भारत में cancer रोगियों की संख्या दिनों दिन क्यूँ बढ़ती जा रही है इसके निदान के लिये आप क्या सलाह देंगे ?

विटामिन बी 17 अमिडगैलिन को नैट से अध्ययन करें
जिन खाद्य पदार्थों में पाया जाता है उनको भोजनम् में शामिल किया जाय ।
अपने दिमाग /मन को बज्र बुद्धि न बनने दिया जाय ।उसमें अपने विचार कर्म चित्राँकन संचालन कर्ता अपने चित्रगुप्त को सक्रिय किया जाय जो दूसरे लोगों के विचारों के संग्रह से विक्षिप्त अवस्था में नवीनतम निर्णय क्षमता से हीन होचुका ह ।जो नये निर्णय नहीं ले पा रहा है ।दूसरे लोगों के द्वारा दिये अनावश्यक काम तनाव से बचें ।कैंसर अति तनाव की अवस्था लम्बी चलते हुए होता है ।
अपने दिमाग को लचीला बना कर अपने दिमाग के अमिडगैला क्षेत्र को सक्रिय किया जाय ।मन को तनाव से मुक्त करने के लिए भाव अतीत ध्यान प्रक्रिया द्वारा मन में छिपे हानिकारक विचारों को किसी श्रेष्ठ गुरु के निर्देश न में निकाल कर समाप्त किया जाय जो मनोवैज्ञानिक हो ,उत्तम बुद्धि का हो ,मनोरोगी को लम्बे समय तक बिमार बना कर चिकित्सा करनेवाले ओं में न हो ।
भोजन में गीता ग्रंथ निर्धारित सातविक भोजन किया जाय जिसमें जैविक अंश की प्रचुर ता ह ,राजसी परिवर्तित स्वाद का भोजन कम से कम ,तामसिक भोजन विकृत स्वाद ,भ्यंकर स्वाद वाले चाईनीज भोजन से बचा जाय ।
जैसा तन वैसा मन या फिर इसे यूँ भु कहते हैं जैसा मन होगा वैसा तन होगा , इस नियम को मैंने स्वयं पर आजमाया हैं ।
कैंसर कोई रोग नहीं है जो सूक्ष्म जीव जगत के जीव वायरस बैक्टीरिया से फैलता है ःः।यह अपने ही दिमाग के अल्पनियंत्रित्र होने से शरीर पर से पूरी तरह से नियंत्रिण न कर पाने की एक मानसिक विकृति है जो स्वयं को दूसरों के अनुसार अपने को नियंत्रित होने देते हैं अति आदर्श बनने के फेर में या फिर स्वयं ही स्वयं पर से नियंत्रण छोड़ ने लगते हैं मन पर से अपना नियंत्रण हटा कर । ये दिमाग के एक पक्ष का अत्यधिक उपयोग किया करते हैं । अतिपोजिटिव पुरुषोचित या अति निगेटिव मानसिक ता वाले अर्थात ये यूनिपोलर माईंड लोग हौते हैं इनके दिमाग के दोनों भाग दाया / बायाँ सम समान कार्य नहीं करते ।इनमें मानसिक स्वयं के विचार का स्वयं प्रतिरोध क्षणिक करने की क्षमता नहीं होती जिससे एक मस्तिष्क के विचार उद्भव ठीक से न होने पर इनके मन में असंख्य विकृत मनो विकारी ग्रंथि याँ उत्पन्न होती जाती हैं ,इन विकृत मनोविकारी ग्रंथियों के प्रभाव से शरीर नियंत्रण केंद्र हाईपोथैलामस की मस्तिष्क को सक्रिय रखने की सिग्नल व्यवस्था गड़बड़ हो जाती है । जिससे शरीर में जगह जगह जैविक प्रक्रियाओं के विषाक्त मैटाबोलाईट का समुचित सफाया नहीं हो पाती ।जिससे भोजन के द्वारा शरीर में आए विष कण इन विषैले मैटाबोलाईट ओं में जुड़कर शरीर की विषाक्ता को बढ़ाते जाते हैं जिन्हें सीमित नियंत्रित करने के प्रयास में शरीर में जहरीली कोशिकाएं बनने लगती हैं । इनको कैंसर कोशिकाएं कहते हैं ।ये कैंसर कोशिकाएं तभी तक सक्रिय रहती हैं जब तक शरीर नियंता सूक्ष्म शरीर निर्माता आत्मा / प्राण सम्यक रुप में सक्रिय नहीं होता । प्राण के सम्यक रुप से सक्रिय होते ही ये कैंसर कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं । जिससे कैंसर ठीक हो जाता है पर अपनी मानसिक शक्ति के बढऩे से परन्तु सात्विकता के सिद्धांत को अपनाने पर ।
यह था कैंसर का संक्षिप्त एक पक्षिय मात्र वैचारिक विवेचन
अब भोजन पक्ष विवेचन इसमें भोजन के प्रोटीन विटामिन बी 1–12, और बी 17 ,विटामिन सी शरीर के शोधन को आवश्यक है ।
आयुर्वेदिक औषधि हरण , आँवला का सेवन जरूरी है हरण शरीर में छिपे विषैले पदार्थों को मल के साथ बाहर करके शरीर का शोधन करता है ,आँवल विष को भोजन में से शरीर में नहीं चढने देता । कृपया विष मिला कर भोजन करने के बाद आँवले की परीक्षा का दूस्साहस न करें ,मेरा मतलब आजकल के उस विष से है जिसे हम प्लास्टिक वस्तुओं से तरह तरह के बजारु रंगीय भोजन में खारहे है तरह तरह के कृत्रिम स्वाद में खा रहे हैं

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