गलती का पुराण और महात्म्य
गलत सोच गलत ज्ञान और गलत काम परिणम:-- यह लाइन है मैंने अपने जोगी जोगड़ा छाप भिखारी गुरुजनों से सुनी है जो अक्सर भीख मांगने आ जाते हैं दरवाजे पर और ज्ञान देते हैं ःःःःगृहस्थ अतिथि जनों को बहुत भयंकर ःः :---कैसे सब ठाट पड़ा रह जाएगा जब लाद /छोड़ चलेगा बंजारा , जब तक बंज (व्यापारी) तभी तक बंजारा (व्यापार) ,, जब छोड़ दिया बंज तो कैसा बंजारा ,,,जब भाग गया बंजारा तो कैसा बंजारा । ना करें बंज तो कैसा बंजारा ।। यही गलत लाइन है जो मुझे जन्म में जोगी जोगड़ा ओं गुरुजनों से मिली मैंने इन्हें कंठस्थ किया और अब उद्धृत कर रहा हूं जिसके ग्रहण करने से समय समय उसमें पर मेरे कंठ से अक्सर जीवन में गलतियां होती रही मैंने अपने इस गल्ली के गलता पुराण के पाठ को सर्वजन के हितार्थ अपने ब्लॉग पर इसलिए उड़ेल रहा हूं ताकि इसे पढ़कर कोई भी गलती से उत्पन्न होने पर गलत परिणाम से अपनी सुरक्षा कर सके जो ऐसी गलत लाइन अपने मन में पाले हुए हैं अपनी गलत लाइनों को मन से निकाल दे ।
गलती का कारण गलती करते समय गलती करने वाले के दिलों दिमाग और कार्य में अज्ञान अल्पपज्ञान जागरूकता की कमी से होता है , प्रज्ञा जैन इसे भूल कहते हैं जो उचित अवसर पर चूक हो जाती है जिसे अपनी गलती को सही तरीके से समझने और मानने का तरीका आ गया तथा दूसरों की गलती करने पर उन्हें गलत ठहरने का तरीका आता है उस एक बार गलती करके फिर से दोबारा गलती न करने वाले महाजन को अबुद्ध प्रबुद्ध जन कहा जाता है । जिसका परिणाम किए गए कार्य का नतीजा सदैव उल्टा पूल्टा आता है गलती करने वाला गलता और जो गलती करने करने में संग लगे उसे कहते हैं गालता और जो दोनों ही जन गलती करते समय ध्यान ना रहे, उसे कहते मुगालता ।। गलती करने का अधिकार केवल धनी बलवान बुद्धिमान हो अफसर अधिकारी लोगो गुरुजन कोटि लोगों को है उनकी सभी गलतियां क्षम्य हैं । जन साधारण लोगों को, दास, सेवक गुलाम ,लोगों को अज्ञानी होते हुए भी ज्ञान ना होने पर भी गलती करने का अधिकार नहीं है । ऐसे लोग नासमझ होने पर अबूझ होने पर अबोध /अज्ञानी होने पर गलती करते हैं तो उनको गलती करने की भयंकर सजा मिलती है ।
सभी सामान्य जनों को गलती करवाने का कारण माध्यम मन है जो क्षण क्षण बदलने वाला है हर समय दूसरों को बदलते हुए देखता है परंतु खुद के अंदर आए बदलाव को कभी नहीं देखता है कि वह अपना ही मन एक क्षण के अंश में कितना बदल गया जबकि सबसे ज्यादा तो वही अपना मन बदला था अपने मन के बदलाव ने ही तो परिवर्तन की सही समझ ना होने के कारण मनुष्य से गलती कराई थी जिससे इच्छित लक्ष्य के इच्छित कर्म का परिणाम इच्छित वांछनीय नहीं आया जिसे हम गलती कहने लगते है । तो फिर गलती है क्या?
गलती का कारण है अर्ध सत्य ज्ञान ,अर्ध ब्रह्म अर्ध जीव भाव जो अपूर्णता से ग्रसित / प्रभावित होते हुए पूर्णता प्राप्ति का प्रयास आदिकाल से करता चला आ रहा है लेकिन पूर्णता है कि प्राप्त नहीं होती है। ऐसे में सभी अपने अपने बोध स्तर से कृत्या / कर्म करते रहने पर भी वांछित परिणाम की इच्छा रखते हैं । परंतु पूर्ण वांछित परिणाम कभी आता है । कभी नहीं आता है ऐसे में सूक्ष्मता से लेकर वृहद बुद्धि स्तर तक कर्म प्रयत्न करते रहने पर भी परिणाम इच्छा के अनुसार नहीं आता । ऐसे में ऐसे फल हीन / विपरीत परिणाम दायक कार्य को करना गलती करना कहते हैं ।। ऐसे में गलत कार्य होते हुए समय पर कर्ता का मन पूर्णतया तनमयता के साथ न देने से मन आधीन इंद्रियाँ भी कर्म करते समय पूर्णकालिकसाथ नहीं देती हैं । ना ही तन पूर्ण शारीरिक बल क्षमता से साथ देता है ।। उस छोटे से कर्म को करने के दौरान बार-बार मन विचलित होकर ध्यान बदलता रहता है । कार्य को पूर्ण रूप से संलग्न एक लक्ष्य एक पक्षीय होकर इंद्रियां ध्यान विचलित होते ही अपना धर्म बदलने लगती हैं । जिससे मन को कुछ का कुछ सुनाई देता है , आंखों को कुछ का कुछ दिखाई देने लगता है , ऐसे में थोड़ी देर को क्षणिक समय को लक्ष्य ओझल हो जाता है , और थोड़ी देर बाद जब लक्ष्य पूर्णतः दिखाई देता है । तब तक भयंकर गढ़बड़ गलती हो चुकी होती है । इसी क्षणिक समय की ध्यान भंगता कर्म के परिणाम को परिणाम के अंश के अनुसार बदल देती है । इसी क्षणिक समय में करते कार्य के दौरान कथित शरीर का गिरता ऊर्जा स्तर रही सही कमी को पूरा करके नकारात्मक परिणाम देता है , सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाता । थके हुए शरीर से और थके हुए मन से किए गए कार्य में सफलता नहीं असफलता हाथ लगती है । क्यों होता है ? जब ऐसी नकारात्मकता का परिणाम जब हम सकारात्मक कार्य के दौरान जब हम पुनःप्रयास कर रहे होते हैं? पुनः प्रयास करके भी इच्छित परिणाम नहीं ले पाते ।
काश हमने ध्यान जमाना बिना अंगुलियाँ लगाए कान बंद करना शरीर को सतत ऊर्जावान बनाए रखने का मूल मंत्र एकाग्रता एक लक्ष्य एक दृष्टि सीखा होता ! कैसे होता है एकाग्रता से ध्यान भंग कैसे और क्यों हो जाता है? कैसे लक्ष्य से दृष्टि हट /उड़ जाती है ? कैसे ओझल हो जाता है लक्ष्य ; क्षणभर में? कैसे कब बदल में बदल जाता ह शरीर चंचल भाव ?
इन सभी के आदि मध्य और अंत में छिपा है परिवर्तन का बीज गलती या जीव का चंचल मति स्वभाव इस गलती को ऐसा नहीं है कि हम पहली बार ही कर रहे हैं , यह गलती ही अन्य असंख्य रूपों में आदिकाल में हमारे पूर्वजों ने की ; वर्तमान में हम कर रहे हैं और अंतः कॉल भविष्य में हमारे बच्चे हमारी संतति भी गलतियाँ करेंगे ; भरेंगे गलती का गलत नतीजा मुगालता यानी असफलता उल्टा परिणाम ।। सही काम का तों पता नहीं था लेकिन सही काम नहीं हो पाया ; भविष्य में भी पीढ़ियाँ गलती हो गई यह कहती रहेंगी । इस गलती को सुधारने के , कम करने के , बंद करने के, खत्म करने के प्रयास मानव की पूर्वज पीढ़ियाँ आदिकाल से करती चली आ रही है । तरह तरह से मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाने के लिए तरह-तरह की ध्यान पद्धतियां मानव ने विकसित की है ।भावतीत ध्यान, विपश्यना ध्यान ,प्रेक्षाध्यान , शरीर को ऊर्जावान बनाने के तरह-तरह के तरीके जिम योग और शारीरिक शिक्षा आजकल भी मुख्य है ।इस गलती को सुधारने के लिए गलती में कमी लाने के लिए वर्तमान समय में तरह-तरह के साहित्य का सकारात्मक सोच पैदा करने वाली पुस्तकों का उत्पादन बाजार में औद्योगिक स्तर पर चल रहा है । इंटरनेट पर भी व्यायाम लिखित व्याख्यान रूप में उपलब्ध है। तथा ऑडियो कैसेट श्रवण संसाधन के स्रोत विशेष वक्ता विशेष कार्य दक्ष सर संगठनों में गलती सुधारने गलती संशोधन करने गलतियों में कमी लाने के लिए विशेष वेतन पर पब्लिक ऑफिसर के रूप में नियुक्त हैं । परंतु गलतियां है कि कम नहीं हो पा रही हैं , ना समाप्त होने का नाम ले रही हैं । यह गलतियाँ सुरसा की संतान के समान अनेक असंख्य असीमित रूप में नित्य नहीं गलतियां सामने आ रही है फिर भी प्रयास जारी है कि गलतियां कब समाप्त होगी? कब ऐसा मानव बनेगा जो कभी गलती नहीं करेगा । मैं भी गलतियां होने से परेशान हूं , इन गलतियों में से ःः जो ना चाहते हुए भी हो जाती हैं।औंर इन सुरसा की औलाद गलती से पंगा ले बैठा और अब भुगत रहा हूं मैं भी अतीत की गलतियों का वर्तमान में गलत नतीजा :-- नफरत , संघर्ष, अप्रिय व्यवहार , दुर्व्यवहार , दंड /हानि , अपमान , जिल्लत, जलालत ,खिजालत ।इन गलतियों की अनेक प्रकार के रूपों से मिले दुखों के रूप में इन गलतियां करने की आदत सुधारने मेरा व्यक्तित्व बिगाड़ कर रख दिया है ।जबकि मैं कयी प्रकार के ध्यान भावातीत ध्यान विपश्यना ध्यान प्रेक्षा ध्यान श्रव्य ध्यान दृश्य ध्यान संवेदी ध्यान गंद ध्यान स्पर्श ध्यान आदि का पाठ्यक्रम शिक्षित हूं लेकिन गलतियों से पार नहीं पड़ रहा है ।
अब जब अंतहीन गलतियां करने की सोच की सुरसा की औलाद गलतियों से पंगा ले लिया , जीवन आयु अवधि की पूर्णता का पता नहीं है तो फिर गलतियों के बाणों से घायल होने पर यदि दुख महसूस होने का अनुभव करने लगे तो संघर्ष की क्षमता उद्यम करने का प्रयास धीरे धीरे खत्म हो जाएगा परिणाम वही आएगा जीते जी मौत:- निकम्मा पन , आलस्य ः यही वे मानवीय गुण है जो दुश्मन को बिना पराक्रम उद्यम के खुश करते हैं और मानव जीवन की प्रगति को समाज में जीते जी मनुष्य का पशु स्वरूप में परिवर्तन होता देखता है परिणाम मोक्ष ( कर्म झंझट से छुटकारा ) बुद्धिहीन होने से ( सोच से छुटकारा ) जीते जी बिना मरे नर्क की प्राप्ति , मरकर तो मोक्ष मानव प्राप्त करता है पर कर्मफल परिणाम से मुक्त होकर जीते जी मोक्ष का आनंद पशुज कोटि के मानव लेते हैं निष्काम भाव से कर्म हीन हो करके या फिर मोक्ष का आनंद लेने वाले वह कर्म हीन कर्म विमुख बिना श्रम करने वाले मानव होते हैं। जो मानव कर्म धर्म के संकट में नहीं पड़ते जिन्हें हम पागल अबोध बेबुद्धि प्राणी कहते हैं वह भी जीते हैं सबसे अधिक गलतियां तो यही अबुद्ध जन करते हैं। लेकिन इनकी गलतियां विचारणीय नहीं रहती है इनकी गलतियां माफ कर दी जाती है। यह बे बुद्धि लोग इस दुनिया में पूरी उम्र पर तंदुरुस्त रहते हैं। बिना कर्म बिना फल बिना कर्म किसी का फल किसी को दायित्व हीनता के निर्मल मन के सिद्धांत से कि उन्होंने कभी कोई बुरा कर्म किया ही नहीं तो फिर बुरे कर्मों का लक्ष्य हीनता दोष या बुरा फल वह क्यों देखेंगे । विकर्म अग्नि के ताप से सदैव दूर रहकर बात बनाते हैं दूसरों को दिशा निर्देश देते रहते हैं पर स्वयं कर्म अग्निकुंड के निकट प्राप्त क्षेत्र में स्वयं नहीं आते इन्हें बांस कहते हैं यदि यह गलती से भूलवश कर्म के ताप /ऊष्मीय क्षेत्र में आ गए तो अपने अधीनस्थ कर्मचारी को तुरंत अग्नि ताप क्षेत्र में झांक देते हैं और आप कर्म अग्नि ताप क्षेत्र की पहुंच से दूर रहते हैं तभी तो वह बॉस (बर्न आउट सिंड्रोम) सर्विसेज में रहते हैं उनकी सुविधा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है उनके अधीनस्थ कर्म की गलतियों का दोष उनके सिर पर मरता/मढता रहे और उनका बॉस निर्दोष रहे। बॉस की सुविधा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है उससे कर्माणि क्षेत्र से दूर रखा जाता है।
गलती को सुरसा संतति कहने का ख्याल मेरे मन में रावण से आया था पुराणों से पुस्तकों से भी पढ़ा था कि रावण ने गलती के साहित्य से पीएचडी की थी गुरु शुक्राचार्य के नियंत्रण में क्योंकि गुरु बृहस्पति जी ने उसे गलती पर संशोधन करने की विधा पीएचडी करने के लिए मना कर दिया था बृहस्पति जी गलती का समूल संशोधन कराने के कारण से ही देव गुरु बने थे । जबकि शुक्राचार्य जी अपनी गलती पर अडिग रहने और गलती की एवज में दूसरी बड़ी गलती करने के कारण दैत्य गुरु तांत्रिक सम्राट बने थे । उन्हें गलती में सुधार की विधा का पूर्ण ज्ञान था परंतु जीवात्मा के सूक्ष्म रूप सीमितशिव शक्ति असीम सोच से उपजे मानव चित्त की चंचलता के स्वभाव का पता था । तभी तो उन्होंने गलती का सुधार बड़ी गलती करने करवाने का मूल मंत्र रावण को दिया था । लक्ष्य बोध के लिए रेखा ज्ञान विधा बड़ी रेखा के अंश को मिटाकर छोटी रेखा करना और छोटी रेखा में जोड़कर छोटी रेखा को बड़ी बना देना या उसके बराबर कर देना । अर्थात गलती करा कर छोटे जीव की मानसिक स्थिति खराब कर उसके अहम अस्तित्व को हीन करना , या , कम करना ,रावण को यह दोनों तंत्र विधाएं एकाग्र मन से कंठस्थ थी तभी तो उसने कभी भी बलवान शत्रु बली सहस्त्रबाहु से पंगा नहीं लिया । निर्बल ओं को सताना महिलाओं पर पराक्रम प्रदर्शन करना उसका जीवन लक्ष्य की मुख्य आदत थी । उस समय जो भी विशेष महिलाएं थी उसने सामाजिक मान सम्मान को तिलांजलि देकर उन्हें बलपूर्वक लंका लाकर एकत्र किया था । उसके महल में महिलाओं/दासियाँ थी । जिसमें महिलाओं का रूप लावण्य स्फूर्ति का नित्य प्रदर्शन करना होता था । कहने भर को तो ये रावण की रानियां लिखी है ।रावण का मूल नाम उसके पिता विश्वेर ने क्या रखा था यह पता नहीं पर रावण का नाम उसके नाना ने रखा था जो बाद में शुक्राचार्य ने तंत्र दीक्षापश्चात रोवन रखा जिसका तात्पर्य है दूसरों को अकारण रुलाते हुए कष्ट देकर खुश होना ।। प्रगति के लिए मित्रों की खुशहाली को नियंत्रित रखो , उन्हें इतना समर्थ मत होने दो की उनमें स्वामी भाव पूरित हो जाएं । मित्रों कुटुंब सहायक जनों को सदा पीड़ित परेशान दुखी रखो यदि उनमें स्वामी भाव दिखाई दे , तो उनकी समृद्धि की लाइन काट कर उनको निर्धन कर दो । तभी वे सेवक बने रहेंगे अन्यथा समृद्धि से स्वामी भाव पाकर अपने स्वामी को समस्या ग्रस्त कर देंगे । सत्ता गई शासन गया ऐश्वर्या गया दुखाया चिंता शुरू जीवन दूभर इसलिए उसने अपने अधीनस्थ सेवकों को गलती कराने के लिए समय-समय पर उन्हें उनकी मानसिक शारीरिक बौद्धिक क्षमता से अधिक कार्य देकर गलतियां करवाता था उन्हें रुलाता रहता था । मित्रों संबंधियों के अक्सर रोते रहने से उनकी आत्मा हीनता अबोध मन निर्मल तन का पता चलता रहता है अतः किसी मानव को आत्मा वान मत रहने दो आप महान होते ही वह प्रगति पथ पर चलने लगेगा और पंच मानव प्रगति स्तर पंच परमेश्वर विप्र नेता विधायक मनु इंद्र इंद्र आदि स्तरों से होता हुआ परम आत्मा स्तर तक चला जाएगा जो बाद में गिन गिन कर पुरानी रंजिश ई करतूतों के बदले गिन गिन कर लेगा ।अतः अधम शासक / बाँस का परम कर्तव्य है कि अधिनस्थ सेवकों को पतित ज्ञान , कल्पित ज्ञान , भ्रम ज्ञान देकर उसे गलतियों के मार्ग पर निरंतर चलते रहने को मजबूर करो जिससे मनुष्य शिक्षा पाकर भी सेवक भाव धरकर सदैव नीची नजर करके तुम्हारे सामने दीन हीन विकलांग हालत में रहेगा अतः मनुष्य को पशुध सेवक बनाओ उसे दानव स्वामी भाव से निरंतर नियंत्रित बाधित करते हुए पतित अवस्था में बनाकर रखो लगातार गलती करा कर गलती पर ताड़न पीटन कर मनुष्य को अवैध पशु बनाए रखो यह रावण का मूल शुक्राचार्य मंत्र था जिससे रावण के शासन में रावण के अतिरिक्त किसी में भी स्वामी भाव नहीं था । स्वामी भाव उदय होने पर रावण स्वामी भावधारी पर नजर रखता था और स्वामीभावधारी पर गलती करा कर मारपीट करके वह उस मानवको मानसिक पशु अवस्था में रखता था ।
No comments:
Post a Comment