समलैंगिकता से अभिप्राय है अपने समान लिंग वाले अपने समान जैविक जाति वाले जीव की ओर आकर्षित होकर उससे यौनिक संबंध बनाना या यौन संबंध बनाने का प्रयास करना या यौन संबंध बनाने की मानसिकता रखते हुए उस स्व समान लिंगी प्राणी से भविष्य में यौन संबंध बनाने की कामना/इच्छा रखना , सपने देखना । प्रायतः प्रकृति में सभी प्राणियों में ऐसा अद्भुत विचार कर्म नहीं मिलता विशेष रूप से पशु बुद्धि प्राणियों ,परन्तु वे प्राणी जिनका बौद्धिक विकास अधिक तम होचुका है ,विशेष कर मनुष्य में यह कुत्सित प्रवृत्ति पाई जाती रही है पुरातनकाल से । इस कुत्सित प्रथा /कुत्ता रिवाज का ब्यौरा सभी संस्कृति साहित्यिक पत्रिकाओं, पुस्तकों में मिलता है ।
योगवशिष्ठ ग्रंथ में कुम्भ ऋषि का बर्णन है कि वो दिन में पुरुष रूप में रहते थे ,रात्रि में स्त्री रूप में बदल जाते थे और समर्थ पुरुषों से स्त्रियोचित व्यवहार करते हुए यौनाचार क्रियाएँ करते थे ,रात्रि पश्चात अगले दिन में वह सामान्य पुरुषों के जैसा व्यवहार करने लगते थे ।
प्रकृति में यह गुण असामान्य रुप में स्तनधारी वर्ग में यूथीरिया उपवर्ग में बुद्धिमान प्राणी टंक /आर्डर कार्निवोरा /माँसाहारी ,तथा प्राईमेटस /बुद्धि धारी ओं के नरों में पाया जाता है । कुत्ता, बंदर, बकरा , साँड ,भैंसा ,ऐसा अमान्य कर्म करते कभी कभार कहीं नजर आ जा ते हैं यदि उन्हें उनकी मादा जीव उचित समय पर उपलब्ध नहीं है तो वे असामान्य परिस्थितियों में आपस में ऐसा विचित्र कौतूहलिक कर्म करते हैं , कभी कभी वे विजातीय दूसरी जाति के जीव ओं से भी बलपूर्वक संबंध बनाने का प्रयास किया करते हैं।
ऐसे परिणाम हीन/फलहीन निर्थक कर्म को मित्थया मैथुन कहा जाता है जिसमें नर जीव स्वजातीय नरों से या विजातीय नर/मादा ओं से बल पूर्वक मैथुन कर्म करता है परंतु उसे मैथुन /प्रज्या कर्म का संतान वृद्धि, जाति वृद्धि का सार्थक परिणाम नहीं आता ।जिससे वह नर वंश वृद्धि न होने से वंश हीनता ,जाति वृद्धि न होने से जाति हीनता को प्राप्त होता है ।
अब बात समलैंगिकता के रोग /बिमारी /व्याधि की ःः
पहले चर्चा रोग की जैसा कि रोग शब्द से स्पष्ट होता है रोग शब्द से निकल ता है ,रोने का गुण जो जीव में पैदा होता है उसकी असमर्थता से जब उसकी निजी जीवन क्षमता .जैविक क्षमता में कमी हो जाती है जीवन जीने में विवश होने लगता है।
यदि जीव अकेला है पशु है बुद्धि हीन है तब उस पर इस परिणाम हीन निर्थक फल हीन मित्थया मिथुन कर्म का को उतना प्रभाव नहीं पड़ता ।परन्तु यदि वह समूह में रहता है सामूहिकता नियम पालन करता है तो उससे प्रभावित मनुष्य उसकी पत्नी उसका परिवार जो उससे अपनी अपनी आकाक्षाओं को रखते हैं उसके माता पिता भाई बहनों के मन पर सामाजिक प्रतिष्ठा ओं पर बुरा/दुष्प्रभाव पड़ता है ।पत्नी पर विशेष रूप से ।उसकी जीवन इच्छा एं त्रासित पीड़ित होती हैं ।
इस प्रकृति में सजीव निर्जीव में अंतर केवल रिप्रोडक्शन अपनी प्रति का निर्माण आप करना यह क्षमता केवल सजीव जगत जीवों में पायी जाती है इसे प्रज्या कर्म कहते हैं जिससे सभी जीव पैदा होते मरते रहते हैं पर उनकी जाति अमर रहती है यदि वे नियमित रूप से प्रज्या कर्म से अपनी संतान उत्पन्न करने में लगे रहे तब तक उनकी जाति वंश अमर है । यदि नर समलैंगिकता की ओर आकर्षित होने लगते हैं तो उनकी पूरक अपूर्ण मादाएं/नारियां त्रासित होने लगती हैं ।नर को नारी की ,नारी को नर की योनिक तृप्ति इच्छा मित्थया भक्षण का नियम स्यूडोकैनाबोलिज्म प्रकृति का नियम है दो जीवों के एक दूसरे को मित्थया भक्षण कर्म मंद नियंत्रित हिंसा कर्म से तीसरे नये जीव का निर्माण सृष्टि का शाश्वत नियम है जिसमें दो जीव नर नारी मिलकर एक तीसरे नये जीव का निर्माण करते हैं (वृहद अरन्यक उपनिषद में गुप्त विस्तार से )
यदि नारी / मादा जीवों को उनकी इच्छा के अनुसार प्रज्या कर्म संतान उत्पन्न करने में बाधा डलती है व्यावधान /रुकावट पैदा करने का काम किया जाता है तो वे व्यथित दुखी होकर चीखने चिल्लाने, विलाप करने लगती हैं जिसे हूक,हूकरी हुक्की विलाप /रूदन या करूण क्रंदन कहा जाता है । इसे प्रज्या जनन काल में मादा कुतिया ,गाय ,भैंस की हुक्की आवाज से कुत्ता, साँड ,भैंसों को आमंत्रित करना कहते हैं ,कि वो आयेंं और अपनी पत्नी ओं से मिलकर प्रज्या कर्म में सहयोग करें । यदि नर समलैंगिकता की ओर आकर्षित होने लगता है, तो उसकी पूरक अर्धांगिनी को रोने का रोग हुक्की विलाप करूण क्रंदन का रोग पैदा हो जाता है ।
समलैंगिकता एक रोग है जिसमें नारी के समलैंगिक संबंधों का नर के मन पर वही प्रभाव पड़ता है नारी के नर वैराग्य व्यवहार से नर नारी के द्वारा नर में रूचि नहीं रखने से नर उस ठंडी षंढी नारी को छोड़कर गर्म उत्तेजक वृष्या अभिसारिका नारी की ओर आकर्षित होने लगता है । तब वह समलैंगिकता प्रिय नारी नर पर बदचलनी का आरोप लगाकर अपनी किशमत का रोना रोने लगती है क्योंकि अब उसके सामने अपने भरण पोषण, श्रृंगार सौभाग्य संकट सम्मान समस्या उत्पन्न हो गई होती है ।
अब चर्चा बिमारी की ःः
बीमारी का अर्थ है ऐसा छिपा हुआ कारक रोग जो आपको छिपे छिपे मार रहा है और दिखाई नहीं दे रहा है ।समलैंगिक विवाह संबंध ओं में भी ऐसा ही होता है ,समलैंगिक विवाह से मिथुन कर्म निरंतर करते रहने पर भी संतान उत्पन्न नहीं होती है ।नारी के नारी निरंतर सानिध्य से या नर के नर से निरंतर सान्निध्य में रहने मित्थया मिथुन कर्म से संतान पैदा नहीं होती है ःः
धीरे धीरे काल चक्र के प्रभाव से वे समलैंगिक शादी शुदा युगल जब बूढ़े हो ने लगते हैं ।तब उन को बुढ़ापे में आने से पूर्व अधेड़ उम्र में अल्पशक्ति अनुभव होने पर दीर्घकालिक सेवा दार की कमी महसूस होती है और वे संतान के विकल्पों पर सोच ना शुरू कर ते हैं अब वह समलैंगिक प्राणी विषम लैंगिक ता की ओर आने लगते हैं ।संतान उत्पत्ति की युवा वस्था में भूल सुधार के लिए
सिंग्ल पेरैंट्स सिस्टम एक माँ बिना वैध बाप के बच्चा ,एक बाप बिना वैध माँ के संतान
की ओर चलने लगते हैं ःः
बिना वैध विधिवत विधान के संतति उत्पत्ति से करते हैं उस अबोध आत्मा के साथ क्रूर मजाक जिसे पैदा होते ही समर्थ होने पर कर्ण के जैसा सामाजिक उपहास झेलने पड़ते हैं ।जबकि कर्ण की माता कुंती से अवैध संतान उत्पत्ति अपराध अज्ञान ता से हुआ था । शेष ह बाद मेंं लिखूँगा ।टिप्पणी से जोड़ कर