वृद्धावस्था आगमन कमजोरी का कारण अनियंत्रित उच्च/निम्न रक्त शर्करा है।

सभी जीवों के शरीर में जन्म के साथ मृत्यु ,  अवस्था के साथ परिवर्तन स्थिति का गुण छिपा होता है । जैसे बचपन में जवानी , जवानी में बुढ़ापा छिपा होता है । जो लोग अपने जीवन को ईश्वर के नियम आदर्शवाद प्रकृति नियम यथार्थ वाद के अनुसार जीते हैं वह अपने जीवन को समग्र रूप से बचपन जवानी वृद्धावस्था तक को पूरा करते हुए जीते हैं जिसे काल मौत  प्राकृतिक मृत्यु कहा जाता है ।  परंतु जो लोग अपने जीवन को निजी रूप से अपनी जीवन नियम शर्तों के अनुसार जीते हैं उनका जीवन सृष्टि में प्राकृतिक रूप से स्वाभाविक रूप में  पूरा नहीं हो पाता है। किसी के जीवन से जवानी निकल जाती है तो किसी के जीवन से वृद्धावस्था निकल जाती है । जिससे वह अपने जीवन को जवानी में आयु पूरी कर लेता है । जिसे अकाल मौत कहा जाता है।
       वृद्धावस्था का आगमन उच्च/निम्न अनियंत्रित रक्त शुगर कोई रोग नहीं , ब्लिक प्रकृति द्वारा मनुष्य की जींस मे डाला हआ जीवन अवधि समाप्ति सूचक चिन्ह प्राकृतिक  जैविक गुण लक्षण होता है जो प्रत्येक जीव की जातक जीवन अवधि आयु है जो उसकी भूमि पर रहने की अवधि को तय करता है । परंतु निजी जीवन पद्धति भी जीवन जीने का तरीका और विशेष जीवन आयु अवधि का मानक नियम सभी जीवों को अलग अलग है। यह सभी जीवो का एक मैटाबॉलिक जैविकऑडर है। जो प्रकृति में जैविक आयु जीवन अवस्था व्यवस्था के अनुसार जातक आयु के रूप में निर्धारित होता है यदि कोई जीव  अपनी जीवन पद्धति के दौरान यदि अपनी आयु को ईश्वरीय  नियम या प्राकृतिक नियम के अनुसार जीता है तभी वह अपनी आयु को जातक आयु स्तर तक जी पाता है । यदि  जातक अपनी जीवन पद्धति को प्रकृति और ईश्वरीय नियमों की अवहेलना करते हुए अपने निजी तरीके से जीता है अपनी दैनिक सुविधा सुरक्षा से जीने लगे तो इसे प्राणी का निजी मेटबॉलिक डिस ऑर्डर लाइफ डिस्टरबेंस  कहा जाता है 
जो प्राणी के जातक जीवन आयु अवधि को परिवर्तित करके छोटा कम या ज्यादा आयु का कर देता है । जिसके अनुसार प्रत्येक जीव की उसकी अपनी निजी जीवन पद्धति के दौरान जीवो के शरीर में दो प्रकार की विशेष जैविक क्रियाएं होती है । एक एनाबॉलिक शरीर निर्माणाधीन क्रिया जो वृद्धि दायक है। दूसरे कैटाबॉलिक जैविक ऑक्सीकरण जो  शरीर को नाशकारी है । दोनोंजविक शारीरिक क्रियाएं समान रूप से युवावस्था में एक साथ या कभी एक कम एक ज्यादा चलती रहती हैं जो युवावस्था और वृद्धावस्था तय करती है। इन दोनों जैविक दोनों अनाबॉलिक्स कैटाबॉलिक जैविक क्रियो के मध्य जब तक संतुलन है दोनों समान रूप से चल रही है तो जीव के शरीर के आकार आकृति स्थिर स्थाई बनी रहती है , उनकी आयु तक रुकी रहती है । परंतु यदि अनाबॉलिक्स क्रियाएं अधिक तेजी से होने लगती हैं तो जीवन के शरीर का आकार आकृति तेजी से बढ़ने लगती है सभी जीव प्रज्या क्षमता युक्त होकर प्रजनन द्वारा दूसरे जीव का निर्माण करने में समर्थ होने लगते हैं । परंतु यदि कैटाबॉलिक क्रियाएं तेजी से होने लगती है तो जीवो के शरीर आकार आकृति तेजी से घटने लगते हैं। पुरानी प्राणी शरीर रोगी रहने लगता है प्रज्या क्षमताहीन होने ऊर्जा हीनता  आने लगती है, जीव प्रजनन  क्रिया करना बंद कर देता है । परंतु कभी-कभी जब एक बड़े शरीर के अंदर अन्य दूसरे छोटे-छोटे शरीरवाले बैक्टीरिया वायरस प्रोटोजोआ कृमि आदि आकर उसके शरीर में घुसकर अपनी जैविक क्रियाएं करते हुऐ अपनी सीमा से अधिक तेजी से होने वृद्धि करने लगते हैं  उसके शरीर की जीवित कोशिकाओं को खाने लगते हैं या उसके शरीरकी ऊर्जा सप्लाई को प्रभावित करने लगते हैं जिससे उसको खाया पिया उस बड़े शरीर वाले  को शरीर अंग नहीं लगता है ऐसी अवस्था को जीव की ऊर्जा हीनता शरीर ऊर्जा में कमी रोगी अवस्था कहा जाता है।
    परंतु कभी-कभी संक्रमण नहीं होने पर भी जब प्राणियों के शरीर में कैटाबॉलिक क्रियाएं अपने आप तेजी से होने लग जाती हैं । तो इसका मुख्य कारण उसे व्यक्ति द्वारा पितज पदार्थ कंटोल करेला जिमीकंद का अधिक भोजन करना है जिससे मुंह लंबे समय तक 15 से 30 दिन तक कड़वा बना रहने लगता है यह पित्त कुपित व्याधि / पितज प्रकोप के  लक्षण है। जो लंबे समय तक चलने वाली चिंतालु समस्या से उत्पन्न चिंतालु स्वभाव प्रवृत्ति  से सक्रिय रहने लगता है । इससे वृद्धावस्था का आगमन  कमजोरी थकावट अशक्ता का जल्दी आना कहा जाता है । जिसमें प्राणियों के शरीर में अपने आप रक्त शर्करा का स्तर अकारण बिना परिश्रम के भी उच्च या निम्न अनियंत्रित रहने लगता है।
। इसे शरीर का पलीतम दोष शरीर का पकना कहा जाता है। जो वृद्धावस्थाके पहले अचानक युवावस्था के अंत में उत्पन्न हो सकता है शरीर की निर्माण क्रियाएं थम सी जाती हैं । व्यक्ति बीमार समान रहने लगता है । जो उच्च रोग क्षमता के चलते बीमार तो नहीं होता परंतु प्रमेह/ मधुमेह व्याधि से ग्रसित होकर तेजी से बूढ़ा होने लगता है । इसमें सबसे पहले केश/बाल श्वेत इद्रियां कान आंख शक्तिहीन होने लगते हैं फिर दांत क्षय होने लगता है । शरीर में पाचक रसों का स्राव कम हो जाने से भोजन का सम्यक  पाचन नहीं हो पाता  , अधिक परिमाण में भोजन खाने पर भी शरीर को पोषक तत्व न्यूनतम मात्रा में मिल पाते हैं। तब उस मधुमेह व्याधि ग्रस्त मनुष्य को विशेष विशेषज्ञ  की देखरेख में उच्च पोषण क्षमता वाला औषधिमय भोजन दिया जाता है। जिसे सप्लीमेंट्री डाइट कहा जाता हैं। जिस कारण से समस्त औषधीयों को अन्नसार भोजन कहा जाता है ।

     ऐसे में अनियंत्रित उच्च या निम्नरक्त शर्करा कोई रोग नहीं अपितु वृद्धावस्था का आगमन है । वृद्धावस्था की आयु मे आवश्यक करने की क्षमता के अनुसार व्यक्ति कुछ अनावश्य कार्यों को ऊर्जा की कमी हो जाने से छोड़ने लगता है जिससे उसके मस्तिष्क के न्यूरोन डिजनरेट होकर घटने लगते हैं स्मृति क्षय होने लगता है। न्यूरोन क्षय की प्रक्रिया के साथ-साथ शरीर में आवश्यक कार्य करने से संबंधित अन्य कोशिकाओं की रिपेयर का काम मंदा पड़ जाता है। मृत कोशिकाएं शरीर पर चिपकी रहती हैं जिससे वृद्ध के शरीर में झुर्रियां बनने लगते हैं । इसके अलावा शरीर की अन्य ग्रंथियां जैसे अग्नाशय ग्रंथि/ पेनक्रियाज और यकृत ग्रंथि भी अपना कार्य धीरे-धीरे मंद रूप से करने लगते हैं जिससे रक्त में शर्करा का स्तर कभी अचानक सामान्य से उच्च कभी अचानक सामान्य से निम्न हो जाने से शरीर में सम्यक ऊर्जा की मात्रा की स्थिरता अनियंत्रित हो जाने से आवश्यकता के अनुसार स्थिर नहीं रहती , मनुष्य अकारण अचानक जीवन संकट महसूस करने लगता है । जिससे हृदय की धड़कन अनियंत्रित रूप से घटने बढ़ने लगती है। शरीर के रक्त को साफ करने वाली ग्रंथियां यकृत और किडनी का कार्य भी गड़बड़ाने लगता है। वर्तमान समय में चिकित्सक लोग इसे पेनक्रियाज में बीटा सेल का मर जाना कहते हैं यह कथन सत्य नहीं है। जब तक जीवन है तब तक शरीर में सभी कोशिकाओं की संख्या में बार-बार 
 पुनर्जीवन उत्पादन मरण बना रहता है। जीव की आवश्यकता के अनुसार शरीर की कोशिकाएं बढ़ती घटती रहती हैं। शरीर का जीवन अवस्था का नियंत्रण उसके अवचेतन मन के द्वारा नियंत्रित रहता है परंतु यह अवचेतन मन चिंतारहित अमूर्त चिंतन हीन विचारहीन निद्रा सामान तनावहीन अवस्था में सक्रिय होता है जो लोग अकारण अचानक अनावश्यक अत्यंत चिंतन वाले चिंतालु हो जाते हैं वह अपने मस्तिष्क को तनाव ग्रस्त रखते हैं। उनका अवचेतन मन व्यर्थ की चिंता करने से ठीक से काम नहीं कर पाता । उनके शरीर में सोने के बाद निद्रा अवस्था में शरीर का रिपेयर मरम्मत का कार्य ठीक से नहीं हो पाता । वह लंबे समय तक रोगियों के समान दिखाई देने लगते हैं। कह सकते हैं कि निरंतर चिंतालुक मनस्थिति बनी रहने से रोग का लक्षण उनकी जींस में चला जाता है । नई कोशिकाएं भी रोगीली ही बनती हैं । इस दौरान यदि मनुष्य अपने मस्तिष्क की चिंतन प्रणाली की सेटिंग माईंड स्ट्रेस मैनेजमेंट ठीक से करना सीख जाता है अपने मस्तिष्क को आराम देना सीख जाता है ऐसे में उसका मस्तिष्क फिर से नई निर्मित कोशिकाओं  से फिर से शरीर को नया बनाकर नियंत्रित करने लगता है। नवंबर 24 में मुझे मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा के दौरान मूत्र शर्करा की समस्या हुई रक्त की शुगर ३७० काफी समय से बड़ी हुई थी । परंतु फरवरी 25 में मूत्र शर्करा की समस्या समाप्त हो गई क्योंकि मैंने माईंड मैनेजमेंट के अंतर्गत अपने मस्तिष्क की कार्य प्रणाली को समझते हुए मस्तिष्क को अनावश्यक चिंतन से बचाना मस्तिष्क के तनाव को कम करना सीख लिया था । मानसिक ऊर्जा का अपव्य कम से कम करने लगा था व्यर्थ का अनावश्यक चिंतन चिंतक प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए अनावश्यक चिंतन से बचने लगा था इसके साथ-साथ में रात्रि में पूर्ण निद्रा 5 घंटे की एक नींद पर अपना ध्यान फोकस करने लगा था निद्रा की मात्रा 8 घंटे तक बढ़ा दी थी। शर्करा का इलाज भी आरंभ कर दिया था रक्त शर्करा की आयुर्वेदिक औषधियां नींम गिलोय का सेवन शुरू कर दिया था ।
        शरीर में जन्म के समय से लेकर जीवन और मृत्यु की सूचना उसकी कोशिकाओं के अंदर  गुणसूत्र में जीव जीवन सूचना सूत्र में  जींस के रूप में जीवन भर विद्यमान रहती है । परंतु हम जन्म के पश्चात अपना ध्यान व्यर्थ की बातों पर जीवन में फोकस करते हैं मृत्यु की अवहेलना करते हैं । जिससे जीवन भर मृत्यु के हाथों विविध प्रकार के रोगों के द्वारा प्रभावित होते हुए अपना जीवन जीते हैं ।*रोग भी हमारी चिंतन प्रणाली पर आधारित हैं वर्तमान समय की दुष्ट शिक्षा प्रणाली के अनुसार हमें सदैव रोगी रहने की शिक्षा दी जाती है जो रोग हो गया वह ठीक नहीं होगा यह लाइन आज की चिकित्सकों द्वारा रोगियों के दिमाग में डाल दी जाती है जबकि ऐसा नहीं है शरीर में मौजूद रोग का मनुष्य की चिंतन प्रणाली से सीधा संबंध है उच्च रक्त शर्करा स्तर में शरीर के बाहर त्वचा पर वर्ण विविधता कत्थई रंग के लाल दाग अंदर  गांठै बनना अवांछनीय कोशिकाओं की वृद्धि कैंसर यह रोग नहीं मनुष्य की विकृत चिंतन पद्धति की पहचान है । यदि मनुष्य की चिंतन प्रणाली में सुधार हो जाता है तो शरीर में मौजूद रोग भी हट जाता है।

  मृत्युजींस के सक्रियता के अनुसार समय-समय पर एक्टिव होने पर किसी को वृद्धावस्था  उचित आयु के समय के पहले और किसी को उचित समय आयु  से बाद में उत्पन्न होती है।  वृद्धावस्था जो मनुष्य और अन्य जीवों में दैनिक दायित्व हीनता और अपने जीवन कै लिए निर्धारित धर्म कर्म छोड़ने से अचानक जीवन पद्धति में परिवर्तन करने से समय से पहले जल्दी उत्पन्न हो जाती है। जैसे-जैसे मनुष्य सामाजिक पारिवारिक जिम्मेदारियां जल्दी-जल्दी समय से पहले छोड़ने लगता है अपनी दैनिक कार्यों लिए जैविक ऊर्जा का उपयोग काम करता चला जाता है उसी के अनुसार उसके शरीरकी ऊर्जा की गर्मी धीरे-धीरे कम होने लगती  है । जिसको नियंत्रित करने के लिए मनुष्य के अग्नाशय ग्रंथि के बीटा सेल धीरे-धीरे क्षरित  होने लगते हैं जैसे जैसे यह बीटा  सेल क्षय की हानि  होने लगती है । परंतु पेनक्रियाज में मौजूद बीटा सेल कभी भी पूरी तरह से समाप्त नहीं होती जब तक जीवन है उनमें भी सेल्फ रिपेयर प्रवृत्ति मौजूद रहती है।  जीव के आयु परिमाण के अनुसार मनुष्य में इंसुलिन हार्मोन का निर्माण दिन में अधिक रात में कम होने से शरीर दिन में ठंडा रात में गरम ऊर्जा दायक हार्मोन ग्लूकोगन रात में ज्यादा दिन में कम मत कम होने से शरीर गरम रहता है निद्रा से पहले शरीर ठंडा निद्रा के दौरान शरीर गर्म इसी प्रक्रिया से रहता है। मनुष्य पर धीरे-धीरे वृद्धावस्था का आक्रमण होना शुरू हो जाता है जो स्वस्थ  मनुष्य की आयु को धीरे-धीरे तेजी से कम करने लगता है। वृद्धावस्था कि यह प्रक्रिया भी एक अकेली अपने आप नहीं आती अपितु मस्तिष्क कोशिकाओं के क्षय के साथ-साथ समस्त शरीर में जगह-जगह कोशिकाओं की निर्माण और रिपेयर द्वारा वृद्धि  मंद होती जाती है । कोशिकाओं की क्षय क्षमता दर बढ़ती जाती है ।  शरीर की अन्य कोशिकाओं जैसे न्यूरोन से वृद्धावस्था मे अल्जाइमर पर्किंसन जैसे स्मृति क्षय और शरीर कांपना अन्य रोग लक्षण उत्पन्न होने लगते है। यह वृद्धावस्था उन लोगों को अत्यंत तीव्र गति से आती है जो अपने शारीरिक परिश्रम के कार्य को एक साथ छोड़ देते हैं इसके अलावा वे मानसिक परिश्रम भी करना बंद कर देते हैं या मानसिक परिश्रम की दर सामान्य से बहुत अधिक कर देते हैं ।  जिसे चिंतालु ओवरथिंकिंग या बेकार का व्यर्थ चिंतन कहा जाता है , जो लोग समझदार होते हैं जिनका अपने दिलों दिमाग पर पर्याप्त नियंत्रण होता है जो आवश्यकता होने पर तो सोचते हैं आवश्यकता ना होने पर उनका दिमाग चिंतन नहीं करता ओवरथिंकिंग नहीं करता बेकार के मानसिक परिश्रम से दूर रहते हुए , तनाव जनित मानसिक शारीरिक परिश्रम करते हुए अपने शरीर को सम्यक श्रम अनुपात में सक्रिय रखते हैं ऐसे लोग दीर्घकाल तक वृद्धावस्था में भी अपना जीवन 90 वर्ष से ऊपर की आयु तक जीते रहते हैं। 
     वृद्धावस्था की आयु की आगमन पर शरीर की मरम्मत निर्माण कोशिकाओं का कार्य अत्यंत धीमा हो जाता है। जिससे शारीरिक परिश्रम के दौरान नष्ट हुई कोशिका समय के अनुसार उचित समय पर तेजी से नहीं बन पाती है जिससे शरीर पूर्व की आयुके समान परिश्रम करने में खुद को असमर्थ पाता है। जैसे युवावस्था में टूटा हआ पेशी तंतु 2 दिन में बन जाने से दो दिन बाद दर्द होनेके बाद पेशी तंतु  रिपेयर के पश्चात पूर्व अवस्था मैं आकर काम करना शुरू कर देती है जबकि वृद्धावस्थामे टूटे हुए पेशी के तंतु की रिपेयर मैं 30 से 45 दिन तक लग जाते ह। पूर्ण विश्राम कर ने पर भी पेशी तंतु एक माह के बाद ठीक हो पाती है जो लोग पेशी दर्द के प्रति जागरूक  नहीं होते उनकी पेशी पर दर्द की समस्या लंबे समय तक चलती रह सकती है। इसी प्रकार से वृद्धावस्था में  ऑपरेशन के पश्चात टांकें काटने में लगा समय 9 दिन से बढ़कर 15 दिन से 45 दिन में बदल जाता है ।  नष्ट हुई कोशिका की मरम्मत शीघ्र न होने से कोशिका वृद्धि दर पूर्वत: न होने से शरीर का आकार छोटा होने लगता है जिससे त्वचा पर झुरिया पड़ने  लगती हैं। ऊर्जा तंत्र की कमी होने पर शारीरिक परिश्रम न करने पर पेशी क्षय  तेज हो जाने से हाथ पांव चेहरे पतले पड़ने लगते हैं। ऊर्जा तंत्र की अल्प क्षमता से काम करने से मस्तिष्क के न्यूरोन क्षय  होने से स्मृति क्षय होने लगता है दिमाग ठीक सेकाम नहीं करता है शरीर के अल्प ऊर्जा क्षमता हो जाने से हाथ पैर कांपने की पार्किंसन और भूल पड़ने  स्मृति क्षय की अल्जाइमर मनोरोग व्याधि उत्पन्न हो जाती है।
    ऐसे में जो अति महत्वाकांक्षी  लोग ऊर्जा की कमी होने पर भी अपनी मस्तिष्क को अधिक मात्रा में आवश्यकता से अधिक सक्रिय रखते हैं व्यर्थ का सोच विचार ओवरथिंकिंग करते रहते हैं या मानसिक तनाव से उनकी रात्रि में नींद ना आने पर भी ठीक से न सो अपने पर भी रात्रि में , दिन में आवश्यकता से अधिक अध्ययन करते रहते हैं ऐसे में उनका मस्तिष्क कमजोर होते हुए भी अधिक मात्रा में ऊर्जा कंज्यूम करने लगता है जिससे अति महत्वाकांक्षी लोगों के दिमाग की सेटिंग खराब हो जाती है शरीर की सेटिंग खराब हो जाती है व्यर्थमे रक्त प्रवाह की दर बढ़ जाती है जिससे ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है रक्त में   शुगर का स्तर बढ़ जाता है यह स्थिति शरीर के  लिए खतरनाक हो सकती है जिसमें 180 से ऊपर मूत्र शर्करा समस्या उत्पन्न हो जाती है जो रक्त शर्करा नियंत्रित होने के पश्चात समाप्त हो सकती है। 200 से ऊपर कानों से मन्दा सुनाई देना 250 से ऊपर आंखों से धुंधला दिखाई देना 300 से ऊपर यकृत और पेनक्रियाज समस्याग्रस्त होने लगती है , 400 से ऊपर किडनी समस्या ग्रस्त हो जाती है।500 से ऊपर अर्धांग फालिस लकवा 800 से ऊपर मस्तिष्क क्षय संभावना बन जाती है ।
      ऐसे में यदि वृद्धावस्था को तेजी सेआने से रुकना है तो दिमाग का इस्तेमाल आवश्यक होने पर ही करें नए संकल्प निर्माण पर नियंत्रण करने के लिए संकल्प कम से कम करैं, लोगों से मिले जरूर लकिन उनसे जुड़ना चिपकना जैसे समाजिक संबंध सोच समझ कर बनाएं नए प्राण प्रतिज्ञा बिल्कुल न करें। दिमाग से परिश्रम कम से कम करें शरीर से परिश्रम ज्यादा से ज्यादा करें। इसके लिए दैनिक व्यायाम कसरत पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे शरीरकी ऊर्जा पेशीय में ज्यादा से ज्यादा देर तक संचित रख सके पेशियों संस्थान स्वस्थ रहे । शरीर में पेशियां के सुडोल होने पर शरीर में रक्त शुगर का सामान्य रहने लगता है ऐसी पेशीय की स्थिति में रक्त शुगर ठीक हो जाने से ब्लड प्रेशर सामान्य हो जाता है।
    यदि शरीर ठंडा है तब तक शुगर सामान्य है शरीर में रक्त शर्करा का स्तर  बढने पर पहले आखों में खुजली होती है फिर आंखें लाल रहने खुजलाने लगती है उसके बाद भोजन करने के पश्चात उल्टी आना मतली लगना शरीर में बड़ी रक्त शर्करा के प्रभाव से पहले यकृत गर्म होकर बड़ा हो जाता है बाद में पेनक्रियाज गर्म होकर रक्त में शर्करा का स्तर उच्च कर देती है। जो अंग हानि का कारण बन सकता है बहरापन अंधापन नेफ्राइटिस किडनी क्षय आदि   खतरनाक व्याधियों उत्पन्न हो सकती है। शरीर को ठंडा रखने के लिए हमें ठंडी ठंडी तासीर के औषधि भोजन का सेवन करना जरूरी होता है। लंबे समय तक अधिक समय तक पितज प्रकृति का भोजन जैसे करेला कंट्रोल जिमीकंद खाने से शरीर में पित्त बढ़ जाता है शरीर गरम रहने लगता है तो शरीर में रक्तशुगर सामान्य से अधिक बढ़ जाती है। शरीरकी ऐसी  अवस्थामे हमें ठंडी तासीर की निद्रा दायकआयुर्वेदिक औषधि नीम गिलोय जलजमनी अमला बहेड़ा हरण अर्जुन देवदार चंदन आदि शीतल औषधियां का उपयोग करना चहिए इसके अलावा एलोपैथिक औषधियां विटामिन ए ,बी,सी,डी का भोजन करने में समझदारी है ।
        वृद्धावस्था मे अग्नाशय भी अन्य ग्रंथियां की तरह सम्यक संतुलित तरीके से अपना कार्य नहीं कर पाती उसके भी काम करने के तरीके में व्यापक परिवर्तन हो जाता है जिससे वह रक्त शर्करा पर सम्यक तरीके से इंसुलिन निर्माण से नियंत्रण नहीं रख पाती और ग्लूकेगन हार्मोन उत्पादन पर भी नियंत्रण नहीं रख पाती है । अग्नाशय में मौजूद बीटा सेल की संख्या घट जाने से इंसुलिन का निर्माण आवश्यकता के अनुसार नहीं हो पाता है। जिससे रक्त में ग्लूकेगन हांर्मोन अनियंत्रित होकर बनने से कम ग्लूकेगन से हाइपोग्लाइसीमिया रक्त में रक्त शर्करा का स्तर कम हो जाता है हृदय की धड़कन घट जाती है । ज्यादा ग्लूकेगन बनने से हाइपर ग्लाईकोसिमिया रक्त में उच्च शर्करा स्तर बढ़ जाताह हृदय की धड़कन बढ़ जाती है ।  जिससे रक्त में सम्यक शर्करा की मात्रा नियंत्रण खत्म हो जाता है ।
      इंसुलिन हर्मोन कोशिका  रंध्र प्लाज्मों डैसमैटा के आकार को स्थायित्व देता है  इसकी उचित सम्यक प्लाज्मो  डैस्मैटा रंध्रक का आकर आकर स्थिर स्थाई अपरिवर्तनीय बनाए रखती है जिस कारण से कोशिका केअदर ग्लूकोज के कणों का आवगमन नियंत्रित रहता है। जब तक शरीर में अग्नाशय ग्रंथि में इंसुलिन का उत्पादन सामान्य रहता है तब तक वृद्धावस्था नही आ सकती जैसे हीअग्नाशय ग्रंथियां मैं बीटा सेल की संख्या कम होने लगती तो इंसुलिन हार्मोन का उत्पादन सामान्य से कम होने लगता है जिसको  चिकित्सक कृत्रिम इंसुलिन हार्मोन की टेबलेट मेटामॉर्फिन से नियंत्रित करने का प्रयत्न करते हैं। वे रोग के आरंभिक अवस्था में सप्लीमेंट्री फूड की मदद से शरीर को इंसुलिन हार्मोन बनानको प्रेरित करते ह। यदि इसमें कामयाबी मिल गई तो ठीक अन्यथा अंतिम चरणमें वृद्धावस्थारोगी या  व्यक्ति को इंसुलिन हार्मोन इंजेक्शन पद्धति मार्ग दिखा दिया जाता है। 
     शरीर में इंसुलिन सामान्य से काम बनने पर रक्तमें अपने आप ग्लूकोगन सामान्य से अधिक बनने  लगता है जिससे रक्त में शर्करा की मात्रा उच्च हो जाने से आरंभिक चरण में हृदय की गति अत्यधिक बढ़ जाने से व्यक्ति की नदीकी धड़कन असामान्य रूप से तेज रहने लगती है जिससे शरीर का ताप सामान्य से उच्च रहने लगता है ऐसी स्थिति में प्रमेह अवस्था मधुमेह रोग मैं बदलने लगती है । यदि ग्लूकेगन हांर्मोन काम है तो हाइपोग्लाइसीमिया से कानों में घंटियां बजने लगती हैं । यदि  रक्त में उत्सर्ज रक्त शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है तब शरीर में ग्लूकोस वसा में बदलने लगता है ऐसे व्यक्ति गुड़ खाकर भी मोटे  होने लगते है इसे  ग्लूको से वसा  संश्लेषण कहते हैं ऐसी व्यक्ति की वसा विशेष रूप से पहले पेट पर फिर पैरों पर फिर भुजाओं हाथों पर सबसे अंत में चेहरे पर एकत्रित होती ह । ऐसे व्यक्ति का चेहरा पिचका हुआ रहता है से शरीर वसा से पूरित रहता है ग्लूकोज से निर्मित वसा के अणु कमजोर होते हैं  जो देर तक भूखा रहने पर तेजी से टूट कर शरीर को ऊर्जा देने लगते हैं ऐसे व्यक्ति जल्दी मोटू जल्दी पतली होने लगते हैं। इनको बेड कोलेस्ट्रॉल की समस्या नहीं आती । बेड कॉलेस्ट्रॉल की समस्या उन लोगों को आती है जो हार्ड फैट मांस आदि अधिक मात्रा में सेवन करते हैं  । शरीर में लंबे समय तक प्रमेह अवस्था रक्तमें उच्च शर्करा बनी रहने पर शरीर का ताप सामान्य से उच्च बना रहने पर शरीर में पलीताम पकाना का दोष वृद्धावस्था का जल्दी आगमन का कारण बनता है जिसकी पहचान दांतों पर शर्करा स्तर प्लाक बनना  दांतों का पीला रहना दांतों मे संक्रमण से दर्द रहना परिणाम जल्दी दांत गिरना दांत क्षय होने लगता है। बाल पकने लगताह सफेद होने लगता है मूत्रमें शर्करा जाने लगती है शरीर में कमजोरी रहने लगती है जिससे पहले ध्वनि श्रवण मंदता महसूस होने से कानों अचानक अकारण घंटियां बजने की आवाज आने लगती है  बाद में मंदा या धीमा सुनाई देने लगता है इसे टिंटनिस कान का रोग कहते हैं । बाद में नेत्र क्षय आंखोंसे मंदा या धुंधला दिखाई देने लगता है मंदा दिखने को नजर गिरना दृष्टि दोष कहा है जिसका इलाज मोनोक्युलर बायऑकुलर चश्मे से किया जाता है परंतु धुंधला दिखाई देनेका कारण आंखों में मोतियाबिंद व्याधि कहा जाता है जिसमें रक्त में से कैल्शियम निकलकर नेत्रलैंस को धुंधला करने लगता है । कैल्शियम के रक्त में से हड्डियों के जोड़ घिसने लगते हैं। अस्थि संधिबिंदु कार्टिलेज प्लेट घिसने से अंग संचालन में दर्द होने लगताह ।
  मधुमेहव्याधि की आरंभिक अवस्था में ही मनुष्य को शारीरिक श्रम नियंत्रित अवस्था में करना आरंभ कर देना चाहिए जब तक मनुष्य की मांसपेशियां सुडौल है तब तक मधुमेह हानि नहीं पहुंचा सकती जब तक माइटोकांड्रिया में ग्लूकोज ऑकसीडेशन नियंत्रित सुचारू बनी हुई है। मसल्स क्षय के पश्चात माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या घटने से पर रक्त मैं उत्सर्ग शर्करा अवस्था अनियंत्रित रहने लगती है। वृद्धावस्था में इतना अधिक परिश्रम  की कार्टिलेज  घिसने से हड्डियों मे दर्द बनने लगे वृद्धावस्था में उचित नहीं रहता करण की वृद्धावस्था में कोशिका निर्माण की दर कट जाती है ।  परंतु इतना कम परिश्रम  ना किया जाए की पेशीयां क्षय से गलकर कोशिकाओं की संख्या कम हो जाने से माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या घटकर रक्त उत्सर्ग शर्करा मुक्त होकर रक्त में अति उच्च शर्करा स्टार स्तर बन जाने से मधुमेह व्याधि उत्पन्न होने लगे। दांत छह के बाद कान श्रय दृष्टि  क्षय के बाद नेत्र छय के पश्चात लिवर क्षय किडनी  क्षय के पश्चात मस्तिष्क  क्षय मैं फालिस पड़ना अंगमारी अर्ध शरीर के पश्चात किसी भी समय हृदय आघात कार्डियक फैलियर जैसी अचानकजीवन पूर्ण व्याधि  से बचते हुए जीवन को पूर्ण जातक आयु तक जिया जाए ।

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