अथर्व वेद के अनुसार संकल्प निर्माण विधा कैसे हैं?अधिक मात्रा में निर्माण कार्य करने से प्रिय प्राण अप्रिय प्राण समस्या कारक अपान पदार्थ वस्तुओं का निर्माण करता है । यह पहले शब्द चित्र रूप में मन मस्तिष्क में भूतिक रुप से और बाद में ब्रहमांड पदार्थ मिट्टी आदि सेअनेक सजीव निर्जीव वस्तुओं का निर्माण करता है ।जब विस्तार कारक अतिसृष्टा पदार्थों वस्तुओं का निर्माण सृष्टि में करता है । तो उससे भी पहले उसका निर्माण अपने मनन चिंतन से मन में करता है । विचार के रूप में , जब मन में एक विचार उत्पन्न हो रहा होता है तो उसी के साथ साथ दूसरे विपरीत दूसरा विचार मन में पैदा हो रहा होता है । इसी प्रकार से जब सृष्टि में उत्पत्ति /निर्माण कार्य होने वाला होता है तो उससे पहले दूसरे कृति /पदार्थ का विनाश हो रहा होता है ।इस निर्माण विनाश कार्य को अग्नि की मदद से किया जाता है । जिसमें किसी सपक्ष को किसी का निर्माण दिखाई देता है तो किसी विपक्षी को किसी का निर्माण भी विनाश दिखाई देता है । किसी किसी को ही निर्माण और विनाश दोनों कार्य एक साथ दृश्य अवस्था और अदृश्य अवस्था में दिखाई देते हैं । वही विद्वान हैं जिन्हें दोनों अवस्थाओं अदृश्य दृश्य में सम्यक रूप से देख लेने की विशेष योग्यता विवेक है । दोनों कार्य दोनों अवस्थाओंमैं करने में केवल अग्नि समर्थ है अतः अग्नि को दिव्या द्विज आदि नाम से जाना जाता है इसके अलावा अग्नि ही अंधकार प्रकाश दृश्य दृश्य निर्माण विनाश कर्मा कर्मा आदि कहा जाता है ।अग्नि का नियंत्रण जीव की मूल चेतना आत्मा से और दृश्य चेतना प्राण से होता है । । १।।सुख हो या दुख दोनों की अनुभूति का कारण प्राणी हों या पौधे दोनों ही की निजी चेतना की सक्रियता पर निर्भर करता है । अल्प चेतनशील नसीब प्राणी जैसे पौधे दुख अधिक अनुभव करते हैं सुख कम अनुभव करते हैं जबकि अति चेतन प्राणी अपने दुखों का निपटारा अपनी चेतना की सक्रियता के प्रभाव से कर लेते हैं । वैसे सुख का अर्थ है , इच्छा अनुसार निर्माण कार्य या इच्छा अनुसार भोग पदार्थों की फतेह / प्रयत्न से प्राप्ति जबकि दुख का आशय है इच्छा अनुसार निर्माण कार्य में बाधा उत्पन्न होना या भोग प्राप्त पदार्थों की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होना । सुख हो या दुख हो दोनों ही अवस्थाएं जीव की प्राणी की निजी सक्रिय क्षेत्र चैतन्यता पर निर्भर हैं ।। जो सुख दे रहा है वही दुख का मार्ग भी बनाएगा ।। जो दुख दे रहा है,जहां से दुख आ रहा है । वहीं से सुख का मार्ग बनेगा । निर्माण हो या विनाश दोनों परिस्थितियों में सभी जीव विरोधी समर्थक सहायक के सानिध्य से हंसते रोते हैं। कोई खुद रोते हैं हंसते हैं किसी को उसके परिजन हंसते रुलाते हैं कोई मरने नष्ट होने पर रोते हैं कोई जीवन पर रोते हैं जीवो में रोने दुख व्यक्त करने का गुण उनमें वस्तुतः यथार्थ स्थति परिस्थिति नियति को सत्य सही रूप से नहीं समझ पाना है । हंसने रोने वालों को भविष्य का सम्यक परिणाम की समझ नहीं होती है । २ ।। ऐसा अद्भुत कार्य अपने अपने मन के विश्लेषण गुण में होने से होता है जैसे जुताई खुदाई ऐसे में व्यर्थ विरोध करने वाले आत्म दूषित जन अज्ञानी हैं , या स्तन दूषित गलत ज्ञान पोषित जन भ्रमज्ञानी हैं ।सत्य ज्ञानी जन तो व्यर्थ अकारण विरोध करने से भविष्य में व्यर्थ समस्याबाधा उत्पन्न करने वालों से संघर्ष से बचते हैं ।3 ।। सृष्टि में समस्त निर्माण विनाश कार्य सभी तमसता से अपने शरीर के मन के स्थिर भाव वश करते हैं । दुख सुख का कारण संकल्प विकल्प कल्पनाओं का साधन माध्यम बनते हैं ।यह सभी दुख सुख का उत्पन्न करने वाला मन को व्यतीत करने वाला मन का भाव का गुण एक समान एक जैसी निर्माणी सृष्टि का निर्माण यह प्रत्येक जीव का तमस गुण होता है ।जो उसकी तमता / तमिस्र में स्थित होता है ।यह तमता समस्त मित्र जीवों के मन को इच्छा भाव धारक का गुण स्थिरता देता है ।जो एक समान निर्माण वन विधा से खुश होता है परंतु असमान निर्माण जीव विधा से दुखी होता है । जीव विधा को मिलाकर जीवन पद्धति विधायिका बनती है। इस प्रकार से एक तमिस्रा ही त्रय रुप सत्य ( स्थिर स्थाई) रज (कण चलता ) तमस ( अदृश्य सत्य ) विश्व में दृष्टिगोचर हो रहा है ।जिसमें सब वस्तुओं का निर्माण सत्य विचार शब्दों से ,, रज कण वस्तु के निर्माण में प्रयुक्त जीवन सामग्री पदार्थ है ,, तमसावृता से कृति का निर्माण प्रकृति में हो रहा होता है ।जिसमें एक जैसा एक समान इच्छा के अनुसार निर्माण ःसृर्जन यह एक समान निर्माण सृष्टि दृष्टि है :: तथा इच्छाओं के विपरीत दूसरे प्रकार की वस्तु के निर्माण का उद्यम उद्योग विनाश कहा जाता है । यह असमान सृष्टि दृष्टि कही जाती है । हमारे तन मन के निर्माण में प्रयुक्त मूलतः प्रयुक्त दाता ग्राही गुंण समिश्रण से द्विलैंगिकता गुंण नर नारी भ्रमपूर्ण जीव स्थिर होकर ब्रह्म के भ्रम स बनता है । जिसमें दो तरह की ऊष्मा मिश्रण होता है जिससे कभी जीव को भ्रम पूर्णता दर्शन होताहै तो अपूर्णता दर्शन होता है।ब्रहम कभी नर में नर दर्शन पैदा करता है कभी नर में नारी दर्शन विकार पैदा करता है इसके विपरीत कभी ब्रहम को नारी से नारी दर्शन बोध होता है तो कभी नारी में नर दर्शन अनुभूति होती है । यह समस्त विश्व में सभी जीवों के भ्रमपूर्ण भ्रमजाल में सुख दुःख उपाय निवृत्ति मौलिक भाव होता है जो दो विपरीत गुंण दाता ग्राही के समिश्रण से उत्पन्न होता है जिससे अप्रिय में प्रियता या प्रियता में अप्रियता आती है । भाव परिणाम से उत्पन्न होता है । जैसे जल भूमि के नीचे भौमजल भूमि पर सागर जल विद्यमान है ,उसी प्रकार से भूमि जल के ऊपर टापू /द्वीप रूप से मौजूद होती है तो सागर जल के नीचे तली रूप में किनारों पर तट रुप में स्थापित होती है । जिससे से सभी जीवों से बना प्राणी और पौधों से बना वन जीवन भूमि पर उत्पन्न होकर समुद्र में आता जाता रहता हैं । जीवो का मन भी समुद्र के समान चंचलव और कभी भूमि केसमान स्थिर हो जाता है । जिसमें जीवन मिश्रण स्थिति से सदैव रहने से मन कभी समुद्र के जैसा चंचलता का व्यवहार विनाश करता है तो कभी स्थिर भाव की प्रबलता से सृजन निर्माण कार्य करता है । यह प्रबल अभय भाऊ/भाव होने पर अधिकतम सफल निर्माण सृजन कार्य करने में समर्थ होता है । जब यह प्रबल भय भाव से पूरित भरा होता है वह न्यूनतम निर्माण कार्य अधिकतम विनाश कार्य करने में समर्थ हो पाता है । जीव के मन में पूर्व में भरी वासनाएं जो संस्कार रूप से चित्त चित्र युक्त चेतना में विद्यमान होती हैं । वह इच्छा कर्म भाव रूप से बाहर नहीं निकल पाती हैं वह उसके मन के प्रथम चैतन्य भाग चेतना पट चित्र में भरी रहने से अक्सर उसके मन को चिंतित क्लेशित व्यथित होने से अति उत्तेजना से बिगाड़ करके खराब रखती हैं । जैसे सागर में तूफान, भूमि पर भूकंप , जल थल के अतिरिक्त तनाव दबाव को बाहर निकाल देते हैं ।चंचल सा सागर का और कंपित रहना भूमि का जीवंत गुण है । उसी प्रकार से जीवो में सांस लेना उनके शरीर और मन चित्त के सक्रिय रहने का कंपन गुण है । मन में विचार , मुख मंडल पर भाव मन के कंपित / जीवित रहने का गुण है। यह कंपन शरीर में सांस लेना या मन में चिंतन करना सोच विचार करना जीव की स्वाभाविक मौलिक गति से होते हैं ,, तो मन चित्त शांत रहता है ।। यदि सांस लेना शरीर के लिए , चिंतन मनन करना मन के लिए दीर्घ काल तक बाधित होना /रुकना लगता है तो आत्मा अशुभ और प्राण दुखी क्लेशित महसूस करने लगता है ।जीवन की अनिष्ठा अस्तित्व समाप्ति की आशंका से शरीर के सांस लेने और मन के चिंतन मनन करने की गति सामान्य से ज्यादा तेज हो जाती ह । तो जीवन और मन नष्ट होने लगता है।शरीर में अत्यधिक कंप शारीरिक भूकंप ह तूफान है ।मन की तेज चिंतन मनन प्रक्रिया उग्र चिंतन मानसिक तूफान भूकंप है । मनन चिंतन केंद्र मस्तिष्क के संकट शमन के सूचक होते हैं।जो ब्रेन हेमरेज मस्तिष्क आघात शरीर आघात सूचक होते हैं । अतः शरीर में सांस कीअति तीव्र गति मन के चिंतन मनन गति उग्र चिंतन पर ध्यान रखने की आवश्यकता है । जैसे समुद्र के गहरे अंदर में अथाह गाढ़ा जल नीला जैसा है जिससे समुद्र अभय भाव शांत होने पर सृजन में समर्थ होता है होनहार वृक्ष के पत्ते हरे चिकने चमकदार होते हैं । यह 3 गुण जो सत्य विचार राज गतिमान का तब दृश्य पदार्थ एक अग्नि तत्व हाइड्रोजन आकसीजन की मात्रा पर निर्भर हैं हाइड्रोजन में ज्वलनशील का, ऑक्सीजन में ज्वलन में सहायक का गुण मिलकर , तीसरा ज्वलन हीनता जल का शांत गुण शीतलता आ जाता है ।परंतु उसमें भी वाष्प उड़नशील जल गमनशील बर्फ स्थिर होती है इसी तरह से जल के प्रभाव से सभी जीवित वस्तुएं जीवन धारण करने में सर्गुणी होने से समर्थ और दृश्य है हो पाती हैं जो मर कर निर्गुणी में गुंण हीनता अदृश्य में बदल जाती हैं।जल के प्रभाव से जीवों में त्रगुंण सत्व /सत्य रज/कण/गति तम/कृति गुंण हैं । मृत्यु जन्म जीवन त्रय गूंणी हैं । जीवों में जीवन भी त्रयगुंणी ह । दो वस्तुओं की सक्रियता एक नष्ट होने वाला दूसरा नष्ट करने वाले की संयुक्त संक्रिया उद्यम कर्म पर आश्रित है । इसमें इस विनाश कर्म को करने वाले सभी जीव प्रत्येक को प्रत्येक में एक दूसरे को खाने की इच्छा लीला कर एक दूसरे को कम करने की इच्छा विनाश कर एक दूसरे को नियंत्रित करने की इच्छा जीव स्थिरता , और एक दूसरे को पूर्णता से नष्ट करने का उद्यम प्रदुष्व से संदूषण के मिश्रित होने से करते हैं जल में जो जल अग्नि मंद दहन शीतलता का विशेष गुण है वह जल की दोनों अग्नि यू हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के एक दूसरे को नष्ट करने की विवशता व्यवस्था में बाद में शीतलता विशेषता में बदल जाता है।यद्यपि वह दोनों उप ज्वलनशील तत्व हाइड्रोजन ऑक्सीजन एक दूसरे को पीड़ित राशिद दुख पहुंचाते रहते हैं ऐसा ही नर नारी है लिंगी जीवों का स्वभाव होता है । इन दोनों नर नारी गुण की विपरीता में को संयुक्त रूप से जोड़कर रखने का गुण तृतीय ईशित्व इंद्र नर में इंद्राणी नारी में रूप में प्रत्येक पदार्थ समूह जीव जाती जातक गुणों में पाया जाता है । जिसमें इंद्र ज्वलनशील था इंद्राणी ज्वलन में सहायक प्रेरक तत्व हैं दोनों का संयुक्त सहवास सहजीविता अभिप्रेरणा मिलकर एक दूसरे को दीर्घकालिक पूरक समझती रहने की इच्छा से अपने अपने हितों को ध्यान में रखते हुए एक दूसरे से अति निकट रहते हैं जिसमें वे एक दूसरे पोषण प्राप्त करते रहते हैं और एक दूसरे से अपने अपने पोषण के अनुसार एक दूसरे का शोषण भी करते रहते हैं । पति-पत्नी रूप से इस प्रकार वे दोनों शत्रु भाव धारी होने पर भीएक दूसरे को अपना अति प्राण प्रिय उपासक भाग जल समान प्रिय मानते हैं परंतु और एक दूसरे को नष्ट करने के विनाश गुण का त्याग नहीं करते हैं जिससे पुणे युगल नर नारियों मेंसंघर्ष साथ रहते हुए एक दूसरे का घर था छह करने का लड़ाई शक्ति स्थिरता के लिए लड़ने का गुण उत्पन्न हो जाता है । जिसमें कभी नर लिंग विजई होता है तो कभी नारी लिंगिय / महा लिंग योनि विजय होता है जिसमें जय सदैव जीवन की होती है परंतु नर नारी गुण धारी जीव अकारण व्यर्थ ही संघर्ष लड़ाई का मंद ग्रुप मिथुन करते हुए नित नई सृष्टि पूजा कर्म करते रहते हैं । नर को दृश्यता प्रकाश प्रिय होता है नारी जीव को अदृश्यता अंधकार प्रिय होता है । इस प्रकार से वे दोनों एक दूसरे को साथ साथ पकड़ कर चलते हुए एक दूसरे को नर नारी को दृश्यता प्रकाश में जीवन दर्शन सुख नारी नर को अदृश्य था अंधकार में जीवन दर्शन सुख का एहसास कराते हुए वे दोनों एक दूसरे को प्रदूषण करते हुए प्रिय शिव भाव से दूर तक बहते हुए चलते चले जाते हैं जिसमें दोनों नष्ट हो जाते हैं परंतु जीवन बहता रहता है। उन दोनों के मिलन कर्मठों के मिथुन कर्म से अनेक जीव उस जीवन वैतरणी वतन को चलाने के लिए तरह-तरह के जीवो के सानिध्य में विरोध शत्रु मित्र भाव से चलते चले जाते हैं । वैतरणी बहती रहती है , जीवन धारक जीव तरह तरह के अनेक असंख्य रुपों में उत्पन्न होकर दृश्य जगत में जन्म लेकर आते जाते दिखाई देते हैं जो कुछ समय पश्चात आयु सीमा पूरी करके मरने के बाद अदृश्य रूप में आते जाते रहते हैं । विवेकी जीव विधायक जीव शिव स्वरूप हैं जीवन से युक्त जीव ही जीवों के असंख्य शिव स्वरूप है । शरीर और आत्मा अग्नि रूप में भूतएक दूसरे को देखते हैं शिव रूप में वह तन धारी होने से स्पर्श किए जाते हैं परन्तु त्वष्टाक निर्मित त्वचा के 8 प्रकार केतंत्र त्वचा मांस रक्त आहार नाल फेफड़े वृक्क प्रजनन मस्तिष्क चेतना युक्त हैं । शिवान / सिवान रूप में यह जीत नग्न दर्शन देते हुए सोते जागते तरह-तरह के कर्म करते हुए हवा में से आते हैं और हवा में चले जाते हैं । जीवन लीला का खेल करते हुए इनका यह जीवन लीला का खेल यह मेरा है प्रिय है इसकी सुरक्षा निर्माण मेरा दायित्व है। यह मेरा नहीं है इसका विनाश करना मेरा धर्म कृर्त्य अनिवार्य है । इसके लिए ब्राह्मण दूसरे जीवों को भ्रमित करके उनका प्रज्ञा हरण करके उंहें नाश के द्वार तक धकेलते रहते हैं। क्षत्रप दूसरों को प्रभावित करना अपना वर्चस्व बनाना , वैश्य /वणिक जन दूसरे जीवो काअन धन का उपयोग वित्त रूप में उपयोग प्रयोग का खेल खेलते हैं। ऐसा ही कुछ खेल सृष्टि नियंत्रक तत्व ईश्वर नर , प्रकृति नारी बनकर खेलते हैं । ऐसे में भगवान का खेल भी देवी देवताओं का पक्षपात पूर्ण है नंबर 1 भगवान अपने समर्थकों का सदैव ध्यान रखता है वह अपने समर्थकों को उनके बिना मांगे उनकी इच्छा से सदैव ज्यादा देता है बिना कर्म किए भी नंबर दो भगवान अपने भक्तों कोअपनी स्तुति वाचन या चन करने पर देता है आवश्यकता के अनुसार नंबर 3 भगवान सभी कर्ताओं कर्मियों कर्मठों को उनके कर्म के अनुसार देता है । नंबर 4 सभी जीवन धारियों को उनके जीवन अवधि के अनुसार जीने लायक आवश्यकता से कम देता है जिससे वे जीवन भर जीवन जीने की लालसा /भूक बनी रहती हैं । 5 वैचारिक विरोध करने वालों को सदैव जीने लायक आवश्यकता से कम देता ह जिससे भगवान के विरोधी जीवन भर निर्धनता गरीबी में भगवान को गाली बकते हुए अभिशप्त जीवन जीने को बाध्य होते हैं । नंबर 6 कर्म विरोध करने वालों को आलसी लालची निकम्मा को सबसे कम देता है उनका जीवन दरिद्रता मुफलिसी कंगाली में बिकता है। नंबर 7 विधाता सोने वालों को , चिरकालिक विरोध करने वालों को, चिरकुट को देता ही नहीं उनसे सुखचैन धन चिंता रहता है तरह तरह के रोग देकर कुसंग जनित व्याधियों समाज दंड राजदंड धर्म दंड कर दंड आदि से।
जीवन जीने में तरक्की रुकने से परेशानीयाँ कैसे आती हैं ? ्
किसी भी जीव /मनुष्य /पशु की सद्गति(जहाँ पर वह अपनी इच्छाओं भावनाओं के अनुसार उनकी पूर्ति करने के लिए जाना है ) प्रगति ( जहाँ पर वह इच्छाओं की पूर्ति करने का इच्छुक है ) ऊर्ध्व गति (जहाँ पर वह तेजी से जाना चाहता है और पहुँच जाय )अधो /पतनशील गति (जहां पर वह नहीं जाना चाहता है, लेकिन सही सूचनाओं की कमी से ,गलत सूचना मिलने पर/लेने से या मौज मस्ती मजा की रौ /धारा के प्रभाव से अकेले /सपरिवार/मित्र मडली के द्वारा पहुँचा दिया गया है।अब वहाँ पर दुखी /उदास है , उस स्थान को चाहकर भी मजबूरी में नहीं छोड़ पा रहा है दुख पा रहा है विपरीत परिस्थितियों में घिर जाने पर : बार बार हर क्षण उसका मानसिक शारीरिक शोषण/शोधन /उत्पीड़न ,आपरेशन /शल्य कर्म छेदन चीरण हो रहा है ) दुर्घटनावश दुर्भाग्य के फेर से दुर्गति के स्थान में पहुंचने गया है ।जहाँ पर वह नहीं जाना जाता था लेकिन प्रकृति ने ईश्वर ने पूर्व कर्मों के अनुसार भाग्य वश ,या पूर्व सूचनाओं के आधार पर अनुवांशिक या और अर्जित सीखी पढ़ी लिखी गई सूचनाओं के अनुसार रिक्तता /कमी की पूर्ति करने के लिए, सुधार करने के लिए उसे उस प्रिय अप्रिय स्थान पर पहुँचा दिया . अब वह अपनी मर्जी से भी चाहते हुए नहीं निकल सकता है उसे उस अप्रिय स्थान पर निश्चित समय के लिए मन मारकर /मन दाबकर उस अप्रिय स्थिति में रहना है दुख अपमान क्लेश सहना पड़ेगा ) यह सभी जीवों के साथ मनुष्य/पशुओं के साथ ईश्वर और प्रकृति के निर्देशानुसार जीव जीवन नियंत्रण क्रियाओं के अनतर्गत होता रहता है ।उनसे ज्यादा बलवान बुद्धि मान ,धनवान धनत्तरी जीव फिरोंनई /फराओ की खतरनाक सोच जैसे लोगों के कारण । ये फिरोंन बुद्धि लोग /अन्नयायी लोग दूसरे कमबुद्धि कमजोर निर्धन लोगों के नियंत्रण करने के लिए हर जगह पर मौजूद रहते हैं , जमाने के खुदा जो जीवों को मनुष्य ओं को पशुओं को अन्नयाय के द्वारा नियंत्रित करने का हुनर /विशेष बुद्धि जानते हैं ।पहले मेरा फिरोंन बिल्लन मेरा बड़ा कुलबंधु था फिर मूर्ख पड़ौसी पंडित रधुवीर बना जब बिल्लन प्राकृतिक मौत मर गया फिर रघुवीर भी प्राकृतिक मौत मर गया अब मुझे दुखी परेशान करने के लिए प्रकृति ने मुझे दुखी करने के लिए अकाल झगड़े के उत्पन्न करने लिए एक अन्य सत्ता को नियुक्त कर दिया ।जिससे मैं अपना कुछ अलग और विकास ना कर सकूँ ।
प्रत्येक जीव की गतिविधियां उसके नियंत्रण केंद्र मन मेँ भरी पूर्व सूचनाएं ज्ञान पर निर्भर करती हैं जो उसके दिमाग में ध्वनि व चित्रों के रूप में शब्द श्रंखला वाक्य चित्र श्रृंखला वीडियो के द्वारा उसके मस्तिष्क में भरी/डाली जाती हैं ।जो स्थिर होकर स्मृति के रूप अर्जित ज्ञान ज्ञापन ज्ञापति में बदलकर उसे ज्ञानी बनाया करती हैं ।जो और भी आगे भविष्य में निरंतरता से स्थिर स्थित होकर दीर्घकालीन स्थित स्थिर गुण अनुवांशिकता गुणों में बदल जाती हैं इन्ही अनुवांशिक गुण लक्षणों की उपस्थिति आधार पर जीव की आकृति आकर भाव गुण प्रभाव ,अभाव ,स्वभाव ,कार्य पद्धति का निर्माण होता है। दुनिया में सभी ज्ञानी अज्ञानी अल्पज्ञानी जीव एक दूसरे जीव के आकृति (शरीर) आकार (शरीर दशा दिशा अवस्था )भाव (शरीर की कार्य क्षमता स्थिति )को देखते हैं ।। उस जीव के प्रभाव (अच्छा बुरा करने की क्षमता )अभाव(साधन उपलब्धता में कमी )स्वभाव (अपने भावों का साधना नियंत्रण कला प्रतिक्रिया)सुभाव (अपने लिए अच्छी प्रतिक्रिया)दुर्भावना(दूसरे के लिए बुरी प्रतिक्रिया )शायद ही कोई देख पाने में समर्थ होता है।सामान्यत साधारण जीवों को ये जीव का अपना निजी क्रिया व्यवहार नहीं दिखाई देता है जिस पर उसकी सभी प्रकार की गतिप्रगति, दुरगति सदगति निर्भर करती हैं ।
यदि जीव अति महत्वपूर्ण आवश्यक वांछित सूचनाएं ज्ञान के रूप में माता पिता गुरु जनों से ले लेता है तो उसकी प्रगति सदगति निर्धारित तय हो जाती है । यदि जीव को आवश्यक वांछित सूचनाएंसही तरीके से ज्ञान रूप में मां बाप गुरु दे देते हैं तो प्रगति निश्चित है ।। यदि उसे वे जीवन की वांछित आवश्यक सूचनाएं नहीं मिलती हैं या वह नहीं लेता है तो उसकी दुर्गति अधोगति निश्चित /तय है।चाहे इस ज्ञान दाता प्रक्रिया में मां बाप गुरु गूंगे मूक हैं कारण उनका अज्ञानी अल्पज्ञानी अशिक्षित हो या वे भय वश सभ्यता संस्कृति संसकार वश ज्ञान ज्ञापन के समय वाकछल कौशल प्रयुक्त करते हों ।जानते हुए, जानबूझकर, भय लालच वश सही सद् ज्ञान देना उचित न समझते हो ंं , संसारिक ज्ञान बखेड़ों झगड़ों से बचने के लिए। द्रोणाचार्य, शंम्मूक प्रकरण ।। सही सूचनाएं सटीक ज्ञान विकास प्रगति की दिशा के मार्ग को खोलतीं हैं तो दूसरी ओर गलत सूचनाएँ भ्रमित ज्ञान जीवों को विनाश भटकाव के मार्ग में धकेलते हुए उनका जीवन उद्देश्य लक्ष्य बदलाव करके उन्हें पतन के गर्तों में ऐसा बुरी तरह से गिरा देती हैं कि उनकी संतति /संतान भी उस पतन के गर्त गरीबी दरिद्रता निर्धनता के गर्त /गड्ढे में से बाहर नहीं निकल पाती है।
मैं स्वयं इस ज्ञान छल कपट की भ्रमज्ञान से उत्पन्न समस्याओं से इतना परेशान हुआ कि इन्होंने मुझे समय से पहले जवान करके समय से पहले बुड्ढा कर दिया ।इसका मतलब/रहस्य मुझे 55साल के बाद समझ में आया जिसे में बयां कर रहा हूँ ।:-हमारे जीवन में विकास और विनाश के मध्य में नियंत्रण अवस्था होती है जिसमें हम अपना जीवन दूसरों के प्रभाव से नियंत्रित होकर जिया करते हैं ।जो लोग अपने नियंत्रण को अपने हाथ में ले लेते हैं उनकी प्रगति सद्गति होती है और जिनके मन मस्तिष्क का नियंत्रण दूसरे के हाथ में चला जाता है उसकी दुर्गति /अधोगति निश्चित है ।और जो इन दोनों के मध्य में रहता है वह जब स्वतंत्र होता ह खुशी होता है और जब दूसरे फिरोंन बुद्धि लोगों का साथ होता है तब दुखी /परेशान होता है ।ये फिरोंन बुद्धि लोग बने ही दूसरे लोगों को परेशान करने के लिए और नियुक्ति इनकी प्रकृति करती है । ये ना खुद से दूर होते हैं न अपने उत्पीड़क जीव को दूर होने देते हैं । मजा आता है ईनको कमजोर लोगों को झूठमूठ का दुश्मन बना कर कमजोर असहयोगी लोगों से नूराँ /दिखावटी कुश्ती लड़कर कमजोर लोगों की हड्डियाँ चटकाने में।सभी जीवों का जीवन विकास और विनाश के मध्य संघर्ष अवस्थाओं में रहता है जब तक संघर्ष ह संघर्ष में लड़ने की बचने की जीवन प्रियता से भागने की इच्छा होते हुए कर्मफल परिणाम देखने की जीवन जीने की इच्छा है, तभी तक जीवन है। संघर्ष खत्म होने पर विरक्ति भाव उत्पन्न होता है जिसके बाद जीव पहले कर्म भाव त्याग कर अकर्मण्य होता है फिर कोई भी कर्मफल परिणाम देखने की इच्छा न होने पर परमपलायनवादी बनकर मृत्यु मार्ग पर चल पड़ता है। यह जीवन संघर्ष मरने के बाद समाप्त होता है यह जीवन संघर्ष मनुष्य की जागरूकता आवश्यक जीवन सूचनाओं के संग्रह पर निर्भर करता है जो रीति रिवाज नीति/नियम कानून :अनीति कुरीति के मध्यांक मेँ रहता है।जिसमें अज्ञान की अधिकता से विनाश , सत्य ज्ञान की अधिक मात्रा में होने से विकास और असत्य ज्ञान ,भ्रमज्ञान, मित्थ्या ज्ञान काल्पनिक ज्ञान ,विपरीत ज्ञान से जीवन में निरंतरता बनती है ।
जिन लोगों मेँ अपनी निजी मानसिक ऊर्जा क्षमता शारीरिक ऊर्जा क्षमता का सही सटीक आँकलन स्वयं करने का गुण नहीं होता है जिसे निजी ऊर्जा स्तर स्टैमिना या देरी तक अपनी ऊर्जा को आप प्रयोग करने का गुण नहीं होता है अर्थात जिनकी सोच प्रथम ईश्वरीय द्वितियक प्राकृतिक न होकर तृतीय मानवीय मूल्यों संवेदनाओं पर आधारित होती है या चतुर्थ श्रेणी पशु भाव प्रधान मतलब और स्वार्थ पर आधारित होती है वे जीवन में कम से भी कम प्रगति करते हैं ।जीवन भर परेशान भ्रमित अवस्था में रहते हैं ।।जिन लोगों का ऊर्जा स्तर परमाणु कक्षा KLMNOके अनुसार K से काईनेटिक Lसे लेबर /मजदूर M मशीनी या मैकेनिकल N नोटोरियस काम को पूरा करने के लिए लगातार लगे रहते हैं एक काम को पूरा करने पर दूसरा काम में फिर से लग जाते हैं धुन्नीराम टाईप , Oसे सभी को नियंत्रण करने में रूचि रखते हैं हर काम को लेकर करने लग जाते हैं चाहे इनसे वह काम नहीं आता है। इनको चुनौती /चेतावनी प्रिय है ।।
परंतु जो लोग अपनी मानसिक क्षमता शारीरिक क्षमता को स्वयं पहचान ने का गुण होता है जिनका निजी ऊर्जा स्तर स्टैमिना उच्च स्तरीय होता है नींद कम आलस्य नहीं होता है देरी तक अपनी ऊर्जा को आप प्रयोग करने का गुंण होता है ।जो देर तक सोच विचार करने की काम करने की कला सीख लेते हैं या उनमें यह गुंण अनुवांशिक होता है उनकी माता का ऊर्जा स्तर उच्च होता है ऐसे लोग अपने जीवन को ईश्वरीय विधान नियमों के अनुसार अपने जीवन को प्राकृतिक रूप से जीते हैं ।जीवन में प्रगति तरक्की सद् गति यही करते हैं ।इनके जीवन में और लोगों की तुलनामें समस्याएं बाधाएँ कम से कम तर आती हैं ।अपने जीवन को ईश्वरीय आदेशानुसार जीने के गुंण से ईश्वर सदैव इनको अपनी छत्रछाया मेँ रखता है ईनकी असमय कुसमय में मदद करता है और प्रकृति के नियमों के अनुसार जीने से प्रकृति इनकी सुरक्षा आप करती है ।इनको आयु से पहले नहीं मरने देती है।जबतक कि इनका जीवन उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता है। इनके सभी संसारिक कार्य पूरे नहीं हो जाते हैं ये दुनिया से जल्दी नहीं जाते हैं ।
जो लोग अपने जीवन को मानव नियम से जीते हैं ये अनिश्चितता से अपने जीवन को कृत्रिमता से जीते हैं ये मानव समाज में सम्मानित जीवन जीते हैं ।इनके जीवन में भ्रम की प्रधानता होती है ।इनको कभी अच्छे कर्म का फल अच्छा तो कभी बुरा मिलता है जिससे ये अनिर्णायक भ्रम अवस्था में होते हैं कभी कामयाब तो कभी नहीं नाकामयाब वजह यह है कि यह तत्व ज्ञानी /सत्य ज्ञानी न होकर सत्व ज्ञानी शार्ट कट वाले होते हैं । और जो अपने जीवन को पशु ज नियम पूर्ण अनिश्चितता से जीते हैं वे तो क्या उनकी संतति /संतान भी दुखों से घिरी हुई रहती है ।ये केवल अपने जीने के लिए भी कम से कम परिश्रम करनेवाले आल्सी भीरु लालची होते हैं ।ये अपने जीवन को पूरी तरह से दूसरों के नियंत्रण में जीते हैं पराधीन गरीब लोग ।
गरीब लोगों में निजी ऊर्जा उपयोग करने की समझ नहीं होती है इनका स्टैमिना (देरी तक काम करने की क्षमता) ऊर्जा स्तर कम होता है क्यों कि ये ऊर्जा स्रोत भोजन के प्रति जागरूक नहीं होते हैं।इनकी सोच सिर्फ अप तक या अपने दिमाग तक भी नहीं होती है। यह अपने हित को आप नहीं पहचानता है। अपने हित के लिए आप खुद नहीं सोच सकता है। इनकी सोच बंद होती है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ बुद्धि अपने हित के लिए दूसरे लोगों से चाहता है कि दूसरे लोग उसके हित के लिए सोचें लेकिन वह अपने हित में सोचने वाले को धन्यवाद देना नहीं चाहता है उसे हर चीज बिना श्रम के मुफ्त में चाहिए । नतीजा धन्यवाद भी मुफ्त में नहीं मिलता है दाता के दरवाजे ऐसे मुफ्त खोरा समाज के लिए बंद रहते हैं ।अब वह अपना जीवन जीये अपने हाल से , कोई भी बुद्धि जीवी ऐसे फोकटा के हित सोचने को अपना समय क्यों खराब करेगा ।
धन /रुपया क्या है ?
धन एक अन्न / दर्शन विचार कृति कर्म कृत्या है जो /वस्तु /शरीर /ऊर्जा पिंड /आवश्यकता /जरूरत /उपयोगिता/ क्षमता /दक्षता / जीवन प्रियता / खूबियां ,विशेषता / मानक / विद्युत आवेश के समान श्रृंखला गति ,चाल है ।
उपरोक्त में से जो जिस मनुष्य के पास जितनी अधिक मात्रा में है ,जिसकी जितने ज्यादा लोगों को आवश्यकता है ।वह अपनी क्षमता ,दक्षता के अनुसार लोगों की समाज की जरुरत को पूर्ति अपने मानक नियमों /शर्तों के आधार पर कराकर अपना उपयोगिता उपलब्धि मानक मूल्य तय /निर्धारित करके प्राप्त करता है /वसूली करता है। वह उसका धन /लाभ मानक मूल्य है । यदि वह इसे अपने मिशन धर्म कर्म के अनुसार वसूली पूरी तरह से नहीं कर पाता है तो परेशान / दुखी होता है ,जिसे हानि कहा जाता है । यदि वह अकेला व्यक्ति मानव समाज में आपूर्तिकर्ता संसाधन स्रोत स्वामी है , लोगों की/की ; तब वह ऐसी परिस्थिति में धन का अधितम लाभ प्राप्त करता है ।जिसे व्यापार पर एकाधिकार या मोनोपॉली कहते हैं ।। यदि उसके जैसे समान आपूर्तिकर्ता अनेक लोग समाज के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति /उपलब्धता क्रय विक्रय श्रृंखला संचालन करते हैं तो यह समाज में व्यापार की संयुक्त अवस्था बाजार /मार्केट कमेटी व्यवस्था बन जाती है ।जिससे लाभांश कम /घट जाता है ।अब एक वस्तु उपलब्धि खपत का लाभ अनेक लोग लेने लगते हैं।जब समाज में एक विशेष वस्तु की उपयोगिता बढ़ जाती है तो उसकि उपलब्धता कम हो जाती है जिससे उसका उपयोगिता उपलब्धता समानुपात मानक मूल्य गड़बड़ा जाता है, विचलित हो जाता है । जिससे समाज में एक वस्तु के या अनेक वस्तुओं के पूर्तिकर्ता , उपलब्ध कर्ता /दाता दुकानदार और एक और अनेक वस्तुओं के खरीदने वाले ग्राहक ,लेने वाले व्यवस्था बन जाती है । जिसे वस्तुओं की क्रयविक्रयी व्यापार वयवसथा बड़ा बाजार कहते हैं ।
जो अपना और अपनी वस्तु की उपयोगिता का मूल्य अपने आप लगाते हैं ।वे अपनी उपयोगिता के अनुसार अधिक मूल्य लेकर धनी बनते जाते हैं । जिनमें अपनी उपयोगिता का स्वव मूल्यांकन करने का गुण नहीं होता है जो समाज को मनुष्य को उपयोगी उत्पादन नहीं करते हैं। वे दूसरे लोगों की शर्तों के अनुसार धन देकर अपना जीवन जीते हुए निरंजन निर्धन गरीब दरिद्रता भिक्षावृत्ति से अपमानित महसूस करते हुए जीवन जीते हैं ।
जिन लोगों में सक्रिय अतिरिक्त ऊर्जावान होने से समाज को परिवार को देने की बात / भावना ,उत्पादन क्षमता अधिक होती है उनकी उपलब्धता विक्रय अधिक होती है ।उनमेँ लेने की भावना कम होती हैउनकी क्रयशक्ति कम होती है वे समाज में परिवार में दाताभाव धारी ,दाताराम समाज में परिवार में पोषणकर्ता वृद्ध भाव उपयोगी विचारवान नर / धनी व्यक्ति बनते हैं ।। जिन लोगों में निष्क्रियता अधिक होने से कम ऊर्जावान होने से लेने की बात / भावनाअधिक होती है उनकी आपूर्ति खपत क्रयशक्ति अधिक होती है । उनमेँ समाज को परिवार को देने की इच्छा भावना न होने से उनमें विक्रय शक्ति कम होती है । जिससे वे समाज में परिवार में शोषणकर्ता बालक भाव उपयोगी विचार हीन निर्धन गरीब व्यक्ति बने रहते हैं ।।
धन का जीवों में उनके शरीर का आकार आकृति स्फूर्ति से सहसंबंध है ।लेकिन हम मनुष्य जाति में इसे परमाणु के कक्षा ऊर्जा नियम K ( kinetic ) जीने लायक ऊर्जा , L ( labour) परिश्रम /मेहनत लायक ऊर्जा , M ( mechanical energy)मशीन की तरह काम करना /सामान्य से अधिक ऊर्जा , O ( operating regularly) लंबे समय तक कार्य करते हुए रहना ,अधिक ऊर्जा वाले , N ( Non stop worker or officer to regulat maintain mission work ) किसी भी लिए गए कार्य को उसकि अंतिम परिणिति फाईनल रिजल्ट तक पहुंचाने तक बीच में नहीं रुकना ।जिन लोगों का ऊर्जा स्तर M , N , O वाला होता है वे अपनी शारीरिक मानसिक ऊर्जा स्तर के अनुसार अपने जीवन में बौद्धिक विकास क्षेत्रों में और शारीरिक श्रम निर्माण क्षेत्रों में तरह तरह का उत्पादन देकर तरक्की /प्रगति करते हैं । लेकिन जिन लोगों का ऊर्जा स्तर K , L स्तर का होता है जिनमें केवल जीवन जीने मात्र भावना इच्छा होती है ।जो अपना जीवन जीने के प्रति जागरूक नहीं होते हैं उनके जीवन की कमान /नियंत्रण दूसरे अधिक ऊर्जा वाले , धूर्त ,कुर्रा ,मुर्रा , व्यापारी ,व्यावसायिक लोग ले लिया करते हैं ।उनको गलत ज्ञान , भ्रम ज्ञान , अज्ञान , विपरीत ज्ञान , अपूर्ण ज्ञान देकर अपना मुर्गा, बकरा ,बैल ,कुत्ता बनाते हैं ।जो बाद में सबका मुर्गा ,बकरा, बैल ,गाय भैंस ,कुत्ता बनकर स्वयं आदमी होते हुए दूसरे आदमियों को आदमपशु रुप से समाज में परिवार में अपमानजनक परिस्थितियों में अपना जीवन जीने देते हैं धन के गुलाम बना कर , मानसिक लालच देकर उसमें आवश्यकता या कमी / रिक्तता भाव स्थाई रूप से बनाकर । जो अपने बच्चों को भी अपने वाला जीवन ढर्रा सिखाकर अपना जीवन पूरा करके चले जाते हैं ।
धन का जीवों के शरीर में ऊर्जा स्थिति ,निजी ऊर्जा ईकाई माईट्रोकोन्डिया , तथा माईट्रोकोन्डिया की कार्य पद्धति : खाद्य पदार्थों के जारण से शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पादन तथा जीवों के द्वारा खाये गये खाने से सीधा संबंध है ।माईट्रोकोन्डिया मनुष्य और स्तनपायी सभी प्राणियों में माता की ओर से आते हैं ।पिता के माईट्रोकोन्डिया निषेचन प्रक्रिया से पहले ही अण्डाणु से बाहर रहकर नष्ट हो जाते हैं ।साईटोप्लाज्मिक इनहैरिटैंस नियम के अनुसार सभी बच्चों का ऊर्जा स्तर उनकी मां के आधार पर निर्धारित होता है ।पिता पर बच्चों का ऊर्जा स्तर निर्धारित नहीं होता है ।जिससे लोकोक्ति है , हिरनी के जने जाये मट्ठे /आलसी /सुस्त नहीं होते हैं । शेरनी के बच्चे लड़ाई झगड़े मरने से नहीं डरते वे अपने से बड़े हाथी पर भी वार किया करते हैं ।धन की प्रक्रिया मां के द्वारा सिखाई गयी जीवन पद्धति पर निर्भर करती है।
जो देना जानता है जिसने विवेकपूर्ण तरीके से मांग आपूर्ति के तारतम्यता को ध्यान में रखते हुए देना सीख लिया वह आवश्यकता का मानक तय मूल्य अपनी मर्जी से लेता है वसूलकर्ता है वह अमीर /धनी बनता है ।यह बात अलग है विचारणीय है कि वह समाज को परिवार को क्या उपयोगी दे रहा है शब्द या वस्तु या अन्न /दर्शन विचार आवश्यकता पूर्ति ।। जो लेना जानता है ,जिसने लेना सीखा है खाना सीखा है देना नहीं ऐसा दीन /धर्म कर्म हीन मनुष्य अपनी बढ़ी हुई अति आवश्यकता व्यर्थ की अनावश्यक वस्तुओं को खरीदता हुआ सदैव कंगाल गरीब निरधन बना रहता है । अपनी सामाजिक उपयोगिता का मानक मूल्य खुद तय नहीं करना जानता है । अपनी सामर्थ्य हीन /क्षमता हीन / दक्षता हीन होने से, उपलब्धता आवश्यकता से प्रभावित होकर /वशीभूत होकर , मजबूरी वश अधिक दक्षिणा , क्षमता मूल्य देने को बाध्य मजबूर होता है ।अधिक देता है । वह शोषित होता है। ,जिससे वह आजीवन गरीब, निर्धन, मजबूर ,मजदूर ,दरिद्र, शोषित बना रहता ।।
जिसने शिक्षित होकर उत्तम शिक्षा पाकर अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण करना सीख लिया ,अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अपने आप करना सीख लिया ,जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अपनी मांग के अनुसार अपने आप स्वयं कर लेता है अधिकतम अपने लिए अपना निर्माण कार्य स्वयं/खुद कर लेता है । अपनी जरूरत से अधिक ज्ञान प्राप्त करके वहआत्म निर्भर स्वलंबी बन कर शोषण और शोषक व्यवस्था पर अपनी आवश्यकताओं को निर्धारित ,नियंत्रित करना सीख लेता है । समझ लिया करता है । पूरा कर लिया करता है ।। वह कम रुपया होने पर भी ,कम मानक शासकीय धन /मुद्रा अवस्था में गरीब /अल्पधनी /या निर्धन अवस्था में सुख शांति संतोष से चैन /शकून के साथ बिना विचलित हुए मन से जीना सीख लिया करता है ।
परंतु जिसका अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण नहीं रहता है ।जो आत्मनिर्भर स्वालंबी नहीं है ।जो दूसरे लोगों की आवश्यकताओं को अपनी आवश्यकता /जरूरत मानने /समझने लगता है ।जिसका आवश्यकता विवेक खत्म /समाप्त हो जाता है । ऐसे मूर्ख मनुष्य की आवश्यकताओं को दूसरे व्यावसायिक व्यापारी लोग अपने नियंत्रण में लेकर ,दूसरे लोगों की आवश्यकताओं को भी अपने नियंत्रण में लेना ,नियंत्रित करना सीख लिया करते हैं ।। विज्ञापन ,प्रचार , प्रसार ,नाम विस्तार विधा द्वारा ।। ऐसे अनियंत्रित आवश्यकता वाले मूर्ख /मूढ़मति ,वज्रबटुक बुद्धि मानव का जीवन सदैव दरिद्रता ,वामन, वामपंथी, शूद्र ,अशूद्र ,सेवक, श्रमिक ,मजदूर लोगों का जीवन सदैव गरीबी रेखा से नीचले स्तर पर जीवन रेखा भिक्षुण अवस्था भिक्षावृत्ति में दूसरे लोगों से सदैव कुछ न कुछ मांगते हुए व्यतीत होता है ।
कोई भी मनुष्य अपने आप में पूरी तरह से आत्मनिर्भर स्वालंबी नहीं हो सकता है उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरे लोगों के पास जाना होगा ,और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए दूसरे लोगों को अन्न धन शासकीय मुद्रा रुपयों का लालच देना ही पड़ेगा । हम सभी लालच के वशीभूत होकर तरह तरह के परिवारिक सामाजिक ,शासकीय ,धार्मिक संगठन बनाकर सामूहिकता रुप से गांव शहरों में रहते हैं ।ये सभी संगठन समाज मनुष्य धन के आश्रित होकर कार्य करते हैं ।
अक्षरज्ञान मनुष्य समाज की आवश्यकता है ।। पशु समाज की नहीं ।।
जो लोग अपनी आवश्यकता से अधिक अक्षर ज्ञान को संचित / संग्रहित कर लेते हैं ,वे अपने अक्षर ज्ञान में से समाज को प्रवाचक रूप से ,शासकीय ,निजी ,शिक्षण संस्थानों को शिक्षक रुप में , वकील , चिकित्सक , सलाहकार मनुष्य सामाजिक संगठन तंत्रों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी क्षमता, दक्षता को देखते हुए समय समय पर आंशिक तौर से अपने संचित विचारों को अक्षरओं मौखिक लिखित रूप से देते रहते हैं ।और अपने बुद्धि कौशल के अनुसार दान दक्षिणा सलाह सुविधा शुल्क रुप में धन अन्न शासकीय मुद्रा आदि लेते रहते हैं । जैसे गुरु जन ,शिक्षक, निदेशक, निर्देशक , ऋषि मुनि,पंडित, कथाकार, कहानीकार, गायक, लेखक, वकील , चिकित्सक, जज, प्रशासनिक अधिकारी, लिपिक, सचिव , IAS,IPS,IFS,IES,&etc .
रक्षण कार्य मानव की,समाज तंत्र की, घरसमाज की ,दुर्बल लोगों की आवश्यकता है ।।
जो लोग अपनी निजी आवश्यकता से अधिक शक्ति क्षमता दक्षता प्राप्त /हासिल कर लेते हैं सामान्य लोगों की तुलना में, या शक्ति के संसाधनों /हथियार आदि का संग्रह कर लेते हैं । लड़ाई झगड़े युद्ध कौशल में सामान्य लोगों से ज्यादा निपुण होते हैं ।वे समाज के निर्बल डर्रू भयमान लोगों को समय समय पर अभय भाव देते हुए उनका डर दूर करते हुए मनुष्य का, समाज का रक्षण कार्य करते हैं ।वे सुरक्षा कर्मी रुप गार्डस पुलिस, सैनिक ,गुंडई रुप से अपना जीवन यापन :जीविकोपार्जन करते हैं।
स्वास्थ्य सेहत मानव समाज की आवश्यकता है ।।
जो लोग अपनी आवश्यकताओं से अधिक स्वास्थ्य ज्ञान ,चिकित्सा सहायता आदि का संग्रह कर लेते हैं।बाद में वे धीरे धीरे आवश्यकताओं के अनुसार लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं इसके बदले में वे समाज से सिस्टम से दान दक्षिणा अन्न धन शासकीय मुद्रा अपने जीवन हितार्थ लेते हैं दूसरों को देने के लिए , वे चिकित्सक नर्स ,पैरामेडिकल तरीकों से जीविकोपार्जन करते हैं ।शेष का विस्तार करते हुए पाठक गण अपनी ओर से जोड़ कर स्वयं समझ लेंगे ।
डीएनए की नकल का क्या प्रभाव है जो प्रजनन प्रक्रिया पर पूरी तरह से सटीक नहीं है?
Gene track system
F1 __50 +50 %
F2 __25 % +50&25 %
F3 __12.5 % +50 +37.5 %
F4 __6.25 % +50 + 43.75 %
F5 __ 3.125 %. +50. +46.875 %
F 6 __1.5625. %. +50 +48.4375 %
F 7 __ o.8125. %. + 50 +49.2495 %
F 8 __0 .40625. + 50 +49.65575 %
F9 __0.203125 + 50 + 49.858875 %
F 10 __0.1015625 + 50 + 49.960437 % this is the pattern or rule of genetically increase and decrease traits or cherecters which is pass out in to next generation F1 ,F2 F3 F4 F5,F6 F7 F8 F9 F10 .according to mandellow of inheritance
Hence DNA copy pattern effect is not true 100% correct accurately.
Here 50% cherecters comes from male and 50% cherecters come s female.
If we considered only one side cherecters are same 50% is Konstantin there both side cherecters are deviated .
Hence if we wants choice cherecters are increased .then after we make a certain character gene track pattern followed
This is the DNA of chromosomal nuclear genic pattern where male and female both gene participate 50&50 0/0 during reproduction procedure .
But in case of mitochondrial DNA genic pattern is quite differently ,in Which only Mother mitochondrial DNA is pass out in NextGeneration
Because during reproduction fertilization male sperm mitochondria can not entered in female ovum cell, only male sperm head contains chromosomal DNA entered in female ovum cell. Male mitochondrial DNA presents in tail region which is not entered into female ovum cell , if any one mitochondria is entered in the cytoplasm of ovum cell then after male mitochondria destroye in female ovum by phagocytosis by lysosomal enzymes activity.
Hence male mitochondria not pass out in NextGeneration . energy lavel of future generations is totally dependent on mother's mitochondrial DNA presents 100percent .
This process is governed by cytoplasmic domain inheritance rules . Variations, speciation genetic drift, mutation also includes in it .
अंडा देने वाले प्राणी को क्या कहा जाता है?
जीवन उत्तपत्ति धारणा के अनुसार जीव चार प्रकार से पैदा होते हैं ।उद्भिज , स्वेदज , अंडज , जरायुज । भारतीय पुराने विज्ञान मत के अनुसार ।
उद्भिज जीव ःः ये जीव भूमि पर उसके धरातल को तोड़कर अपने आप अपनी निजी जैविक क्षमता से पैदा होते हैं । इसके अलावा पहाड़ों पर टूटे शिला खण्डों के मध्य जो जीव वनस्पति दिखाई देते हैं ,मानवीय क्रियाओं के बिना पैदा होते हैं बिना कृषि कर्म के ,जो प्रज्या कर्म प्रजनन करते दिखाई नहीं देते . उन सभी जीव ओं को उद्भिज जीव कहते हैं ,वनस्पतिक जीव .अदृश्य सूक्ष्मदर्शी जीव . वायरस ,बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ, पोरीफैरा ,सीलेन्ट्रेटा ,प्लैटीहैल्मिंथ ,निमैटोडा ,एनिलिडा .मोल्सका ,इकाईनोडर्मेटा मत्स्य मछली मेढक आदि ।
स्वेदज ःः ये सूक्ष्म जीव उन बड़े जीव ओं के शरीर पर पैदा होते हैं जिन्हें पसींना /स्वेद अधिक मात्रा में आता है, जो अपने स्वेद को पूर्ण रूप से साफ /स्वच्छ नहीं कर सकते ,कर पाते हैं ।ऐसे में उनके शरीर के स्वेद की गंध के अनुसार उनके शरीर पर तरह तरह की शरीर गंध के अनुसार तरह तरह के सूक्ष्म दर्शी अदृश्य दर्शी जीव पैदा हो जाते हैं । सूक्ष्म कवक सृष्टि दाद छाजन एक्जिमा ,बैक्टीरिया सृष्टि ,प्रोटोजोआ सृष्टि, सूक्ष्म आर्थोपोडा जूँ चीलर, कलीली आदि परजीवी सृष्टि उत्पन्न हो जाती है यदि उनके शरीर की सुरक्षा के लिए बनी शरीर में बनी तैलीय ग्रंथियां प्राकृतिक रूप से कार्य करने में पूरी तरह से सक्रिय नहीं होती हैं ।
उनके शरीर पर शरीर सुरक्षा के लिए प्राकृतिक तेल, म्यूकस की परत नहीं होती है ।
अण्डज ःः ये जीव अपनी जातक वृद्धि के लिए प्रजनन की लैंगिक अण्डज विधि का प्रयोग करते हैं ।इन जीव ओं में एक समान जाति के नर जीव उसी स्वजातीय मादा से प्रज्या कर्म मिथुन संसर्ग करते हैं ,मादा स्वजातीय जीव नर स्वजातिय जीव के शरीर अंश शुक्र अणुओं को अपने शरीर के स्त्रिय अंगों में धारण कर लेती ह ।बाद में मादा के स्त्रिय अंगों के अण्डज संकाय में उपस्थित अण्डों से एक एक से एक के अनुसार मिलन कर्म निषेचन होता है ।बाद में निषेचित अण्डे में जीव का सूक्ष्म रूप भ्रूण बनता है , जो अण्डे में विकसित हो जाता है जीव के छोटे बच्चे के रूप में ।बाद में जीव का छोटा रूप उसके बच्चे के रूप में अण्डे से बाहर आता है । सरीसृप जगत, छिपकली कछुआ साँप मगरमच्छ ,पक्षी जगत के सदस्य परवाजी पंख ,परों से युक्त मुर्गा मोर कौआ , आदि तथा स्तनपयी जगत में डकबिल एकिडना अंडे देते हैं ।
जरायुज ःः ये सभी जीव वाहय कान वाले होते हैं इनकी त्वचा पर बाल होते हैं ,इनकी एक जाति दो उप जातक रुप नर व नारी /मादा रुप में होते हैं ,सैक्सुअल डाईमौरफिज्म . सिंगल सैक्स इन टू कास्ट । ये स्तनपयी जगत के बच्चे पैदा कर ने वाले जीव हैं इन जीवों की मादा बच्चे पैदा करती है ।बच्चों के पैदा होने से पहले उनका विकास मादा के गर्भाशय में एक सुरक्षित आवरण जेर में पलेसैंटा नाभि नाल द्वारा निर्धारित समय तक होता है ।पूर्ण विकास पश्चात एक निर्धारित निश्चित समय पश्चात बच्चे नाभि नाल सहित जेर में सुरक्षित रूप से मादा के योनिद्वार अंग से बाहर आता है ।उतपत्ति के समय बच्चे के जेरीसुरक्षा आवरण में आने से इन्हें जरायुज कहते हैं । मनुष्य गाय भैंस बकरी बंदर सिंह कुत्ता आदि
चार चैंबर दिल होने पर क्या फायदा?
विकास की प्रक्रिया में अकशेरुकी जीव ओं में एक चैंबर दिल होता है जो स्पंदन धडकन के दौरान रक्त संचार क्रियान्वयन में केवल रक्त को रक्त नलिकाओं में हिलाया करता है रक्त को निश्चित दिशाओं में नहीं संचालित करता है ।
कशेरुकी जीवों में प्रथम विकास शील प्रथम श्रेणी जीव मत्स्य/मछलियों का हृदय द्विकक्षीय होता है जिसमें एक वाल्व होता है जिससे रक्त एक निश्चित दिशा में बहता है रक्त में शुद्ध आक्सीजन वाला शवासन अंग गिल क्षेत्र में से शरीर में जाता रहता ह ।मस्तिष्क को अलग से शुद्ध रक्त नहीं मिलता ,शुद्ध आक्सीजन युक्त तथा अशुद्ध कारबनडाईआकसाईड रक्त मिश्रित होकर बहता है । मत्स्य /मछलियों की तुलना में उच्च विकसित उभयचर ओं मेढक ओं टोड का हृदय त्रिकक्षीय तीन चैंम्बर दो अलिंद एक निलय वाला होता है जिससे मेढकों टोड में तीन तरह का रक्त हृदय से प्रवाहित होता है , अधिकांश शुद्ध रक्त मस्तिष्क में प्रथम जाता है, शेष शुद्ध रक्त शरीर के अंगों में जाता है अशुद्ध रक्त कारबनडाईआकसाईड वाला फेफडों में जाता है ।कैरोटिड आर्क ,सिस्टैमैटिक आर्क , पल्मोनरी आर्क रक्त वितरण प्रणाली से ।इनमें शुद्ध अशुद्ध रक्त का मिश्रण हो जाता है । न पूर्ण शुद्ध रक्त हृदय से मस्तिष्क में जाता है न पूर्ण अशुद्ध रक्त फेफडों में जाता है पल्मोनरी आर्क सिस्टम द्वारा ।
चार चैंम्बर वाला हृदय स्तनधारी वर्ग के जन्तुओं का होता है जिसमें दो दायां अलिंद फेफड़ों से शुद्ध रक्त , बाँया अलिंद फेफडों सेअशुद्ध रक्त लेते हैं । दो निलय कक्ष दायाँ निलय शुद्ध रक्त धमनियां कक्ष में भेजता है बाँया निलय बाँयें अलिंद से प्राप्त अशुद्ध रक्त को फेफडों में भेजता है । चार कक्षीय हृदय होने से शुद्ध आकसीजन युक्त तथा कारबनडाईआक्साईड युक्त अल्प आकसीजन वाला रक्त अलग अलग रहता है । मस्तिष्क और शरीर के सभी अगों को पूर्ण शुद्ध आक्सीजन युक्त रक्त मिलने से स्तनधारी ओं का शरीर और मस्तिष्क अन्य जीव की तुलना में अधिक सक्षम सक्रिय होता है ।जिस कारण से मैमेलियन /स्तनधारी जीवों का विकास उच्च स्तरीय कहा जाता है ।अधिक मस्तिष्क सक्रिय , अधिक शरीर सक्रिय ।
दार्शनिक जबाब :
दिल में चार चैम्बर तो होते हैं ।पता चल गया ।।
नयी पहेली
एक शरीर में चार दिल होते हैं दो दिल दिमाग में एक हाईपोथैलामस या त्रिकुटी दूसरा जीभ ।
दो दिल धड़ में होते हैं एक हृदय ऊपरी एक हृदय निचला जिसे जातक हृदय गर्भाशय/शुक्र आश्य कहते हैं
इन चार ओं में एक समानता है । हृ से हरण द से देना य से यह जो स्थिर स्थित स्थान अमर है ।
क्या सक्रिय लकड़ी का कोयला काले मस्से और मुहासे का इलाज करता है?
यह अफवाह कहूँ या मित्थया कथन या फिर अपने आप को खुद ही धोखा देने जैसा है ।मैं इस पर अपना निजी सत्य अनुभव बयान कर रहा हूँ ।
मेरी बेटी को29सितंबर2015 को बेटा हुआ ,पैदा होने के8दिन बाद बेटे को दस्त की शिकायत बनी जो ठीक होने में नहीं आयी बच्चा खूब माँ का दूध पीता रहता दस्त करता रहता दस्तों की अधिकता से उसका मलद्वार स्थान के आस पास का स्थान की त्वचा गलकर फटने लगी ,बच्चे का इलाज 9 वें दिन से शुरू करवा दिया MBBS ,MD , बाल रोग विशेषज्ञों चिकित्सक द्वारा ,देशी आयुर्वेदिक दवाई मल्हम नीम, बोरोप्लस आदि जिसने बताया । पर मलद्वार क्षेत्र के आसपास की त्वचा कभी कभार ठीक दिखाई देती फिर अगले दिन फटी हुई क्षतिग्रस्त दिखाई देती । सभी परेशान कि ये कैसा रोग है जो दिल्ली में बाल रोग विशेषज्ञ ओं से भी ठीक नहीं हो पा रहा है ।
डाक्टर लोग हमारा ध्यान रोग के स्थान से हटाने को कोई नीली इंकी दवा ई देता ,कोई क्रिस्टल वायलट की बैंगनी रंगों की दवाएं देते . हमको जब तक रोग क्षेत्र दवाइयों से छिपा होता दिखाई नहीं देता ।एक सप्ताह के बाद कारनिफिकेशन प्रक्रिया पश्चात जब पुरानी त्वचा हटती तब रोग ग्रसित स्थान की त्वचा फिर से दिखाई देने लगती हम सभी परेशान थे ,ये कैसा रोग है जो ठीक नहीं हो पा रहा है । इस बीच रोग की बढती स्थिति देख कर उस पर नीम का स्वनिर्मित मल्हम लगाया जाता तो आराम हो जाता था ।3दिन बाद फिर वही क्षतिग्रस्त त्वचा दिखाई देने लगती । मेरा मन परेशान आखिर ये कैसा रोग है जिसमें फायदा नहीं होता है । बाल रोग चिकित्सक और अन्य शुभ चिंतन कर्ता सफाई की कमी बताया करते मैं परेशान था इस नये रोग से । तभी एक दिन एक बूढी पडोस की माँ आयीं और बताया
बच्चे को चुन्ने का या ततैया का रोग हो गया इसका इलाज कोई पुराना हकीम /वैद्यक कर सकता है ये रोग नये डाक्टर ओं की समझ से परे है ।
बस यही वाक्य काफी था । हमको जागरूक करने को । हमारे पास ही बुलंद शहर में पुराने यूनानी तिब्बी हकीम जी के पुत्र काली नदी के पुल के पास रहते हैं । मैं ने बच्चे को उन्हें दिखाने को भेजा साथ में छोटी बेटी को कैमरा मोबाइल देकर कहा कि वो जब हकीम थी इलाज करें तो वह विडिओ बना ती रहे ।
हकीम जी ने इलाज शुरू किया जो हुआ वह चमत्कार था ।बच्चे के मल द्वार से छोटे छोटे कृमि यों के बच्चे लार्वा छोटे छोटे गिंडार जैसे जमीन पर गिर ने लगे । वैद्य जी ने कृमि नाशक दवाई खिलाने को दी ,बच्चे की अति अल्प आयु को विषैली कृमि नाशक दवाई नहीं खिलाई पर 10दिन बाद बच्चे को फिर भेजा ,तो देखा अबकी बार लार्वा/छोटे न होकर बड़े बड़े थे जो मल द्वार से गिर रहे थे ।
बस फिर क्या था , रोग के कारक लार्वा के फोटो मिलने के बाद में उनके अध्ययन में जुट गया . मैं ने प्राणी शास्त्र में परजीवी यों का फिर से अध्ययन किया तो पता चला
बच्चे को माईसिस रोग हो गया था जिसका इलाज आपरेशन से आँतों की सफाई करना था वह भी एक माह के बच्चे की , आपरेशन की कामयाबी की सफलता आधी । बच्चे के लिए दवाई के साथ दुआ पूजा स्तुति शुरू इस दोरान बच्चे को जीवन क्षमता बढाने की दवा एं चलती रही .बाद में फिर दोबारा हकीम जी को दिखाया गया ,अन्तिम बार के वाकये पर पाठक बन्धु यकीन नहीं करेंगे बच्चे के मल द्वार से छोटे छोटे मकड़ी जैसे छोटे छोटे पंख वाले 4/5 कीड़े गिरे जिनको देख कर बच्चे का बाप यानि मेरा दामाद को गश /हल्का बेहोश होने लगा ।
प्रश्न कर्ता भाई मेरा आपसे अनुरोध है कि ऐसे बहम को मानसिक बल न दें ।कारबन /काला कोयला चेहरे पर लगाने पर मुँहासे आपको उस समय दिखाई नहीं देंगे जब तक चेहरे पर कोयला का चूर्ण/पाउडर लगा रहे गा ।जैसे ही कोयला पाउडर हटेगा मुँहासे फिर से दिखाई देंगे । मुहासों का कारण बाल की जड़ो में ,त्वचा के रोम कूप छोटे छोटे त्वक छिद्रों में रहनेवाले बैक्टीरिया /माईक्रो आर्थोपोडा आदि सूक्ष्म जीव के उपस्थित हो ने से होता है जो तैलीय त्वचा में त्वचा की तैलीय ग्रंथियों के तेल से बन्द होकर मर जाते हैं ।
इनका इलाज त्वचा की सफाई ह न कि त्वचा पर कोयला पाउडर लगाकर संक्रमित त्वचा को आँखों से ओझल रखना ।
यही बात एपिथिलियक कैंसर /त्वचा पर बने मस्सों पर भी लागू होती है । मस्सों का देशी /आयुर्वेदिक /यूनानी ईलाज बहुत अच्छा उप लब्ध ह । सावधानी बरतें त्वचा की जलन के प्रति /खुजली के प्रति जागरूक रहे । त्वचा को जलन खुजली से बचायें मस्से खुद ब खुद कम हो जायेंगे । होम्योपैथी क दवा थूजा का सेवन होम्योपैथी क चिकित्सक के निर्देशन में करें ।
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