वर्तमान में समाज में कितने प्रकार की शिक्षा पद्धतियाँ व्याप्त हैं ?

शिक्षा शब्द का आशय स्वयं बोलता है :-- सीखो अच्छा "  यह जीवों की यह जैविक प्रक्रिया अन्य जीवों की तुलना में मनुष्य में जन्म लेने के बाद तेजी से आरंभ हो जाती हैं, जैसे ही उसमें जीवन जीने की इच्छा के प्रति चेतना जागने लगती है । उसमें अपना जीवन जीने , अपने जीवन को बचाने ,, अपने जीवन को सुरक्षा देने की भावना आने लगती है ।  जिससे वह लघु मानव शैशवावस्था में जन्म लेने के 20 दिन बाद से ही वह समाज में वातावरण में सभी से सीखने लग जाता है शिशु में सीखने की प्रक्रिया पूर्व जन्म की स्मृति के आधार पर जन्म के समय मौजूद होती है । जन्म लेने के बाद चेतन उदित होने पर जागरूकता उत्पन्न होने पर 20 दिन बाद से ही वह शिशु अपने जीवन के लिए हितकारी शुरुआती जीवन उपयोगी लाइफ टिप्स जिन्हें सम्मिलित रूप से आरंभिक शिक्षा कहा जाता है वह सीखने का प्रयत्न आरंभ कर देता है ।    

     आमतौर पर शिक्षा का व्यापक अर्थ स्कूली शिक्षा को समझा जाता है परन्तु बच्चे स्कूल जाने से पहले घर परिवार के समाज से जीवन प्रक्रिया के काफी आरंभिक चरण  अपनी अपनी सामाजिक स्थितिक अनुसार सीख चुके होते हैं परंतु उनकी यह परिवार में शिक्षा सीखने की प्रगतिदार अत्यंत मंद होती है इस शिक्षा को तीव्र गति से सीखने के लिए बच्चे सामूहिक शिक्षण केंद्र विद्यालय स्कूल या मदरसा मैं शिक्षा द्वारा अच्छा सीखने के लिए बचपन से जाना आरंभ कर देते है ।   शिक्षा एक निश्चित धार्मिक सामाजिक जीवन राष्ट्रीय योजना के अंतर्गत निश्चित स्थान विद्यालय में निर्धारित पाठ्यक्रम पड़ने पर ही संपन्न होती है । लोग उसे ही शिक्षा कहते हैं ।।        जबकि मेरे विचार से शिक्षा की यह परिभाषा पूरी तरह से ठीक नहीं है । मेरे विचार से शिक्षा बच्चा जन्म के 15 दिन बाद से ही पहले महीने में तीसरे महीने से तेजी से सीखना शुरू कर देता है । जिसमें वह  अपने को दूसरों की अप्रिय प्रेरणा अप्रिय संवेदनशीलता से उनके अप्रिय व्यवहार से बचने का प्रयास शुरू कर देता है । इस दौरान बच्चे की मां के शैशव गान लोरियों का प्रभाव उस बच्चे पर पड़ने लगता है । यदि वह लोरियां अच्छी-अच्छी गाती सुनाती है । तो बच्चे का विकास अलग दिशा में चलने लगता है । यदि रहे बच्चे को मां लोरियां नहीं सुनाती है तो बच्चे में संवाद सवेदनशीलता  // कम्युनिकेशन स्किल का विकास रुक सा जाता है । वह दूसरों की बातें सुनना पसंद नहीं करता दूसरों की सुनाई बातों पर गौर नहीं करता । इसमें गौर करने की बात यह है कि जो मां बच्चे को हर समय अधिकतम लोरियां सुनाती रहती है । परंतु बच्चा कभी कभी मूड होने पर ही उन लोरियों के गान को सुनकर स्वीकार कर पाता है ।  

   उसके बाद जब वह 1 वर्ष का हो जाता है तो उसमें सीखने की प्रक्रिया और भी ज्यादा  तेजी से विकसित होने लगती है । जिसमें वह अपने जीवन के लाइफ टिप्स परिवार के लोगों मां से अधिकतम पिता से न्यूनतम  को देखकर और वातावरण के दूसरे लोग पशु पक्षी आदि की अप्रिय संवेदनशीलता को समझ कर तेजी से सीखता है । इस सीखने की प्रक्रिया में जब वह 2 साल का हो जाता है तो उसके सीखने की प्रक्रिया में मां बाप के अलावा घर परिवार के लोग जुड़ जाते हैं , वह उनसे भी सीखने लगता है ।  जब वह 5 वर्ष के पश्चात घर से बाहर निकल कर स्कूल  जाना शुरू कर देता है तो वह बाहर घर समाज परिवार और वातावरण सभी से सीखने लगता है । सीखने की प्रक्रिया जीवन में पैदा होने से शुरू हो जाती है जो सामान्य लोगों में स्कूली शिक्षा के रूप में 20 वर्ष तक चलती है ,  परंतु  कुछ ऐसे लोग होते हैं जो मरते दम तक सीखते रहते हैं ऐसे लोगों को लचीली  बुद्धि वाले परम बुद्धिमान विवेकशील लोग समझा जाता है ।।

      सीखने की प्रक्रिया में अधिकतर लोग सिर्फ स्कूली शिक्षा को शिक्षा समझकर स्कूली शिक्षा को सीखने पर जोर देते हैं जबकि मेरे अनुभव के अनुसार हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब और किस किस तरह से स्कूली शिक्षा से हटकर शिक्षा के अन्य औपचारिक वैकल्पिक स्रोत जैसे सत्संग * , सभा * , पंचायत *, गोष्ठी * ,मित्रों की मंडली से* , अपने बड़े छोटे सभी लोगों की बातें सुनकर के अपने को शिक्षित करते रहते हैं । जिसे पर्सनालिटी डेवलपमेंट कहते हैं । आमतौर पर पाठ्यक्रम की शिक्षा को ही शिक्षा माना गया है । लेकिन मेरे विचार से बच्चा स्कूल में जाकर पाठ्यक्रम से ज्यादा अपने स्कूल के सहपाठियों से , कमतर निजी मनन चिंतन से ज्यादा  , परन्तु स्कूल  के शिक्षकों के निर्देशन में क्रियाकलापों से ज्यादा  सीखते हैं ।  

   जिन के मन पर   सहपाठियों का ज्यादा रंग चढ़ जाता है वह स्कूली पाठ्यक्रम की शिक्षा में स्कूल शिक्षक प्रदत्त शिक्षा में कम रुचि लेते हैं । स्कूल की शिक्षा से दूर चले जाते हैं । जिसे  असामाजिक शिक्षा या अपराधी शिक्षा कहा जा सकता है । जो बच्चे घर से बाहर मानव समाज में स्कूली  समाज से हटकर  असामाजिक अनुपयोगी शिक्षा अपने हित के लिए के लिए सीखते हैं जो बकवाद बकवास गपशप कही जाती है। स्कूली शिक्षा की तुलना मे उस गप्पू शिक्षा को मुफ्त में प्राप्त असामाजिक लोगों से प्राप्त  शिक्षा को अपने लिए हितकारी ज्यादा अच्छा उपयोगी समझते है । उस असमाजिक अनुपयोगी शिक्षा को अपनाकर अपराध जगत में चले जाते हैं । असामाजिक दृष्टिकोण अपना लेते हैं ।,  
   जिनके मन पर स्कूली शिक्षा और  शिक्षा शिक्षकों का रंग चढ़ता है । वह स्कूली पाठ्यक्रम से जुड़ कर के परिवार समाज और राष्ट्र की उपयोगी विचार धारा से जुड़ कर के समाज के लिए उपयोगी शिक्षित नागरिक बन जाते हैं ।। 
         जिन छात्रों के मन में शिक्षा द्वारा निजी हित या सामाजिक हित में चिंतन मनन विचारण  के गुंण अवसर के अनुसार नयी अपने लिए हितकारी सोच  उत्पन्न हो जाती है. यह अपने जीवन में अपने लिए प्रायोरिटी वरीयता तय करना सीख जाते हैं इसके अलावा यह है समाज के दूसरे लोगों के बकवादी बातें व्यर्थ के ज्ञान पर ध्यान नहीं देते । मात्र वहीं छात्र समाज के दिशा निर्देशक उच्च कोटि के व्यापारी उद्योगपति  राजनीतिकार प्रशासनिक अधिकारी बन पाते हैं ।  जो छात्र शिक्षकों की शिक्षा से  ज्यादा अभिप्रेरित हो जाते हैं वह शिक्षा के दौरान या उच्च शिक्षा प्राप्त करके निजी हित कम सामाजिक हित अधिकतम उपयोगी ज्ञान सूचना अपने मन में संचित करके बुद्धि मन विवेक शीलता से शिक्षक लेखक सहित्यकार पत्रकार आदि सामाजिक जगत में या समाज के अन्य जगत में सेवा दाता बन जाते हैं । परंतु जो मित्रों की ओर ज्यादा अभिप्रेरित हैं और उनकी मित्र मंडली भी अच्छे लोगों की है तो वह मित्रों की संगत से अच्छी निर्माणात्मक दिशा की ओर चल पड़ते हैं यदि मित्रों की मंडली संगत अच्छी नहीं है तो वे विनाश आत्मक दिशा अपराध जगत की ओर चल पड़ते हैं।   ऐसे में शिक्षा को मात्र स्कूली शिक्षा तक सीमित करके शिक्षा को छोटा ना समझते हुए शिक्षा के प्रति दायरे को बढ़ा करते हुए हम अपनी सोच को यदि लर्निगमाइंड या सतत शिक्षा का बना लेते हैं अर्थात इस दुनिया में हमें प्रत्येक जीव प्रत्येक मनुष्य कुछ ना कुछ हमको सिखा रहा है । हम सभी से कुछ ना कुछ सीख रहे होते हैं । अब यह बात अलग है कि हमने क्या कुछ अलग सीखा जो उपयोगी था या हमारे लिए अनुपयोगी था जो शिक्षा के पश्चात निरर्थक सिद्ध हुआ । जिसके शिक्षण में हमारा धन और समय व्यर्थ गया जिसके शिक्षा का हमने अपने निजी जीवन में कोई लाभ नहीं उठाया ऐसी निरस्तकारी शिक्षा को व्यर्थ शिक्षा कहा जाता है । 
    इस सीखने की प्रक्रिया में यदि मनुष्य अच्छे आध्यात्मिक गुरु के संपर्क में आ जाते हैं जो उन्हें चिंतन मनन की मौलिक साधनाएं विधि सिखा देते हैं जिससे उनका अपने निजी जीवन संचालक मस्तिष्क के अवचेतन मन से संपर्क करना आ जाता है । तो ऐसे अवचेतन मन से  नियंत्रित संपर्कित  छात्र अपने जीवन में सबसे अधिक प्रगति करते हैं । वे छात्र यदि कहीं भटकते हैं गलती करते हैं तो ऐसे में उन्हें उनके अवचेतन मन से आने वाली निजी अंतर चेतना आवाज समय-समय पर रोक कर उचित दिशा में मार्ग   निर्देशित करती रहती है । इस प्रकार से यह सामान्य लोगों और छात्रों की लीक से हटकर अपने मंन की अवचेतन मन की बात को सुनते हुए अपने मन के अवचेतन स्तर से जीने वाले छात्र अपने जीवन में अधिकतम प्रगति करते हैं ।       @परंतु कुछ लोग इनसे भी ऊपर होते हैं जो अपने अवचेतन मन को नियंत्रित करना अपने अवचेतन मन को आवश्यक निर्देश देकर नियंत्रित करना सीख जाते हैं । उनमें से नियंत्रित अवचेतन मन मस्तिष्क वाले छात्र और अधिक तरक्की करते हैं परंतु जो छात्र अपने मन के सुपर चेतन स्तर सुपर ईगो से जीते हैं वे छात्र समाज के संचालक फरिश्ते और सर्वोत्तम उपयोगी नागरिक बनते हैं । इस प्रकार से शिक्षा में मस्तिष्क नियंत्रण विचार नियंत्रण की विधा का महत्व सबसे अधिक और सर्वोपरि है जिसके आधार पर हमारा विवेक कार्य करता है।
         यह हमारी निजी विवेक पर निर्भर करता है इसमें हम यदि सुनना समझना सोचना और बोलना इस प्रक्रिया को सही तरीके से सीख जाते हैं जिसे ज्ञान मार्ग कहा जाता है । जिसे सुने सबकी करें मन की ,,  तभी हम सही मायनों में शिक्षित हो पाते हैं । अन्यथा दूसरे लोगों के हर किसी की बात को ध्यान देकर सुनने के बाद उसे ज्यों का त्यों अपनालेने पर वह उसकी बात हमारे दिमाग में बैठती चली जाती हैं जो हमको ‌हाईपोकोन्डरियास का मनोरोगी बना दिया करती है , जिससे उसके बाद  निरर्थक बातों की अधिकता के कारण हमारा दिमाग निरर्थक बातों पर आधारित निरर्थक क्रिया कलाप के अनुसार अनियंत्रित निर्थक व्यवहार करने लगता है । जिससे हम समाज में परिवार में फेल होते दिखाई देते हैं । इस फेल होने की प्रक्रिया से बचने के लिए शिक्षा का अहम पक्ष सेल्फ माइंडसेटिंग या अपने दिमाग की अपने आप सेटिंग करना और सैल्फ ब्रेनवॉश आना चाहिए यह बहुत जरूरी है । यदि सेल्फ माइंडसेटिंग का फंडा हमारे दिमाग में आ जाता है , और हम अपने दिमाग को अपने हिसाब से सेट करना सीख जाते हैं । तो हमारे दिमाग पर दूसरों का शब्दों का जादू प्रभाव नहीं चल पाता ।। ऐसे में हम अपने जीवन में अधिकतम तरक्की करते हैं , परंतु जो लोग अल्प शिक्षित हैं जिनके परिवार में शिक्षित नहीं हैं अगर उन्हें अपनी तरक्की करनी है तो ऐसे में उन्हें दूसरे लोगों के शब्दों को ग्रहण करना उनकी मजबूरी है ,  उनका विकास दूसरे लोगों को देखकर उनके प्रेरणा शब्दों को सुनकर  होता है । इन दूसरे लोगों के शब्दों को ग्रहण करते समय हमें इस बात का खास ध्यान रखना पड़ता है । हमें जो दूसरे लोग शब्द दे रहे हैं क्या वह अपराधी मनोवृति के लोग हैं ? या सामान्य श्रेष्ठ लोग हैं , या असामान्य श्रेष्ठ लोग हैं या असामान्य सामान्य प्रकार के अपराधी सोच के भ्रमित करने वाले धुर्वे धुर्रा धूर्त राजनीतिक  लोग हैं । ऐसे में हम अपनी तरक्की सिर्फ उन धार्मिक लोगों के विचारों के ऊपर आधारित होकर कर सकते हैं । जिनकी सोच सामान्य या असामान्य रूप से श्रेष्ठ लोगों की श्रेणी में होती है ।।
      ऐसे में माइंडसेटिंग में हमें इस बात का भी विशेष ध्यान रख कर के हमें उन लोगों के विचारों को अहमियत नहीं देनी चाहिए , जिन लोगों के विचार निरर्थक हमें भ्रमित करने वाले किंकर्तव्यविमूढ़ किंकर बनाने वाले हैं । हमें समाज उपयोगी विचार देने वाली लोगों के विचार सुनने चाहिए परिवार के उपयोगी लोगों के विचार सुनने चाहिए तभी हम अपने विचार विश्लेषण द्वारा दूसरों के विचारों से भी लाभ उठाकर तरक्की कर सकते हैं । विचारों की प्रक्रिया श्रृंखला उस दूध के समान होती है , जिसमें बहुत अधिक परिमाण में पानी अल्प परिमाण में पोषक वसा आदि तत्व होते हैं । ऐसे में हम अपना ध्यान मात्र मानसिक पोषण विचारों  (पोषक प्रोटीन और वसा पर रखना चाहिए ना कि पानी पर क्योंकि पानी और पोषक प्रोटीन भी मट्ठा के रूप में बाहर निकल जाती है ) इस प्रकार से मक्खन और घी के रूप में हम न्यूनतम उच्च उत्तम विचारों का संग्रह अपने पास कर पाते हैं । सभी तरह के विचारों के संग्रह का कारण मध्य शब्द चित्र दृश्यंकन युक्त ज्ञान है। जो ऊर्जा से पूरित ऊर्जा से युक्त होता है । 
    फ्रायड के अनुसार हर शब्द एक सूक्ष्म ऊर्जा पिंड बम स्वरूप होता है । हमारा मन मस्तिष्क जिस प्रकार के शब्दों को संचित करता है उन शब्दों के अनुसार हमारे विचारों द्वारा संचालित हमारे मस्तिष्क में ऊर्जा भरती चली जाती है । बोला गया प्रत्येक शब्द ऊर्जावान होता है वह नकारात्मकता/सकारात्मकता  दोनों के प्रभाव युक्त होता है यह हमारी इच्छा मर्जी पर निर्भर है कि हम सकारात्मक शब्दों को ग्रहण करें नकारात्मक शब्दों का त्याग करें। इस प्रकार से अध्ययन किए गए ज्ञान के द्वारा दूसरे लोगों‌ से प्राप्त मार्गदर्शी ज्ञान से हमारा मन दूसरे लोगों से मिले  शब्दों  चित्रों दृश्य दर्शन के प्रभाव से अपने आप नियंत्रित होता चला जाता है ।
   इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमें शब्दों चित्रों दृश्य दर्शन के प्रति अत्यंत संवेदी और जागरूक रहते हुए शब्दों चित्रों दार्शनिक  के ज्ञान ग्रहण करने सुनने से पहले जागरूक होकर गौर करके वक्ता को देखकर ही वक्ता के शब्द सुनने चाहिए कि वक्ता  राजनीतिक भूत है या सच्चा धार्मिक मनुज है ।। इसी बात को हम और आगे बढ़ाते हुए अपनी शिक्षा को जो स्कूल में शिक्षा ले रहे हैं । उसमें भी संवेदी होकर स्कूल में दाखिल होते समय आगे के लेख को पढ़ते हुए :----  जागरूक होकर स्कूल में जागरूक रहना चाहिए कि स्कूल में शिक्षा के छः:६ प्रकार की शिक्षा में से कौन-कौन सी शिक्षा में दी जा रही है
 जिसमें से हम केवल 1  आदर्शवादी शिक्षा को अपने लिए ग्रहण करें ,2 प्रकृति वादी शिक्षा को दूसरों के लिए ग्रहण करें ,3 प्रयोजनवादी शिक्षा को समाज के लिए ग्रहण करें , 4  यथार्थवादी शिक्षा को बोलने दूसरों सुनाने के लिए संयम संज्ञान से ग्रहण करें ,  5 आदेशात्मक अवसरवादी शिक्षा को अफसरों के अनुसार उपयोग करें ,,6 रहस्यवादी छलिया ज्ञान करण खोजी शिक्षा को अपने दिमाग की मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए अवश्य सीखना चाहिए । 
यदि हम शिक्षा संस्थानों में स्कूलों में इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे तभी हम शिक्षा को सही मायनों में समग्र रूप से ग्रहण करते हुए अपने जीवन को सिद्ध सार्थक बनाने में कामयाब हो पाएंगे ।
       वर्तमान समय में  पहले पांच प्रकार के विद्यालय  अनुभव अनूभूतियाँ किए गए हैं अंतिम छतवान रहस्यवादी शिक्षा देने वाले स्कूल समाज में नहीं ह । जो वासना ,कामना धर्म धारण , कर्म विधि ,कर्म बंधन , शिक्षा स्थानांतरण , शिक्षा पद्धति , शिक्षा के गुण नियंत्रण के अनुसार अनुभव किए गए हैं । परंतु छठा ज्ञान चैनल रहस्यवादी शिक्षा रहस्य उद्धघाटन  पाखंड खंडन को गोपनीय /गुप्त  रखा गया है।
1:- आदर्श वादी शिक्षा यह शिक्षा ब्रह्मवाद के अनुसार या ईश्वरीय चैतन्यता विधान नियम आदर्शवाद के अनुसार संचालित होती है । जिसमें वासना  संस्कार भाव  जो  जीव के निजी   चेतना में संचित रहते हैं । वह उत्तम शिक्षा के प्रभाव से बाहर निकल कर प्रस्फुटित होते हैं तो अधम /पतनकारी शिक्षा  प्रभाव से दवे के दवे रह जाते हैं । इस शिक्षा में धर्म कर्म भाव  जीव की आवश्यकता के अनुसार निश्चित है इस प्रकार की शिक्षा में शिष्य का स्थान प्रमुख गुरु का स्थान द्वितीय है । इसमें शिष्य अपनी रुचि की और आवश्यकता के अनुसार अधिकतम अधिगम करता है । इस प्रकार की शिक्षा ही मनुष्य को जीवन में अधिकतम प्रगति विकास कराने में सक्षम है यह शिक्षा सार्वजनिक सत्य भौतिक * सत्य नीति * कथन पर आश्रित है । जो लोग अपने निजी जीवन में सत्य को जितने अंश में निजी तौर पर तथा परिवार में संचित करते हैं वह उतनी ही तरक्की कर के अगले स्तर में चले जाते हैं। जो लोग सत्य को नहीं स्वीकार करते सत्य से बचते हैं वह अपने उसी जीवन स्तर में बने रहते हैं जिसमें वह पैदा हुए थे ।।। इस शिक्षा की कर्म विधि में शिक्षा के दोनों पूरक  सोपान गुरु और शिष्य को एक दूसरे के हितों को देखते हुए उनकी  क्षमता पात्रता योग्यता दक्षता क्षमता   के अनुसार शिक्षा दी जाती है । जिसका परिणाम अधिकतम अधिगम के रूप में आता है । इसमें कर्म बंधन का नियम दोनों पूरक गुरु शिष्य सोपानों /चरणों  में गुरु प्राण या नर समान दाता भाव  शिष्य  इंद्री या नारी ग्रहणकर्ता  भाव समान  शिष्य का महत्व होता है । यह शिक्षा * देवत्व विधि शिक्षा पद्धति शिक्षा * कही जाती है जिसमें गुरु और शिष्य के मन में, कर्म में, धर्म में, वचन में हिंसा की संभावना न्यूनतम होती है हिंसा हिंसा विवेक को प्रधानता दी जाती है ।  आदर्श वादी शिक्षा अहिंसा वादी शिक्षा कही जाती है। यह आदर्शवादी शिक्षा नीति प्रधान होती है जो समाज के 90% लोगों के विचारों के अनुसार 90% लोगों को संतुष्ट करती है परंतु 10% लोग अति विकासवादी विचारणा के कारण इससे असंतुष्ट रहते हैं।
        परंतु वर्तमान समय के परिपेक्ष में देखते हुए यह आदर्शवादी शिक्षा  मनुष्य को मूर्ख बनाने की ओर धूर्त लोगों का एक कदम बन गया है। जिसमें साधारण मनुष्य में ईश्वर उचित गुण भरने का प्रयास किया जा रहा है । प्रत्येक मनुष्य से उसके ईश्वर स्वरूप में प्रतिष्ठित होने की आशा की जाती है ।जो  कि असंभव है मनुष्य जीव भावधारी होने के कारण किसी भी स्थिति में पूर्णतया ईश्वर नहीं बन सकता वह ईशिता गुण अवश्य सीख सकता है । यदि वह ईश्वर होता तो जीव अवस्था में जन्म लेकर पैदा ना होता परंतु अवतारवाद के सिद्धांत से इससे सही सिद्ध करने का प्रयास किया गया है जो उचित नहीं है । साधारण लोग को सच और इमानदारी का भयंकर पाठ पढ़ा कर उसमें ईश्वरयता लाने का प्रयास किया जाता है। जिससे वह मनुष्य स्वयं को ईश्वर बनने समझने के फेर में सब को नियंत्रित करने में लग जाता है। उसमें अकारण सभी से लड़ाई झगड़ा करने , संघर्ष करने, सभी को नियंत्रित करने का ईश्वरीय गुण आने की सोच बन जाती है जो उचित नहीं है । जबकि प्रकृति में वास्तविक जीवन में जीव का ईश्वर बन्ना मिथ्या कल्पना है इस मिथ्या कल्पना के चलते लोग धूर्तता पूर्ण जीवन प्रणाली अपनाते हैं । दूसरों को सत्य मार्ग पर चलने का आदेश निर्देश देते हैं जबकि वह अपने निजी जीवन में उतने ही ज्यादा सत्य से दो असत्य की ओर चलते हुए लक्षित होते हैं । इस आदर्श वादी  शिक्षा के संचालक लोग अपने स्तर पर अपनी भ्रष्टता  दुष्टता दूसरों को धोखा देना लक्ष्य से भ्रमित करने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं । 
2:-  प्रकृतिवादी या इंद्र वादी भाव के रूप में जानी जाती है । जो शिक्षा में विस्तार वाद या बृहस्पति की सोच सूचक होती है यह शिक्षा रीति रिवाज  प्रधान शिक्षा होती है। इस शिक्षा में प्रजा में से आधे लोग सदैव राजा या शासक हित प्रधान होते हैं आधे लोग स्वहित   प्रधान  विद्रोही कहे जाते हैं इस प्रकार से यह समाज की भ्रम व्यवस्था की शिक्षा कही जाती है जिसमें लोग सदैव भ्रम में रहते हैं । प्रकृति भी सभी जीवो को नियंत्रित करने के प्रयास में उन सभी जीवों को जन्म देकर मरने तक उनको नियंत्रित करने के प्रयास में  पीड़ित करने  मारने में लगी रहती है । जो जीव प्रकृति की मार उष्णन शीतलन को सहन करने में समर्थ हो जाते हैं । वे सक्षम और समर्थवान कहे जाते हैं , जो प्रकृति की मार को सहन नहीं कर पाते वह अकाल मौत मर जाते हैं क्योंकि वह जीवन जीने में सक्षम नहीं होते हैं । 
      प्रकृति के द्वारा सृष्टि नियंत्रण के गुण को जो लोग समझ सीख जाते हैं वह समाज के दूसरे लोगों को नियंत्रित करने के लिए राज धर्म अपनाकर समाज के निजी लोग और दूसरे समाज के दूसरे लोग सभी को नियंत्रित करने के लिए राजधर्म से तरह-तरह के नीति नीति नियम बनाकर समाज संचालन करने में लगे रहते हैं ।
   यह प्रकृति वादी शिक्षा राज प्रवृत्ति के लोगों द्वारा जनता के लोगों को नियंत्रित करने के लिए शासक वर्ग के द्वारा लोगों को नियंत्रित करने की दिशा में उनको मानसिक गुलामी की ओर ले जाती है । दुष्ट क्षत्रिय लोगों के द्वारा अपनी सभ्यता संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिए दूसरी प्रकार की सभ्यता संस्कृति को नष्ट करने के लिए संस्कृति के युगपरुष बनने के प्रयास , संस्कृति के संचालक इंद्रपुरुष बनने के प्रयत्न , संस्कृति के रक्षक राज पुरुषओं के कोशिश  द्वारा संचालित की जाती है ।  इसमें शिक्षा का धर्म भय से प्रजा नियंत्रण तथा प्रजा को मूर्ख बनाना प्रधान होता है । इसकी कर्म विधि पशुज प्रकार की मारा पीटी /मारकाट से दूसरे जीवों को नियंत्रित करने की होती है । इसमें कर्म बंधन का गुण या शिक्षा के पूरक सोपान गुरु स्वामी के रूप में शिष्य सेवक के रूप में अपने अपने दायित्व को स्वीकार करते हुए शिक्षा ग्रहण करते हैं । यह शिक्षा क्षत्रिय प्रकार की शिक्षा कही जाती है । जो हिंसा पर आधारित होती है इसमें गुरु शिष्य का अधिकतम शोधन करने के लिए ताड़न या मारा पीटी पर ज्यादा ध्यान रखते हैं । यह शिक्षा प्रकृति वादी शिक्षा भी कही जा सकती है जो सर्वश्रेष्ठ जीवितम के जीवन लक्ष्य के अनुसार चलती है । इसमें गुरु शिष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए उन संस्कृति मूल्यों के वाहक  शिष्यों  संस्कृति मूल्यों के वाहन बनाने के लिए प्रचार प्रसार के लिए मारपीट विधा से  उष्णन  करता है । इस प्रकार की प्रकृति वादी शिक्षा से मारपीट की शिक्षा से अक्सर कभी-कभीशिष्यों का उत्थान मूल्यांकन के स्थान पर अवमूल्यन पतन होता है जिससे शिष्य की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है या वह विपरीत मति गति से उल्टा चलकर पतन के गर्त में लुप्त हो जाता है।।
3:- प्रयोजन /प्रयोग वादी शिक्षा इस प्रकार की शिक्षा पद्धति में वैश्य वासना भाव मतलब मंत्वय आर्थिक विकास समृद्धि प्रधान होता है । जिसके अंतर्गत शिक्षा का उद्देश्य गति और परिणाम निश्चित नियंत्रित करने वाले लोगों की सोच वणिक या व्यापारी प्रकार की होती है । इस प्रकार की  शिक्षा का धर्म आधार लालच है । इस प्रकार की मतलब शिक्षा में लोगों में अपने अपने निजी संविधान अपने अपने कुल के अनुसार बनाने की होड़ बन जाती है जिससे समाज में परिवार में निजी संविधानओं की बहुलता के कारण तरह तरह की सामाजिक * कुरीतियां * उत्पन्न हो जाती हैं यह प्रयोजनवाद ई शिक्षा कभी गुरु के हित में जाती है तो कभी शिष्य के हित में जाती है इस शिक्षा में एक पक्षीय हित साधन होता है इस शिक्षा में सर्व हित साधन संभावना का सामाजिक शिक्षा विकल्प स्पष्ट होता है जिससे इसे  धूर्तता पूर्ण शिक्षा कहा जाता है। जिसमें इसके दोनों पूरक सोपान इसके दाता गुरु व्यापारी तथा शिष्य  ग्राहक दोनों की मनोवृति लालची होती है । 
  लोभी गुरु - लालची चेला ,  करें नर्क में ठेलम्  ठेला ः
   इसमें गुरु शिष्य का शोषण करने की मनोवृति रखता है और शिष्य गुरु से मुफ्त में ज्ञान लेने की सोच रखता है । जिससे यह प्रयोजन वादी मतलबी शिक्षा अपना परिणाम न्यूनतम देती है। इसके दोनों पूरक सोपान गुरु शिष्य घाटे में रहते हैं । गुरु अपने ज्ञान को पूर्ण रूप से शिष्यों को दे नहीं पाता ,शिष्य गुरु के ज्ञान को अपनी अधिकतम क्षमता से ले नहीं पाता ।
  गुरु शिष्य दोनों अपने अपने उद्देश्यों के प्रति लक्ष्यों के प्रति ध्यान रखते हुए इस शिक्षा विधि से शिक्षा प्राप्त करते हैं । यह शिक्षा विधि की कर्म विधि मनुज प्रकार की है । जिसमें कर्म बंधन क्षणिक औपचारिकता मात्र होता है । जिसमें गुरु व्यापारी छात्र ग्राहक और दोनों ही धन आश्रित मनोवृति के होते हैं । इस प्रकार की शिक्षा का नियंत्रण धन के द्वारा , धनकुबेर ओं के द्वारा,,  धनी लोगों कारपोरेट वर्ल्ड के हित में किया जाता है ।
4:- यह यथार्थवादी शिक्षा भीड़ वाद आशीर्वाद विघटन वादी शिक्षा विधि पर आश्रित है जो यजुर्वेद के अध्याय 30 के प्रथम से अंतिम श्लोक वृत्ति भाव निरुपण पर  शुद्ध वासना भाव से युक्त होती है। जो प्रत्येक जीव के सम्यक विकास के अनुसार आधारित होती है यदि प्रत्येक जीव का पूर्ण विकास होगा तो फिर जीव क्यों कर सामाजिक अवस्था में रहेगा ? ऐसे में यह है समाज विघटनकारी शिक्षा कहने को तो  सबका साथ सबका विकास # पर आधारित कही जाती है परंतु यह समाज का ,परिवार का धर्म-कर्म स्तर तक नष्ट  कर देती है जब प्रत्येक मनुष्य अपना अपना निजी विकास करने की सोचने लगता है तो वह दूसरों के विनाश में जुट जाता है जिससे पहले घर टूटते हैं परिवार टूटते हैं , कुल टूटते हैं जातियां टूटती हैं धर्म टूटते हैं अंत में राष्ट्र भी टूटने लगते हैं । इस प्रकार की शिक्षा से समाज से लेकर राष्ट्र तक सर्वत्र अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है कोई किसी के नियंत्रण में रहना पसंद नहीं करता कोई किसी की रुचि अभिरुचि का ध्यान नहीं रखता, कोई किसी की  भावना इच्छाओं को समझने की कोशिश नहीं करता सभी अपने आप को जिम्मेदारियों से मुक्त रखते हुए ऐसे समाज की इच्छा रखते हैं कि उन लोगों का ध्यान मान सम्मान समाज के दूसरे लोग रखें लेकिन वह समाज के लोगों का ध्यान रखें ना रखें यह उनका निजी जीवन विकल्प है जो पूर्णतया दायित्व हीन है । परंतु उन्हें इस दायित्व हीन अवस्था में सभी सामाजिक सुविधा सुरक्षा के समस्त अधिकार सुरक्षित निर्बाध बने रहने चाहिए।
 इस यथार्थ वादी शिक्षा का धर्म कर्मपरिणाम अनुभव संग्रह आधारित होता हैं इसके कर्म विधि गुरु स्वयं दायित्व हीन परंतु दूसरे लोगों शिष्यों को उनका दायित्व देने समझाने वाले आप ही सरकार या अधिकारी मनोवृति के लोग होते हैं , परंतु शिक्षा ग्रहण करने वाले शिष्य  स्वयं दायित्व हीन होते हैं । इसका कर्म बंधन मजबूरी है  जिसके अंतर्गत गुरु अपने प्रशासनिक अधिकारियों के नियंत्रण में रहते हुए छात्रों को शिक्षा देते हैं तो छात्र अपने कुल परिवार के नियंत्रण में रहते हुए बेमन से ऐसी शिक्षा ग्रहण करने को बाध्य होते हैं । 
   इसमें गुरु अधिकारी मनोवृति का तथा छात्र बेगारी मजदूर मनोवृति का होता है । इसका नियंत्रण अधिकारीगण के द्वारा होता है इसके दो प्रकार हैं एक शूद्र वादी शिक्षा  जिसमें शिष्य /लोग  दुखी मन से शिक्षा ग्रहण करके दुखी परिणाम देते हैं यह यथार्थवादी शिक्षा जो छात्रों और लोगों के मन में भ्रम उत्पन्न पूर्ण करने वाली परिणाम हीन शिक्षा कही जा सकती है। जो औपचारिकता पूर्ण वार्तालाप से शुरू और बंद होती है । जिसका उद्देश्य स्पष्ट नहीं होता जिससे शिक्षित होने वाले छात्र शूद्र मानसिक अवस्था में सदैव शोक पूर्ण &  रुद्र  , विपिन गरीब दरिद्रता निर्धनता अवस्था में रहते हैं यह छात्र सुख शांति से दूर दिशाहीन स्थिति में सदैव निजहित चिंतन रत रहते हैं । परंतु इन छात्रों में अपने लिए भी सोचने की क्षमता नहीं होती । कारण कि इनमें सोचने की क्षमता व्यापक अध्ययन भ्रम पूर्ण परिणाम और अनुभव से आती है । जब यह अवस्था आती है उससे पहले यह छात्र शिक्षण संस्थानों से बाहर निकल जाते हैं । यह छात्र साक्षर होते हैं परंतु ज्ञानी नहीं ।। जो सदैव अशांत मानसिक अवस्था में शोक और रौद्र अवस्था में रहते हैं । यह नौकरी से मजदूरी से दूसरे के आधीन रहकर यह कर्म करते हैं । परंतु इनके कर्म का फल इनके अधिकारी अधिक भाव में शोषण कर जाते हैं ।
दूसरा  विशिष्ट अशुद्रता का प्रकार है जिसमें छात्र सभी वर्णों के अपने-अपने वर्ण के अनुसार बिना कर्म किए धन अर्जन करना सीख जाते हैं   जिसे शिक्षा से समाज में अपराधीकरण हो जाता है । ऐसी अशुद्र लोग या छिपे हुए शुद्र लोग जो शिक्षा करने तो स्कूल में जाते हैं परंतु शिक्षा को सही रूप से नहीं सीख पाते । अपितु वे :-
धनं धर्मम् आधारं , धनं परं सुख साधनम्  बिना कर्मम् उद्देश्य पूरितं
   का मंत्र आत्मबोध प्रज्ञा विधि से बिना गुरु के पढ़ाई सीख जाते हैं उनके दिमाग में धन के लिए विशेष स्थान होता है वह जीवन का लक्ष्य धन को समझते हैं और आजीवन येन केन प्रकारेण से धन ऐंठने में लगे रहते हैं ।  जैसे धूर्त या अब्राह्मण लोग मंदिर में मूर्ति स्थापना करके लोगों को मूर्त दर्शन कराकर  बिना ज्ञान शिक्षा दिए लोगों से हाथ उठाकर आशीर्वाद मुद्रा से सम्मोहन करके धन उठाते हैं ।  धूर्त क्षत्रप लोग सदैव समाज के लोगों को भय देकर उनसे हफ्ता वसूली, मासिक वसूली, वार्षिक वसूली के द्वारा बिना कर्म के धन उठते हैं , उन लोगों की सुरक्षा भी नहीं करते । दूसरी ओर गुप्त या अवैश्य लोग व्यापार में  मिलावट करना , कम तोलना आदि अनेक विधि से ग्राहकों को ठगते रहते हैं। हद तो अशूद्र मजदूर लोग कर देते हैं जो मालिक से पैसा लेकर भी उसका काम नहीं करते और बिना कर्म किए ही मालिक से ज्यादा से ज्यादा मजदूरी लेने के लालच में लगे रहते हैं ।
     यह शिक्षा का सर्व से निकृष्टतम परिवार समाज के लिएअधम गति दायक अनीति का प्रकार कहा जाता है । जो सर्वत्र उपद्रव उत्पात पैदा करने वाला शिक्षा मंत्र है जिसमें समता समानता का धूर्तता  पूर्ण उद्देश्य निहित है । कारण कि समाज मनुष्य प्रकृति तभी तक संचालित जीवन से चल रहे हैं जब तक वह अपूर्ण है यदि वे पूर्णता प्राप्त करने लगते हैं तो उनकी गति मंद मंथर समाप्त हो जाती है ।
 जिसमें सभी शिक्षित अशिक्षित लोग परम दुखी मन से , परम दुखी करने वाला कर्म मंत्र  धर्म- हीन, कर्म -हीन , विपरीतमति , विपरीत- परिणाम , धूर्तता , छल कपट प्रपंच मंत्र से समाज परिवार को दुखी करना और स्वयं दुखी रहना है ।
5:- नौकर शाही शिक्षा  आदेशवादी शिक्षा  संभावना उत्पन्न करने वाली शिक्षा मीटिंग वाली शिक्षा अधिकारी शिक्षा यह शिक्षा का पांचवा प्रकार कहा जाता है जो अफसर के आदेश निर्देश के अनुसार संचालित होती  है अफसर स्वयं शासन के सर्वोच्च कर्मचारियों /उच्च अधिकारियों के द्वारा आदेश निर्देश के अनुसार संचालित होते हैं । इस  शिक्षा के द्वारा सभी के मन में शिक्षा के परिणामों को लेकर शंका संभावनाएं बनी रहती हैं । परंतु इस शिक्षा में सभी कार्य में सहयोग करने वाले लोग सत्य / असत्य आंकड़े भेज करके अपने अपना दायित्व पूरा कर लेते हैं या अपना अपना आपा बचा लेते हैं । यह बाबू वादी शिक्षा कही जाती है जो मीटिंग या गुप्त वार्ता निर्देश विधि के द्वारा चलती है यह पूर्णतया गोपनीय प्रकार की शिक्षा कही जाती है जिसमें धूर्तता दुष्टता की पराकाष्ठा होती है  इसके परिणाम व्यक्ति के सम्मुख शीघ्र आ जाते हैं जब प्रिय परिणाम आते हैं तो व्यक्ति खुश होता है और जब अप्रिय परिणाम आते हैं तो व्यक्ति दुखी होता है या व्यक्ति को दंडित किया जाता है उसे आर्थिक धन वसूला जाता है उसका स्थान परिवर्तन कर दिया जाता है या उसकी सेवा समाप्त कर दी जाती है ।
 6* रहस्यमयी शिक्षा, वर्तमान काल की कलयुगीन शिक्षा जो लोगों की दुष्ट दूषित बुद्धि को देखते हुए सृष्टि विधाता ब्रह्मा के मंतव्य अनुसार मनीष जानो महर्षियों ने विद्वान लोगों को शब्दों के नकारात्मक ऊर्जा  बम प्रभाव से बचने के लिए शब्दों को ऊर्जा ही अल्प ऊर्जामय या ऊर्जा हीन निष्फल शब्द कर दिया है ।
 जिससे सभी भाषा संस्कृतिओं में विपर्यस्त / का दोष उत्पन्न हो गया है । एक शब्द के अनेक अर्थ हो जाने से लोग भ्रमित हो गए हैं । शब्द निष्प्रभावी ऊर्जा हीन/ कालकीलित / उत्कीलित हो गए हैं । जिससे बिना गुरु के निर्देशन में किया गया अध्ययन निष्फल / व्यर्थ साबित हो रहा है शब्द ज्ञान स्रोत पुस्तकें निष्प्रभावी हो गई हैं । लोग रिद्धि सिद्धि हीन आध्यात्मिकता दोषयुक्त /अल्प ज्ञानी/ अर्ध ज्ञानी /भ्रमित बुद्धि युक्त हो गए हैं । ऋषि लोगों की वाणी अमोघ ना हो करके श्रीहीन हो गई है ।। वरदान शाप निष्फल हो गये है । सभी लोग अभिशापित शिक्षा ले रहे हैं । शब्द से बने मंत्र छंदयुक्त छद्म छलिया हो गए हैं । जिनका आशय/ मतलब छिपा हुआ हो गया है। जो हर किसी को ठीक से सही समझ में नहीं आता । ऐसा विचित्र कौतुक मनीष जनों ने लोगों को सत्य / ब्रह्मज्ञान  न सहन  कर पाने की स्थिति के कारण किया है । जबकि भ्रमित ज्ञान के द्वारा विद्वान ज्ञान चर्चा के दौरान लोगों के उत्तेजित होकर भड़कने की विषम परिस्थिति के दौरान उत्पन्न सघर्ष से अपनी रक्षा कर लेते हैं । परंतु आज भी ऐसी विचित्र रहस्यमई भ्रमित शिक्षा से उत्पन्न विचित्र परिस्थितियों के युगीन शिक्षा में ज्ञान से उत्पन्न रिद्धि सिद्धि का प्रभाव यथावत है जिनके पास थोड़ा बहुत सत्याग्यान है वे रिद्धि-सिद्धि युक्त समर्थ धनाढ्य है ।ऐसी में शब्दों का मर्म स्पष्ट करने वाली रहस्यवादी शिक्षा जो मनुष्य को दार्शनिक बनती है विद्वान बनती है उसमें लोगों को रहस्य उद्घाटन करने के समझाने के कला विज्ञान को श्रैष्ठ माना है । आज के युग मेंहर किसी को उसकी पात्रता योग्यता क्षमता दक्षता जाने समझे बिना उसको  सही स्पष्ट सटीक अर्थ बताना खतरनाक/ वर्जित है। इस रहस्यमई शिक्षा के प्रभाव से विद्वान गुनिया लोग भ्रमित लोगों की सभा में संघर्ष लड़ाई झगड़ों से से बचें रहते हैं । यह रहस्योद्घाटन  करने वाली छिपे हुए छंदीय ज्ञान को प्रकट करने वाली शिक्षा मनुष्य में अतींद्रिय क्षमता उत्पन्न करने वाली है ।  मनुष्य को विशेष  दार्शनिक बनाने वाली उच्च शिक्षा आत्मज्ञानी शिक्षा प्राण प्रतिष्ठा युक्त ज्ञान की शिक्षा की चर्चा समाज में सुलभता से नहीं होती ।

हमारी श्राद्ध वंशावली कैसे हैं

हमारी श्राद्ध वशावली
पूर्णमासी सर्व पितृ बाबा दिलसुख के पिताजी नवरंग और नवरंग के पिताजी ज्योति 
दोज - पिताजी रामचरण शर्मा और उनके दादा दिलसुख 
तीज - बाबा यादराम 
चौथ :- हमारे बाबा वसुदेव
पंचमी:- बाबा झम्मन और पिताजी की दादी 
छट:- सर्व सत्ती दादी
सातवें 
आठवें:- बाबा मोहर सिंह जमीन घेरा 
नौंवी:- कन्हैया बाबा 
दसवीं:- 
एकादशी:- अम्मा और पिताजी की ताई
द्वादशी :- दादी भूरी * पिताजी ने बताया 
तृयोदशी: भूरी दादी 
चतुर्दशी :- 
अमावस्या:- 


जीव के कार्य करने कार्य क्षमता को प्रभावित करने की जैविक \ पुण्य अग्नि कितने प्रकार की है?

जीवों के  शरीर  जिस अग्नि के प्रभाव से बनते हैं वह गर्भाशय अग्नि कहीं जाती है । इसके अलावा जीवो के शरीर में जिस अग्नि के प्रभाव से कार्य करने की क्षमता होती हैं वह शरीर अग्नि कही जाती है । जीव के शरीर के अंदर जो भी कार्य हो रहा है या सृष्टि में कहीं पर भी कार्य हो रहा है उस कार्य को संपन्न कराने वाली शरीर अग्नि उसमें तीन रूपों में अंदर, मध्य, वाहय, रूप से स्थित होती है हम वही अग्नि प्रभाव को पेशिय ऊर्जा स्तर को देखते हैं अंदर मध्य की अग्नि प्रभाव को नहीं देखते हैं इसके अलावा यह अग्नि अनेक दूसरे नामों से भी पुकारी जाती है जैसे जात वेदा अग्नि  ( किसी एक जाति विशेष समूह के अंतर्गत ऊर्जा स्तर जैसे ब्राह्मणों में बौद्धिक योग्यता , क्षत्रिय जाति में फुर्तीलापन वैश्य जाति में धूर्तता  ) नचिकेता अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक मनुष्य के निजी शरीर में ऊर्जा स्तर) पाप अग्नि के अंतर्गत   ( किसी मनुष्य में अकारण अचानक हिंसा का ऊर्जा स्तर )   पुण्य अग्नि के अंतर्गत ( किसी एक विशेष मनुष्य में उसके कुल में उसकी जाति में उसके अनुयाई समर्थक लोगों में एक निश्चित कार्य पूर्णता का ऊर्जा स्तर जिससे उनका जीवन खुशहाल समृद्ध बनता है  ) सामान्य जीवन अग्नि जैविक  जिसके अनुसार जीवों का जीवन सुख दुख के मध्य ईश्वरीय शक्ति कृपा, ऐश्वर्या कृपा पितर माता-पिता गुरु कृपा होते हुए अपना जीवन दूसरे लोगों की दुआ बददुआ की प्रभावशक्ति से जीते हैं। । उपरोक्त इन सभी जीवन जीने की जैविक अग्नि में पुण्य अग्नि का विशेष महत्व ह । जिसके आधार पर साधारण आत्मा भी ईश्वरीय शक्तियुक्त समानसिद्ध होता है । पुण्य अग्नि वाला पुरुष सामन्य आत्मा बल प्रभाव से बढ़ाकर महान परमात्मा स्तर तक अपना प्रभाव बढ़ा लेताहै ।
संसार में विशेष संभव अलौकिक कार्य विशेष ज उनकी पुण्य अग्नि के प्रभाव से संभव होते हैं । जैसे राज योग परिवार में समाज में देश में शासन सत्ता लाभ केवल पुण्यअग्नि के प्रभाव से संभव होता है । बल और बद्धि समय के प्रभाव से परिवर्तन शील होते हैं । इसके प्रभाव से कभी निर्बल बलवानों पर भारीपढते हैं , कभी मूर्ख विद्वानों पर भारी पडते हैं । परंतु पुण्यशीला आत्माओं पर हर कोई आसानी से वर्चस्वशील प्रभावी नहीं हो सकता । जैसे राम औरकृष्णा मैं संभव अलौकिक कार्य किए थे।

संस्कृति युद्ध, धर्म युद्ध, कर्म युद्ध /क्रूसेड वार आदि कितने प्रकार के युद्ध हुआ करते हैं?

क्रूसेड वार /संस्कृति युद्ध /जीवन में युद्ध पद्धति  के अंतर्गत युद्ध का मतलब होता है '-'…
, किसी भी मनुष्य का बिना कारण बिना विचार बिना दिमाग अकारण दूसरों को दुश्मन समझते हुए उन्हें सह परिवार से समाज नष्ट करने की मानवीय  हिंसा की प्रवृत्ति , ययह युद्धकी प्रवृत्ति केवल मनुष्य में पाई जाती है पशुओं में नहीं पाई जाती है।  जिसके अतर्गत एक मनुष्य अनेक मनुष्य के समूह को नष्ट करने की  अकारण हिंसक प्रवृत्ति रखता है । मनुष्य की यह  हिंसा प्रवृत्ति उसकी सेना उसके मंतव्य की समर्थक मित्र मडली की संख्या के बाहुबल पर निर्भर करती है । यदि मनुष्य व्यापक अकेला हिंसा करता है तो उसकी यह हिंसक प्रवत्ति तो संघर्ष लड़ाई कहींजाती है । परंतु जब एक मनुष्य अपने दिमाग के हिंसा को अनेक मनुष्य के दिमाग में बौकर या बीजारोपण करके अनेकलोगों के अकारणहिंसा को हिंसा के स्तर को सीमित सेलेकर असीमितहिंसा अनंत हिंसा की ओर ले जाताहै के जिसमें मानवीय  हिंसा सीमाहीन होने लगती है  एक क्षेत्र के। लोग दूसरे क्षेत्र के लोगों को अकारण करने नष्ट करने पर उद्यत हो जाते हैं ।   तू यह सीमाहीन नियम हीन हिंसा युद्ध कहीं जाती है जिसमें हिंसक सीमा क्षेत्र का दायरा उसे क्षेत्र विशेष में व्याप्त हिंसा पर निर्भर करता है । जब यह हिंसा दो परिवारों के बीच कारण बनती है तो इसे पारिवारिक हिंसा कहा जाता हैं। परंतु जब यह हिंसा परिवार के स्तर से आगे बढ़कर जाति धर्म के स्तर पर उतर आती है तो इसे सामूहिकहिंसा सांप्रदायिक हिंसा कहां जाता है । जब इस सामूहिक सांप्रदायिक हिंसा का कारण जाति बनती है तो इससे जाति जब यह सामूहिक हिंसा का कारण धर्म बनता है तो इसे धार्मिक हिंसा या धर्म युद्ध /  क्रूसेडर वार \  संस्कृति युद्ध । आदि अनेक हिंसक शब्दावलियों से विभूषित किया जाता है । जब यह हिंसा राष्ट्रीय व्यापक क्षेत्र में फैल जाती है तो इस ग्रह युद्ध कहा जाता है । जब यह सामूहिक हिंसा दो राष्ट्रों के बीच आयोजित होती है जिसमें एक राष्ट्र के लोग दूसरे राष्ट्र के लोगों को कारण मरने पर उदित हो जाते हैं। तब इस राष्ट्र युद्ध कहते हैं।। जब दो या दो से अधिक राष्ट्र अकारण एक दूसरे से उलझ कर हिंसक होकर एक दूसरे राष्ट्र को नष्ट करने का उद्यम करने लगते हैं तो इस महायुद्ध कहा जाता है जब यह हिंसा का डेरा धरती के व्यापक गोलार्ध में फैल जाता है तब इसे विश्व युद्ध कहा जाता है। 
          वर्तमान समयमें इस्लामी संस्कृति दुनियामें मौजूद अन्य सभी संस्कृतियों के विनाश पर नष्ट करने पर उद्योग चल रहा है । यह अतीत के पुराने समय में अनेक  संस्कृतियों को पूर्व में समाप्त कर चुकी है जैसे अरब क्षेत्र में यहूदी इजरायल सस्कृति , पुराने ग्रीस   की यूनानी  सस्कृति , मिश्र इजिप्ट की संस्कृति , तुर्की की उस्मानिया संस्कृति , पर्शिया फारस बेबीलोन की इराक की सभ्यता संस्कृति , ईरान की पर्शियन पारसी संस्कृति , वर्तमान समय में इसका विशेष संघर्ष यूरोपकी क्रिश्चियन इसाई संस्कृति , भारतीय क्षेत्रकी हिंदू सस्कृति के अंतर्गत यह भारतीय क्षेत्रमें पाकिस्तान अफ़गानिस्तान कश्मीर बंगाल केरल क्षेत्र में हिंदू संस्कृति को विलुप्त कर चुकी है । वर्तमान समय में इसका व्यापक विरोध सघर्ष हिंदी भाषीक्षेत्र उत्तर प्रदेश राजस्थान बिहार मध्य प्रदेश हिमाचल प्रदश पंजाब क्षेत्रमें चल रहा है। जबकि यह पूर्वोत्तर भारत पर अपना आधिपत्य हिंदीभाषी क्षेत्र पर स्थापित कर चुकीहै ।

विस्मृति भूलना क्या है ?

भूलना या विस्मृति मनुष्य का स्वाभाविक जैविक मौलिक गुण है । जिसके अनुसार मनुष्य का नित्य का सीखा गया ( दृश्य आत्मज्ञान ) अध्ययन किया गया ( शब्द ज्ञान ) सुना गया ( नाद / शब्द / ध्वनि ) ज्ञान जो नित्य प्रत्येक दिन सीखा गया अधिगम किया जाता है । वह सीखने के , सुनने के ,  स्मृत / अधिगमित  होने के पश्चात उसमें से अधिकतम अनुपयोगी ज्ञान जो भविष्य के लिए उपयोगी नहीं होता वह ‌विस्मृत / भूलना / मिटना या  क्षय होना शुरू हो जाता है । यह भूलने की / विस्मृति / स्मृति छिपने की प्रक्रिया रात्रि में निद्रा अवस्था में सर्वाधिक तेज गति से होती है । जिससे मानव मस्तिष्क अगले दिन के लिए जीवन को सुचारू रूप से जीने के लिए निम्नतम स्मृति स्टार के अनुसार  मानव को तैयार करता है । यदि स्मृति विस्मृत नहीं होती तो मस्तिष्क पर अनावश्यक स्मृति बाहर पढ़ने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता क्रमशः घटती चली जाती है ।  जिन लोगों में  विस्मृति / भुलक्कड़ की दर  स्मृति की तुलना में अधिक होती है उन्हें मंदबुद्धि या कम बुद्धि  कहा जाता है । जिसमें विस्मृति दर स्मृति की तुलना में बराबर या सामान्य होती है उन्हें साधारण मनुष्य कहा जाता है । जिन लोगों में स्मृति की दर अधिक और विस्मृति की दर कम होती है उन्हें विशिष्ट मेधावी मूर्धन्य विप्र ( विशेष प्रतिभाशाली लोग ) कहा जाता है । इस विस्मृति के  भुलक्कड़ पन के स्वभाव के जैविक पाशविक मानवीय गुणों की अनिवार्यता आवश्यकता के कारण मनुष्य के   मन मस्तिष्क में पूर्व में संचित किए गए अधिनियमित ज्ञान की सभी उपयोगी / अनुपयोगी ,  आवश्यक /अनावश्यक सूचनाएं अक्सर उनके मन के विभिन्न स्तरों में चेतन अचेतन अवचेतन सुपर चेतन  मन में चली जाती हैं या मिटकर विस्मृत होती रहती हैं । जो अक्सर आवश्यकतानुसार अवचेतन मन की आवश्यकता के अनुसार या विश्लेषण करने के पश्चात वापस आ जाती हैं । परंतु जो साधारण स्मृति स्तर के या मंदबुद्धि स्तर के लोग हैं उनके मस्तिष्क में यह संचित ज्ञान सूचनाओं का शीघ्रता से नष्ट हो जाता ह उसे  विस्मृति या भूल जाना कहते हैं । विप्र लोगों के मन मस्तिष्क में यह सूचनाएं   शीघ्रता से नहीं नष्ट होती जिसके कारण विप्र लोगों की स्मृति सामान्य जन की तुलना में अधिक उत्तम कही जाती है।
     मानव मन मस्तिष्क में छिपी अदृश्य गुप्त सुप्त लुप्त ज्ञान सूचनाओं में से आवश्यक सूचनाओं को दैनिक उपयोग में व्यवहार में लाने के लिए नित्य अध्ययन की आवश्यकता होती है । जो लोग नित्य अध्ययन नहीं किया करते हैं वे अपने जीवन में सभी आवश्यक सूचनाएं /आर्जित संचित ज्ञान के रूप में भूलते रहते हैं ।  मनुष्य मन को इस विस्मृति /भुलक्कड़पन के  दोष से बचाने के लिए, कम करने के लिए   समाज के परिवार के सभी लोगों को नित्य शिक्षण कार्य की आवश्यकता होती है । इस  के लिए शिक्षित लोगों द्वारा  शिक्षण के कार्य को दैनिक पाठन पठन लेखन श्रवण वार्ता आदि अनेक शिक्षण कार्यों की नित्य आवश्यकता होती है । तभी समाज में परिवार घर शिक्षित अवस्था में रह पाता है अन्यथा यदि शिक्षण कार्य सतत नहीं किया जाता या शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता तो ऐसे में अच्छे से अच्छा उच्च शिक्षित व्यक्ति हो या परिवार अपने आप अपनी अपनी विस्मृति के स्तर भुलक्कड़पन के अनुसार अशिक्षा को प्राप्त हो जाता है । समाज को इस अशिक्षा के अभिशाप से बचाने के लिए इस परम आवश्यक नित्य शिक्षा  अधिगम कार्य को निरंतर  बनाए रखने के लिए सभ्य सुसंस्कृत समाज के लोग प्रबुद्ध जन शिक्षक , धार्मिक शिक्षक , पंडित  , फादर आदि अनेक धार्मिक गुरु परिवार को, समाज को  शिक्षित रखने के लिए  शिक्षा को समाज में निरंतर बनाए रखने के लिए अपने अपने विविध प्रकार के तरीकों से निरंतर शिक्षण कार्य करते रहते हैं । जिससे वार्ता सत्संग या ज्ञान /प्रवचन  समागम कहते हैं ।  किसी भी समाज का परिवार का जागरूक होना उनकी सभ्यता का संस्कृति का चिरकालिक  स्थिर स्थाई होना उस समाज के शिक्षक जनों ,प्रबुद्ध जनों की सक्रियता पर निर्भर करता है । यह उस जनसाधारण की रूचि पर  जागरूकता पर निर्भर करता है ।  
           जिस समाज के लोग शिक्षा के प्रति उदासीन हो जाते हैं । शिक्षा ,  शिक्षक ,  संस्कृति का सम्मान नहीं करते  या  जिस समाज में शिक्षा का व्यवसायीकरण कर दिया जाता है या हो जाता है । वह शिक्षा व्यावसायिक समाज शिक्षा दाताओं गुरु जनों को शिक्षा के उपयोग मूल्य का भुगतान नहीं किया करता है । तब  वह फोकटिया परिवार , समाज  अंतः गोत्वा  अन्न धन का शिक्षा उपयोगिता के अनुसार भुगतान न करने के कारण अशिक्षित होकर नष्ट हो जाता है । आदिकाल से इस फंडे के कारण पुरानी शिक्षा संस्कृति सभ्यताएं स्वतः ही नष्ट होती आई हैं । आक्रामक जाति के लोगों ने रक्षक जाति के लोगों की शिक्षा संस्कृति को नष्ट कर दिया है। जिस कारण और नई-नई शिक्षा संस्कृति यहां पैदा हो रही है । अपनी अपनी सभ्यता संस्कृति को बचाने के लिए धार्मिक शिक्षक निरंतर धर्मशिक्षा देने में , राजनीतिक शिक्षक राज शिक्षा देने में, राजगुरु/ राजपुरुष / राजनेता विविध प्रकार की शिक्षाएं देने के लिए प्रयासरत हैं। सर्वतोन्खी विकास की शिक्षा देने के लिए शासकीय शिक्षक सक्रिय रहते हैं । विश्व की भौगोलिकता कि शिक्षा देने के लिए प्रभावी चैनल टीवी , रेडियो, पत्र पत्रिकाएं, व्हाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर आदि दिन-रात मनुष्य को शिक्षित करने के लिए सक्रिय रहते हैं । संविधान की शिक्षा देने का कार्य दायित्व न्यायपालिका - वकील जज कार्यपालिका भारतीय - प्रशासन सेवा ने संभाल रखा है। चिकित्सा शिक्षा देने के लिए भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ,यूनानी चिकित्सा पद्धति, होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति, पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति मेडिकल, आदि ने मानव जीवन की आयु स्थिरता का दायित्व संभाल रखा है , कहने का तात्पर्य यह है कि तरह-तरह के कोटि-कोटि गुरुजनों ने समाज में मानव जीवन की सतत निरंतरता को सुचारू रूप से चलाने के लिए सभी अपने-अपने तरीकों से सक्रिय हैं ।
     लेकिन इन सभी के अथक प्रयासों के बावजूद मनुष्य अक्सर तरह-तरह की जैविक , पारिवारिक , सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक,  भौतिक रासायनिक समस्याओं से ग्रस्त है । कारण है कि कार्य करते रहने पर भी कार्य का सम्यक उचित परिणाम नहीं आता ह । या कार्य के विपरीत परिणाम आना समस्या को और भी बढ़ा देता है । जिससे मानव मन ज्ञान श्रोत संसाधनों की विशालता के होने पर भी समस्या ग्रस्त परेशान दुखी हो जाता है । जिसका मूल कारण है । मनुष्य को उसकी आवश्यकता के अनुसार सही शिक्षा न मिलना  या   मानव मन का , मस्तिष्क का भूलने का गुण विस्मृति अर्थात स्मृति को छुपा कर रखना । 
              इस मानव मस्तिष्क के इस दुर्गुण विस्मृति के समाधान करने के लिए इसे कम करने के लिए हम सभी को निजी तौर पर पारिवारिक रूप से सामाजिक रुप से नित्य व्यक्तिगत अध्ययन , दैनिक , साप्ताहिक , मासिक , वार्षिक अध्ययन की आवश्यकता होती है ।  नित्य अध्ययन एकल अवस्था में करने पर सीमित  प्रभावी होता है । एक व्यक्ति को शिक्षित करता है । सामाजिक सामूहिक अध्ययन करने पर विशेष प्रभावी होता ह। जिससेेेेे समाज शिक्षित होता ह ।  इस विशेष अध्ययन को करते हुए विशेष जागरूक, शिक्षित लोग अपने मन मस्तिष्क को भविष्य के लिए , अगले दिन के लिए , समय पूर्व मानसिक योजना वैचारिक रूप से , कार्य योजना पाठक पत्र बनाकर स्वयं को पहले से तैयार रखते हैं । वह अपने दिलो-दिमाग को नित्य दैनिक रूप से उचित नवीनतम सूचनाओं से सुसज्जित अपडेट रखते हैं । वह समाज में अधिकतम प्रगति करते हैं। ऐसे लोग न्यूनतम समस्या ग्रस्त रहते हैं जैसे प्रशासनिक वर्ग , शिक्षक वर्ग , न्यायपालिका वर्ग के लोग, स्वास्थ्य सेवा दाता , चिकित्सक , इंजीनियर आदि ,, परंतु जो लोग अपने मन और दिमाग को अधिकतम अध्ययन न करते हुए न्यूनतम अध्ययन करते हैं या अध्ययन करना उचित नहीं समझते उनके सार्थक अध्ययन न करते हुए निरर्थक अध्ययन व्हाट्सएप टि्वटर फेसबुक में अपना अधिक समय व्यतीत करते हैं । वह पढ़े लिखे भी अनपढ़ अशिक्षित जैसे रह जाते हैं । क्योंकि इन  ज्ञान  चैनलों पर प्राप्त ज्ञान दाताओं का बौद्धिक स्तर कम होता है या फिर वे अपने दिमाग का कूढ़ा /मानसिक कचरा दूसरे लोगों के दिमाग को खराब करने के लिए फैंकते रहते हैं अनावश्यक सूचनाओं के रूप में ।   इन अनावश्यक सूचनाओं का दैनिक जीवन में उपयोग कम होता है ये अनावश्यक ज्ञान , अज्ञान, कल्पना, मिथक किंवदंतियाँ , सूचनाएँ मानव मन मस्तिष्क पर अनावश्यक /फालतू का स्मृति भार बढ़ाकर मनुष्य के मन /मस्तिष्क की कार्य क्षमता को घटाती हैं / कम करती हैं । इन , टीवी  ,  व्हाट्सएप , फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर , कू आदि ज्ञानदाता चैनलों के दिए गए ज्ञान की  परीक्षाएं नहीं होती । ना  इस तरह का ज्ञान अनौपचारिक चैनलों से प्राप्त किया ज्ञान विश्वसनीय नहीं होता ह । यह ज्ञान शोधित उपचारित नहीं होता है । उस में अधिकतर अक्सर आपत्तिजनक ज्ञान भी आ जाता है ।  जिसकी   परख प्रत्येक पाठक को नहीं होती है । 
        ज्ञान की परख परीक्षा गुरुजनों के द्वारा ही संभव है। ऐसे ही बिना गुरु के नियंत्रण निर्देशन में  ज्ञान को अर्जित  हुए पढ़े लिखे लोग  निगुरे कहे जाते हैं ।  जो पढ़े लिखे होने पर  निगुरे गवार लोग ज्ञानी होने पर भी अपने जीवन में अधिकतम समस्या ग्रस्त रहते हैं । जो अपने जीवन में दरिद्रता विपन्नता गरीबी कटु वचन वक्ता निर्धनता में जीते हुए संसाधन हीन होकर अपने जीवन को दुखी मन से जिया करते हैं । मानव जीवन में समस्या निवारण के लिए या न्यूनतम समस्या में जीवन जीने के लिए स्वयं का नित्य शिक्षा ज्ञान दैनिक शिक्षा ज्ञान उचित कुल गुरु के नियंत्रण निर्देशन में अति आवश्यक है । जो  प्रबुद्ध  जनों ,महाशय जनों ,गुरुजनों , और धर्म जनों के सानिध्य /सत्संग से प्राप्त किया जाता है उस ज्ञान का भी कुलगुरु के द्वारा परिमार्जन /शोधन आवश्यक है । अतः कुलगुरु का परिवार में महत्वपूर्ण स्थान होता है ।
   मानव मस्तिष्क की विश्राम अवस्था का नाम विस्मृति है जो निद्रा नशा निकम्मापन या मानसिक निष्क्रियता अवस्था रूप में दृष्टिगोचर होती है। जिसके सामान्य से अधिक होने पर डिमेंशिया अल्जाइमर स्मृति भ्रंश  आदि मनोरोग उत्पन्न होते हैं । मानव मस्तिष्क की सक्रियता का नाम स्मृति है । जिसमें मस्तिष्क की सक्रियता से जीव जीवन को अति जागरूकता से जीते हैं । परंतु जब स्मृति भार  अपने मस्तिष्क की मानक क्षमता से अधिक हो जाती है तब दूसरे प्रकार के मनोरोग हिस्टीरिया सिजोफ्रेनिया असामान्य असभ्य व्यवहार उत्पन्न होने लगते हैं । ऐसी विचित्र अवस्था में मन का मस्तिष्क पर से नियंत्रण हटने लगता है । मनुष्य अनियंत्रित स्मृति तारतम्य टूटने से मनुष्य अनाप-शनाप बकने लगता है ।
         ऐसे में मन का उचित व्यवस्था से मस्तिष्क पर नियंत्रण करना आवश्यक  है ।ना कि मस्तिष्क का मन पर नियंत्रण करना । मस्तिष्क का अधिक ऊर्जावान होना और मस्तिष्क पर सम्यक समर्थ नियंत्रक बनना  मस्तिष्क की कोशिकाएं न्यूरॉन और न्यूरोग्लियल सेल्स ग्रे मैटर की अधिक ऊर्जा स्तर के मोटाई मानक से अधिक होने पर होता है ।  मन और मस्तिष्क दोनों की मिलीजुली सम्यक जानकारी एक दूसरे को साझा करने  नियंत्रित करने की क्रिया का नाम सपना वस्था है ।  जिसमें जब मस्तिष्क तनाव /दवाव से उग्र हो जाता है तो वह मस्तिष्क अपने को शांत /कूल करने /  नियंत्रण करने के लिए मन को  अतिरिक्त स्मृति भार चित्रों ऑडियो को निकालता है । जिससे मन को स्वप्न में भयंकर डर अनुभव होता है । परंतु जब मस्तिष्क शांत मन सक्रिय होता है तो वह मस्तिषक में से चयनित इच्छाएं के आधार पर आडियो वीडियो निकाल कर  प्रिय स्वप्न बनाता है जिसे स्वप्न में वह भय के स्थान पर प्रसन्नता महसूस होती है । जो दृश्य तन मन की इच्छा के अनुसार बनकर उभर कर आते हैं उस समय मस्तिष्क और मन शांत /सक्रिय  होते हैं । तब मन मस्तिष्क अपनी अपनी इच्छाओं के अनुसार  तनाव जनित दृश्यों की स्मृति समस्याओं को परिवर्तित करके निकालता है । जिससे स्वप्न मन मस्तिष्क की इच्छा के अनुसार नहीं आते और अक्सर ऐसे विचित्र अप्रिय स्वप्न जंजालिक दृश्य देख कर मन भर जाता है । भयंकर स्वप्न देख करके ऐसे भयंकर स्वप्न देखने के पश्चात खोपड़ी में उस विशेष  स्मृति स्थान विशेष पर दर्द अनुभव होता है । जो उस वक्त दर्शन के कुछ अंतराल के तुरंत बाद लगभग 5 से 30 मिनट के अंतराल में पुनः  विस्मृति या भुलक्कड़ पंन द्वारा यह दर्द गायब हो जाता है । पीड़ादायक स्मृति तनाव उत्पन्न करने वाले दृश्य के उखड़ जाने के पश्चात वह घटना घटित दृश्य मस्तिष्क के स्मृति पटल से पूर्णतया हट जाने से मस्तिष्क स्मृति भार से हल्का हो जाता है।
         कुछ लोग जिनमें नित्य शिक्षण सीखने की इच्छा नहीं होती है वह नया कुछ नहीं सीखते हैं वे आजीवन बच्चे बुद्धि बने रहते हैं वे अपने जीवन को बचपन में जीते हैं उनका शरीर बड़ा मुख्य मुद्राएं भाव भंगिमा बड़ी होती है शरीर से वे जवान या वृद्ध भी दिखते हैं परंतु उनका मन इसके विपरीत पलट या उल्टा भी होता है अर्थात ऐसे लोग बुड्ढे होकर भी बालक मन की अवस्था में जीते हैं ।

जैव विषाक्ता और जैव अमरत्व क्या है ? इसका हमारे मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ??

जैव विषाक्तता जीवो का वह गुण है जिसके प्रभाव से सभी जीव मरते हैं या अपने को मरने के लिए तैयार करते हैं या जीवन में मारक गतिविधियां अधिकतम करते हैं । आमतौर पर जैव विषाक्तता  की मात्रा  की अधिकता बच्चों में सबसे कम और वृद्ध जनों में सबसे अधिक होती है । जन्म लेने के पश्चात जैव विषाक्तता  विविधता के प्रभाव से सभी जीव बूढ़े होकर मरते हैं । परंतु जीव अमरत्व के प्रभाव से वह वृद्धि करते हुए बढ़ते जाते हैं । और तभी अपना पूरा जीवन जी पाते हैं । जैव अमृता के प्रभाव से सभी जी प्रजनन करके अपने जैसी सामान संतानोत्पत्ति उत्पन्न करने के पश्चात ही जेब विषाक्तता के प्रभाव से वृद्ध /मूर  होकर मरते हैं। 
     मनुष्य के क्रियाकलाप जैसे विनाशआत्मक कार्य अधिक मात्रा में करना व्यवहार का गर /विष के प्रभाव से क्रूरता और दुष्टता होना से मनुष्य के तन मन और विचारों में विषाक्ता का प्रभाव देखा जाता है । यह  जिन लोगों के तन में मन में  जितने प्रमाण  परिमाण परिणाम के अनुसार  जिन लोगों में होता है उसी  परिमाण के अनुसार परिवार के कुल के वंश के अनुसार अपना दैनिक कार्य व्यवहार करते हुए अपना जीवन जीते हैं । यह तन में उपलब्ध विष के प्रभाव से बीमार रहते हैं और मन में उपलब्ध उसके प्रभाव से विषैले कार्य करते हैं जैसे मनुष्य सांप की संतान मनुष्य सांप  ही उत्पन्न होती है । मनुष्य गधे की संतान मनुष्य गधा , मनुष्य बैल की संतान मनुष्य बैल आदि जीव पशुज गुणों से युक्त संतान मानव जाति में भी पैदा होती है । आम तौर पर जैव विष की मात्रा पशुओं में अधिक होती है । जिस कारण से पशुओं का जीवन कम होता है , परंतु उन मनुष्यों में भी विष की मात्रा अधिक कही जा सकती है जो अपने जीवन को पशुओं के समान भी जीते हैं और दूसरे लोगों के जीवनों को भी पशुओं के जैसा बनाने का प्रयास करते रहते हैं ।  ऐसे लोगों को विषाक्त पुरुष कहा जा सकता है । इस विषाक्त पुरुष की श्रेणी में समस्त वे समस्त मानव आते हैं जो अपने जीवन में अधिकतम विषाक्त क्रियाकलाप विनाशात्मक कार्य जैसे दूसरों की प्रगति में बाधा बनना , दूसरों का जीवन हरण करना दूसरे लोगों अपना जीवन जीने में  उनको समस्याएं उत्पन्न करना ,आदि कृत्य आते हैं । 
    आमतौर पर समाज में माता-पिता और गुरु को इस विषाक्तता से दूर रखा है परंतु मेरे विचार से माता पिता और गुरु भी इस विषाक्तता के प्रभाव से अछूते नहीं हैं । जिसके प्रभाव से विषाक्त माता पिता के द्वारा उत्पन्न संतान में विषाक्त कार्य प्रभाव विचार आते हैं । तो विषाक्त गुरु के सानिध्य में रहकर विद्या सीखने वाले शिष्य में भी विषाक्त   ज्ञान  विचार कार्य प्रभाव  आ  जाते हैं । जिसके प्रभाव से उसका अच्छा शिष्य भी उसकी विषाक्तता अपनाकर विनाशात्मक कार्य व्यवहार प्रभाव विचारों को गुरु से सीख जाता है ।  दृश्य और अदृश्य रूप में इसका परिणाम यह होता है कि वह विनाश बुद्धि या नाशखेत शिष्य समय से पहले विद्यालय छोड़ देता है । विद्या विमुख हो जाता है । ऐसे में उसे विद्या विमुख बनाने वाले विद्यालय से दूर करने वाले विषाक्त माता-पिता और विषाक्त गुरु का प्रभाव समाज में दिखाई देता है । लेकिन ऐसे विषाक्त माता पिता और गुरु को लोग अनदेखा अनसुना कर दिया करते हैं । तो दूसरी ओर यह विषाक्त माता पिता और गुरु अपने पुराने अतीत साहित्य का ब्यौरा देखकर अपने को समाज में पुजवाते हैं । जैसे कबीर का लिखा साहित्य :-  गुरु अंतिम सर्वश्रेष्ठ सत्य है ।
 कबीरा हरि के रूठते गुरु के  सर ने जाए ।
कह कबीर गुरु रूठते हरि नहीं होत सहाय ।।
उस कबीर को विष गुरु और विषाक्त माता-पिता का भांन पहचान अहसास नहीं था कि जिन्होंने उसे उत्पन्न तो किया पर अपनाया नहीं । नहीं प्यार से पालन पोषण शिक्षा दीक्षा दिया । इसी प्रकार से कबीर के गुरु ने भी उसे विधिवत रूप से अपनाकर अपने गुरुकुल में रखकर शिक्षा दीक्षा नहीं दी । और गुरु नाम देकर छोड़ दिया ऐसे लोग जो अपने शिष्य को मात्र नाम दान देकर छोड़ दिया करते हैं । और शिष्य की पात्रता योग्यता व क्षमता दक्षता के विकास गुंणवत्ता  गुप्त गौवा गुंण  पर ध्यान नहीं देते । और ना ही गुरु के विद्या प्राप्ति के पश्चात शिष्यों के  बाद जीवन पर ध्यान देते हैं । ऐसे लोग विषाक्त गुरु की श्रेणी में आते हैं । जो मां बाप अपने बच्चों के  नैतिक प्राकृतिक विकास पर ध्यान नहीं देते ,  अपितु अपने निजी स्वार्थ हित पूजा के लिए   भी अपने बच्चों से वाहियात वाक्य जैसे माता का पिता का कर्ज चुकाना , मां के दूध का कर्ज चुकाना ,,  पिता का कर्ज चुकाना . ऐसे एहमकाना  वाक्य अपने बच्चों में डाल डाल कर खुद को पुजवाते हैं इसका विषाक्ता परिणाम यह आता है कि उनके बच्चे भी उनकी विषाक्तता को अपना लेते हैं ।  उनके बच्चे भी प्रगति नहीं कर पाते , वह भी पतन के गर्त में जीते हैं या पतन के गर्त में गिरते चले जाते हैं प्रगति में बाधक बनते हैं वह भी विषाक्त माता-पिता के श्रृवण कुमार पूत की श्रेणी में आते हैं । जो अपने जीवन को अपने माता-पिता के कहे अनकहे सुने वाक्यों के आधार पर अपना जीवन जीने के लिए अपने को तैयार करते हैं परंतु उनके दिए गए शिक्षा कथन वाक्यों पर मनन चिंतन करना उचित नहीं समझते या मनन चिंतन करना नहीं सीख पाते जिससे वे अपना जीवन अपने हित के अनुसार जीते हुए अपना विकास पितर श्रेणी के अनुसार या अपना विकास अलग चेक करके अपने जीवन को माता-पिता के जीवन के श्रेणी के निर्धनता गरीबी के अनुसार ना जीते हुए अपने जीवन को सुखी समृद्ध और शांत जी सकें।
  जैवअमृत के अंतर्गत सभी जीवो में उत्पन्न होने के पश्चात अपना विकास करने अपने जीवन को  सुख शांति समृद्धि के साथ जीने का कला विज्ञान जैव अमरत्व है । जब अमृतपुर के अनुसार सभी जीव अपने जीवन को सतत निरंतर जीने की कामना करते हैं और इस भूमि पर सदैव स्थिर स्थाई बनने का प्रयास अमर होना चाहते हैं परंतु अमर होने का सौभाग्य साधारण लोगों को नहीं मिलता अमर लोग केवल इंद्र वर्ण या युगपुरुष ही हो पाते हैं ।आमतौर पर जब अमृत की मात्रा बच्चों में सबसे अधिक होती है जो धीरे-धीरे निरंतर जीवन जीने तक कम होती चली जाती है , वृद्ध में जैवअमृत सबसे कम होता है। और मृत जीव में जैवअमरत्व नहीं होता । इस जेब अमृत के प्रभाव से सभी जी अपने शरीर का मन का विकास करते हुए अपने जीवन को सम्यक रूप से जी पाते हैं । जिससे उनके जीवन में वह अधिक से अधिक निर्माणात्मक कार्य कर सकें , आवास का संतान उत्पत्ति का निर्माण मुख्य निर्माण कार्य हैं ।  जिसे उनके बच्चे  परिवार  कुल वंश जाति के अनुसार विकास कर सकें । यदि जाति विकास संभव ना हो तो अपना निजी स्तर पर मौलिक विकास कर सकें । यह अमरत्व का विशेष गुण  उनमें भी श्रेष्ठ संतान का निर्माण करना निरोग जीवन जीना ही मानव जीवन का उचित लक्ष्य है । 

गलतियां क्यों होती है?

  गलती का पुराण और महात्म्य 

 गलत सोच गलत ज्ञान और गलत काम परिणम:--  यह लाइन है मैंने अपने जोगी जोगड़ा छाप भिखारी गुरुजनों से सुनी है जो अक्सर भीख मांगने आ जाते हैं दरवाजे पर और ज्ञान देते हैं ःःःःगृहस्थ  अतिथि जनों  को बहुत भयंकर ःः :---कैसे सब ठाट पड़ा रह जाएगा जब लाद /छोड़  चलेगा बंजारा ,  जब तक बंज (व्यापारी)  तभी तक बंजारा (व्यापार) ,,  जब छोड़ दिया बंज तो कैसा बंजारा ,,,जब भाग गया बंजारा तो कैसा बंजारा  । ना करें बंज तो कैसा बंजारा ।। यही गलत लाइन है जो मुझे जन्म में जोगी जोगड़ा ओं गुरुजनों से मिली मैंने इन्हें कंठस्थ किया और अब उद्धृत कर रहा हूं जिसके ग्रहण करने से समय समय उसमें पर मेरे कंठ से अक्सर जीवन में गलतियां होती रही मैंने अपने इस गल्ली के गलता पुराण के पाठ को सर्वजन के हितार्थ अपने ब्लॉग पर इसलिए उड़ेल रहा हूं ताकि इसे पढ़कर कोई भी गलती से उत्पन्न होने पर गलत परिणाम से अपनी सुरक्षा कर सके जो ऐसी गलत लाइन अपने मन में पाले हुए हैं अपनी गलत लाइनों को मन से निकाल दे ।

  गलती का कारण गलती करते समय गलती करने वाले के दिलों दिमाग और कार्य में अज्ञान अल्पपज्ञान  जागरूकता की कमी से होता है , प्रज्ञा जैन इसे भूल कहते हैं जो उचित अवसर पर चूक हो जाती है जिसे अपनी गलती को सही तरीके से समझने और मानने का तरीका आ गया तथा दूसरों की गलती करने पर उन्हें गलत ठहरने का तरीका आता है उस एक बार गलती करके फिर से दोबारा गलती न करने वाले महाजन को अबुद्ध प्रबुद्ध जन  कहा जाता है । जिसका परिणाम किए गए कार्य का नतीजा सदैव उल्टा पूल्टा आता है गलती करने वाला गलता और जो गलती करने करने में संग लगे उसे कहते हैं गालता और जो दोनों  ही जन गलती करते समय ध्यान ना रहे, उसे कहते मुगालता ।। गलती करने का अधिकार केवल धनी बलवान बुद्धिमान हो अफसर अधिकारी लोगो गुरुजन कोटि लोगों को  है उनकी सभी गलतियां क्षम्य हैं । जन साधारण लोगों को, दास, सेवक गुलाम ,लोगों को अज्ञानी होते हुए भी ज्ञान ना होने पर भी गलती करने का अधिकार नहीं है । ऐसे लोग नासमझ होने पर अबूझ होने पर अबोध /अज्ञानी होने पर गलती करते हैं तो उनको गलती करने की भयंकर सजा मिलती है । 

      सभी सामान्य जनों को गलती करवाने का कारण माध्यम मन है जो क्षण क्षण बदलने वाला है  हर समय दूसरों को बदलते हुए  देखता है  परंतु खुद के अंदर आए बदलाव को कभी नहीं देखता है कि वह अपना ही मन एक क्षण के अंश में कितना बदल गया जबकि सबसे ज्यादा तो वही अपना मन बदला था अपने मन के बदलाव ने ही तो   परिवर्तन की  सही समझ ना होने के कारण मनुष्य से गलती कराई थी जिससे इच्छित लक्ष्य के इच्छित कर्म का परिणाम इच्छित वांछनीय नहीं आया जिसे हम गलती कहने लगते है । तो फिर गलती है क्या?  

  गलती का कारण है  अर्ध सत्य ज्ञान ,अर्ध  ब्रह्म अर्ध जीव भाव जो अपूर्णता से ग्रसित / प्रभावित होते हुए पूर्णता प्राप्ति का प्रयास आदिकाल से करता चला आ रहा है लेकिन पूर्णता है कि प्राप्त नहीं होती है। ऐसे में सभी  अपने अपने बोध स्तर से कृत्या / कर्म  करते रहने पर भी वांछित परिणाम की इच्छा रखते हैं । परंतु पूर्ण वांछित परिणाम कभी आता है । कभी नहीं आता है ऐसे में सूक्ष्मता से लेकर वृहद बुद्धि स्तर तक कर्म प्रयत्न करते रहने पर भी परिणाम इच्छा के अनुसार नहीं आता । ऐसे में ऐसे फल हीन / विपरीत परिणाम दायक कार्य को करना गलती करना कहते हैं ।। ऐसे में गलत कार्य होते हुए समय पर कर्ता का मन पूर्णतया तनमयता के साथ न देने से मन आधीन इंद्रियाँ भी कर्म करते समय   पूर्णकालिकसाथ नहीं देती हैं । ना  ही तन पूर्ण शारीरिक बल क्षमता से साथ देता है ।। उस छोटे से कर्म को करने के दौरान बार-बार मन विचलित होकर ध्यान बदलता रहता है । कार्य को पूर्ण रूप से संलग्न एक लक्ष्य एक पक्षीय होकर इंद्रियां ध्यान विचलित होते ही अपना धर्म बदलने लगती हैं । जिससे मन को कुछ का कुछ सुनाई देता है , आंखों को कुछ का कुछ दिखाई देने लगता है ,  ऐसे में थोड़ी देर को क्षणिक समय को लक्ष्य ओझल हो जाता है , और थोड़ी देर बाद जब लक्ष्य पूर्णतः दिखाई देता है ।  तब तक भयंकर गढ़बड़ गलती हो चुकी होती है । इसी क्षणिक समय की ध्यान भंगता  कर्म के परिणाम को परिणाम के अंश के अनुसार बदल देती है ।  इसी क्षणिक समय में करते कार्य के दौरान कथित  शरीर का  गिरता ऊर्जा स्तर रही सही कमी को पूरा करके नकारात्मक परिणाम देता है , सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाता ।  थके हुए शरीर से और थके हुए मन से किए गए कार्य में सफलता नहीं असफलता हाथ लगती है । क्यों होता है ? जब ऐसी नकारात्मकता का परिणाम जब हम सकारात्मक कार्य के दौरान जब हम पुनःप्रयास कर रहे होते हैं? पुनः प्रयास करके भी इच्छित परिणाम नहीं ले पाते ।

  काश हमने ध्यान जमाना  बिना अंगुलियाँ लगाए कान बंद करना शरीर को सतत ऊर्जावान बनाए रखने का मूल मंत्र एकाग्रता एक लक्ष्य एक दृष्टि सीखा होता ! कैसे होता है एकाग्रता से ध्यान भंग कैसे और क्यों हो जाता है? कैसे  लक्ष्य से दृष्टि हट /उड़ जाती है ? कैसे ओझल हो जाता है लक्ष्य ; क्षणभर में? कैसे कब बदल में बदल जाता ह शरीर चंचल भाव ?

  इन सभी के आदि मध्य और अंत में छिपा है परिवर्तन का बीज गलती या जीव का चंचल मति  स्वभाव इस गलती को ऐसा नहीं है कि हम पहली बार ही कर रहे हैं , यह गलती ही अन्य असंख्य रूपों में आदिकाल में हमारे पूर्वजों ने की ;  वर्तमान में हम कर रहे हैं और अंतः कॉल भविष्य में हमारे बच्चे हमारी संतति भी गलतियाँ करेंगे ; भरेंगे गलती का गलत नतीजा मुगालता यानी असफलता उल्टा परिणाम ।।  सही काम का तों पता नहीं था  लेकिन सही काम नहीं हो पाया ; भविष्य में भी पीढ़ियाँ गलती हो गई यह कहती रहेंगी । इस गलती को सुधारने के ,  कम करने के ,   बंद करने के, खत्म करने के प्रयास मानव की पूर्वज पीढ़ियाँ आदिकाल से करती चली आ रही है । तरह तरह से मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाने के लिए तरह-तरह की ध्यान पद्धतियां मानव ने विकसित की है ।भावतीत ध्यान, विपश्यना ध्यान ,प्रेक्षाध्यान , शरीर को ऊर्जावान बनाने के तरह-तरह के तरीके जिम योग और शारीरिक शिक्षा आजकल भी मुख्य है ।इस गलती को सुधारने के लिए गलती में कमी लाने के लिए वर्तमान समय में तरह-तरह के साहित्य का सकारात्मक सोच पैदा करने वाली पुस्तकों का उत्पादन बाजार में औद्योगिक स्तर पर चल रहा है ।  इंटरनेट पर भी व्यायाम लिखित व्याख्यान रूप में उपलब्ध है। तथा ऑडियो कैसेट श्रवण संसाधन के स्रोत विशेष वक्ता विशेष कार्य दक्ष सर संगठनों में गलती सुधारने गलती संशोधन करने गलतियों में कमी लाने के लिए विशेष वेतन पर पब्लिक ऑफिसर के रूप में नियुक्त हैं । परंतु गलतियां है कि कम नहीं हो पा रही हैं ,  ना समाप्त होने का नाम ले रही हैं । यह गलतियाँ सुरसा की संतान के समान अनेक असंख्य असीमित रूप में नित्य नहीं गलतियां सामने आ रही है फिर भी प्रयास जारी है कि गलतियां कब समाप्त होगी? कब ऐसा मानव बनेगा जो कभी गलती नहीं करेगा । मैं भी गलतियां होने से परेशान हूं ,  इन गलतियों में से ःः जो ना चाहते हुए भी हो जाती हैं।औंर इन सुरसा की औलाद गलती से पंगा ले बैठा और अब भुगत रहा हूं मैं भी अतीत की गलतियों का वर्तमान में गलत नतीजा :-- नफरत , संघर्ष, अप्रिय व्यवहार , दुर्व्यवहार , दंड /हानि , अपमान ,  जिल्लत, जलालत ,खिजालत ।इन गलतियों की अनेक प्रकार के रूपों से मिले दुखों के रूप में इन गलतियां करने की आदत सुधारने मेरा व्यक्तित्व बिगाड़ कर रख दिया है ।जबकि मैं कयी  प्रकार के ध्यान भावातीत ध्यान विपश्यना ध्यान प्रेक्षा ध्यान श्रव्य ध्यान दृश्य ध्यान संवेदी ध्यान गंद ध्यान स्पर्श ध्यान आदि का पाठ्यक्रम शिक्षित हूं लेकिन गलतियों से पार नहीं पड़ रहा है । 

अब जब अंतहीन गलतियां करने की सोच की सुरसा की औलाद गलतियों से पंगा ले लिया ,  जीवन आयु अवधि की पूर्णता का पता नहीं है तो फिर गलतियों के बाणों से घायल होने पर यदि दुख महसूस होने का अनुभव करने लगे तो संघर्ष की क्षमता उद्यम करने का प्रयास धीरे धीरे खत्म हो जाएगा  परिणाम वही आएगा जीते जी मौत:- निकम्मा पन , आलस्य  ः  यही वे मानवीय गुण है जो दुश्मन को बिना पराक्रम उद्यम के खुश करते हैं और मानव जीवन की प्रगति को समाज में जीते जी मनुष्य का पशु स्वरूप में परिवर्तन होता देखता है  परिणाम  मोक्ष ( कर्म झंझट से छुटकारा ) बुद्धिहीन होने से ( सोच से छुटकारा ) जीते जी बिना मरे नर्क की प्राप्ति ,  मरकर तो मोक्ष मानव प्राप्त करता है पर कर्मफल परिणाम से मुक्त होकर जीते जी मोक्ष का आनंद पशुज कोटि के मानव लेते हैं निष्काम भाव से कर्म हीन हो करके या फिर मोक्ष का आनंद लेने वाले वह कर्म हीन कर्म विमुख बिना श्रम करने वाले मानव होते हैं।  जो मानव कर्म धर्म के संकट में नहीं पड़ते जिन्हें हम पागल अबोध  बेबुद्धि प्राणी कहते हैं वह भी जीते हैं सबसे अधिक गलतियां तो यही अबुद्ध जन करते हैं। लेकिन इनकी गलतियां विचारणीय नहीं रहती है इनकी गलतियां माफ कर दी जाती है। यह बे बुद्धि लोग इस दुनिया में पूरी उम्र पर तंदुरुस्त रहते हैं। बिना कर्म बिना फल बिना कर्म किसी का फल किसी को दायित्व हीनता के निर्मल मन के सिद्धांत से कि उन्होंने कभी कोई बुरा कर्म किया ही नहीं तो फिर बुरे कर्मों का लक्ष्य हीनता दोष या बुरा फल वह क्यों देखेंगे  । विकर्म अग्नि के ताप से सदैव दूर रहकर बात बनाते हैं दूसरों को दिशा निर्देश देते रहते हैं पर स्वयं कर्म अग्निकुंड के निकट प्राप्त क्षेत्र में स्वयं नहीं आते इन्हें बांस कहते हैं यदि यह गलती से भूलवश कर्म के ताप /ऊष्मीय क्षेत्र में आ गए तो अपने अधीनस्थ कर्मचारी को तुरंत अग्नि ताप क्षेत्र में झांक देते हैं और आप कर्म अग्नि ताप क्षेत्र की पहुंच से दूर रहते हैं तभी तो वह बॉस (बर्न आउट  सिंड्रोम) सर्विसेज में रहते हैं उनकी सुविधा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है उनके अधीनस्थ कर्म की गलतियों का दोष उनके सिर पर मरता/मढता रहे और उनका बॉस निर्दोष रहे। बॉस की सुविधा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है उससे कर्माणि क्षेत्र से दूर रखा जाता है।

 गलती को सुरसा संतति कहने का ख्याल मेरे मन में रावण से आया था पुराणों से पुस्तकों से भी पढ़ा था कि रावण ने गलती के साहित्य से पीएचडी की थी गुरु शुक्राचार्य के नियंत्रण में क्योंकि गुरु बृहस्पति जी ने उसे गलती पर संशोधन करने की विधा पीएचडी करने के लिए मना कर दिया था बृहस्पति जी गलती का समूल संशोधन कराने के कारण से ही देव गुरु बने थे । जबकि शुक्राचार्य जी अपनी गलती पर अडिग रहने और गलती की एवज में दूसरी बड़ी गलती करने के कारण दैत्य गुरु तांत्रिक सम्राट बने थे । उन्हें गलती में सुधार की विधा का पूर्ण ज्ञान था परंतु जीवात्मा के  सूक्ष्म रूप सीमितशिव शक्ति असीम सोच से उपजे मानव चित्त की चंचलता के स्वभाव का पता था । तभी तो उन्होंने गलती का सुधार बड़ी गलती करने करवाने का मूल मंत्र रावण को दिया था । लक्ष्य बोध के लिए रेखा ज्ञान विधा बड़ी रेखा के अंश को मिटाकर छोटी रेखा करना और छोटी रेखा में जोड़कर छोटी रेखा को बड़ी बना देना या उसके बराबर कर देना । अर्थात गलती करा कर छोटे जीव की मानसिक स्थिति खराब कर उसके अहम अस्तित्व को हीन करना , या , कम करना ,रावण को  यह दोनों तंत्र विधाएं एकाग्र मन से कंठस्थ थी तभी तो उसने कभी भी बलवान शत्रु बली सहस्त्रबाहु से पंगा नहीं लिया । निर्बल ओं को सताना महिलाओं पर पराक्रम प्रदर्शन करना उसका जीवन लक्ष्य की मुख्य आदत थी । उस समय जो भी विशेष महिलाएं थी उसने सामाजिक मान सम्मान को तिलांजलि देकर उन्हें बलपूर्वक लंका लाकर एकत्र किया था । उसके महल में महिलाओं/दासियाँ थी । जिसमें महिलाओं का रूप लावण्य स्फूर्ति का नित्य प्रदर्शन करना होता था । कहने भर को तो ये रावण की रानियां लिखी है ।रावण का मूल नाम उसके पिता विश्वेर ने क्या रखा था यह पता नहीं पर रावण का नाम उसके नाना ने रखा था जो बाद में शुक्राचार्य ने तंत्र दीक्षापश्चात रोवन रखा जिसका तात्पर्य है  दूसरों को अकारण रुलाते हुए कष्ट देकर खुश होना ।।   प्रगति के लिए मित्रों  की खुशहाली को नियंत्रित रखो , उन्हें इतना समर्थ मत होने दो की उनमें  स्वामी भाव पूरित हो जाएं । मित्रों कुटुंब सहायक जनों को   सदा पीड़ित परेशान दुखी रखो यदि उनमें स्वामी भाव दिखाई दे , तो उनकी समृद्धि की लाइन काट कर उनको निर्धन कर दो  ।  तभी वे सेवक बने रहेंगे अन्यथा समृद्धि से स्वामी भाव पाकर अपने स्वामी को समस्या ग्रस्त कर देंगे । सत्ता गई शासन गया ऐश्वर्या गया दुखाया चिंता शुरू जीवन दूभर इसलिए उसने अपने अधीनस्थ सेवकों को गलती कराने के लिए समय-समय पर उन्हें उनकी मानसिक शारीरिक बौद्धिक क्षमता से अधिक कार्य देकर गलतियां  करवाता था  उन्हें रुलाता रहता था । मित्रों संबंधियों के अक्सर रोते रहने से उनकी आत्मा हीनता अबोध मन निर्मल तन का पता चलता रहता है अतः किसी मानव को आत्मा वान मत रहने दो  आप महान होते ही वह प्रगति पथ पर चलने लगेगा और पंच मानव प्रगति स्तर पंच परमेश्वर विप्र नेता विधायक मनु इंद्र इंद्र आदि स्तरों से होता हुआ परम आत्मा स्तर तक चला जाएगा जो बाद में गिन गिन कर पुरानी रंजिश ई करतूतों के बदले गिन गिन कर लेगा ।अतः अधम शासक / बाँस का परम कर्तव्य है कि अधिनस्थ सेवकों को  पतित ज्ञान , कल्पित ज्ञान , भ्रम ज्ञान देकर उसे गलतियों के मार्ग पर निरंतर चलते रहने को मजबूर करो जिससे मनुष्य शिक्षा पाकर भी सेवक भाव  धरकर सदैव नीची नजर करके तुम्हारे सामने दीन हीन विकलांग हालत में रहेगा अतः मनुष्य को पशुध सेवक बनाओ उसे दानव स्वामी भाव से निरंतर नियंत्रित बाधित करते हुए पतित अवस्था में बनाकर रखो लगातार गलती करा कर गलती पर ताड़न पीटन कर मनुष्य को अवैध पशु बनाए रखो यह रावण का मूल शुक्राचार्य मंत्र था जिससे रावण के शासन में रावण के अतिरिक्त किसी में भी स्वामी भाव नहीं था । स्वामी भाव उदय होने पर रावण स्वामी भावधारी पर नजर रखता था और स्वामीभावधारी पर गलती करा कर मारपीट करके वह उस मानवको मानसिक पशु अवस्था में रखता था ।