में एक्सपर्ट हो जाता है ।

वैसे लॉजिकल थिंकिंग का अर्थ लंबे समय तक किसी एक विषय वस्तु से संबंधित विचारों का निरंतर मस्तिष्क में आना या किसी मनुष्य का किसी एक विषय पर लंबे समय तक धाराप्रवाह बोलने की कला लॉजिकल थिंकिंग कही जाती है क्योंकि उसमें उसका मस्तिष्क उस विषय से संबंध पूर्व संचित विचारों को क्रमश एक-एक करके निकालने लगता है और वह मनुष्य बिना रुके लगातार धाराप्रवाह 1 मिनट से लेकर 2 घंटे तक बोल सकता है । जो मनुष्य जितने अधिक लंबे समय तक धाराप्रवाह वस्तु केंद्रित बोल सकता है वह उतना ही अच्छा लॉजिकल थिंकर होता है ।इसमें जो मैंने महसूस किया हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी का लाजिकल थिंकिंग का जवाब नहीं जो किसी भी व्याख्यान को लगातार 2 घंटे तक बिना रुके बोल सकते हैं ।

मानसिक उत्पीड़न किसे कहते हैं?

 मानसिक उत्पीड़न व्यक्ति के पास और समाज के परम चतुर्भुज लोगों के द्वारा दुष्ट लोगों के द्वारा दैनिक व्यवहार में अपनाई जाने वाली वह युक्ति वह कला वह विज्ञान है जिसमें एक मनुष्य शांत और चुपचाप रहते हुए भी दूसरे मनुष्य को अपने व्यवहार से अपने व्यंग बाण से अपने क्रियाकलाप से इतना अधिक मानसिक रूप से उग्र व्यस्त और तनाव मैं कर देता है कि वह व्यक्ति सोचते-सोचते इतना परेशान हो जाता है कि मानव जनित समस्या का उचित हल नहीं मिल पाने पर उस मनुष्य का लगातार सोचते रहना और सोचते-सोचते उस मनुष्य के मस्तिष्क में दर्द मन में बेचैनी बन जाना और अंतिम अवस्था में मन मस्तिष्क का इतना व्यग्र हो जाना कि उसका व्यवहार खराब हो जाए और वह मरने मारने पर उतारू हो जाए या उसके मन मस्तिष्क में आत्महत्या के विचार आने लगे तो किसी भी मनुष्य को दूसरे मनुष्य द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने की मनोवैज्ञानिक विधि विज्ञान तकनीकी कला को मानसिक उत्पीड़न करना कहते हैं

ऐसी मनुष्य जो दूसरे मनुष्यों का निरंतर मानसिक उत्पीड़न करते रहते हैं यह उनकी विकृत मानसिकता कही जाती है जो एक प्रकार का मानसिक अपराध शेडिस्ट या दूसरों को पीड़ा पहुंचा कर खुश होना कहा जाता है । यह एक प्रकार का मानसिक अपराध है जिसके लिए सही साबित हो जाने पर अदालत में ले जाने पर मानसिक उत्पीड़न करने वाले व्यक्ति को सजा और जुर्माना दोनों देने का विधान है।

मुसीबत में फंस जाने के बाद मनुष्य को ग्रह दोष, वास्तु दोष और पितृ दोष दिखाई देने लगता है जबकि स्वयं का दोष दिखाई नहीं देता, ऐसा क्यों?

 जब कोई मनुष्य मुसीबत में फंस जाता है वह तभी सोचना सूझना सीखता है । मुश्किलों में फस जाने पर भी मनुष्य का मन मस्तिष्क निजी रूप से सक्रिय होकर कार्य करने लगता है । जब तक मनुष्य मुसीबत में नहीं फंसता तब तक वह दूसरे लोगों के विचारों का सलाह के रूप में उपयोग प्रयोग करता रहता है । एक बार जो मनुष्य मुसीबत में अच्छी तरह से फंस जाता है तो वह सोचने की मुख्य विधा अंतर्मुखी होना सीख जाता है ।

आमतौर पर मनुष्य के सोचने बोलने और व्यवहार करने की मुख्य दो मानसिक विधाएं हैं नंबर 1 अंतर्मुखी विधा जिसमें मनुष्य अपने मन के अंदर भरी संचित मेमोरी या पूर्व सूचित स्मृतियों का उपयोग करता है । आत्मकथन और स्वप्ने इसी अवस्था में आते हैं । इसके अलावा कभी-कभी मनुष्य को किसी समस्या में गिर / घिरजाने पर उस समस्या का सही गलत या किसी भी प्रभाव का सुझाव अंतर्मन के द्वारा कहे गये वक्तव्य के द्वारा मिलता है जिसे वह मनुष्य सही सटीक होने पर आत्मज्ञान कहता है तो गलत गलत सूचना मिलने पर भ्रम या वह कहता है ।

सामान्य अवस्था में मनुष्य अपने मस्तिष्क का उपयोग करना नहीं जानता / चाहता समझता जरूरी नहीं समझता ऐसे में वह निरंतर अपनी समस्या का समाधान दूसरों की सलाह से करता है। इसे हम इस प्रकार से समझ सकते हैं जब हम बहिर्मुखी अवस्था में होते हैं तो आंख हैं बाहर का देखती हैं कान बाहर की ध्वनि सुनते हैं ना बाहर से तरह-तरह की गंध महसूस करती है और हमें पूर्ण व्यवहार की अनुभूति वाहय जगत से होती है । परंतु एक अवस्था ऐसी भी होती है जो अंतर्मुखी कही जाती है जिसमें आंखें बंद होने पर भी दृश्य दिखाई देते हैं कान बंद होने से होने पर भी तरह तरह की दुनिया कन सुनते रहते हैं नाक सुनती रहती है तो इस प्रकार की अवस्था को अंतर्मुखी अवस्था कहते हैं । दिवास्वप्न और स्वप्न इस गहनतम मानसिक अमूर्त चिंतन अवस्था में आते हैं।

अब आपके प्रश्न का जवाब यह है कि जब मनुष्य गहन समस्या में फंस जाता है तो पहले वह बहिर्मुखी होकर दूसरों से तरह-तरह की समस्या समाधान सुझा मांगता पड़ता है जब वह भी फेल हो जाते हैं तब उसे पता लगता है कि दूसरे लोग समस्या का सही समाधान नहीं सोच पा रहे हैं फिर वह अपने मन मस्तिष्क पर जोर डालने लगता है और सही या गलत जैसा भी है अपने तौर-तरीकों से सोचने बोलने व्यवहार करने लगता है जब उसे दूसरे लोगों की सलाह आसानी से उपलब्ध नहीं होते । ऐसा मनुष्य जब अपनी समस्या का समाधान सोचने के लिए दूसरे लोगों के पास जाता है।

तो वह दूसरे लोग उसकी समस्या का सही समाधान न सोच पाने पर उस मनुष्य के मन को समस्या से हटाने दूर करने के लिए तरह-तरह की समस्याओं में लगाने के लिए वास्तु दोष ग्रह दोष भूत दोष आदि अनेक प्रकार के दोषों का विवरण लेने देने लगते हैं जो उन्होंने अपनी अपनी अलग अलग प्रज्ञा बुद्धि से ज्ञान हासिल किया होता है जैसे ज्योतिषी ज्योति दोष राहु केतु बुध गुरु शुक्र शनि चंद्र मंगल की दशा महादशा , विदिशा, कुदशा का दोष ,, गुनिया ओझा जनित ज्ञान भूत प्रेत बाधा का दोष ,, नव शिक्षित साक्षर यह नया कंसेप्ट अभी मार्केट में आया है वास्तु दोष अर्थात भवन निर्माण विद्या में कमी या घर में रहने वाली वस्तुओं की स्थिति में परिवर्तन करना यह भी मनुष्य के ध्यान को क्षणिक रूप से भटकाने जैसा है और जब मनुष्य इन सब में भी फेल हो जाता है कब तब शुरू हो जाती है उसकी निजी अमूर्त आत्मचिंतन अवस्था

द्विध्रुवी विकार वाले लोगों के लिए अवसादग्रस्त एपिसोड क्या हैं?

 द्विध्रुवीय विकार या बाइपोलर डिसऑर्डर वह मानसिक बीमारी है जिसमें मनुष्य कभी कभी बहुत अच्छा प्रदर्शन करता है अच्छी उपलब्धि हासिल करता है तो कुछ समय पश्चात उसका प्रदर्शन यकायक खराब होने लगता है । उपलब्धियां घटने लगती हैं ऐसे में हम उसे द्विध्रुवी विकार या बाइपोलर डिसऑर्डर मानसिक मनो रोग कहते हैं अक्सर जिसमें मनुष्य खराब उपलब्धि खराब परिवर्तन खराब अवसाद से परेशान होकर अवसाद ग्रस्त हो जाता है परंतु हम यह भूल जाते हैं कि यह द्विध्रुवीय विकार नाम की मानसिक बीमारी का हमें एहसास - मानसिक स्तर भेद होने वाले एक उच्च बुद्धि वाले और एक निम्न बुद्धि वाले माता-पिता के संयोग से अनुवांशिक रुप में उनके सानिध्य में रहने पर व्यवहार में मिलती है । अर्थात यदि किसी के माता-पिता में एक बुद्धिमान और एक मूर्ख बुद्धि स्तरीय ह तो उनकी संतान में बुद्धि स्तर के अंतर भेद की अधिकता से उनकी संतान /संतति में बाइपोलर डिसऑर्डर की मानसिक विकृति के आने की संभावना बहुत अधिक होती है। परंतु यदि उनके बौद्धिक अंतर भेद में थोड़ी समानता है या बौद्धिक अंतर भेद कम है तो ऐसे बच्चों में , ऐसे मनुष्यों मेंबाइपोलर डिसऑर्डर या मानसिक विकार के आने की संभावना बहुत ही कम रह जाती है बाइपोलर डिसऑर्डर एक ऐसी मानसिक बीमारी है कहने को इस पर बहुत लिखा गया है कि यह सत्य है असाध्य है उसे है परंतु मेरे विचार से यह अनुवांशिक होने के कारण सदैव असाध्य थी है और रहेगी यह बात अलग है किसी में बाइपोलर डिसऑर्डर की अधिकता ज्यादा होती है तो उसका परिणाम ठीक नहीं आता सदैव गलत आता है परंतु जिसमें बाइपोलर डिसऑर्डर के होने की संभावना कम होती है तो उनका परिणाम अक्सर सही आने की संभावना रहती है…शेष है

अल्जाइमर, भूलने की बीमारी और मनोभ्रंश में क्या अंतर है?

 अल्जाइमर वृद्धावस्था में भूलने की बीमारी होती है जिसमें अक्सर मनुष्य जो कुछ याद करता है सुनता देखता है उसे तुरंत या कुछ समय बाद पूरी तरह से भूल जाता है । विस्मृत हो जाता है । बहुत समय के बाद फिर से पुनः स्मरण हो जाता है ।अर्थात अल्जाइमर में याद रखना स्तुति और भूलना विस्मृति एक सामान्य प्रक्रिया चल जाती है । ।। परंतु जब यही मानसिक प्रक्रिया वृद्धावस्था से पूर्व युवावस्था में होने लगती है तो इससे भूलने की बीमारी कहते हैं भूलने की बीमारी में स्मृति बहुत जल्दी वापस आ जाती है अर्थात भूलने के थोड़ी देर बाद याद करने पर सब कुछ याद हो जाता है ।। परंतु मनोभ्रंश अलग मानसिक बीमारी है जिसमें मनुष्य अपने दिमाग को लगातार किसी भी दृश्य पर पूर्णतया केंद्रित नहीं कर पाता ह वह किसी भी लंबे दृश्य का वर्णन करने पर उस संपूर्ण दृश्य को वर्णन नहीं कर पाता , अपितु उस लंबी दृश्य में से कुछ क्षणों को याद कर रखा है ,कछ /अधिकांशतया क्षणों को भूल जाता है। मनोभ्रंश की बीमारी प्राय मूर्खों कम मानसिकता वाले लोगों में पाई जाती है । जिसमें वे महत्वपूर्ण बातों तक को भूलने से अक्सर हानि उठाया करता है।

कौन सी समस्याएं संकीर्ण विचारधारा से उपजती हैं?

 संसार में ,समाज में , सभी निजी ,परिवारिक सामाजिक ,राजनीतिक , जैविक ,समस्याएं संकीर्ण विचारधारा से उत्पन्न होती हैं ।। संकीर्ण विचारधारा का अर्थ है मनुष्य का सीमित बुद्धि होने पर अत्यधिक अहंकार करना , या कुछ भी नया सीखने की इच्छा ना होना , अपितु जो पहले पुराना थोड़ा सा सीखा जा चुका है न्यूनतम मात्रा में , उसी न्यूनतम मात्रा में सीखे गए ज्ञान या पढ़े गए ज्ञान के आधार पर अपने जीवन के वह विस्तृत फैसले लेना

इसमें मनुष्य को आप तो कह रहे हैं कौन सी समस्याएं संकीर्ण विचार धारा से पैदा होती हैं तो इस मैं कहता हूं कि— इसमें निजी समस्याएं , पारिवारिक समस्याएं , सामाजिक समस्याएं , व्यावसायिक समस्याएं , ऐसी कौन सी समस्या नहीं है जो संकीर्ण विचारधारा से पैदा नहीं होती है । बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि किसी भी मनुष्य का समस्या ग्रस्त हो ना ही उसके संकीर्ण मानसिक विचारधारा की पहचान है । जिसमें वह समय परिवर्तन के अनुसार ना तो अपने विचारों में परिवर्तन करता है । ना वह अपने अध्ययन में कुछ नया सीखता है । अपितु जो पहले सीख लिया बस उसी को अटल सत्य , परम सत्य ,अंतिम सत्य , समझता हुआ अपना जीवन पुराने ढर्रों पर जीता है । जबकि समस्याएं उन लोगों को आती हैं जो समय के परिवर्तन क्यों समझ नहीं पाते # और समय के परिवर्तन को समझने के साथ-साथ अपने मानसिक स्थिति अवस्था में परिवर्तन नहीं करपाते ।

जैसे बहुत पहले समय में किसी भी स्त्री का या लड़की का पर पुरुष से संबंध बनाना एक सामाजिक अपराध था परंतु आज यह अपराध नहीं रहा अब यदि कोई पुरुष या स्त्री किसी अन्य परिचित अपरिचित लड़की को स्त्री को उसके अवैध यौन संबंधों पर प्रताड़ित करता है या कुछ भी कमेंट करता है तो यह उसकी संकीर्ण मानसिकता की पहचान है @ ,, कारण कि पुरुषों की यौन क्षमता शुक्राणु संख्या पहले के मुकाबले कम हो चुकी है और स्त्रियां उसका विकल्प ढूंढने के लिए दूसरे पुरुषों को ढूंढने लगी हैं ऐसे में यह परपुरुष या परस्त्री के मध्य परिचय संबंध या यौनिक संबंध मान्य / स्वीकार्य है । यह संवैधानिक नियम भी आ गया है कि कोई भी विवाहिता स्त्री अपने विवाह पूर्व के बॉयफ्रेंड से संबंध बरकरार रख सकती है विवाह पूर्व के बॉयफ्रेंड से संबंध रखने में कोई पति अपनी पत्नी को यदि रोकने मारने पीटने प्रताड़ित करने का कृत्य करता है । तो उसे अदालत बुरा या अपराध बताती है ।

दूसरा पहले शादी विवाह का संबंध स्व जाती तक सीमित था लोग निर्धन थे ऐसे में यदि विवाह के पश्चात कोई समस्या आती तो मनुष्य सामूहिक रूप से मिल बैठकर उसका निपटारा कर लेते थे । परंतु आज सामाजिक संबंधों के द्वारा रक्त संबंध तक सीमित नहीं है अपितु आज सामाजिक संबंधों का दायरा रक्त संबंध से आगे परिचय संबंध परिचय संबंध से आगे जाति संबंध जाति संबंध से आगे धर्म संबंध धर्म संबंध से आगे संस्कृति संबंध और संस्कृति संबंध से आगे देश विदेश संबंध अर्थात आज की तारीख में समस्त पृथ्वी एक मनुष्य का परिवार बन चुकी है ऐसे में वह समस्त पृथ्वी समस्त पृथ्वी के किसी क्षेत्र से किसी भी जाति किसी भी धर्म किसी सामाजिक संस्कृति महिला से शादी करने के लिए स्वतंत्र है शादी के पश्चात उस स्त्री को उस मनुष्य की सामाजिक पहचान सकते हैं और संवैधानिक रूप से अपने आप मिल जाती है ऐसे में यदि कोई विजातीय शादी संबंध या संवैधानिक शादी सम्मान कोर्ट मैरिज संबंध पर किसी भी प्रकार की आपत्ति करता है कमेंट करता है तो उसकी आपत्ति और कमेंट को अपराध माना जाएगा और मैं उस मनुष्य के खिलाफ संवैधानिक कार्यवाही हो सकती है । ऐसे में आज अदालत में संविधान की अवमानना और अपनी मानहानि का केस दायर करके उस व्यक्ति को अदालत से दंडित कराकर उसे सजा और आर्थिक दंड दिलवा जा सकता है।

इस प्रकार समाज की मर्यादा में बदलती हैं परंपराएं बदलती हैं संबंध बदलते हैं रिश्ते बदलते हैं तो ऐसे में हमें उन पुराने मर्यादाओं परंपराओं रिश्ते और संबंधों को समझने की क्षमता नये परिप्रेक्ष्य में तथा पुराने परिप्रेक्ष्य में होनी चाहिए । उन्हें नये और पुराने संबंध संभावना परिप्रेक्ष्य को भली प्रकार से समझते हुए जहां तक हो सके अपने उचित खुले विचारों की मानसिक विचारधारा से अपनाना चाहिए । यदि हम संकीर्ण मानसिकता वाले रहे तो वह दिन दूर नहीं कि हम अपनों को खो देंगे या हम अपने ही अपनों से दूर चले जाएंगे और दूसरे हमें गले नहीं लगा पाएंगे हम से नहीं मिल पाएंगे तो ऐसे में हम समाज में अकेले हो कर अपना जीवन हास्यप्रद जिंदगी में हम अपने जीवन को चित्र जिंदगी से जी पाएंगे जो कि यह हमारे पढ़े लिखे होने पर भी एक प्रश्न चिन्ह होगा और साथ ही हमारी बंद बुद्धि या संकीर्ण विचारधारा की पहचान होगी ।

प्रेजेंस ऑफ माइंड (दिमाग की तत्परता) का सबसे बड़ा उदाहरण क्या है?

 मनुष्य के मस्तिष्क में दूसरों के द्वारा सुनी गई देखी गई सूचनाएं या अध्ययन की गई समस्त सूचनाओं को स्मृति कहते हैं ।यह स्मृति एक निश्चित कालांश काल - अवधि के पश्चात अपने आप सोते में या स्वतः ही धूमिल होती हुई धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती है । जिससे विस्मृति या भूलन कहते हैं । परंतु यह विश्व की भी कुछ विशेष योग साधना ओं के द्वारा विस्मृति भी स्मृति क्षमता में आ जाती है ।

इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क दो मुख्य मानसिक विधा स्मृति और विस्मृति के मध्य काम करता है ।जिसमें स्मृति पर केंद्रित होकर काम करना मुख्य है । इस स्मृति पर केंद्रित होने को ही प्रेजेंस आफ माइंड या दिमाग की तत्परता कहा जाता है । इसके लिए दो विधियां मुख्य हैं नंबर 1 रीजनिंग एबिलिटी कारण /तर्क द्वारा नंबर दो डिस्क्रिप्टिव मेथड या वर्णनात्मक पद्धति द्वारा । रीजनिंग एबिलिटी भौतिक विज्ञान गणित विज्ञान लोगों की अच्छी होती है । जबकि डैस्क्राईब या वर्णनात्मक पद्धति जीव विज्ञान , रसायन विज्ञान , संविधान और समस्त कला वाणिज्य संकाय के लोगों की अच्छी होती है । परंतु इसमें जो प्रजेंट सॉफ्टमइंड है इसका तात्पर्य सिर्फ एक है कि मस्तिष्क का इतना अधिक सक्रिय होना किसानों से कम से कम समय में अपने मस्तिष्क में संचित सूचना मिलते ही तुरंत एक उचित सही सटीक सूचना निकालकर सही समय पर दे जिसका मानव उपयोग करके अपना बचाव कर सके या लाभ कमा सके हानि से बचे दुर्घटनाओं से बचे ।

अक्सर होता यह है कि जब भी कोई समस्या आती है तो अमूर्त चिंतन क्षमता के अभाव में सभी लोगों का दिमाग ठीक से काम नहीं करता एक समस्या आने पर मस्तिष्क या तो सुन्न हो जाता है या फिर अनेकों प्रकार की समस्याओं से ग्रसित होकर या अनेक समस्याओं के अनेकों हल विकल्प के कारण निर्णय हीन हो जाता है। ऐसे में वह समस्या ग्रसित व्यक्ति फेल हो जाता है । समस्या का सही समाधान नहीं निकाल पाता है परंतु जिन लोगों में रीजनिंग एबिलिटी या प्रेजेंस ऑफ माइंड दिमाग तत्परता फैक्टर ठीक से काम करता है वह सदैव सही समस्या का सही समय पर सही हल निकाल कर देते हैं।

क्या मस्तिष्क को सही तरीके से ऑक्सीजन नहीं मिलना ही सिर दर्द का मुख्य कारण है ?

 मस्तिष्क को जल्दी 2 मिनट तक ऑक्सीजन नहीं मिलती है मस्तिष्क अपना काम करना खत्म कर देता है और मनुष्य की मृत्यु हो जाती यह एक सामान्य कारण है ।

परंतु आप पूछ रहे हैं सही तरीके से ऑक्सीजन नहीं मिलना समझ में नहीं आया कि आप का सही तरीका कौन सा है ? जिससे मस्तिष्क को ऑक्सीजन कम मिलती है जबकि मेरे विचार से वास्तविकता यह है कि टोटल सांस में ली गई ऑक्सीजन का अधिकतम उपयोग मस्तिष्क ही करता है । मस्तिष्क को सबसे अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है मस्तिष्क को सबसे अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति कारण कि मस्तिष्क के अंदर अरबों न्यूरॉन्स पाए जाते हैं और प्रत्येक न्यूरॉन्स में माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या 50000 से 200000 तक हो सकती है माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या मस्तिष्क की न्यूरॉन्स के कार्य करने की क्षमता उत्पन्न करती है यदि माइटोकॉन्ड्रिया कम संख्या में हैं तो मस्तिष्क धीरे-धीरे मंद गति से कार्य करेगा और यदि माइट्रोकांड्रिया पर्याप्त मात्रा में है तो मस्तिष्क सामान्य गति से काम करेगा और यदि माइटोकॉन्ड्रिया उचित और अधिकतम मात्रा में हैं तो ऐसे में मस्तिष्क तीव्र गति से काम करेगा जिसके आधार पर लोगों को जीनियस कहा जाता है।

आप रहा प्रश्न मस्तिष्क में सिर दर्द का तो इसके कारण अन्य हैं नंबर 1 थर्मोस्टेट वाद जब मनुष्य के शरीर का ताप सामान्य से गिर जाता है तो गिरे ताप की सूचना के लिए मस्तिष्क सक्रिय होकर सिर दर्द उत्पन्न करके जीवांता को संदेश देता है कि अब तुम्हारे जीवन को खतरा पैदा हो गया ।नंबर 2ग्लूकोज स्टेट - बाद जब मनुष्य के रक्त में ग्लूकोज की मात्रा सामान्य स्तर से कम हो जाती है या ग्लूकोज का स्तर गिर जाता है तो ऐसे में मनुष्य को ग्लूकोज के स्तर को मेंटेन करने के लिए भूख पैदा होने लगती है । भूख की तीव्रता के अनुसार मनुष्य के मस्तिष्क में दर्द होने लगता है ।।कभी-कभी मनुष्य अत्यधिक परिमाण में अति शीतल पदार्थ बर्फ आदि खाता है तो जिससे पेट में बर्फ के आ जाने पर या अति शीतल पदार्थ खाने पर मस्तिष्क में दर्द होने लगता है। यदि मनुष्य उच्च ताप का गरम खाना खाने लगता है जिससे आमाशय में दर्द हो या जलन होने लगता है तो इसमें पर भी मनुष्य में मस्तिष्क में दर्द होने लगता है । यह तो एक वह सामान्य कारण थे जो मनुष्य को यह सूचना देने के लिए थे कि जीवन में गड़बड़ है । परंतु कभी-कभी जब मस्तिष्क में संक्रमण होता है विशेष रूप से वायरल इंफेक्शन के समय वायरल इंफेक्शन की शुरुआत सबसे पहले मस्तिष्क से होती है मस्तिष्क में दर्द रहने लगता है ऐसा नहीं है कि केवल वायरल इन्फेक्शन से मस्तिष्क में दर्द रहता हो , मस्तिष्क में कभी-कभी अनेक प्रोटोजोआ या कृमि हेल्मिंथ भी चले जाते हैं । तो मस्तिष्क में कृमि या अन्य रोग जनक सूक्ष्म जीवों के आने पर दर्द रहने लगता है ।मस्तिष्क में यदि ट्यूमर बन जाता है तब भी निरंतर किसी क्षेत्र विशेष पर मस्तिष्क में दर्द रहने लगता है । मानसिक कारणों से जब गलत चिंतन पद्धति हो जाती है ,निरंतर चिंतन प्रक्रिया चलने लगती है मस्तिष्क विश्राम /आराम नहीं कर पाता है तो भी अति चिंता आतुर बने रहने से सिर में दर्द रहने लगता है जिसे मानसिक पीड़ा कहते हैं ।

समझ में नहीं आता इतने सारे विकल्प सिरदर्द के हैं अभी विकल्प और भी बाकी हैं जो मैंने नहीं लिखे हैं उन्हें किसी चिकित्सक से पूछ लेना वह तुम्हें अच्छी तरह से समझा देगा कि मस्तिष्क में सिर दर्द के कितने कारण है क्योंकि उसकी व्याख्या करने के लिए चिकित्सक ही ऑथराइज्ड व्यक्ति है हम शिक्षक लोग इसकी अधिक व्याख्या नहीं कर सकते । सिर दर्द के बारे में यदि और अधिक जानकारी चाहिए तो प्रसिद्ध वैद्य ग्रंथ भाव प्रकाश या चरक संहिता मैं इनका अधिक विस्तृत विवरण देखें