क्या समलैंगिकता एक बीमारी है?

समलैंगिकता से अभिप्राय है अपने समान लिंग वाले अपने समान जैविक जाति वाले जीव की ओर आकर्षित होकर उससे यौनिक संबंध बनाना या यौन संबंध बनाने का प्रयास करना या यौन संबंध बनाने की मानसिकता रखते हुए उस स्व समान लिंगी प्राणी से भविष्य में यौन संबंध बनाने की कामना/इच्छा रखना , सपने देखना । प्रायतः प्रकृति में सभी प्राणियों में ऐसा अद्भुत विचार कर्म नहीं मिलता विशेष रूप से पशु बुद्धि प्राणियों ,परन्तु वे प्राणी जिनका बौद्धिक विकास अधिक तम होचुका है ,विशेष कर मनुष्य में यह कुत्सित प्रवृत्ति पाई जाती रही है पुरातनकाल से । इस कुत्सित प्रथा /कुत्ता रिवाज का ब्यौरा सभी संस्कृति साहित्यिक पत्रिकाओं, पुस्तकों में मिलता है ।
योगवशिष्ठ ग्रंथ में कुम्भ ऋषि का बर्णन है कि वो दिन में पुरुष रूप में रहते थे ,रात्रि में स्त्री रूप में बदल जाते थे और समर्थ पुरुषों से स्त्रियोचित व्यवहार करते हुए यौनाचार क्रियाएँ करते थे ,रात्रि पश्चात अगले दिन में वह सामान्य पुरुषों के जैसा व्यवहार करने लगते थे ।
प्रकृति में यह गुण असामान्य रुप में स्तनधारी वर्ग में यूथीरिया उपवर्ग में बुद्धिमान प्राणी टंक /आर्डर कार्निवोरा /माँसाहारी ,तथा प्राईमेटस /बुद्धि धारी ओं के नरों में पाया जाता है । कुत्ता, बंदर, बकरा , साँड ,भैंसा ,ऐसा अमान्य कर्म करते कभी कभार कहीं नजर आ जा ते हैं यदि उन्हें उनकी मादा जीव उचित समय पर उपलब्ध नहीं है तो वे असामान्य परिस्थितियों में आपस में ऐसा विचित्र कौतूहलिक कर्म करते हैं , कभी कभी वे विजातीय दूसरी जाति के जीव ओं से भी बलपूर्वक संबंध बनाने का प्रयास किया करते हैं।
ऐसे परिणाम हीन/फलहीन निर्थक कर्म को मित्थया मैथुन कहा जाता है जिसमें नर जीव स्वजातीय नरों से या विजातीय नर/मादा ओं से बल पूर्वक मैथुन कर्म करता है परंतु उसे मैथुन /प्रज्या कर्म का संतान वृद्धि, जाति वृद्धि का सार्थक परिणाम नहीं आता ।जिससे वह नर वंश वृद्धि न होने से वंश हीनता ,जाति वृद्धि न होने से जाति हीनता को प्राप्त होता है ।
अब बात समलैंगिकता के रोग /बिमारी /व्याधि की ःः
पहले चर्चा रोग की जैसा कि रोग शब्द से स्पष्ट होता है रोग शब्द से निकल ता है ,रोने का गुण जो जीव में पैदा होता है उसकी असमर्थता से जब उसकी निजी जीवन क्षमता .जैविक क्षमता में कमी हो जाती है जीवन जीने में विवश होने लगता है।
यदि जीव अकेला है पशु है बुद्धि हीन है तब उस पर इस परिणाम हीन निर्थक फल हीन मित्थया मिथुन कर्म का को उतना प्रभाव नहीं पड़ता ।परन्तु यदि वह समूह में रहता है सामूहिकता नियम पालन करता है तो उससे प्रभावित मनुष्य उसकी पत्नी उसका परिवार जो उससे अपनी अपनी आकाक्षाओं को रखते हैं उसके माता पिता भाई बहनों के मन पर सामाजिक प्रतिष्ठा ओं पर बुरा/दुष्प्रभाव पड़ता है ।पत्नी पर विशेष रूप से ।उसकी जीवन इच्छा एं त्रासित पीड़ित होती हैं ।
इस प्रकृति में सजीव निर्जीव में अंतर केवल रिप्रोडक्शन अपनी प्रति का निर्माण आप करना यह क्षमता केवल सजीव जगत जीवों में पायी जाती है इसे प्रज्या कर्म कहते हैं जिससे सभी जीव पैदा होते मरते रहते हैं पर उनकी जाति अमर रहती है यदि वे नियमित रूप से प्रज्या कर्म से अपनी संतान उत्पन्न करने में लगे रहे तब तक उनकी जाति वंश अमर है । यदि नर समलैंगिकता की ओर आकर्षित होने लगते हैं तो उनकी पूरक अपूर्ण मादाएं/नारियां त्रासित होने लगती हैं ।नर को नारी की ,नारी को नर की योनिक तृप्ति इच्छा मित्थया भक्षण का नियम स्यूडोकैनाबोलिज्म प्रकृति का नियम है दो जीवों के एक दूसरे को मित्थया भक्षण कर्म मंद नियंत्रित हिंसा कर्म से तीसरे नये जीव का निर्माण सृष्टि का शाश्वत नियम है जिसमें दो जीव नर नारी मिलकर एक तीसरे नये जीव का निर्माण करते हैं (वृहद अरन्यक उपनिषद में गुप्त विस्तार से )
यदि नारी / मादा जीवों को उनकी इच्छा के अनुसार प्रज्या कर्म संतान उत्पन्न करने में बाधा डलती है व्यावधान /रुकावट पैदा करने का काम किया जाता है तो वे व्यथित दुखी होकर चीखने चिल्लाने, विलाप करने लगती हैं जिसे हूक,हूकरी हुक्की विलाप /रूदन या करूण क्रंदन कहा जाता है । इसे प्रज्या जनन काल में मादा कुतिया ,गाय ,भैंस की हुक्की आवाज से कुत्ता, साँड ,भैंसों को आमंत्रित करना कहते हैं ,कि वो आयेंं और अपनी पत्नी ओं से मिलकर प्रज्या कर्म में सहयोग करें । यदि नर समलैंगिकता की ओर आकर्षित होने लगता है, तो उसकी पूरक अर्धांगिनी को रोने का रोग हुक्की विलाप करूण क्रंदन का रोग पैदा हो जाता है ।
समलैंगिकता एक रोग है जिसमें नारी के समलैंगिक संबंधों का नर के मन पर वही प्रभाव पड़ता है नारी के नर वैराग्य व्यवहार से नर नारी के द्वारा नर में रूचि नहीं रखने से नर उस ठंडी षंढी नारी को छोड़कर गर्म उत्तेजक वृष्या अभिसारिका नारी की ओर आकर्षित होने लगता है । तब वह समलैंगिकता प्रिय नारी नर पर बदचलनी का आरोप लगाकर अपनी किशमत का रोना रोने लगती है क्योंकि अब उसके सामने अपने भरण पोषण, श्रृंगार सौभाग्य संकट सम्मान समस्या उत्पन्न हो गई होती है ।
अब चर्चा बिमारी की ःः
बीमारी का अर्थ है ऐसा छिपा हुआ कारक रोग जो आपको छिपे छिपे मार रहा है और दिखाई नहीं दे रहा है ।समलैंगिक विवाह संबंध ओं में भी ऐसा ही होता है ,समलैंगिक विवाह से मिथुन कर्म निरंतर करते रहने पर भी संतान उत्पन्न नहीं होती है ।नारी के नारी निरंतर सानिध्य से या नर के नर से निरंतर सान्निध्य में रहने मित्थया मिथुन कर्म से संतान पैदा नहीं होती है ःः
धीरे धीरे काल चक्र के प्रभाव से वे समलैंगिक शादी शुदा युगल जब बूढ़े हो ने लगते हैं ।तब उन को बुढ़ापे में आने से पूर्व अधेड़ उम्र में अल्पशक्ति अनुभव होने पर दीर्घकालिक सेवा दार की कमी महसूस होती है और वे संतान के विकल्पों पर सोच ना शुरू कर ते हैं अब वह समलैंगिक प्राणी विषम लैंगिक ता की ओर आने लगते हैं ।संतान उत्पत्ति की युवा वस्था में भूल सुधार के लिए
सिंग्ल पेरैंट्स सिस्टम एक माँ बिना वैध बाप के बच्चा ,एक बाप बिना वैध माँ के संतान
की ओर चलने लगते हैं ःः
बिना वैध विधिवत विधान के संतति उत्पत्ति से करते हैं उस अबोध आत्मा के साथ क्रूर मजाक जिसे पैदा होते ही समर्थ होने पर कर्ण के जैसा सामाजिक उपहास झेलने पड़ते हैं ।जबकि कर्ण की माता कुंती से अवैध संतान उत्पत्ति अपराध अज्ञान ता से हुआ था । शेष ह बाद मेंं लिखूँगा ।टिप्पणी से जोड़ कर

भारत में cancer रोगियों की संख्या दिनों दिन क्यूँ बढ़ती जा रही है इसके निदान के लिये आप क्या सलाह देंगे ?

विटामिन बी 17 अमिडगैलिन को नैट से अध्ययन करें
जिन खाद्य पदार्थों में पाया जाता है उनको भोजनम् में शामिल किया जाय ।
अपने दिमाग /मन को बज्र बुद्धि न बनने दिया जाय ।उसमें अपने विचार कर्म चित्राँकन संचालन कर्ता अपने चित्रगुप्त को सक्रिय किया जाय जो दूसरे लोगों के विचारों के संग्रह से विक्षिप्त अवस्था में नवीनतम निर्णय क्षमता से हीन होचुका ह ।जो नये निर्णय नहीं ले पा रहा है ।दूसरे लोगों के द्वारा दिये अनावश्यक काम तनाव से बचें ।कैंसर अति तनाव की अवस्था लम्बी चलते हुए होता है ।
अपने दिमाग को लचीला बना कर अपने दिमाग के अमिडगैला क्षेत्र को सक्रिय किया जाय ।मन को तनाव से मुक्त करने के लिए भाव अतीत ध्यान प्रक्रिया द्वारा मन में छिपे हानिकारक विचारों को किसी श्रेष्ठ गुरु के निर्देश न में निकाल कर समाप्त किया जाय जो मनोवैज्ञानिक हो ,उत्तम बुद्धि का हो ,मनोरोगी को लम्बे समय तक बिमार बना कर चिकित्सा करनेवाले ओं में न हो ।
भोजन में गीता ग्रंथ निर्धारित सातविक भोजन किया जाय जिसमें जैविक अंश की प्रचुर ता ह ,राजसी परिवर्तित स्वाद का भोजन कम से कम ,तामसिक भोजन विकृत स्वाद ,भ्यंकर स्वाद वाले चाईनीज भोजन से बचा जाय ।
जैसा तन वैसा मन या फिर इसे यूँ भु कहते हैं जैसा मन होगा वैसा तन होगा , इस नियम को मैंने स्वयं पर आजमाया हैं ।
कैंसर कोई रोग नहीं है जो सूक्ष्म जीव जगत के जीव वायरस बैक्टीरिया से फैलता है ःः।यह अपने ही दिमाग के अल्पनियंत्रित्र होने से शरीर पर से पूरी तरह से नियंत्रिण न कर पाने की एक मानसिक विकृति है जो स्वयं को दूसरों के अनुसार अपने को नियंत्रित होने देते हैं अति आदर्श बनने के फेर में या फिर स्वयं ही स्वयं पर से नियंत्रण छोड़ ने लगते हैं मन पर से अपना नियंत्रण हटा कर । ये दिमाग के एक पक्ष का अत्यधिक उपयोग किया करते हैं । अतिपोजिटिव पुरुषोचित या अति निगेटिव मानसिक ता वाले अर्थात ये यूनिपोलर माईंड लोग हौते हैं इनके दिमाग के दोनों भाग दाया / बायाँ सम समान कार्य नहीं करते ।इनमें मानसिक स्वयं के विचार का स्वयं प्रतिरोध क्षणिक करने की क्षमता नहीं होती जिससे एक मस्तिष्क के विचार उद्भव ठीक से न होने पर इनके मन में असंख्य विकृत मनो विकारी ग्रंथि याँ उत्पन्न होती जाती हैं ,इन विकृत मनोविकारी ग्रंथियों के प्रभाव से शरीर नियंत्रण केंद्र हाईपोथैलामस की मस्तिष्क को सक्रिय रखने की सिग्नल व्यवस्था गड़बड़ हो जाती है । जिससे शरीर में जगह जगह जैविक प्रक्रियाओं के विषाक्त मैटाबोलाईट का समुचित सफाया नहीं हो पाती ।जिससे भोजन के द्वारा शरीर में आए विष कण इन विषैले मैटाबोलाईट ओं में जुड़कर शरीर की विषाक्ता को बढ़ाते जाते हैं जिन्हें सीमित नियंत्रित करने के प्रयास में शरीर में जहरीली कोशिकाएं बनने लगती हैं । इनको कैंसर कोशिकाएं कहते हैं ।ये कैंसर कोशिकाएं तभी तक सक्रिय रहती हैं जब तक शरीर नियंता सूक्ष्म शरीर निर्माता आत्मा / प्राण सम्यक रुप में सक्रिय नहीं होता । प्राण के सम्यक रुप से सक्रिय होते ही ये कैंसर कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं । जिससे कैंसर ठीक हो जाता है पर अपनी मानसिक शक्ति के बढऩे से परन्तु सात्विकता के सिद्धांत को अपनाने पर ।
यह था कैंसर का संक्षिप्त एक पक्षिय मात्र वैचारिक विवेचन
अब भोजन पक्ष विवेचन इसमें भोजन के प्रोटीन विटामिन बी 1–12, और बी 17 ,विटामिन सी शरीर के शोधन को आवश्यक है ।
आयुर्वेदिक औषधि हरण , आँवला का सेवन जरूरी है हरण शरीर में छिपे विषैले पदार्थों को मल के साथ बाहर करके शरीर का शोधन करता है ,आँवल विष को भोजन में से शरीर में नहीं चढने देता । कृपया विष मिला कर भोजन करने के बाद आँवले की परीक्षा का दूस्साहस न करें ,मेरा मतलब आजकल के उस विष से है जिसे हम प्लास्टिक वस्तुओं से तरह तरह के बजारु रंगीय भोजन में खारहे है तरह तरह के कृत्रिम स्वाद में खा रहे हैं

ओशो रजनीश के बारे मे क्या जानते हैं जो कोई दूसरा नहीं जानता?


मैं कभी भी ओशो के ,आश्रम के, शिष्यों के ,सानिध्य में नहीं रहा ।जो भी जानकारी धारण एं हैं वह पत्रिकाओं, साहित्यिक अध्ययन पर आधारित हैं कि ःःःःःः
कि एक भारतवर्ष में भी सुकरात पैदा हुआ जिसने भारतीयों लोगों को ज्ञान को ज्यों का त्यों ग्रहण करने के बजाय ज्ञान का भी विवेचन शोधन दर्शन कला कर्म सिखाया ।
मैं धन्यवाद देता हूँ ओशो को जिसके साहित्य को पढ़कर मुझे सोचने बोलने लिखने की समझ पैदा हुई ।

ऐसी छोटी छोटी चीज़ें क्या हैं जिनसे वज़न कम करके एक बड़ा बदलाव लाया जा सकता है?



वजन कम करने का सिर्फ एक ही सही प्रमाणिक तरीका है जीवो के शरीर में भी कोशिश की ऊर्जा उत्पादन ईकाई माईट्रोकोन्डिया की संख्या ओं की जानकारी और उन माईट्रोकोन्डिया के आक्सीकरण क्रियान्वयन के पैटर्न की सम्यक जानकारी ःःसंक्षेप में यह जानकारी नैट ज्ञान से आधारित है और मेरा अनुभव शामिल है मैं इसका अनुमोदन /स्वीकृत करता हूँ
माईट्रोकोन्डिया की संख्या लीवर सैल मै1000–2000, हृदय सैल में 5000–6000तक तथा मस्तिष्क कोशिश न्यूरॉन में 10000–50000 तक होती है यह संख्या स्थिर स्थाई नहीं है समय आयु कार्य आवश्यकता लिंग आदि कारकों के अनुसार बदलती रहती है । माईट्रोकोन्डिया सदैव संतान में उसकी माता से आते हैं । मनुष्य में पिता के माईट्रोकोन्डिया कभी भी नहीं आते कारण कि पिता के माईट्रोकोन्डिया उसके मिलन युग्मक/शुक्राणुओं की पूँछ में रहते हैं जो स्त्री युग्मक अण्डाणु से निषेचन /पूर्ण मिलन प्रक्रिया में अण्डाणु के नाभिक/केंद्र में नहीं प्रवेश कर पाते । पूँछ टूट कर अण्डाणु कोशिका से बाहर रह जाती है ।जिससे बच्चों का जैविक ऊर्जा संचालन ,नियंत्रण , जैविक निजी ऊर्जा स्तर उनकी माँ के समान होता है । इससे कहा जाता है कि बच्चों की सेहत ,स्वास्थ्य उनकी माँ से ड्राफ्ट होता है । सेहत का उत्तर दायी घटक माईट्रोकोन्डिया उनकी माँ से आता है ।
माईट्रोकोन्डिया में ही भोजन का पूर्ण आकसीकरण /दहन होता है ,जिससे जीव / बच्चों की जीवन जैविक क्रियाएं संचालित होती हैं ।ऊर्जा उत्पादन होता है । ग्लूकोज और फैट के आक्सीकरण /दहन से ।
भोजन के अनुसार यदि मानसिक शारीरक श्रम /कार्य किया जाता है ।तो वजन के बढ़ने की सम्भावना बिल्कुल भी नहीं है ।
वजन तब बढ़ता है जब खाये गये भोजन की कैलोरी मात्रा के अनुसार श्रम कैलोरी ऊर्जा व्यय नहीं की जाती है ।
यदि पौष्टिक भोजन में वसा ,फैट ज्यादा लेते हैं और शारीरिक श्रम उतना नहीं करते हैं वसा के प्रमाण के अनुसार तो वसामें आयी अतिरिक्त कैलोरी ऊर्जा शरीर में वसा/फैट में बदल कर शरीर का वजन बढा देती है । यदि काम/श्रम ज्यादा है भोजन में कारबोहाइड्रेट, वसा कम परिमाण में ली जाती है तो शरीर की रिजर्व संचित वसा जलकर शरीर का वजन घट जाता है ।
इसके अलावा शरीर में कारबोहाइड्रेट के अधिक सेवन/खाने से कारबोहाइड्रेट भी वसा में बदल जाता है जिस कारण चावल शुगर खाने से भी वजन बढ़ता है ।
अंतर सिर्फ इतना है कि कारबोहाइड्रेट से बनी बसा लचीली होने से वह आसानी से आक्सीकरण प्रक्रिया में जाकर शीघ्रता से जलकर जल्दी ऊर्जा देती है उतनी हानिकारक नहीं होती है जबकि जन्तु वसा घी चर्बी कठोर होती है । पादप वसा तेल की तुलना में , जिसके सेवन से कालेस्ट्राल सम्बंधित समस्या एं उत्पन्न होती है ।
अब यदि वजन घटाने में आप ज्यादा जागरुक हैं तो खाने के आईटम भोजन घटको का ज्यादा विशलेषण विवेचना करने की आवश्यकता नहीं है ।
जरुरत है ब्रैन माईट्रोकोन्डिया की अधिक संख्या देखते हुए ज्यादा से ज्यादा मानसिक श्रम करना सक्रिय रहना पढ़ाई लिखाई चित्रकारी वार्ता (बात चीत ) आदि बौद्धिक कार्य करना या फिर कठिन से कठिन अधिक तम परिश्रम करना । अपने को सक्रिय रखना , न्यूनतम जरूरी निद्रा लेना । गोपनीय कार्य करते रहने से शरीर के वजन बढ़ने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है ।
वजन उनका बढ़ता है जो न शरीर से श्रम /मेहनत करते हैं । न दिमाग को मेहनत करते देते हैं ,न चिंता करते हैं न चिंतन और न होते हैं चिंतित कैसी भी विषम विपरीत परिस्थितियों के पैदा होने पर भी ,जीते हैं अपने जीवन को बेफिक्र ई से ।

क्या आप मांगलिक कुंडली के बारे में जानकारी दे सकते हैं?

मंगल दोष जन्म कुंडली के 1, 4 ,8 ,12 वें भाग में अशुभ युति क्रूर भयंकर ग्रहों के सानिध्य से उत्पन्न होता है । जैसे 1 शनि 2 राहु 3 वरुण ,4 यम के सान्निध्य से निकटता से द्रष्टि से ।
यदि युति सानिध्य श्रेष्ठ ग्रह बृहस्पति, शुक्र, चंद्रमा मंगल के साथ में है तो मंगल दोष का प्रभाव क्रम शः घटता जा ता है
मंगल दोष तब अनुवांशिक होजाता है जब माता पिता दोनों मंगल दोष से ग्रस्त होते हैं तब मंगल दोष उनकी संतान में स्थानांतरित हो जाता है ईसे व्यर्थ मित्थया न समझेंं यह वास्तव में होता है । इस पर अमेरिका में 2002–3 में अध्ययन हुआ है । विधवा परित्यक्त आ अपराधी आक्रामक महिलाओं और लड़ाकिया विलेन माईन्ड लोगों पर अध्ययन किया गया , तो पाया कि उनके मस्तक पर v शेप में अतिरिक्त रूप से बाल पाये गये 75%महिलाओं के माथे पर यह v का निशान छोटे या बड़े रूप में पाया गया ,पुरुषों में लड़ाकू अपराधियों के माथे पर 60% से अधिक लोगों में पाया गया था इसे आप नैट पर vidow peak पर देख सकते हैं । वैज्ञानिक विवेचना आप नैट से , स्वयं पढ़ें ।
यदि कुंडली में मंगल 1,4,8,12 वें स्थान पर नहीं है परन्तु माथे पर छोटे या बड़े क्षेत्र में बाल हैं ।कलमची माथा है सामने पार्शव में माथे पर बाल नहीं हैंं । तो पंडित से पत्री कुंडली विवेचना की आवश्यकता नहीं है । जातक झगड़ू ,झगड़ालू ,झगड़े खोरा निकलेगा जिसका मतलब है मंगली या आक्रमण कारी ।
मंगली और मंगल दोष में यह अन्तर है कि मंगली लड़ाकू भिड़ंत -तिया होता है जिसकी अक्सर लड़ाई झगड़े में विजय /जीत होती है । जबकि मंगल दोष वाला पुरुष हो या मंगली स्त्री इनकी सदैव झगड़े में ,लड़ाई में हार /पराजय होती है परंतु इन्हें लड़ने में मजा /आनन्द आता है ,जिससे यह जीवन भर लड़ते हारते रहते हैं ।और लड़ाई की हार से कोई सबक शिक्षा नहीं लेते ।
किससे लड़ना है? कब तक लड़ना है ? कहाँ तक लड़ना है ? लड़ाई में ये लड़ते हुए मंगली दोष वाले कहीं तक ,किसी भी सीमा तक अनितिक क्रूर दुष्ट पन की मानवीय सीमा से परे पशुओं के भी स्तर से नीचे जा सकते हैं .।ज़नूनी ,वहशीपन से आगे ।
मंगल कुंडली में जिस भी स्थान पर भी होता है सिर्फ 3 तीसरे स्थान में अकेले होने पर शुभ होता है ,ऐसे लोग जीवन में सिर्फ जीतने को पैदा होते हैं ,इनकी कभी भी लडाई में हार नहीं होती । परन्तु यदि 3 रे घर में कमजोर ग्रह बुध आजाये तौ यह शुभ मंगल भी भ्रात दोष कृष्ण कुंडली में बदल जाता है ,ऐसे जातक का जीवन जिन्दगी भर अपनो से दूसरों से लडऩे में जाता है उसे मानसिक शांति नहीं मिलती , उसे अकारण असमय में भी अपने हो या पराये सभी लड़ाई का मजा लेने को ढूँढते रहते हैं और वह आजीवन दूसरों के लिए लड़ता ,लड़वाता रहता हुआ लड़ाई में खप जाता है यदि अच्छे सज्जन हितकारी लोगो में रहना नहीं सीखा ,तो उसका जीवन रण भूमि में पूरा होता है ।
शेष विवेचना अपने अनुभव से जातक स्वयं सीखेंगे ।
1 घर में पिता से ,2 में माता से 4 में पड़ोसियों मित्रों ,युगल सहायक ,पति का पत्नी से ,पत्नी का पति से वैर । 5वें में गुरु से 6 में शुक्र से 7 में विस्तार /वृद्धि से 8 वे में यम से यानि स्वयं ही स्वयं का शत्रु आत्महंता 9 शनि विवेक शत्रु अपने शुभ चिंतन कर्ता ओं का बुरा सोचने, करने वाला , 10 वाँ ईन्द्र शत्रु राजा से पंगा लेकर अपना अहित करने वाला शंम्मूक वंशी ,11 वें मे सेवक शत्रु 12वें में कुल शत्रु कुल हंता सिद्ध होता है । अपने झगडालू स्वभाव ,लड़ने की आदत से ।
यह रहा संक्षेप में लेख ःः लोगों में मंगल दोष को लेकर चिंता होती है ,परंतु मंगली दोष से बड़े बड़े भयंकर दोष है जैसे यदि इन 1,4,8,12में चंद्रमा आजाय तब चंद्र दोष से वंश ,कुल ,जाति ,पित्री भावी पीढ़ी दोष से युक्त पुरुष स्त्री जातक चंद्र बल की प्रधानता से भीरु ,स्त्री समान आचरण करने वाला अधिक पुत्रियों वाला ,पुत्रहीन, पुत्रशोक आदि सामाजिक समस्या ओं से ग्रस्त होता है । यदि स्त्री की कुंडली में इन स्थान पर विग्रही अशुभ युति नीच सूर्य आजाये तो स्त्री में सूर्य बल अतिरिक्त बढ़ जाने से सूर्य बली होती है जो भय हीन ,लज्जा हीन ,दुस्साहसी होने से पितर कुल को ,पति कुल को समस्या ओं से ग्रस्त करती रहती है । यदि इन ग्रहों में विग्रही नीच गुरु आजाये तो जातक को सुधारने में श्रेष्ठ से श्रेष्ठ गुरु भी असफल होता है । यदि इन ग्रहों में विग्रही नीच शनि आजाये तो जातक विवेक हीन हो जाता है सही निर्णय नहीं ले पाता जीवन भर , उसकी जिंदगी में उसके अधिकांशतः फैसले /निर्णय गलत होने से वह जीवन भर उचित अवसर चूकने /छोड़ने की महामूर्खता पूर्ण गलती दर गलती करता हुआ जीवन मर अभिशप्त जीवन जीता है ।
ज्योतिष शास्त्र आँकड़ों का साँख्यकि गणित है ,एक सेकेंड की काल त्रुटि हुई और फलित ज्योतिष का परिणाम कुछ का कुछ होता है ,कुंडली तक में बदलाव आता है ।अतः यह विश्वासनीय कम है ।जबकि गुणों का विज्ञान अनुवांशिकी , शरीर मुद्रा ज्ञान बाँडी लैंग्वेज आधुनिक होने से विश्वसनीय हैं ।
पर बुद्धिमानी इसी में है कि यदि अपनी कमी /भूल का पता लग /चल जाय तो ः
सुधार करो अपने स्वभाव में , आदत में सोच मेंं ,व्यवहार में ,कर्म में ,, ।
बदलो अपनी किशमत अपना भाग्य सिर्फ अपने लड़ाकू विचार व्यवहार त्याग /छोड़ कर ,ःःःःखोलो अपने दिमाग के द्वार , स्वागत करो ,स्वीकार करो ,ग्रहण करो नये आधुनिक विचार ।
लिखने वाले ने लिख दिया —विधाता ने , । बाँचने वाले पंडित ने बाँच दिया । सुनने वाले ने समझ लिया ,अब दोष किसी का नहीं ।
होनी होने को बनी ,शिक्षा रोकने को बनी ,इतने पर भी घटना घटित हो तो दोष किसी कि नहीं , विधाता बली है ।
राम राम भाई जी पढ़ने वाले को ..ःः पंडित जी की ।
यह कुंडली बाँचने की विधा है ।

क्या जानवर भी उकता जाते हैं?

हाँ बहुत जल्दी मानव की तुलना में शाकहारी जानवर जल्दी उकता कर अपनी जगह छोड़ कर अन्यत्र जगह जाने की सोचने लगते हैं ।इसका आभास उनके एक जगह स्थित स्थिर खड़े होने के बाद उनके पैर स्थान बदलने से उनके पलायन भावनाओं से स्थान परिवर्तन की मनोवृत्ति का अनुमान लग जाता है माँसाहारी यदि शिकार स्थल पर शिकार की शिकार बनाने की योजना बना रहे हैं तब वो देर तक घंटों तक नहीं उकता ते ,काफी देर तक एक ही शिकार मुद्रा में अपने को संयमित किए हुए रोके रहते हैं ।।शिकार पर आक्रमण करने तक नहीं उकताते ।

भूत हमेशा किसी को नुकसान क्यो पहुंचाते हैं हमने आज तक ये नहीं सुना कि भूत ने किसी कि जानकारी बचाई हो ऐसा क्यों?

यह प्रश्न ही गलत है कि भूत नुकसान पहुंचाते हैं सच यह है कि कुछ भीरु डर्रु ढीढ पंगेबाज दिमाग से खाली विचार हीन आस्थावान लोग जिनका अपने विचार स्रोत अपनी खोपड़ी पर अपना नियंत्रण नहीं होने पर उस खाली खोपड़ी, जिन्दा शरीर में भूत गण आसानी से ऐसे घुस जाते हैं जैसे किसी वीराने में बने मकान हवेलियों में ढीढ उदंड लोग घुस कर रहने लगते हैं ,या फिर लम्बे समय से किसी खाली मकान में साहसी हिम्मत वाले लोग पंगेबाज बहादुर लोग घुस कर रहने लगते हैं, विवाद ग्रसित संपत्ति मकान मेंं दूसरे लोग खाली पन का लाभ उठाकर रहने लगते हैं ।
ऐसे ही जिन लोगों की खोपड़ी में उनके अपने विचार नहीं होते, दूसरों के विचार भरे होते हैं तब ऐसे में उस खोपड़ी में जीनियस लोग ब्रैन वाश करके अपने विचार घुसा देते हैं या फिर उस खाली विचार हीन ,विचार शून्य अवस्था खोपड़ी में दूसरी अशरीरी आत्माएं घुस कर उस नियंत्रण हीन शरीर पर नियंत्रण कर लेती हैं जैसे कमजोर मन तन वाले मनुष्य के घर में दूसरे लोग बलपूर्वक रहने लगते हैं। परंतु यदि उस अपनी खोपड़ी में अपने विचार हैं तो उस भरी खोपड़ी में खाली जगह नहीं होने पर कोई दूसरी आत्मा/भूत नहीं घुस /प्रवेश कर सकता।
मैं आपको अपना निजी होशहवास का अनुभव शेयर कर रहा हूँ आप विश्वास करें ना करें यह आपकी मर्जी पर घटना सच्ची है जो मेरे साथ मेरे परिवार अम्मा पिता जी की मौजूदगी में घटित हुई ।
सन् 1978में 10वीं कक्षा में था सर्दी के मौसम में मैंने अपनीं जिवित भूदेवी चाची की आवाज ऐसे सुनीं जैसे वे घर के बाहरी कमरे दुबारी में भैंस बाँध रही होंं और भैंस ने उन पर हमला करके उन्हें नीचे गिरा कर मार रही हो, जनवरी माह के महीने की शाम का समय था में खाना खा रहा था ।पहले अम्मा ने कहा खाना छोड़ जा अपनी चाची को बचा उसे भैंस ने गिरा दिया है उसे भैंस मार रही है मैं अनसुनी कर खाना खाने में लगा रहा ,फिर पिता जी ने जोर से कहा तेरी चाची भैंस ने निचे गिरा दी है भैंस तेरी चाची को सींग अड़ाकर मार रही है मैं अनसुना कर खाना खाने में डटा रहा तब पिता जीन ने खाना सामने से हटा लिया और कहा जा पहले अपनी चाची को भैंस से बचा फिर खाना खा लेना । मैं परिवार में सबसे बड़ा लम्बे कद काठी का था मुझे भी बिगड़ैल पशु ओं से लड़ने भिड़ने में मजा आता था । मैं खूँटे से बंधे बैल भैंस के सींगों को पकड़ कर उनसे भिडंत करता रहता था ।
मैं रोष मेंं उठा लकड़ी का मोटा सा डंडा लिया और उस अंधेरे कमरे मे लड़ते हुए पशु ओं को हटाने वाली सिंहय आवाज करता हुआ आगे बढ़ने लगा जहाँ से भैंस और चाची की आवाज आ रही थी पिता जी कमरे के द्वार पर खड़े हो गए जिससे मेरा मन बल बढ़े पशु बल घटे ,तभी कमरे से आवाज आनी बंद हो गई ।मैं अंदाज से डंडा घुमाता ,खटकाता अंधेरे में आगे बढ़ता जाता था तब अंदाजन कमरे के अन्तिम स्थान तक गया था । देखा कमरा में कोई नहीं था ।मैं खूब हँसा अपनी मूर्खता पर ,पिता जी के चेहरे का रंग उड़ गया भूत भय से ।उस दिन पशु बाँधने चाची नहीं आयी थी चाचा और चचेहरे भाई पशु भैंस बैल बाँधने आये थे उस कमरे में घटना घटित के बाद में ।अगले दिन बाद में घटना की चाहिए से चर्चा की तब चाची ने कहा— अपनी कदकाठी पर मत इतना इतरा पशु ओं से भिडंत के शौक को छोड़ दे नहीं तो अंजाम भुगतना पड़ेगा तुझे तू भूतलाओं की नजर में आगया है । और सुन मैं तो क्या बड़ी बड़े की भी यदि उस कमरे से ऐसी आवाज आये तो उनको भी बचाने मत जाना तेरे साथ कहीं पर भी धोखा हो सकता है भूतों का ।
मेरा सारा नयी जवानी का जोश ठंडा पड़़ गया ।पशु भिडंत का ख्याल छोड़ मैं मनुष्य ओं से भी बचने/दूर रहने लगा ।सभी अचरज में आ गए मुझे क्या हो गया ,हँसना लड़ना भिड़ना बंद मैं चुप गुम सुम रह कर भूतों के वार की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगता । अब मेरे दिमाग में भूत भय पड़ गया पर मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया । पर अंतर्मन में भूतभय चढ़ चुका था ।
लगभग तीन वर्ष बाद मेरे साथ 19८1 मेंं जब मैं बी.एस.सी. प्रथम सत्र में था मेरे साथ जून माह में शुक्ल पक्ष में फिर भूत दर्शन हुआ चाँदनी रात में अबकी बार भूत नहीं भूतनी थी जिसके बारे में जब परिवार में चर्चा की हुलिया बताया गया तो पता लगा उस औरत की प्रसव पश्चात मौत हो चुकी थी वह अक्सर अपने परिवार वाले को कभी कभी सीमा लाँघने पर परेशान करती थी जिसमें यदि उसके घर वाले चले जायें तो उनको बीमारकर दिया करती थी लेकिन हमसे मैं अम्मा पिता जी मेरा छोटा भाई से कुछ नहीं कहती थी । उसके इस मर्यादा शील व्यवहार पर सभी को आश्चर्य होता था ।मृत्यु बाद भी वह हमारे परिवार के प्रति दयालु थी क्योंकि हमने कभी भी लोगों के कहने पर भी उसके प्रति उसे अपशब्द नहीं बोला करते थे।उसकी उसके घर में एक नियत निश्चित जगह थी मकान का दोनों दक्षिणी दिशा के ऊपर नीचे के चार कमरे यानि आधा मकान चार में से दो दक्षिणी कमरे उसके थे ।
इस घटना का ब्यौरा ःः
1981का जून माह गर्मी का समय था उसके घर वाले उसके भय से घर छोड़ कर बूलंदशहर में अपना मकान बनाकर शिफ्ट हो गये थे अब उनका खाली सारा मकान हमारे नियंत्रण में था अधिकार में नहीं हम उनके मकान का उपयोग कभी कभार सोने में करते थे , तभी एक रात लगभग11–12बजे के बीच खूब स्पष्ट चाँदनी खिली हुई थी अचानक मेरी आँख खुलीं मैंने मच्छर ओं के कारण खुद को ओढ़ने के कपड़े में पूरी तरह ढक रखा था ।एक औरत की पायलों की आवाज सुनी महसूस किया कि कोई औरत है जो मेरे चारपाई के चारों ओर घूम रही है मैं डर गया और सोचने लगा कि यह कौन सुन्दर सी औरत है जो इस चाँदनी रात में मेरे खाट के चक्कर लगा रही है यह यहां क्यों आयी है और अब क्या करेगी ।मैं उसके रूप से खुश हुआ वह बिरोजी रंग की साड़ी, और नीला ब्लाउज पहने भरे शरीर वाली हल्के गेहूँआँ रंग की थी ।उसनें मेरी खाट के दो चक्कर लगाये और अपने घर के दरवाजे पर रूककर कुछ सोचने लगी मैं इस इन्तजार में था कि यह अब क्या करेगी तभी उस स्पष्ट चाँदनी में मैंने देखा कि उसने अपने आप एक हाथ को उठाकर किवाड़ ओं के उपर साँकल के कुन्दे पर हाथ रखा और साँकल वाली किवाड़ को ऊपर उठाया और तभी साँकल को खींच कर नीचे गिरा दिया जिससे बड़े जोर की आवाज हुई और मेरे पास से कुछ दूर पर मेरी अम्मा भी सोये से जाग गई उसने मुझे जोर से आवाज दी नरेश और मैंने भी हुँकारा देकर अपनी सही सलामत स्थिति व्यक्त की ।वह दरवाजा काफी मजबूत था उन कुंडी लगी किबाड़ो को खोलना औरत तो क्या सामान्य कदकाठी के मजबूत शरीर के आदमी को खोलना आसान नहीं था ,जिसे उस औरत ने यूँ ही हल्के से हाथों से आसानी से खोल दिया था । तभी अम्मा को शंका हुई उसने सोचा शायद मैं किवाड़ खोल कर उनके घर के अंदर गया हूँ ।वह उठकर मेरे पास आयीं और इस तरह से बिना मौसम कि बिना हवा के इस घर का दरवाजा कैसे खुला इस पर पूछने लगीं तब मैंने बताया अम्मा अभी अभी बिरोजी साड़ी नीला ब्लाउज पहने एक औरत इस घर में किबाड़ खोलकर अंदर गयी है वह कौन है और इस रात में अकेली यहां क्यों आयी है बस फिर क्या था अम्मा सारा वाकया समझ गई और मुझे अपने साथ सुलाया सारी रात जागकर मेरी रखवाली की ।और रात भर दरवाजे पर नजर जमाये रही कि वह औरत अब कब दरवाजे से बाहर निकलेगी । रात बीत गई पर कोई भी दरवाजे से बाहर नहीं निकला सवेरे तक । सवेरे बाद दिन में देखा तो पता चला घर खाली था घर में कोई अन्दर नहीं गया था तो दरवाजा किसने और क्यों खोला यह चर्चा का विषय रहा ।बाद में उस औरत के बारे में पता चल गया कि वह इन्जीनियर साहब की पहली पत्नी थी जो अक्सर कभी कभार अपना घर देखने आया करती थी ।
एक और भूतिया घटना बाद में मेरे परिवार की ःः
मेरी अम्मा21 जुलाई 2015 को मर गयीं थीं । पर ठीक एक साल बाद 2016 को कड़ी ठंड के जनवरी माह की एक शाम को लगभग 10बजे रात्रि के अर्ध पूर्व मेरी मां की जैसी आवाज में कोई आवाज आयी पहले मेरे नाम से नरेश ओ भैया जिसे सुनकर मेरी बेटी दरवाजा खोलने की सोचने लगी डरते हुए ,तभी उसने मेरी छोटी बेटी को जगाया कहा कीर्ति बाहर अम्मा खड़ी है छोटी बेटी जगते ही बोली तेरा दिमाग ठीक नहीं है अम्मा तो पिछली साल मर चुकी है बरसात में अब एक साल बाद वह कैसे और क्यों कर आयेगी ।तभी उसने बड़ी बेटी को आवाज दी तब बड़ी बेटी बोली सुन अम्मा फिर से दोबारा अवाज दे रही है अबकी बार आवाज बड़ी बेटी गुड्डन के नाम से थी किबाड़ो के हिलाने /हिचकाने की आवाज भी आयी । तभी मेरी छोटी बेटी बोली बुढ़िया तेरा दिमाग ठीक है क्या तुझे मरे एक साल हो गया अब क्या लेने आयी है तभी मेरा काला कुत्ता जोर से भौंका भौंकने लगा । फिर सब कुछ शान्त हो गया ।पर बेटियाँ रातभर डर से लैम्प जलाकर जागती रहींं कहीं बुढ़िया यानि मेरी अम्मा कहीं किबाड़ो में से होकर न आ जाय ।मेरी छोटी बेटी मेरी अम्मा को बुढ़िया कहती थी ।क्योंकि अम्माँ उसे बहुत परेशान करती थीं लाड़ में । अगले दिन मेरे पड़ोसियों और मेरे छोटे भाई के परिवार ने बताया हँसते हुए खुशी खुशी कि रात अम्मा आयी थी हमने भी आवाज सुनी थी पर हमें ये भी पता था कि अम्मा मरे एक साल हो गया पर डर के मारे हमने किबाड़ो को इसलिए नहीं खोला भूत है अम्मा का अम्मा नहीं । और ये भूत प्रेत किसी के नहीं होते हैं कहीं हमें न परेशान करने लगें बाद में ।भाईसाहब यानि कि मैं टंटर मंटर खुद तो जानते हैं इनकी टोली में/मित्र मंडली में गुनिया ओझे भी हैं ये तो ऐसे भूतलाओं परेतों से निपट लेंगे । हमारे लिए मुश्किल हो जायेगी यदि अम्मा या अम्मा के फेर में कोई दूसरा भूत प्रेत धोका कर गया तो हमसे नहीं सुलटा जायेगा उस कपटी भूत से ।
इसके अलावा मुझसे कःई बार भूतों से मुलाकात हुई है लेकिन आज तक कोई भूत प्रेत ब्याधा ने मेरा बुरा नहीं किया है अपितु कःई बार मेरे दुश्मनों को छकाया परेशान किया है वजह में भूतों से पंगा परीक्षा नहीं लेता ।वे न मुझे छेड़छाड़ करते /परेशान करते हैं ।आखिर कुछ तो है इस शरीर में ऐसा ,जिसके कारण शरीर में सक्रियता है और जो ना हो ना रहे इस शरीर में तो शरीर निष्क्रिय मृत हो जाता है । वही भूत है इनकी भी एक अद्भुत दुनिया है ।जो गुप्त रूप से है । अतः इनसे पंगा परीक्षा न लो ।