विस्मृति भूलना क्या है ?

भूलना या विस्मृति मनुष्य का स्वाभाविक जैविक मौलिक गुण है । जिसके अनुसार मनुष्य का नित्य का सीखा गया ( दृश्य आत्मज्ञान ) अध्ययन किया गया ( शब्द ज्ञान ) सुना गया ( नाद / शब्द / ध्वनि ) ज्ञान जो नित्य प्रत्येक दिन सीखा गया अधिगम किया जाता है । वह सीखने के , सुनने के ,  स्मृत / अधिगमित  होने के पश्चात उसमें से अधिकतम अनुपयोगी ज्ञान जो भविष्य के लिए उपयोगी नहीं होता वह ‌विस्मृत / भूलना / मिटना या  क्षय होना शुरू हो जाता है । यह भूलने की / विस्मृति / स्मृति छिपने की प्रक्रिया रात्रि में निद्रा अवस्था में सर्वाधिक तेज गति से होती है । जिससे मानव मस्तिष्क अगले दिन के लिए जीवन को सुचारू रूप से जीने के लिए निम्नतम स्मृति स्टार के अनुसार  मानव को तैयार करता है । यदि स्मृति विस्मृत नहीं होती तो मस्तिष्क पर अनावश्यक स्मृति बाहर पढ़ने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता क्रमशः घटती चली जाती है ।  जिन लोगों में  विस्मृति / भुलक्कड़ की दर  स्मृति की तुलना में अधिक होती है उन्हें मंदबुद्धि या कम बुद्धि  कहा जाता है । जिसमें विस्मृति दर स्मृति की तुलना में बराबर या सामान्य होती है उन्हें साधारण मनुष्य कहा जाता है । जिन लोगों में स्मृति की दर अधिक और विस्मृति की दर कम होती है उन्हें विशिष्ट मेधावी मूर्धन्य विप्र ( विशेष प्रतिभाशाली लोग ) कहा जाता है । इस विस्मृति के  भुलक्कड़ पन के स्वभाव के जैविक पाशविक मानवीय गुणों की अनिवार्यता आवश्यकता के कारण मनुष्य के   मन मस्तिष्क में पूर्व में संचित किए गए अधिनियमित ज्ञान की सभी उपयोगी / अनुपयोगी ,  आवश्यक /अनावश्यक सूचनाएं अक्सर उनके मन के विभिन्न स्तरों में चेतन अचेतन अवचेतन सुपर चेतन  मन में चली जाती हैं या मिटकर विस्मृत होती रहती हैं । जो अक्सर आवश्यकतानुसार अवचेतन मन की आवश्यकता के अनुसार या विश्लेषण करने के पश्चात वापस आ जाती हैं । परंतु जो साधारण स्मृति स्तर के या मंदबुद्धि स्तर के लोग हैं उनके मस्तिष्क में यह संचित ज्ञान सूचनाओं का शीघ्रता से नष्ट हो जाता ह उसे  विस्मृति या भूल जाना कहते हैं । विप्र लोगों के मन मस्तिष्क में यह सूचनाएं   शीघ्रता से नहीं नष्ट होती जिसके कारण विप्र लोगों की स्मृति सामान्य जन की तुलना में अधिक उत्तम कही जाती है।
     मानव मन मस्तिष्क में छिपी अदृश्य गुप्त सुप्त लुप्त ज्ञान सूचनाओं में से आवश्यक सूचनाओं को दैनिक उपयोग में व्यवहार में लाने के लिए नित्य अध्ययन की आवश्यकता होती है । जो लोग नित्य अध्ययन नहीं किया करते हैं वे अपने जीवन में सभी आवश्यक सूचनाएं /आर्जित संचित ज्ञान के रूप में भूलते रहते हैं ।  मनुष्य मन को इस विस्मृति /भुलक्कड़पन के  दोष से बचाने के लिए, कम करने के लिए   समाज के परिवार के सभी लोगों को नित्य शिक्षण कार्य की आवश्यकता होती है । इस  के लिए शिक्षित लोगों द्वारा  शिक्षण के कार्य को दैनिक पाठन पठन लेखन श्रवण वार्ता आदि अनेक शिक्षण कार्यों की नित्य आवश्यकता होती है । तभी समाज में परिवार घर शिक्षित अवस्था में रह पाता है अन्यथा यदि शिक्षण कार्य सतत नहीं किया जाता या शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता तो ऐसे में अच्छे से अच्छा उच्च शिक्षित व्यक्ति हो या परिवार अपने आप अपनी अपनी विस्मृति के स्तर भुलक्कड़पन के अनुसार अशिक्षा को प्राप्त हो जाता है । समाज को इस अशिक्षा के अभिशाप से बचाने के लिए इस परम आवश्यक नित्य शिक्षा  अधिगम कार्य को निरंतर  बनाए रखने के लिए सभ्य सुसंस्कृत समाज के लोग प्रबुद्ध जन शिक्षक , धार्मिक शिक्षक , पंडित  , फादर आदि अनेक धार्मिक गुरु परिवार को, समाज को  शिक्षित रखने के लिए  शिक्षा को समाज में निरंतर बनाए रखने के लिए अपने अपने विविध प्रकार के तरीकों से निरंतर शिक्षण कार्य करते रहते हैं । जिससे वार्ता सत्संग या ज्ञान /प्रवचन  समागम कहते हैं ।  किसी भी समाज का परिवार का जागरूक होना उनकी सभ्यता का संस्कृति का चिरकालिक  स्थिर स्थाई होना उस समाज के शिक्षक जनों ,प्रबुद्ध जनों की सक्रियता पर निर्भर करता है । यह उस जनसाधारण की रूचि पर  जागरूकता पर निर्भर करता है ।  
           जिस समाज के लोग शिक्षा के प्रति उदासीन हो जाते हैं । शिक्षा ,  शिक्षक ,  संस्कृति का सम्मान नहीं करते  या  जिस समाज में शिक्षा का व्यवसायीकरण कर दिया जाता है या हो जाता है । वह शिक्षा व्यावसायिक समाज शिक्षा दाताओं गुरु जनों को शिक्षा के उपयोग मूल्य का भुगतान नहीं किया करता है । तब  वह फोकटिया परिवार , समाज  अंतः गोत्वा  अन्न धन का शिक्षा उपयोगिता के अनुसार भुगतान न करने के कारण अशिक्षित होकर नष्ट हो जाता है । आदिकाल से इस फंडे के कारण पुरानी शिक्षा संस्कृति सभ्यताएं स्वतः ही नष्ट होती आई हैं । आक्रामक जाति के लोगों ने रक्षक जाति के लोगों की शिक्षा संस्कृति को नष्ट कर दिया है। जिस कारण और नई-नई शिक्षा संस्कृति यहां पैदा हो रही है । अपनी अपनी सभ्यता संस्कृति को बचाने के लिए धार्मिक शिक्षक निरंतर धर्मशिक्षा देने में , राजनीतिक शिक्षक राज शिक्षा देने में, राजगुरु/ राजपुरुष / राजनेता विविध प्रकार की शिक्षाएं देने के लिए प्रयासरत हैं। सर्वतोन्खी विकास की शिक्षा देने के लिए शासकीय शिक्षक सक्रिय रहते हैं । विश्व की भौगोलिकता कि शिक्षा देने के लिए प्रभावी चैनल टीवी , रेडियो, पत्र पत्रिकाएं, व्हाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर आदि दिन-रात मनुष्य को शिक्षित करने के लिए सक्रिय रहते हैं । संविधान की शिक्षा देने का कार्य दायित्व न्यायपालिका - वकील जज कार्यपालिका भारतीय - प्रशासन सेवा ने संभाल रखा है। चिकित्सा शिक्षा देने के लिए भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ,यूनानी चिकित्सा पद्धति, होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति, पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति मेडिकल, आदि ने मानव जीवन की आयु स्थिरता का दायित्व संभाल रखा है , कहने का तात्पर्य यह है कि तरह-तरह के कोटि-कोटि गुरुजनों ने समाज में मानव जीवन की सतत निरंतरता को सुचारू रूप से चलाने के लिए सभी अपने-अपने तरीकों से सक्रिय हैं ।
     लेकिन इन सभी के अथक प्रयासों के बावजूद मनुष्य अक्सर तरह-तरह की जैविक , पारिवारिक , सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक,  भौतिक रासायनिक समस्याओं से ग्रस्त है । कारण है कि कार्य करते रहने पर भी कार्य का सम्यक उचित परिणाम नहीं आता ह । या कार्य के विपरीत परिणाम आना समस्या को और भी बढ़ा देता है । जिससे मानव मन ज्ञान श्रोत संसाधनों की विशालता के होने पर भी समस्या ग्रस्त परेशान दुखी हो जाता है । जिसका मूल कारण है । मनुष्य को उसकी आवश्यकता के अनुसार सही शिक्षा न मिलना  या   मानव मन का , मस्तिष्क का भूलने का गुण विस्मृति अर्थात स्मृति को छुपा कर रखना । 
              इस मानव मस्तिष्क के इस दुर्गुण विस्मृति के समाधान करने के लिए इसे कम करने के लिए हम सभी को निजी तौर पर पारिवारिक रूप से सामाजिक रुप से नित्य व्यक्तिगत अध्ययन , दैनिक , साप्ताहिक , मासिक , वार्षिक अध्ययन की आवश्यकता होती है ।  नित्य अध्ययन एकल अवस्था में करने पर सीमित  प्रभावी होता है । एक व्यक्ति को शिक्षित करता है । सामाजिक सामूहिक अध्ययन करने पर विशेष प्रभावी होता ह। जिससेेेेे समाज शिक्षित होता ह ।  इस विशेष अध्ययन को करते हुए विशेष जागरूक, शिक्षित लोग अपने मन मस्तिष्क को भविष्य के लिए , अगले दिन के लिए , समय पूर्व मानसिक योजना वैचारिक रूप से , कार्य योजना पाठक पत्र बनाकर स्वयं को पहले से तैयार रखते हैं । वह अपने दिलो-दिमाग को नित्य दैनिक रूप से उचित नवीनतम सूचनाओं से सुसज्जित अपडेट रखते हैं । वह समाज में अधिकतम प्रगति करते हैं। ऐसे लोग न्यूनतम समस्या ग्रस्त रहते हैं जैसे प्रशासनिक वर्ग , शिक्षक वर्ग , न्यायपालिका वर्ग के लोग, स्वास्थ्य सेवा दाता , चिकित्सक , इंजीनियर आदि ,, परंतु जो लोग अपने मन और दिमाग को अधिकतम अध्ययन न करते हुए न्यूनतम अध्ययन करते हैं या अध्ययन करना उचित नहीं समझते उनके सार्थक अध्ययन न करते हुए निरर्थक अध्ययन व्हाट्सएप टि्वटर फेसबुक में अपना अधिक समय व्यतीत करते हैं । वह पढ़े लिखे भी अनपढ़ अशिक्षित जैसे रह जाते हैं । क्योंकि इन  ज्ञान  चैनलों पर प्राप्त ज्ञान दाताओं का बौद्धिक स्तर कम होता है या फिर वे अपने दिमाग का कूढ़ा /मानसिक कचरा दूसरे लोगों के दिमाग को खराब करने के लिए फैंकते रहते हैं अनावश्यक सूचनाओं के रूप में ।   इन अनावश्यक सूचनाओं का दैनिक जीवन में उपयोग कम होता है ये अनावश्यक ज्ञान , अज्ञान, कल्पना, मिथक किंवदंतियाँ , सूचनाएँ मानव मन मस्तिष्क पर अनावश्यक /फालतू का स्मृति भार बढ़ाकर मनुष्य के मन /मस्तिष्क की कार्य क्षमता को घटाती हैं / कम करती हैं । इन , टीवी  ,  व्हाट्सएप , फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर , कू आदि ज्ञानदाता चैनलों के दिए गए ज्ञान की  परीक्षाएं नहीं होती । ना  इस तरह का ज्ञान अनौपचारिक चैनलों से प्राप्त किया ज्ञान विश्वसनीय नहीं होता ह । यह ज्ञान शोधित उपचारित नहीं होता है । उस में अधिकतर अक्सर आपत्तिजनक ज्ञान भी आ जाता है ।  जिसकी   परख प्रत्येक पाठक को नहीं होती है । 
        ज्ञान की परख परीक्षा गुरुजनों के द्वारा ही संभव है। ऐसे ही बिना गुरु के नियंत्रण निर्देशन में  ज्ञान को अर्जित  हुए पढ़े लिखे लोग  निगुरे कहे जाते हैं ।  जो पढ़े लिखे होने पर  निगुरे गवार लोग ज्ञानी होने पर भी अपने जीवन में अधिकतम समस्या ग्रस्त रहते हैं । जो अपने जीवन में दरिद्रता विपन्नता गरीबी कटु वचन वक्ता निर्धनता में जीते हुए संसाधन हीन होकर अपने जीवन को दुखी मन से जिया करते हैं । मानव जीवन में समस्या निवारण के लिए या न्यूनतम समस्या में जीवन जीने के लिए स्वयं का नित्य शिक्षा ज्ञान दैनिक शिक्षा ज्ञान उचित कुल गुरु के नियंत्रण निर्देशन में अति आवश्यक है । जो  प्रबुद्ध  जनों ,महाशय जनों ,गुरुजनों , और धर्म जनों के सानिध्य /सत्संग से प्राप्त किया जाता है उस ज्ञान का भी कुलगुरु के द्वारा परिमार्जन /शोधन आवश्यक है । अतः कुलगुरु का परिवार में महत्वपूर्ण स्थान होता है ।
   मानव मस्तिष्क की विश्राम अवस्था का नाम विस्मृति है जो निद्रा नशा निकम्मापन या मानसिक निष्क्रियता अवस्था रूप में दृष्टिगोचर होती है। जिसके सामान्य से अधिक होने पर डिमेंशिया अल्जाइमर स्मृति भ्रंश  आदि मनोरोग उत्पन्न होते हैं । मानव मस्तिष्क की सक्रियता का नाम स्मृति है । जिसमें मस्तिष्क की सक्रियता से जीव जीवन को अति जागरूकता से जीते हैं । परंतु जब स्मृति भार  अपने मस्तिष्क की मानक क्षमता से अधिक हो जाती है तब दूसरे प्रकार के मनोरोग हिस्टीरिया सिजोफ्रेनिया असामान्य असभ्य व्यवहार उत्पन्न होने लगते हैं । ऐसी विचित्र अवस्था में मन का मस्तिष्क पर से नियंत्रण हटने लगता है । मनुष्य अनियंत्रित स्मृति तारतम्य टूटने से मनुष्य अनाप-शनाप बकने लगता है ।
         ऐसे में मन का उचित व्यवस्था से मस्तिष्क पर नियंत्रण करना आवश्यक  है ।ना कि मस्तिष्क का मन पर नियंत्रण करना । मस्तिष्क का अधिक ऊर्जावान होना और मस्तिष्क पर सम्यक समर्थ नियंत्रक बनना  मस्तिष्क की कोशिकाएं न्यूरॉन और न्यूरोग्लियल सेल्स ग्रे मैटर की अधिक ऊर्जा स्तर के मोटाई मानक से अधिक होने पर होता है ।  मन और मस्तिष्क दोनों की मिलीजुली सम्यक जानकारी एक दूसरे को साझा करने  नियंत्रित करने की क्रिया का नाम सपना वस्था है ।  जिसमें जब मस्तिष्क तनाव /दवाव से उग्र हो जाता है तो वह मस्तिष्क अपने को शांत /कूल करने /  नियंत्रण करने के लिए मन को  अतिरिक्त स्मृति भार चित्रों ऑडियो को निकालता है । जिससे मन को स्वप्न में भयंकर डर अनुभव होता है । परंतु जब मस्तिष्क शांत मन सक्रिय होता है तो वह मस्तिषक में से चयनित इच्छाएं के आधार पर आडियो वीडियो निकाल कर  प्रिय स्वप्न बनाता है जिसे स्वप्न में वह भय के स्थान पर प्रसन्नता महसूस होती है । जो दृश्य तन मन की इच्छा के अनुसार बनकर उभर कर आते हैं उस समय मस्तिष्क और मन शांत /सक्रिय  होते हैं । तब मन मस्तिष्क अपनी अपनी इच्छाओं के अनुसार  तनाव जनित दृश्यों की स्मृति समस्याओं को परिवर्तित करके निकालता है । जिससे स्वप्न मन मस्तिष्क की इच्छा के अनुसार नहीं आते और अक्सर ऐसे विचित्र अप्रिय स्वप्न जंजालिक दृश्य देख कर मन भर जाता है । भयंकर स्वप्न देख करके ऐसे भयंकर स्वप्न देखने के पश्चात खोपड़ी में उस विशेष  स्मृति स्थान विशेष पर दर्द अनुभव होता है । जो उस वक्त दर्शन के कुछ अंतराल के तुरंत बाद लगभग 5 से 30 मिनट के अंतराल में पुनः  विस्मृति या भुलक्कड़ पंन द्वारा यह दर्द गायब हो जाता है । पीड़ादायक स्मृति तनाव उत्पन्न करने वाले दृश्य के उखड़ जाने के पश्चात वह घटना घटित दृश्य मस्तिष्क के स्मृति पटल से पूर्णतया हट जाने से मस्तिष्क स्मृति भार से हल्का हो जाता है।
         कुछ लोग जिनमें नित्य शिक्षण सीखने की इच्छा नहीं होती है वह नया कुछ नहीं सीखते हैं वे आजीवन बच्चे बुद्धि बने रहते हैं वे अपने जीवन को बचपन में जीते हैं उनका शरीर बड़ा मुख्य मुद्राएं भाव भंगिमा बड़ी होती है शरीर से वे जवान या वृद्ध भी दिखते हैं परंतु उनका मन इसके विपरीत पलट या उल्टा भी होता है अर्थात ऐसे लोग बुड्ढे होकर भी बालक मन की अवस्था में जीते हैं ।

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