पिता से द्वेष करनेवालीे माता से प्रेम करने वाली या किसी से भी प्रेम न करने वाली संतान सदैव अर्ध पक्षीय आधी बात सुनने वाली आधी बात ना सुनने वाली एक पक्षीय दृष्टि -कोण वाल ध्यान से पूरी बात ना सुनने वाली संतान सदैव प्रगतिहीन विकासहीन रहती है ?

जिस घर परिवार में पति-पत्नी में माता-पिता में अक्सर लड़ाई झगड़ा गृह क्लेश विद्वेष रहता है। ऐसे क्लेषित परिवार के बच्चे अपने-अपने हित क्षमता के अनुसार अपने मन के अनुसार पक्षपाती दृष्टिकोण उत्पन्न हो जाने से अक्सर उनके बुद्धिमान बेटा बेटी भी अर्ध पक्षीय या एक पक्षीय मानसिक दृष्टिकोण रखते हुए जीवन के दूसरे गोपनीय दूसरे पक्ष से अनभिज्ञ होने से विकास युक्त प्रगतिशील सोच होने पर  माता भक्ति भाव प्रिय या पिता भक्तिभाव प्रिय  परशुराम या श्रवण- -कुमार बन जाने से अक्सर अपना सम्यक विकास नहीं कर पाते । यह दो आंखों के होते हुए भी एक आंख से देखने वाले काने , दो कानों के होते हुए भी एक कान से आधी अधूरी बात सुनने वाले कलुषित कलेशित दृष्टिकोण बन जाने से अपने जीवन में प्रगति के एक पक्ष में विकास की उच्चतम सीमा तक जाते हैं । परंतु जीवन में दूसरे अज्ञात अदृश्य पक्षों से अपरिचित होने से यह जीरो या हीरो बनते हैं। माता-पिता के भक्त खाड़कू जंगजू दृष्टिकोण के होने से उनके बच्चे अपने-अपने हित के अनुसार पिता में या माता मे अपना हित ढूंढते हुए वह पिता से अनुराग करने वाले पितृ भक्त या माता से अनुराग करने वाले मातृभक्त दृष्टिकोण को अपनाने लगते हैं । ऐसे में उनका प्रेम अनुराग जिस भी माता-पिता पक्ष की ओर होता है वह उसी के गुण अपने अंतर्मन में भरने लगते हैं । जिससे उनका निजी जीवन में द्विपक्षीय से लेकर बहुपक्षीय तक का  सम्यक विकास बाधित होता है उनका विकास द्विपक्षीय बहुपक्षीय ना होने से उनकी समझ सही समय पर सही तरीके से विकसित नहीं हो पाती । उनमें उनमें सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाने की क्षमता विकसित हो पाती है । वे जीवन भर निर्णय  हीन बालक अवस्था में जीवन जीना चाहते हैं। दूसरों की हिकमत दूसरों की सीख के अनुसार दूसरों के विचार, दूसरों की अकल/ समझ के अनुसार जीवन जीना उनकी नियति बन जाती है । द्विपक्षीय उत्थान पतन का समयक ज्ञान न होने पर एक पक्षीय उत्थान प्रिय या एक पक्षीय पतन प्रिय  के समान हो जाती है।
नतीजा माता-पिता की लड़ाई में जो बच्चे पिता से द्वेष रखते हैं माता से प्रेम करते हैं या दोनों से द्वेष रखते हैं । ऐसे अर्ध पक्षीय दृष्टिकोण वाले या एक पक्षीय दृष्टिकोण वाले बच्चे , बैरागी किसी से भी प्रेम ना करने वाले  या स्वार्थी मतलबी पक्षपाती बच्चे जीवन के दूसरे अदृश्य आवश्यक पक्ष का ज्ञान करना भी अपने लिए उचित नहीं समझते , यह अपने जीवन को कम से कम ज्ञान / कम से कम परिश्रम के सहारे जीने की फिराक में रहते हैं अपने जीवन मे कभी प्रगति नहीं कर पाते हैं । 
बच्चे और बच्चियों के सम्यक विकास के लिए माता-पिता के बीच आपसी समझ अंतर्बूझ अंतर्दृष्टि सूझ होनी का अनुमान लगा लेने का कला विज्ञान का ज्ञान  का होना आवश्यक है। बच्चों के सम्यक विकास के लिए यह जरूरी है  कि माता-पिता बच्चों के सामने लड़ाई झगड़ा ना करें बच्चों से अपने मन के अंतर्भेद साझा ना करें अपने मन के अंतर् भेद होने पर भी बच्चों से उनकी राय ना ले, बच्चों से सलाह ना ले कि तुम मेरे हो या अपने पापा के हो या तुम मेरे हो या अपनी मम्मी के हो । बच्चों से ऐसी बातें करना  असुरक्षा वाली मानसिक स्थिति की माता की मानसिक व्यथा की पहचान है ।  बच्चों से ऐसी बातें करना उनके मन में दूसरे पक्ष के प्रति माता या पिता के प्रति वैराग्य वैर वैमनस्य जैसी दुर्भावना उत्पन्न कर देता है ।
    अक्सर अशिक्षित अल्प शिक्षित भ्रम पूर्ण शिक्षित या विपरीतमति परिणाम वाली गुंण धर्म-कर्म की विजातीय विदेशी संस्कृति से शिक्षित माता-पिता में असुरक्षा की भावनाओं से प्रभावित माताएं अपने बच्चों मैं अपना भविष्यफल को सुरक्षित देखते हुए अपने बच्चों से पूछ पूछ कर उनमें अपने पिता के प्रति वैर वैमनस्य भाव उत्पन्न करके भरकर उनको एक पक्षीय दृष्टिकोण वाला अंजाने में बना देती है । इससे वह अपने लिए हितकारी दूसरे के लिए शत्रुता पूर्णभाव रखने वाला पक्षपाती संतान बना देती है । ऐसे एक पक्षीय रुचि अभिरुचि दृष्टिकोण  वाले बच्चे अपने जीवन में वांछित प्रगति नहीं कर पाते हैं।
       अब इसके विपरीत जो बच्चे अपने माता-पिता दोनों से सामान प्रेम करते हैं दोनों में समान अनुराग रखते हैं दोनों को समान सहयोग करते हैं। किसी एक माता या पिता पक्ष को सुनकर अनसुना नहीं करते । अपने पिता की माता की बातों को ध्यान से सुनते हैं। अपने पिता माता की आज्ञा का सामान पालन करते हैं ऐसे सहयोगी मिलनसार बच्चे अपने जीवन में अधिकतम विकास और प्रगति करते हैं।
    मैं कहता हूं लड़ाई में, भोजन में, प्रेम संबंध में  असाधारण मजा है इसलिए लड़ाई लड़ना जरूर सीखिए । लड़ाई युद्ध विद्या की ओर से अशिक्षित मत रहिए  । परंतु लड़ाई  भोजन और प्रेम-संबंध जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है इसलिए लड़ाई के पात्र शत्रु पर प्रेम और कृपादृष्टि और संदेह रखते हुए जागरूक रहकर अपने जीवन को जीना सीखिए ।  वह आपका शत्रु दृष्टिकोण वाला व्यक्ति आपको भविष्य में समय-समय पर परेशान करता रहेगा आपका बुरा सोचता रहेगा अवसर मिलते ही आपका बुरा करता रहेगा । लड़ाई हमेशा निर्बल शत्रु से करना सीखिए बलवान शत्रु से लड़ाई करने का जोखिम मत लीजिए बलराम शत्रु लड़ाई के दौरान लड़ाई के बाद भी आपकी अकल नस्ल सकल सुख समृद्धि सब कुछ बिगाड़ सकता है। लड़ाई लड़ते समय लड़ाई की सीमा रेखा पर नजर जरूर रखिए इसे शास्त्रों में मर्यादा कहा गया है। लड़ाई किससे करनी है कब तक लड़नी है किस समय तक लड़नी है इस सब का विवेक लड़ाई के योद्धा को होना बहुत जरूरी होता है। लड़ाई लड़िए सोच समझ कर लड़िए । अपने से लड़ाई लड़ना समझदार नहीं मूर्ख की पहचान है जिसे अपने भावी जीवन मैं जीवन जीने के लिए निजी जीवन हित का ज्ञान नहीं है ।
    अक्सर हम बच्चे को उसके बालनकाल में सर्वप्रथम लड़ने के लिए उसे उकसाते हैं सीखाते हैं मार -भैया- मार इस लाइन से बच्चा यह सीख जाता है कि उसे जीवन भर दूसरों को मारते पीटते रहना है। नतीजा इसका यह आता है कि निम्न स्तरीय परिवार के बच्चों में बच्चों में क्रुरता और दुष्कर्म दुष्टतापूर्ण जीवन पद्धति जीने के दौरान  उसे सदैव अकारण अचानक अनावश्यक रूप से दूसरों का विरोध करना दूसरों की चाल रोकना अपनी गलत बात को भी सही सिद्ध करना जैसा स्वयं अपने अपनों के लिए भी शत्रुता पूर्ण दृष्टिकोण भाव वाला बना देता है । जिसका बुरा नतीजा यह आता है कि वह अपनों से ही लड़ना अपनों से ही संघर्ष करना सीख जाता है उसका जीवन अपनों से लड़ते जूझते रहने में व्यतीत होता है । ऐसे में उसके लिए दुश्मनों की फौज उसके अपने पारिवारिक समाजिक लोग ही बन जाते हैं । जिसका नतीजा यह आता है की जो व्यक्ति युद्ध विद्या में पारंगत होता है जीवन भर दूसरों से संघर्ष लडाई युद्ध में जीतता रहता है । वह अपने लड़ाकू खड़कू स्वभाव से अपनी लड़ाई अपनों से लड़ता हुआ जीवन के अंत विकासवान प्रगतिशील होते हुए भी अपनी संतान के प्रगतिहीन विकासहीनता से हारा हुआ प्रमाणित हो जाता है।

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