द्विध्रुवीय विकार या बाइपोलर डिसऑर्डर वह मानसिक बीमारी है जिसमें मनुष्य कभी कभी बहुत अच्छा प्रदर्शन करता है अच्छी उपलब्धि हासिल करता है तो कुछ समय पश्चात उसका प्रदर्शन यकायक खराब होने लगता है । उपलब्धियां घटने लगती हैं ऐसे में हम उसे द्विध्रुवी विकार या बाइपोलर डिसऑर्डर मानसिक मनो रोग कहते हैं अक्सर जिसमें मनुष्य खराब उपलब्धि खराब परिवर्तन खराब अवसाद से परेशान होकर अवसाद ग्रस्त हो जाता है ।
परंतु हम यह भूल जाते हैं कि यह द्विध्रुवीय विकार नाम की मानसिक बीमारी का हमें एहसास - मानसिक स्तर भेद होने वाले एक उच्च बुद्धि वाले और एक निम्न बुद्धि वाले माता-पिता के संयोग से अनुवांशिक रुप में उनके सानिध्य में रहने पर व्यवहार में मिलती है । अर्थात यदि किसी के माता-पिता में एक बुद्धिमान और एक मूर्ख बुद्धि स्तरीय ह , तो उनकी संतान में बुद्धि स्तर के अंतर भेद की अधिकता से उनकी संतान /संतति में बाइपोलर डिसऑर्डर की मानसिक विकृति के आने की संभावना बहुत अधिक होती है। परंतु यदि उनके बौद्धिक अंतर भेद में थोड़ी समानता है या बौद्धिक अंतर भेद कम है तो ऐसे बच्चों में , ऐसे मनुष्यों मेंबाइपोलर डिसऑर्डर या मानसिक विकार के आने की संभावना बहुत ही कम रह जाती है ।
बाइपोलर डिसऑर्डर एक ऐसी मानसिक बीमारी है कहने को इस पर बहुत लिखा गया है कि यह सत्य है असाध्य है उसे है परंतु मेरे विचार से यह अनुवांशिक होने के कारण सदैव असाध्य थी है और रहेगी ।।
यह बात अलग है किसी में बाइपोलर डिसऑर्डर की अधिकता ज्यादा होती है तो उसका परिणाम ठीक नहीं आता सदैव गलत आता है परंतु जिसमें बाइपोलर डिसऑर्डर के होने की संभावना कम होती है तो उनका परिणाम अक्सर सही आने की संभावना रहती है…
यहां से शुरू होता है आपके प्रश्न का जवाब— बाइपोलर डिसऑर्डर होने के कारण अवसाद ग्रसित होने की संभावना :- जब मनुष्य पढ़ लिख जाता है उस अहंकार (मैं सर्वश्रेष्ठ सर्वोच्च सर्वज्ञानी) की मूर्ख भावना पैदा हो जाती है तो ऐसे में उसके अंदर अभिमान की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है ।वह अपने ज्ञानबल पर घमंड करने लगता है ।समस्त समाज घरकुल दूसरे सभी विद्वान लोगों को अल्पज्ञ या कम बुद्धि वाला समझने लगता है । जिससे उसमें ज्ञान का अहंकार बहुत अधिक बढ़ जाता है । परंतु जब कभी वह अपने जीवन में फेल होता है ।या कार्य के अनुसार कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती या विपरीत कर्म फल प्राप्त होता है और यह प्रक्रिया बन जाती है निरंतर लगातार फेल होते रहने से वह अक्सर धीरे-धीरे अवसाद के गर्त में जाने लगता है । क्योंकि वह समाज से दूसरे लोगों को गलत बोलने के कारण या दूसरे लोगों को कम बुद्धि का समझने के कारण पहले से टूट चुका है । ऐसे में उस अवसाद ग्रस्त मनुष्य की फेल होने पर भी लोग कोई मदद नहीं करते , उसका उपहास उड़ाते हैं । क्योंकि उसने पहले लोगों को अपने वाक्य में व्यंग बाणों से घायल पीड़ित किया था । समाज भी बदला लेता है अब जब समाज के बदला लेने का वक्त आता है वह मनुष्य लगातार फेल होता चला जाता है तो ऐसे में उसका अवसाद और ज्यादा बढ़ने लगता है । इस अवसाद से मुक्ति पानी है तो अवसाद ग्रसित बाइपोलर डिसऑर्डर से युक्त व्यक्ति को आत्ममंथन की आवश्यकता होती है।
समस्त आत्ममंथन करना ( अपनी कमी /भूल /गलतियां स्वयं स्वीकार करने के बाद स्वयं सुधार करना सीखना होगा) का सूत्र है , एक ही फार्मूला है समाज के प्रतिष्ठित / विद्वान लोगों लोगों से जुड़ना , समाज के महाशय लोगों तथा सभी जनसाधारण लोगों से भदेश भाषा में जंगली पन के शब्दों का उपयोग करने से बचना । यही व्यवहार परिवर्तन अवसाद मनुष्य को बाईपोलर डिसऑर्डर प्रकोप से बचा सकता है । इसके बुरे प्रभाव से बचा सकता है , क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति अवसाद ग्रस्त होता है तो अवसाद ग्रस्त होने के बाद उसका और भी अगला कदम खतरनाक होता है जिसे एकांकी पन अलगाव कहते हैं और उसके पश्चात और अंतिम कदम होता है जिसे आत्महत्या करना कहते हैं ।। इस पर मैं सिर्फ यही कहूंगा कि यदि कोई बाइपोलर डिसऑर्डर पीड़ित व्यक्ति है जिसके परिणाम प्राय अधिकांशतः खराब आ रहे हैं संभावनाएं विपरीत हो गई हैं तो उसे आत्ममंथन करने के बाद अपनी वॉक शैली सुधारने अधिक आवश्यकता ह । उचित है तभी लोग उसकी मदद करेंगे वह समाज से जुड़ेगा उसका ध्यान बटेगा और ऐसे में समाज के दूसरे प्रतिष्ठित लोगों के ज्ञान के प्रभाव से उस मनुष्य की समस्याओं के कम होने की संभावना बन जाती है ।
कार्ल पीयर के अनुसार समस्त मानसिक रोगों का कारण मनुष्य को मिला भ्रम ज्ञान ( मन को दुविधा में डालने वाला शख्स संदेश शंका उत्पन्न करने वाला ) गलत ज्ञान विपरीत ज्ञान है । जिसका सुधार होने पर या जिस में बदलाव करने यदि मनुष्य को सत्य ज्ञान या ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो जाता है वह यथार्थ को स्वीकारने समझने ग्रहण करने लगता है तो ऐसे में सत्य ज्ञान के प्रभाव से उसका अवसाद स्वयं खत्म हो जाता है । बाइपोलर डिसऑर्डर मंद पड़ जाता है या दब जाता है । याद रहे बाइपोलर डिसऑर्डर मंद पड़ सकता है दब सकता है परंतु जीवन में कभी भी खत्म नहीं हो सकता है । अतः हमें इस मानसिक बीमारी के साथ खुद को जीना सीखने की आदत अपनानी पड़ेगी
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