आत्मज्ञान जीव की निजी बहिर्मुखी और अंतरमुखी मानसिक अवस्था पर स्वयं का नियंत्रण होना है जिसमें जीव का निजी जीवन मृत्यु पर नियंत्रण करना शारीरिक अवस्था रक्त दाब /चाप का अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करके अपने ब्लड प्रेशर को स्वेच्छा अनुसार नियंत्रित रखना सीखना पड़ता है । आत्मज्ञान के बाद मनुष्य का अपने मस्तिष्क में उठने वाले अनियंत्रित विचारों पर नियंत्रण हो जाता है ।जब विचारों पर नियंत्रण हो जाता है तो विचारों पर आश्रित/आधारित कर्म क्रियाओं वाले शरीर के मानसिक शारीरिक यौनिक केंद्रों पर ज्ञान से नियंत्रण आ जाने पर अंततः आत्मा, प्राण, कर्म क्रियाओं आचार विचार अहार विहार व्यवहार पर भी नियंत्रण करना आता है।
ये सभी मानसिक शारीरिक यौनिक कर्म क्रियाएं नियंत्रण में रखना असंभव लगता है, परन्तु जब आत्म ज्ञान हो जाता है तो जीव इन असंभव आत्मिक क्रियाओं को पहले चरण में उत्तम/श्रेष्ठ गुरु से समझता है । फिर इन आत्मिक ( मानसिक) प्राणिक (यौनिक) जैविक (शारीरिक) क्रियाओं को विभिन्न साधनाओं के द्वारा स्वयं समझा ,स्वयं किया, स्वयं नियंत्रण करना (स्व नियंत्रण) सीखा जाता है । महर्षि महेश योगी आत्म ज्ञान विद्या के ज्ञाता थे वे अब इस भौतिक जगत में नहीं रहे । इस विद्या को आंशिक रुप से जग्गी वासुदेव जानते हैं ।यदि इसे सीखना चाहते हैं तो ईशा फाउंडेशन में जाकर समझियेगा फिर सीखने के बाद तरह तरह की पंचतमात्राओं पांचों ज्ञान इंद्रियों पाँचों कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण करना सीखना होगा तरह तरह की स्वयं साधनाओं के द्वारा ।
आत्मज्ञान में सबसे बड़ी बाधा फोक्टी ज्ञान ध्यान इच्छा है।जिसमें स्वयं सीखे बिना दूसरे लोगों को सिखाने की गुरुगद्दी हथिया लेने की पड़ती है । आत्मज्ञानी गुरु जनों का अकाल अभाव है ।आत्मज्ञान का साहित्य उपलब्ध नहीं है। आत्मज्ञान की तीन पुस्तकें हैं 1पातंजल प्रदीप गीता प्रैस की स्वामी ओमानंद व सोमतीर्थ ,2 श्रीराम शर्मां की गायत्री महा विज्ञान तीनों भाग 3ट्रांसकेंडेंटल मैडिटेशन लेखक राबर्ट कीट वैलेस ।
उपरोक्त सभी पुस्तकें मैंने स्वयं पढ़ी हैं ।
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