मनुष्य के क्रियाकलाप जैसे विनाशआत्मक कार्य अधिक मात्रा में करना व्यवहार का गर /विष के प्रभाव से क्रूरता और दुष्टता होना से मनुष्य के तन मन और विचारों में विषाक्ता का प्रभाव देखा जाता है । यह जिन लोगों के तन में मन में जितने प्रमाण परिमाण परिणाम के अनुसार जिन लोगों में होता है उसी परिमाण के अनुसार परिवार के कुल के वंश के अनुसार अपना दैनिक कार्य व्यवहार करते हुए अपना जीवन जीते हैं । यह तन में उपलब्ध विष के प्रभाव से बीमार रहते हैं और मन में उपलब्ध उसके प्रभाव से विषैले कार्य करते हैं जैसे मनुष्य सांप की संतान मनुष्य सांप ही उत्पन्न होती है । मनुष्य गधे की संतान मनुष्य गधा , मनुष्य बैल की संतान मनुष्य बैल आदि जीव पशुज गुणों से युक्त संतान मानव जाति में भी पैदा होती है । आम तौर पर जैव विष की मात्रा पशुओं में अधिक होती है । जिस कारण से पशुओं का जीवन कम होता है , परंतु उन मनुष्यों में भी विष की मात्रा अधिक कही जा सकती है जो अपने जीवन को पशुओं के समान भी जीते हैं और दूसरे लोगों के जीवनों को भी पशुओं के जैसा बनाने का प्रयास करते रहते हैं । ऐसे लोगों को विषाक्त पुरुष कहा जा सकता है । इस विषाक्त पुरुष की श्रेणी में समस्त वे समस्त मानव आते हैं जो अपने जीवन में अधिकतम विषाक्त क्रियाकलाप विनाशात्मक कार्य जैसे दूसरों की प्रगति में बाधा बनना , दूसरों का जीवन हरण करना दूसरे लोगों अपना जीवन जीने में उनको समस्याएं उत्पन्न करना ,आदि कृत्य आते हैं ।
आमतौर पर समाज में माता-पिता और गुरु को इस विषाक्तता से दूर रखा है परंतु मेरे विचार से माता पिता और गुरु भी इस विषाक्तता के प्रभाव से अछूते नहीं हैं । जिसके प्रभाव से विषाक्त माता पिता के द्वारा उत्पन्न संतान में विषाक्त कार्य प्रभाव विचार आते हैं । तो विषाक्त गुरु के सानिध्य में रहकर विद्या सीखने वाले शिष्य में भी विषाक्त ज्ञान विचार कार्य प्रभाव आ जाते हैं । जिसके प्रभाव से उसका अच्छा शिष्य भी उसकी विषाक्तता अपनाकर विनाशात्मक कार्य व्यवहार प्रभाव विचारों को गुरु से सीख जाता है । दृश्य और अदृश्य रूप में इसका परिणाम यह होता है कि वह विनाश बुद्धि या नाशखेत शिष्य समय से पहले विद्यालय छोड़ देता है । विद्या विमुख हो जाता है । ऐसे में उसे विद्या विमुख बनाने वाले विद्यालय से दूर करने वाले विषाक्त माता-पिता और विषाक्त गुरु का प्रभाव समाज में दिखाई देता है । लेकिन ऐसे विषाक्त माता पिता और गुरु को लोग अनदेखा अनसुना कर दिया करते हैं । तो दूसरी ओर यह विषाक्त माता पिता और गुरु अपने पुराने अतीत साहित्य का ब्यौरा देखकर अपने को समाज में पुजवाते हैं । जैसे कबीर का लिखा साहित्य :- गुरु अंतिम सर्वश्रेष्ठ सत्य है ।
कबीरा हरि के रूठते गुरु के सर ने जाए ।
कह कबीर गुरु रूठते हरि नहीं होत सहाय ।।
उस कबीर को विष गुरु और विषाक्त माता-पिता का भांन पहचान अहसास नहीं था कि जिन्होंने उसे उत्पन्न तो किया पर अपनाया नहीं । नहीं प्यार से पालन पोषण शिक्षा दीक्षा दिया । इसी प्रकार से कबीर के गुरु ने भी उसे विधिवत रूप से अपनाकर अपने गुरुकुल में रखकर शिक्षा दीक्षा नहीं दी । और गुरु नाम देकर छोड़ दिया ऐसे लोग जो अपने शिष्य को मात्र नाम दान देकर छोड़ दिया करते हैं । और शिष्य की पात्रता योग्यता व क्षमता दक्षता के विकास गुंणवत्ता गुप्त गौवा गुंण पर ध्यान नहीं देते । और ना ही गुरु के विद्या प्राप्ति के पश्चात शिष्यों के बाद जीवन पर ध्यान देते हैं । ऐसे लोग विषाक्त गुरु की श्रेणी में आते हैं । जो मां बाप अपने बच्चों के नैतिक प्राकृतिक विकास पर ध्यान नहीं देते , अपितु अपने निजी स्वार्थ हित पूजा के लिए भी अपने बच्चों से वाहियात वाक्य जैसे माता का पिता का कर्ज चुकाना , मां के दूध का कर्ज चुकाना ,, पिता का कर्ज चुकाना . ऐसे एहमकाना वाक्य अपने बच्चों में डाल डाल कर खुद को पुजवाते हैं इसका विषाक्ता परिणाम यह आता है कि उनके बच्चे भी उनकी विषाक्तता को अपना लेते हैं । उनके बच्चे भी प्रगति नहीं कर पाते , वह भी पतन के गर्त में जीते हैं या पतन के गर्त में गिरते चले जाते हैं प्रगति में बाधक बनते हैं वह भी विषाक्त माता-पिता के श्रृवण कुमार पूत की श्रेणी में आते हैं । जो अपने जीवन को अपने माता-पिता के कहे अनकहे सुने वाक्यों के आधार पर अपना जीवन जीने के लिए अपने को तैयार करते हैं परंतु उनके दिए गए शिक्षा कथन वाक्यों पर मनन चिंतन करना उचित नहीं समझते या मनन चिंतन करना नहीं सीख पाते जिससे वे अपना जीवन अपने हित के अनुसार जीते हुए अपना विकास पितर श्रेणी के अनुसार या अपना विकास अलग चेक करके अपने जीवन को माता-पिता के जीवन के श्रेणी के निर्धनता गरीबी के अनुसार ना जीते हुए अपने जीवन को सुखी समृद्ध और शांत जी सकें।
जैवअमृत के अंतर्गत सभी जीवो में उत्पन्न होने के पश्चात अपना विकास करने अपने जीवन को सुख शांति समृद्धि के साथ जीने का कला विज्ञान जैव अमरत्व है । जब अमृतपुर के अनुसार सभी जीव अपने जीवन को सतत निरंतर जीने की कामना करते हैं और इस भूमि पर सदैव स्थिर स्थाई बनने का प्रयास अमर होना चाहते हैं परंतु अमर होने का सौभाग्य साधारण लोगों को नहीं मिलता अमर लोग केवल इंद्र वर्ण या युगपुरुष ही हो पाते हैं ।आमतौर पर जब अमृत की मात्रा बच्चों में सबसे अधिक होती है जो धीरे-धीरे निरंतर जीवन जीने तक कम होती चली जाती है , वृद्ध में जैवअमृत सबसे कम होता है। और मृत जीव में जैवअमरत्व नहीं होता । इस जेब अमृत के प्रभाव से सभी जी अपने शरीर का मन का विकास करते हुए अपने जीवन को सम्यक रूप से जी पाते हैं । जिससे उनके जीवन में वह अधिक से अधिक निर्माणात्मक कार्य कर सकें , आवास का संतान उत्पत्ति का निर्माण मुख्य निर्माण कार्य हैं । जिसे उनके बच्चे परिवार कुल वंश जाति के अनुसार विकास कर सकें । यदि जाति विकास संभव ना हो तो अपना निजी स्तर पर मौलिक विकास कर सकें । यह अमरत्व का विशेष गुण उनमें भी श्रेष्ठ संतान का निर्माण करना निरोग जीवन जीना ही मानव जीवन का उचित लक्ष्य है ।
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