जब कोई मनुष्य मुसीबत में फंस जाता है वह तभी सोचना सूझना सीखता है । मुश्किलों में फस जाने पर भी मनुष्य का मन मस्तिष्क निजी रूप से सक्रिय होकर कार्य करने लगता है । जब तक मनुष्य मुसीबत में नहीं फंसता तब तक वह दूसरे लोगों के विचारों का सलाह के रूप में उपयोग प्रयोग करता रहता है । एक बार जो मनुष्य मुसीबत में अच्छी तरह से फंस जाता है तो वह सोचने की मुख्य विधा अंतर्मुखी होना सीख जाता है ।
आमतौर पर मनुष्य के सोचने बोलने और व्यवहार करने की मुख्य दो मानसिक विधाएं हैं नंबर 1 अंतर्मुखी विधा जिसमें मनुष्य अपने मन के अंदर भरी संचित मेमोरी या पूर्व सूचित स्मृतियों का उपयोग करता है । आत्मकथन और स्वप्ने इसी अवस्था में आते हैं । इसके अलावा कभी-कभी मनुष्य को किसी समस्या में गिर / घिरजाने पर उस समस्या का सही गलत या किसी भी प्रभाव का सुझाव अंतर्मन के द्वारा कहे गये वक्तव्य के द्वारा मिलता है जिसे वह मनुष्य सही सटीक होने पर आत्मज्ञान कहता है तो गलत गलत सूचना मिलने पर भ्रम या वह कहता है ।
सामान्य अवस्था में मनुष्य अपने मस्तिष्क का उपयोग करना नहीं जानता / चाहता समझता जरूरी नहीं समझता ऐसे में वह निरंतर अपनी समस्या का समाधान दूसरों की सलाह से करता है। इसे हम इस प्रकार से समझ सकते हैं जब हम बहिर्मुखी अवस्था में होते हैं तो आंख हैं बाहर का देखती हैं कान बाहर की ध्वनि सुनते हैं ना बाहर से तरह-तरह की गंध महसूस करती है और हमें पूर्ण व्यवहार की अनुभूति वाहय जगत से होती है । परंतु एक अवस्था ऐसी भी होती है जो अंतर्मुखी कही जाती है जिसमें आंखें बंद होने पर भी दृश्य दिखाई देते हैं कान बंद होने से होने पर भी तरह तरह की दुनिया कन सुनते रहते हैं नाक सुनती रहती है तो इस प्रकार की अवस्था को अंतर्मुखी अवस्था कहते हैं । दिवास्वप्न और स्वप्न इस गहनतम मानसिक अमूर्त चिंतन अवस्था में आते हैं।
अब आपके प्रश्न का जवाब यह है कि जब मनुष्य गहन समस्या में फंस जाता है तो पहले वह बहिर्मुखी होकर दूसरों से तरह-तरह की समस्या समाधान सुझा मांगता पड़ता है जब वह भी फेल हो जाते हैं तब उसे पता लगता है कि दूसरे लोग समस्या का सही समाधान नहीं सोच पा रहे हैं फिर वह अपने मन मस्तिष्क पर जोर डालने लगता है और सही या गलत जैसा भी है अपने तौर-तरीकों से सोचने बोलने व्यवहार करने लगता है जब उसे दूसरे लोगों की सलाह आसानी से उपलब्ध नहीं होते । ऐसा मनुष्य जब अपनी समस्या का समाधान सोचने के लिए दूसरे लोगों के पास जाता है।
तो वह दूसरे लोग उसकी समस्या का सही समाधान न सोच पाने पर उस मनुष्य के मन को समस्या से हटाने दूर करने के लिए तरह-तरह की समस्याओं में लगाने के लिए वास्तु दोष ग्रह दोष भूत दोष आदि अनेक प्रकार के दोषों का विवरण लेने देने लगते हैं जो उन्होंने अपनी अपनी अलग अलग प्रज्ञा बुद्धि से ज्ञान हासिल किया होता है जैसे ज्योतिषी ज्योति दोष राहु केतु बुध गुरु शुक्र शनि चंद्र मंगल की दशा महादशा , विदिशा, कुदशा का दोष ,, गुनिया ओझा जनित ज्ञान भूत प्रेत बाधा का दोष ,, नव शिक्षित साक्षर यह नया कंसेप्ट अभी मार्केट में आया है वास्तु दोष अर्थात भवन निर्माण विद्या में कमी या घर में रहने वाली वस्तुओं की स्थिति में परिवर्तन करना यह भी मनुष्य के ध्यान को क्षणिक रूप से भटकाने जैसा है और जब मनुष्य इन सब में भी फेल हो जाता है कब तब शुरू हो जाती है उसकी निजी अमूर्त आत्मचिंतन अवस्था
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