जिंदगी जीने की समझदारी से विकास की पहचान

जीवनजीने के दौरान मनुष्य को तरह-तरह के मनुष्यों के प्रिय अप्रिय व्यवहार का सामना करना पड़ता है इसके अलावा उसके सानिध्य मे रहने वाले पशु पक्षी वृक्ष आदि उसे मनुष्य के जीवन के हितार्थ तरह-तरह की क्रिया प्रतिक्रियाएं देते हैं। जो लोग तरह-तरह के सामाजिक असामाजिक मनुष्यों पशुओं पक्षी वृक्ष वनस्पति के प्रिय अप्रिय व्यवहार क्रिया सक्रियाओ की समझ के ज्ञाता हो जाते हैं जिन लोगों को अपने जीवन में दूसरे जीवों की जीवन एजीने के दौरान दूसरे जीवों की जैविक क्रिया संक्रियाओं की समझ हो जाती है वह जीवन में आसानी से तरक्की करते हैं परंतु जिन लोगों को इंसान की सामाजिक असामाजिक मनुष्यों पशु पक्षियों की जैविक जीवन संक्रियाओं की सम्यक ठीक से जानकारी नहीं होती वह ऐसे लोगों से पशु पक्षियों के विचित्र व्यवहार से गलत शगुन विद्या में उलझ कर अकारण जीवन संघर्ष में उलझते हए अक्सर अपने जीवन लक्षयो से भटक जाते हैं । यहां तक की कुछ अज्ञानी अल्पज्ञानी लोग को जीवन संघर्ष के दौरान समय से पहले दुर्घटना ग्रस्त होकर अपने जीवन में तरह-तरह की हानियां उठाते हैं परंतु जो लोग इस ब्रह्मांड में तरह-तरह के जीवन के जैविक विविधता व्यवहारक की भाषा को समझ जाते हैं। वह लाभ उठाते हैं प्रगति करते हैं उन्हीं का सृष्टि में समाज में जाति कुल वंश में तरह-तरह की औद्योगिक संगठनों में विकास होता है ।
   संकेत नंबर 1 कुछ गलत घातक पातकी लोगों से मिलने के बाद सीने में भारीपन पेट में गांठ से लगना यहां पर कुछ सही नहीं है। ऐसे लोगों से मिलने में समझदारी नहीं है ।
 संकेत नबर 2 अति नकारात्मक दुष्ट लोग लोग ऊर्जा को सोख लेते हैं जो आपसे ज्यादा नकारात्मकता युक्त है। ऐसे लोगों से मिलने के बाद शरीर में थकावट महसूस होने लगती है। अपनी सकारात्मक ऊर्जा की स्वयं रक्षा करें ऐसे लोगों से बचें 
संकेत नंबर 3 कार्य करने के दौरान या कार्य करनेसे पहले बाधाएं उत्पन्न होना  , हमको ब्रह्मांड के द्वारा हमारी सुरक्षा के लिए किया गया प्रयास बाधाएं उत्पन्न करना असफल होना प्रकृति के द्वारा हमको हमारे सही जीवन ट्रैक पर पहुंचने के लिए एक चेतावनी है। कि हम गलत लाइफ ट्रैक पर चल पड़े हैं। उसी रास्ते पर एक या दो फेलियर असफलता के प्रयास हद से ज्यादा करना हमारी मूर्खता को बताता ह।
संकेत नंबर 4 खुद को खो देना स्त्री के समान पुरुष के आगे समर्पित होना अपनी मूल बेसिक जरूरी इच्छाओं को दबाते हुए समझौता करते हुए जीना जीवन भर दुख देता है।
संकेत नंबर 5 अपने सपनों का छूट जाना जब पारिवारिक सामाजिक संबंधों के दौरान हम अपनी  मूल भावनाओं को तिलांजलि देकर उस बॉस के समान व्यक्ति के मजबूरी में साथ-साथ जीने लगते हैं तब वह बौस व्यक्ति हमको हमारे जीवन लक्ष्य से भ्रमित कर देता है वह ठीक नहीं है।
संकेत नंबर 6 अराजकता अपनी शांति की कीमत से समझौता ठीक नहीं। उत्पाती उपद्रवी लोगों का साथ ठीक नहीं
संकेत नंबर 7 जीवन में अपनी भावनाओं  को स्वीकार  करते हुए अपने जीवन को अपनी भावनाओं के अनुसार शांति से जीने में समझदारी है ।
संकेत 8 खुद से प्यार करना जब गलत चीजोंको जाने देते हैं। सही चीजें अपने आप जीवन में आने लगती है लड़ाई संघर्ष प्रियता को छोड़ने लगते है । तब जीवन में लड़ाई की घटनाएं कम होने लगती हैं सुख शांति जीवन में अपने आप आने लगती है ।
संकेत नंबर 9 खुदको पहचानना, 
संकेत नंबर 10 अपनी सीमा आप तय करना। 
संकेत नंबर 11 कृतज्ञता का एहसास करना बुरे दुष्ट लोगों तक को धन्यवाद देना उन्होंने हमको हमारा जीवन जीने में एक नया ज्ञान का अध्याय पढ़ा दिया।

राम वर्मा :- आशा के अनुसार लोग मिलने के लिए काल करने लगें 
    समस्या निवारक  रैस्क्युर व्यक्ति मिल जाए 
   इच्छा के अनुसार आवश्यकता के अनुसार सपने दिखाई देने लगे परंतु अवचेतन मन की सेटिंग सही होनी चाहिए अवचेतन मन की खराब सेटिंग होने पर अवचेतन मन घटित घटना का उल्टा दिखाता है अच्छा होना है बुरा दिखेगा , बुरा होना है अच्छा दिखेगा ।
   पशु पक्षियों के शगुन के अनुसार एक निश्चित दिशा में गति करना 
सपनों में  अंको का दिखाई देना, एक  ही प्रकारके एक जैसे सपने दिखाई देना 
 हर घटना पर नजर रखें एविडेंस रेफरेंस सिंक्रोनी सिटी 
 ब्रेकडाउन वाहन का जरूरत के समय स्टार्ट ना होना , रोड ब्लाक जाम मैं फंसना । यूनिवर्स की आपके लिए कोई बेहतर प्लान है। शांत अवस्था में ध्यान करते हुए अपनेअंतर्मन से समस्या का कारण पूछे आपका मन आपको इशारा कर देगा । ऑलमाइटी अल्माटी इल्यूमिनाटी को समझने का प्रयास करें। अपने अवचेतन मन से स्वयं संवाद करें ।

उच्च रक्त शर्करा का कारण अति महत्वाकांक्षा का बढ़ा-बड़ा करके अनुच्छेदित असंभव अनावश्यक चिंतन प्रवृत्ति डर्रू-स्वभाव

वर्तमान समय में भारत में बिना रोग कारक  से पीड़ित अनेकों नए रोग केवल मनुष्यों में आ गए हैं । जो बिना वायरस बैक्टीरिया सूक्ष्म और वृहद कृमि सूक्ष्म-आर्थ्रोपोडा जीवों के बिना संक्रमण के उत्पन्न हो गए हैं जिनके उत्पन्न हो जाने से अनेकों को मनुष्यों के जीवन में उनकी कार्य क्षमता घट जाने से उनको निजी समस्या पारिवारिक समस्या सामाजिक समस्याएं बढ़ जाने से अचानक से उन रोगी लोगों के कारण उनके निजीरोग राष्ट्रीय समस्या धर्म समस्या बन गए है । जो प्रत्येक मनुष्य को उसका जीवन जीने में उसकी शारीरिक मानसिक कार्य क्षमता को घटाकर उसके जीवन जीने में बाधा उत्पन्न कर रहे है । जैसे बिना किसी कार्य के रक्त में अनावश्यक उच्चस्तरीय शर्करा जनित व्याधियां प्रमेह मधुमेह (शुगर) ब्लडप्रेशर , बिना किसी दर्द डर /भय के शरीर  में भीतर गांठ आंतरिक अगों में कैंसर, शरीर पर बाहर हथेलियां पैरों में गांठ, त्वचा पर प्राकृतिक रंग से हटकर काले लाल कत्थई खुजई अप्राकृतिक धब्बे उत्पन्न होने लगे है । जिसका मूल कारण मन में बेचैनी से मन में गांठ लग जाने पर  अनावश्यक असंभव अप्राकृतिक चिंतन से बिना वायरस बैक्टीरिया संक्रमण के तरह-तरह के नवीनतम रोग उत्पन्न हो रहे हैं । जिनका मुख्य कारण मनुष्य के मन में उसके निजी पारिवारिक सामाजिक जीवन पद्धति स्तर से दो-तीन स्तर ऊंचे स्तर की जीवन प्रणाली की सोच रखने की मनोवृति असंभव अनावश्यक महत्वाकांक्षा का पनपना है । या उसके मन में  अति उच्चस्तरीय महत्वाकांक्षाओं का मन में बैठ जाना है। जो उसकी प्राकृतिक रूप से जीवन जीने की मौलिक चिंतन पद्धति कार्य पद्धति  को विकृत करके उसके मन को व्यग्र सुपर उग्र बेचैन बनाकर उसकी नींद उड़ा देता है। जिससे वह रात में ठीक से 5 से 6 घंटे की एक नींद नहीं सो पाता है । उसकी निद्रा भूख मल मूत्र वेग अप्राकृतिक हो जाते हैं। शारीरिक जैविक क्रियाएं मंद या अनियंत्रित हो जाने से वह अनिद्रा (रात में ठीक से एक पूरी नीद नहीं सो पाता ) अजीर्णता ( उसको खाया पिया ठीक से नहीं पचता) कब्जियत(उसे पुरीषक्षय अल्प मल शुष्क मल लीद जैसा आता है )मूत्रबाधा का रोगी (बहुमूत्र अल्पमूत्र रुक-रुक कर आता है) वह बिना संक्रमण का रोगी बन जाता है। उपरोक्त इन सभी रोगों का कारण उसके मन में/उसके प्राण में उसके अपने शरीर के साथ  स्वंय ब्लात्कार करने की मानवीय प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। जिससे वह परिश्रम से थका हुआ होने पर भी काम करने लगता है करता रहता है। जब उसकी यह स्वयं बलात्कारी प्रवृत्ति उसके तन मन लिए प्रकृति द्वारा प्रदत्त निर्धारित जैविक सीमा मानकों से आगे बढ़ जाती है । तो बेचैनी से उसके अवचेतन मन की सेटिंग खराब हो जाती है उसके सपनों में नारी पात्रों की संख्या बढ़जने से मन में अतिरिक्त अनावश्यक भय बैठ जाने का पता लगता है जिससे उसको निद्रा समस्या उत्पन्न हो जाती है। अनिद्रा समस्या के रोगी का उसकी निद्रा का उसकी शरीर लिंग की आवश्यकता के निर्धारत मानकों से कम हो जाना है। वह अपने तन मन शरीर की प्रकृति प्रदत्त  निश्चित  लिंगीय पहचान के अनुसार नर नारी के प्राकृतिक शरीर रूप रचना के अनुसार  व्यवहार नहीं करता । जैसे पुरुष शरीर होते हुए वह अधिक भय के मन मे बैठ जाने पर वह निर्भय निडर आक्रामक मन: स्थिति का पुरुष नहीं रहता , अपितु स्त्री सामान डर्रू शंकालु चिंतन करने वाला अनावश्यक चिंतन करने वाला लड़ाई झगड़े से बचाने वाला पंगाहीन व्यर्थ की निरर्थक चिंताएं करने वाला चिंतालु मनुष्य हो जाता है ‌।* अनावश्यक बलात्कार सहन करना दूसरों का अप्रिय व्यवहार बर्दाश्त करना  उसकी नियति मनोवृति हो जाती है या वह अपने शरीर के मन के साथ खुद से ही बलात्कार  करने लगता है, इतना ही नहीं वह दूसरे लोगों को भी अपने तन मन के साथ बलात्कार करने की अनुमति देने  लेने लगता है वह सर्व सुलभ सहयोगी हातिम भाई बन जाता है*। वह अपने दूसरों के अनावश्यक काम के भार से दबा हुआ भी थकित तन मन: स्थिति में चाय पी पी कर जाग-जाग कर थका हुआ भी काम करता रहता है अपने तनमन को विश्राम नहीं करने देता। 

परंतु कभी-कभी कुछ नारियां भी नारी तन मन का शरीर होते हुए अनुचित लालन पालन के परिवेश से विपरीत गलत शिक्षा दीक्षा हो जाने से नारी का मन परिवर्तन हो जाने से मानसिक रूप से पुरुष शारीरिक रूप से नारी होते हुए पुरुषों के समान आक्रामक मन वाली बलात्कारी मनोप्रवृत्ति की हो जाती है। उनकी भी सामान्यनिद्रा ना होकर असामान्य-निद्रा हो जाने से उनकी नींद उड़ी उड़ी रहती है वह बेचैन आत्मा ठीक से नहीं सो पाती है । वह भी अति ऊर्जावान होकर अपने तन मन से बलात्कार करने लग जाती हैं । नतीजा अपनी प्राकृतिक सौम्यता दयालुता कृपालुता मातृत्व वात्सल्यता को खोने लगती हैं । तब उनमें सेवक मन के बजाय अधिकारी मन बन जाने पर पुरुषोचित गुण लक्षण उदित हो जाते हैं।  जिससे उनकी सृज्या प्रज्या प्रजनन क्षमता घट जाती है वे पुरुषों के समान विरजा होने लगती है।उनकी प्रजनन क्षमता अति कम हो जाने से वो बंध्या तक हो सकती हैं। नारी को सृजनशीला निर्माणी बनाने के लिए विधाता ने नर की तुलना में अधिक निद्रालू आलसी अल्प परिश्रमी अल्प ऊर्जाशील बनाया है । जिसके अत्पयधिक परिश्रमी प्रवृत्ति से उसका गर्भस्थ भ्रूण नष्ट न होने पाए । इसके विपरीत पुरुष को उच्च स्तरीय आक्रामक ऊर्जावान बनाया है जिसकी अतिरिक्त ऊर्जा को नए शुक्र रूप में ग्रहण करके नारी नए जीव का सृजन करने में समर्थ हो पाती है

वृद्धावस्था में शरीर में हड्डियों में दर्द अनियंत्रित रक्त शर्करा स्तर से उत्पन्न एसिडोसिस व्याधि से रक्त का अम्लता से वायु कुपित होने पर शरीर में खांसी दर्द धातुक्षय रहना है

वृद्धावस्था में शरीर का गलना सिकुड़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है जिसके अतर्गत शरीर में कुछ ऐसे विशेष कैटाबॉलिक अम्लीय रसायन बनने लगते हैं जिससे शरीर की कोशिकाएं जीवित होते हुए भी गलकर घटती हुई धीरे-धीरे कम होने लगती हैं । जिससे शरीर में मरम्मत के पश्चात बनी नई कोशिकाओं में ऊर्जा दायी माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या घटने कम होने लगती है। जिससे जीव की जीवन क्षमता घटने लगती है ऊर्जा क्षमता घटने लगती है जीव के जीवन में ऊर्जाहीनता आने लगती है जीवन छय की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।

वृद्धावस्था आगमन कमजोरी का कारण अनियंत्रित उच्च/निम्न रक्त शर्करा है।

सभी जीवों के शरीर में जन्म के साथ मृत्यु ,  अवस्था के साथ परिवर्तन स्थिति का गुण छिपा होता है । जैसे बचपन में जवानी , जवानी में बुढ़ापा छिपा होता है । जो लोग अपने जीवन को ईश्वर के नियम आदर्शवाद प्रकृति नियम यथार्थ वाद के अनुसार जीते हैं वह अपने जीवन को समग्र रूप से बचपन जवानी वृद्धावस्था तक को पूरा करते हुए जीते हैं जिसे काल मौत  प्राकृतिक मृत्यु कहा जाता है ।  परंतु जो लोग अपने जीवन को निजी रूप से अपनी जीवन नियम शर्तों के अनुसार जीते हैं उनका जीवन सृष्टि में प्राकृतिक रूप से स्वाभाविक रूप में  पूरा नहीं हो पाता है। किसी के जीवन से जवानी निकल जाती है तो किसी के जीवन से वृद्धावस्था निकल जाती है । जिससे वह अपने जीवन को जवानी में आयु पूरी कर लेता है । जिसे अकाल मौत कहा जाता है।
       वृद्धावस्था का आगमन उच्च/निम्न अनियंत्रित रक्त शुगर कोई रोग नहीं , ब्लिक प्रकृति द्वारा मनुष्य की जींस मे डाला हआ जीवन अवधि समाप्ति सूचक चिन्ह प्राकृतिक  जैविक गुण लक्षण होता है जो प्रत्येक जीव की जातक जीवन अवधि आयु है जो उसकी भूमि पर रहने की अवधि को तय करता है । परंतु निजी जीवन पद्धति भी जीवन जीने का तरीका और विशेष जीवन आयु अवधि का मानक नियम सभी जीवों को अलग अलग है। यह सभी जीवो का एक मैटाबॉलिक जैविकऑडर है। जो प्रकृति में जैविक आयु जीवन अवस्था व्यवस्था के अनुसार जातक आयु के रूप में निर्धारित होता है यदि कोई जीव  अपनी जीवन पद्धति के दौरान यदि अपनी आयु को ईश्वरीय  नियम या प्राकृतिक नियम के अनुसार जीता है तभी वह अपनी आयु को जातक आयु स्तर तक जी पाता है । यदि  जातक अपनी जीवन पद्धति को प्रकृति और ईश्वरीय नियमों की अवहेलना करते हुए अपने निजी तरीके से जीता है अपनी दैनिक सुविधा सुरक्षा से जीने लगे तो इसे प्राणी का निजी मेटबॉलिक डिस ऑर्डर लाइफ डिस्टरबेंस  कहा जाता है 
जो प्राणी के जातक जीवन आयु अवधि को परिवर्तित करके छोटा कम या ज्यादा आयु का कर देता है । जिसके अनुसार प्रत्येक जीव की उसकी अपनी निजी जीवन पद्धति के दौरान जीवो के शरीर में दो प्रकार की विशेष जैविक क्रियाएं होती है । एक एनाबॉलिक शरीर निर्माणाधीन क्रिया जो वृद्धि दायक है। दूसरे कैटाबॉलिक जैविक ऑक्सीकरण जो  शरीर को नाशकारी है । दोनोंजविक शारीरिक क्रियाएं समान रूप से युवावस्था में एक साथ या कभी एक कम एक ज्यादा चलती रहती हैं जो युवावस्था और वृद्धावस्था तय करती है। इन दोनों जैविक दोनों अनाबॉलिक्स कैटाबॉलिक जैविक क्रियो के मध्य जब तक संतुलन है दोनों समान रूप से चल रही है तो जीव के शरीर के आकार आकृति स्थिर स्थाई बनी रहती है , उनकी आयु तक रुकी रहती है । परंतु यदि अनाबॉलिक्स क्रियाएं अधिक तेजी से होने लगती हैं तो जीवन के शरीर का आकार आकृति तेजी से बढ़ने लगती है सभी जीव प्रज्या क्षमता युक्त होकर प्रजनन द्वारा दूसरे जीव का निर्माण करने में समर्थ होने लगते हैं । परंतु यदि कैटाबॉलिक क्रियाएं तेजी से होने लगती है तो जीवो के शरीर आकार आकृति तेजी से घटने लगते हैं। पुरानी प्राणी शरीर रोगी रहने लगता है प्रज्या क्षमताहीन होने ऊर्जा हीनता  आने लगती है, जीव प्रजनन  क्रिया करना बंद कर देता है । परंतु कभी-कभी जब एक बड़े शरीर के अंदर अन्य दूसरे छोटे-छोटे शरीरवाले बैक्टीरिया वायरस प्रोटोजोआ कृमि आदि आकर उसके शरीर में घुसकर अपनी जैविक क्रियाएं करते हुऐ अपनी सीमा से अधिक तेजी से होने वृद्धि करने लगते हैं  उसके शरीर की जीवित कोशिकाओं को खाने लगते हैं या उसके शरीरकी ऊर्जा सप्लाई को प्रभावित करने लगते हैं जिससे उसको खाया पिया उस बड़े शरीर वाले  को शरीर अंग नहीं लगता है ऐसी अवस्था को जीव की ऊर्जा हीनता शरीर ऊर्जा में कमी रोगी अवस्था कहा जाता है।
    परंतु कभी-कभी संक्रमण नहीं होने पर भी जब प्राणियों के शरीर में कैटाबॉलिक क्रियाएं अपने आप तेजी से होने लग जाती हैं । तो इसका मुख्य कारण उसे व्यक्ति द्वारा पितज पदार्थ कंटोल करेला जिमीकंद का अधिक भोजन करना है जिससे मुंह लंबे समय तक 15 से 30 दिन तक कड़वा बना रहने लगता है यह पित्त कुपित व्याधि / पितज प्रकोप के  लक्षण है। जो लंबे समय तक चलने वाली चिंतालु समस्या से उत्पन्न चिंतालु स्वभाव प्रवृत्ति  से सक्रिय रहने लगता है । इससे वृद्धावस्था का आगमन  कमजोरी थकावट अशक्ता का जल्दी आना कहा जाता है । जिसमें प्राणियों के शरीर में अपने आप रक्त शर्करा का स्तर अकारण बिना परिश्रम के भी उच्च या निम्न अनियंत्रित रहने लगता है।
। इसे शरीर का पलीतम दोष शरीर का पकना कहा जाता है। जो वृद्धावस्थाके पहले अचानक युवावस्था के अंत में उत्पन्न हो सकता है शरीर की निर्माण क्रियाएं थम सी जाती हैं । व्यक्ति बीमार समान रहने लगता है । जो उच्च रोग क्षमता के चलते बीमार तो नहीं होता परंतु प्रमेह/ मधुमेह व्याधि से ग्रसित होकर तेजी से बूढ़ा होने लगता है । इसमें सबसे पहले केश/बाल श्वेत इद्रियां कान आंख शक्तिहीन होने लगते हैं फिर दांत क्षय होने लगता है । शरीर में पाचक रसों का स्राव कम हो जाने से भोजन का सम्यक  पाचन नहीं हो पाता  , अधिक परिमाण में भोजन खाने पर भी शरीर को पोषक तत्व न्यूनतम मात्रा में मिल पाते हैं। तब उस मधुमेह व्याधि ग्रस्त मनुष्य को विशेष विशेषज्ञ  की देखरेख में उच्च पोषण क्षमता वाला औषधिमय भोजन दिया जाता है। जिसे सप्लीमेंट्री डाइट कहा जाता हैं। जिस कारण से समस्त औषधीयों को अन्नसार भोजन कहा जाता है ।

     ऐसे में अनियंत्रित उच्च या निम्नरक्त शर्करा कोई रोग नहीं अपितु वृद्धावस्था का आगमन है । वृद्धावस्था की आयु मे आवश्यक करने की क्षमता के अनुसार व्यक्ति कुछ अनावश्य कार्यों को ऊर्जा की कमी हो जाने से छोड़ने लगता है जिससे उसके मस्तिष्क के न्यूरोन डिजनरेट होकर घटने लगते हैं स्मृति क्षय होने लगता है। न्यूरोन क्षय की प्रक्रिया के साथ-साथ शरीर में आवश्यक कार्य करने से संबंधित अन्य कोशिकाओं की रिपेयर का काम मंदा पड़ जाता है। मृत कोशिकाएं शरीर पर चिपकी रहती हैं जिससे वृद्ध के शरीर में झुर्रियां बनने लगते हैं । इसके अलावा शरीर की अन्य ग्रंथियां जैसे अग्नाशय ग्रंथि/ पेनक्रियाज और यकृत ग्रंथि भी अपना कार्य धीरे-धीरे मंद रूप से करने लगते हैं जिससे रक्त में शर्करा का स्तर कभी अचानक सामान्य से उच्च कभी अचानक सामान्य से निम्न हो जाने से शरीर में सम्यक ऊर्जा की मात्रा की स्थिरता अनियंत्रित हो जाने से आवश्यकता के अनुसार स्थिर नहीं रहती , मनुष्य अकारण अचानक जीवन संकट महसूस करने लगता है । जिससे हृदय की धड़कन अनियंत्रित रूप से घटने बढ़ने लगती है। शरीर के रक्त को साफ करने वाली ग्रंथियां यकृत और किडनी का कार्य भी गड़बड़ाने लगता है। वर्तमान समय में चिकित्सक लोग इसे पेनक्रियाज में बीटा सेल का मर जाना कहते हैं यह कथन सत्य नहीं है। जब तक जीवन है तब तक शरीर में सभी कोशिकाओं की संख्या में बार-बार 
 पुनर्जीवन उत्पादन मरण बना रहता है। जीव की आवश्यकता के अनुसार शरीर की कोशिकाएं बढ़ती घटती रहती हैं। शरीर का जीवन अवस्था का नियंत्रण उसके अवचेतन मन के द्वारा नियंत्रित रहता है परंतु यह अवचेतन मन चिंतारहित अमूर्त चिंतन हीन विचारहीन निद्रा सामान तनावहीन अवस्था में सक्रिय होता है जो लोग अकारण अचानक अनावश्यक अत्यंत चिंतन वाले चिंतालु हो जाते हैं वह अपने मस्तिष्क को तनाव ग्रस्त रखते हैं। उनका अवचेतन मन व्यर्थ की चिंता करने से ठीक से काम नहीं कर पाता । उनके शरीर में सोने के बाद निद्रा अवस्था में शरीर का रिपेयर मरम्मत का कार्य ठीक से नहीं हो पाता । वह लंबे समय तक रोगियों के समान दिखाई देने लगते हैं। कह सकते हैं कि निरंतर चिंतालुक मनस्थिति बनी रहने से रोग का लक्षण उनकी जींस में चला जाता है । नई कोशिकाएं भी रोगीली ही बनती हैं । इस दौरान यदि मनुष्य अपने मस्तिष्क की चिंतन प्रणाली की सेटिंग माईंड स्ट्रेस मैनेजमेंट ठीक से करना सीख जाता है अपने मस्तिष्क को आराम देना सीख जाता है ऐसे में उसका मस्तिष्क फिर से नई निर्मित कोशिकाओं  से फिर से शरीर को नया बनाकर नियंत्रित करने लगता है। नवंबर 24 में मुझे मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा के दौरान मूत्र शर्करा की समस्या हुई रक्त की शुगर ३७० काफी समय से बड़ी हुई थी । परंतु फरवरी 25 में मूत्र शर्करा की समस्या समाप्त हो गई क्योंकि मैंने माईंड मैनेजमेंट के अंतर्गत अपने मस्तिष्क की कार्य प्रणाली को समझते हुए मस्तिष्क को अनावश्यक चिंतन से बचाना मस्तिष्क के तनाव को कम करना सीख लिया था । मानसिक ऊर्जा का अपव्य कम से कम करने लगा था व्यर्थ का अनावश्यक चिंतन चिंतक प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए अनावश्यक चिंतन से बचने लगा था इसके साथ-साथ में रात्रि में पूर्ण निद्रा 5 घंटे की एक नींद पर अपना ध्यान फोकस करने लगा था निद्रा की मात्रा 8 घंटे तक बढ़ा दी थी। शर्करा का इलाज भी आरंभ कर दिया था रक्त शर्करा की आयुर्वेदिक औषधियां नींम गिलोय का सेवन शुरू कर दिया था ।
        शरीर में जन्म के समय से लेकर जीवन और मृत्यु की सूचना उसकी कोशिकाओं के अंदर  गुणसूत्र में जीव जीवन सूचना सूत्र में  जींस के रूप में जीवन भर विद्यमान रहती है । परंतु हम जन्म के पश्चात अपना ध्यान व्यर्थ की बातों पर जीवन में फोकस करते हैं मृत्यु की अवहेलना करते हैं । जिससे जीवन भर मृत्यु के हाथों विविध प्रकार के रोगों के द्वारा प्रभावित होते हुए अपना जीवन जीते हैं ।*रोग भी हमारी चिंतन प्रणाली पर आधारित हैं वर्तमान समय की दुष्ट शिक्षा प्रणाली के अनुसार हमें सदैव रोगी रहने की शिक्षा दी जाती है जो रोग हो गया वह ठीक नहीं होगा यह लाइन आज की चिकित्सकों द्वारा रोगियों के दिमाग में डाल दी जाती है जबकि ऐसा नहीं है शरीर में मौजूद रोग का मनुष्य की चिंतन प्रणाली से सीधा संबंध है उच्च रक्त शर्करा स्तर में शरीर के बाहर त्वचा पर वर्ण विविधता कत्थई रंग के लाल दाग अंदर  गांठै बनना अवांछनीय कोशिकाओं की वृद्धि कैंसर यह रोग नहीं मनुष्य की विकृत चिंतन पद्धति की पहचान है । यदि मनुष्य की चिंतन प्रणाली में सुधार हो जाता है तो शरीर में मौजूद रोग भी हट जाता है।

  मृत्युजींस के सक्रियता के अनुसार समय-समय पर एक्टिव होने पर किसी को वृद्धावस्था  उचित आयु के समय के पहले और किसी को उचित समय आयु  से बाद में उत्पन्न होती है।  वृद्धावस्था जो मनुष्य और अन्य जीवों में दैनिक दायित्व हीनता और अपने जीवन कै लिए निर्धारित धर्म कर्म छोड़ने से अचानक जीवन पद्धति में परिवर्तन करने से समय से पहले जल्दी उत्पन्न हो जाती है। जैसे-जैसे मनुष्य सामाजिक पारिवारिक जिम्मेदारियां जल्दी-जल्दी समय से पहले छोड़ने लगता है अपनी दैनिक कार्यों लिए जैविक ऊर्जा का उपयोग काम करता चला जाता है उसी के अनुसार उसके शरीरकी ऊर्जा की गर्मी धीरे-धीरे कम होने लगती  है । जिसको नियंत्रित करने के लिए मनुष्य के अग्नाशय ग्रंथि के बीटा सेल धीरे-धीरे क्षरित  होने लगते हैं जैसे जैसे यह बीटा  सेल क्षय की हानि  होने लगती है । परंतु पेनक्रियाज में मौजूद बीटा सेल कभी भी पूरी तरह से समाप्त नहीं होती जब तक जीवन है उनमें भी सेल्फ रिपेयर प्रवृत्ति मौजूद रहती है।  जीव के आयु परिमाण के अनुसार मनुष्य में इंसुलिन हार्मोन का निर्माण दिन में अधिक रात में कम होने से शरीर दिन में ठंडा रात में गरम ऊर्जा दायक हार्मोन ग्लूकोगन रात में ज्यादा दिन में कम मत कम होने से शरीर गरम रहता है निद्रा से पहले शरीर ठंडा निद्रा के दौरान शरीर गर्म इसी प्रक्रिया से रहता है। मनुष्य पर धीरे-धीरे वृद्धावस्था का आक्रमण होना शुरू हो जाता है जो स्वस्थ  मनुष्य की आयु को धीरे-धीरे तेजी से कम करने लगता है। वृद्धावस्था कि यह प्रक्रिया भी एक अकेली अपने आप नहीं आती अपितु मस्तिष्क कोशिकाओं के क्षय के साथ-साथ समस्त शरीर में जगह-जगह कोशिकाओं की निर्माण और रिपेयर द्वारा वृद्धि  मंद होती जाती है । कोशिकाओं की क्षय क्षमता दर बढ़ती जाती है ।  शरीर की अन्य कोशिकाओं जैसे न्यूरोन से वृद्धावस्था मे अल्जाइमर पर्किंसन जैसे स्मृति क्षय और शरीर कांपना अन्य रोग लक्षण उत्पन्न होने लगते है। यह वृद्धावस्था उन लोगों को अत्यंत तीव्र गति से आती है जो अपने शारीरिक परिश्रम के कार्य को एक साथ छोड़ देते हैं इसके अलावा वे मानसिक परिश्रम भी करना बंद कर देते हैं या मानसिक परिश्रम की दर सामान्य से बहुत अधिक कर देते हैं ।  जिसे चिंतालु ओवरथिंकिंग या बेकार का व्यर्थ चिंतन कहा जाता है , जो लोग समझदार होते हैं जिनका अपने दिलों दिमाग पर पर्याप्त नियंत्रण होता है जो आवश्यकता होने पर तो सोचते हैं आवश्यकता ना होने पर उनका दिमाग चिंतन नहीं करता ओवरथिंकिंग नहीं करता बेकार के मानसिक परिश्रम से दूर रहते हुए , तनाव जनित मानसिक शारीरिक परिश्रम करते हुए अपने शरीर को सम्यक श्रम अनुपात में सक्रिय रखते हैं ऐसे लोग दीर्घकाल तक वृद्धावस्था में भी अपना जीवन 90 वर्ष से ऊपर की आयु तक जीते रहते हैं। 
     वृद्धावस्था की आयु की आगमन पर शरीर की मरम्मत निर्माण कोशिकाओं का कार्य अत्यंत धीमा हो जाता है। जिससे शारीरिक परिश्रम के दौरान नष्ट हुई कोशिका समय के अनुसार उचित समय पर तेजी से नहीं बन पाती है जिससे शरीर पूर्व की आयुके समान परिश्रम करने में खुद को असमर्थ पाता है। जैसे युवावस्था में टूटा हआ पेशी तंतु 2 दिन में बन जाने से दो दिन बाद दर्द होनेके बाद पेशी तंतु  रिपेयर के पश्चात पूर्व अवस्था मैं आकर काम करना शुरू कर देती है जबकि वृद्धावस्थामे टूटे हुए पेशी के तंतु की रिपेयर मैं 30 से 45 दिन तक लग जाते ह। पूर्ण विश्राम कर ने पर भी पेशी तंतु एक माह के बाद ठीक हो पाती है जो लोग पेशी दर्द के प्रति जागरूक  नहीं होते उनकी पेशी पर दर्द की समस्या लंबे समय तक चलती रह सकती है। इसी प्रकार से वृद्धावस्था में  ऑपरेशन के पश्चात टांकें काटने में लगा समय 9 दिन से बढ़कर 15 दिन से 45 दिन में बदल जाता है ।  नष्ट हुई कोशिका की मरम्मत शीघ्र न होने से कोशिका वृद्धि दर पूर्वत: न होने से शरीर का आकार छोटा होने लगता है जिससे त्वचा पर झुरिया पड़ने  लगती हैं। ऊर्जा तंत्र की कमी होने पर शारीरिक परिश्रम न करने पर पेशी क्षय  तेज हो जाने से हाथ पांव चेहरे पतले पड़ने लगते हैं। ऊर्जा तंत्र की अल्प क्षमता से काम करने से मस्तिष्क के न्यूरोन क्षय  होने से स्मृति क्षय होने लगता है दिमाग ठीक सेकाम नहीं करता है शरीर के अल्प ऊर्जा क्षमता हो जाने से हाथ पैर कांपने की पार्किंसन और भूल पड़ने  स्मृति क्षय की अल्जाइमर मनोरोग व्याधि उत्पन्न हो जाती है।
    ऐसे में जो अति महत्वाकांक्षी  लोग ऊर्जा की कमी होने पर भी अपनी मस्तिष्क को अधिक मात्रा में आवश्यकता से अधिक सक्रिय रखते हैं व्यर्थ का सोच विचार ओवरथिंकिंग करते रहते हैं या मानसिक तनाव से उनकी रात्रि में नींद ना आने पर भी ठीक से न सो अपने पर भी रात्रि में , दिन में आवश्यकता से अधिक अध्ययन करते रहते हैं ऐसे में उनका मस्तिष्क कमजोर होते हुए भी अधिक मात्रा में ऊर्जा कंज्यूम करने लगता है जिससे अति महत्वाकांक्षी लोगों के दिमाग की सेटिंग खराब हो जाती है शरीर की सेटिंग खराब हो जाती है व्यर्थमे रक्त प्रवाह की दर बढ़ जाती है जिससे ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है रक्त में   शुगर का स्तर बढ़ जाता है यह स्थिति शरीर के  लिए खतरनाक हो सकती है जिसमें 180 से ऊपर मूत्र शर्करा समस्या उत्पन्न हो जाती है जो रक्त शर्करा नियंत्रित होने के पश्चात समाप्त हो सकती है। 200 से ऊपर कानों से मन्दा सुनाई देना 250 से ऊपर आंखों से धुंधला दिखाई देना 300 से ऊपर यकृत और पेनक्रियाज समस्याग्रस्त होने लगती है , 400 से ऊपर किडनी समस्या ग्रस्त हो जाती है।500 से ऊपर अर्धांग फालिस लकवा 800 से ऊपर मस्तिष्क क्षय संभावना बन जाती है ।
      ऐसे में यदि वृद्धावस्था को तेजी सेआने से रुकना है तो दिमाग का इस्तेमाल आवश्यक होने पर ही करें नए संकल्प निर्माण पर नियंत्रण करने के लिए संकल्प कम से कम करैं, लोगों से मिले जरूर लकिन उनसे जुड़ना चिपकना जैसे समाजिक संबंध सोच समझ कर बनाएं नए प्राण प्रतिज्ञा बिल्कुल न करें। दिमाग से परिश्रम कम से कम करें शरीर से परिश्रम ज्यादा से ज्यादा करें। इसके लिए दैनिक व्यायाम कसरत पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे शरीरकी ऊर्जा पेशीय में ज्यादा से ज्यादा देर तक संचित रख सके पेशियों संस्थान स्वस्थ रहे । शरीर में पेशियां के सुडोल होने पर शरीर में रक्त शुगर का सामान्य रहने लगता है ऐसी पेशीय की स्थिति में रक्त शुगर ठीक हो जाने से ब्लड प्रेशर सामान्य हो जाता है।
    यदि शरीर ठंडा है तब तक शुगर सामान्य है शरीर में रक्त शर्करा का स्तर  बढने पर पहले आखों में खुजली होती है फिर आंखें लाल रहने खुजलाने लगती है उसके बाद भोजन करने के पश्चात उल्टी आना मतली लगना शरीर में बड़ी रक्त शर्करा के प्रभाव से पहले यकृत गर्म होकर बड़ा हो जाता है बाद में पेनक्रियाज गर्म होकर रक्त में शर्करा का स्तर उच्च कर देती है। जो अंग हानि का कारण बन सकता है बहरापन अंधापन नेफ्राइटिस किडनी क्षय आदि   खतरनाक व्याधियों उत्पन्न हो सकती है। शरीर को ठंडा रखने के लिए हमें ठंडी ठंडी तासीर के औषधि भोजन का सेवन करना जरूरी होता है। लंबे समय तक अधिक समय तक पितज प्रकृति का भोजन जैसे करेला कंट्रोल जिमीकंद खाने से शरीर में पित्त बढ़ जाता है शरीर गरम रहने लगता है तो शरीर में रक्तशुगर सामान्य से अधिक बढ़ जाती है। शरीरकी ऐसी  अवस्थामे हमें ठंडी तासीर की निद्रा दायकआयुर्वेदिक औषधि नीम गिलोय जलजमनी अमला बहेड़ा हरण अर्जुन देवदार चंदन आदि शीतल औषधियां का उपयोग करना चहिए इसके अलावा एलोपैथिक औषधियां विटामिन ए ,बी,सी,डी का भोजन करने में समझदारी है ।
        वृद्धावस्था मे अग्नाशय भी अन्य ग्रंथियां की तरह सम्यक संतुलित तरीके से अपना कार्य नहीं कर पाती उसके भी काम करने के तरीके में व्यापक परिवर्तन हो जाता है जिससे वह रक्त शर्करा पर सम्यक तरीके से इंसुलिन निर्माण से नियंत्रण नहीं रख पाती और ग्लूकेगन हार्मोन उत्पादन पर भी नियंत्रण नहीं रख पाती है । अग्नाशय में मौजूद बीटा सेल की संख्या घट जाने से इंसुलिन का निर्माण आवश्यकता के अनुसार नहीं हो पाता है। जिससे रक्त में ग्लूकेगन हांर्मोन अनियंत्रित होकर बनने से कम ग्लूकेगन से हाइपोग्लाइसीमिया रक्त में रक्त शर्करा का स्तर कम हो जाता है हृदय की धड़कन घट जाती है । ज्यादा ग्लूकेगन बनने से हाइपर ग्लाईकोसिमिया रक्त में उच्च शर्करा स्तर बढ़ जाताह हृदय की धड़कन बढ़ जाती है ।  जिससे रक्त में सम्यक शर्करा की मात्रा नियंत्रण खत्म हो जाता है ।
      इंसुलिन हर्मोन कोशिका  रंध्र प्लाज्मों डैसमैटा के आकार को स्थायित्व देता है  इसकी उचित सम्यक प्लाज्मो  डैस्मैटा रंध्रक का आकर आकर स्थिर स्थाई अपरिवर्तनीय बनाए रखती है जिस कारण से कोशिका केअदर ग्लूकोज के कणों का आवगमन नियंत्रित रहता है। जब तक शरीर में अग्नाशय ग्रंथि में इंसुलिन का उत्पादन सामान्य रहता है तब तक वृद्धावस्था नही आ सकती जैसे हीअग्नाशय ग्रंथियां मैं बीटा सेल की संख्या कम होने लगती तो इंसुलिन हार्मोन का उत्पादन सामान्य से कम होने लगता है जिसको  चिकित्सक कृत्रिम इंसुलिन हार्मोन की टेबलेट मेटामॉर्फिन से नियंत्रित करने का प्रयत्न करते हैं। वे रोग के आरंभिक अवस्था में सप्लीमेंट्री फूड की मदद से शरीर को इंसुलिन हार्मोन बनानको प्रेरित करते ह। यदि इसमें कामयाबी मिल गई तो ठीक अन्यथा अंतिम चरणमें वृद्धावस्थारोगी या  व्यक्ति को इंसुलिन हार्मोन इंजेक्शन पद्धति मार्ग दिखा दिया जाता है। 
     शरीर में इंसुलिन सामान्य से काम बनने पर रक्तमें अपने आप ग्लूकोगन सामान्य से अधिक बनने  लगता है जिससे रक्त में शर्करा की मात्रा उच्च हो जाने से आरंभिक चरण में हृदय की गति अत्यधिक बढ़ जाने से व्यक्ति की नदीकी धड़कन असामान्य रूप से तेज रहने लगती है जिससे शरीर का ताप सामान्य से उच्च रहने लगता है ऐसी स्थिति में प्रमेह अवस्था मधुमेह रोग मैं बदलने लगती है । यदि ग्लूकेगन हांर्मोन काम है तो हाइपोग्लाइसीमिया से कानों में घंटियां बजने लगती हैं । यदि  रक्त में उत्सर्ज रक्त शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है तब शरीर में ग्लूकोस वसा में बदलने लगता है ऐसे व्यक्ति गुड़ खाकर भी मोटे  होने लगते है इसे  ग्लूको से वसा  संश्लेषण कहते हैं ऐसी व्यक्ति की वसा विशेष रूप से पहले पेट पर फिर पैरों पर फिर भुजाओं हाथों पर सबसे अंत में चेहरे पर एकत्रित होती ह । ऐसे व्यक्ति का चेहरा पिचका हुआ रहता है से शरीर वसा से पूरित रहता है ग्लूकोज से निर्मित वसा के अणु कमजोर होते हैं  जो देर तक भूखा रहने पर तेजी से टूट कर शरीर को ऊर्जा देने लगते हैं ऐसे व्यक्ति जल्दी मोटू जल्दी पतली होने लगते हैं। इनको बेड कोलेस्ट्रॉल की समस्या नहीं आती । बेड कॉलेस्ट्रॉल की समस्या उन लोगों को आती है जो हार्ड फैट मांस आदि अधिक मात्रा में सेवन करते हैं  । शरीर में लंबे समय तक प्रमेह अवस्था रक्तमें उच्च शर्करा बनी रहने पर शरीर का ताप सामान्य से उच्च बना रहने पर शरीर में पलीताम पकाना का दोष वृद्धावस्था का जल्दी आगमन का कारण बनता है जिसकी पहचान दांतों पर शर्करा स्तर प्लाक बनना  दांतों का पीला रहना दांतों मे संक्रमण से दर्द रहना परिणाम जल्दी दांत गिरना दांत क्षय होने लगता है। बाल पकने लगताह सफेद होने लगता है मूत्रमें शर्करा जाने लगती है शरीर में कमजोरी रहने लगती है जिससे पहले ध्वनि श्रवण मंदता महसूस होने से कानों अचानक अकारण घंटियां बजने की आवाज आने लगती है  बाद में मंदा या धीमा सुनाई देने लगता है इसे टिंटनिस कान का रोग कहते हैं । बाद में नेत्र क्षय आंखोंसे मंदा या धुंधला दिखाई देने लगता है मंदा दिखने को नजर गिरना दृष्टि दोष कहा है जिसका इलाज मोनोक्युलर बायऑकुलर चश्मे से किया जाता है परंतु धुंधला दिखाई देनेका कारण आंखों में मोतियाबिंद व्याधि कहा जाता है जिसमें रक्त में से कैल्शियम निकलकर नेत्रलैंस को धुंधला करने लगता है । कैल्शियम के रक्त में से हड्डियों के जोड़ घिसने लगते हैं। अस्थि संधिबिंदु कार्टिलेज प्लेट घिसने से अंग संचालन में दर्द होने लगताह ।
  मधुमेहव्याधि की आरंभिक अवस्था में ही मनुष्य को शारीरिक श्रम नियंत्रित अवस्था में करना आरंभ कर देना चाहिए जब तक मनुष्य की मांसपेशियां सुडौल है तब तक मधुमेह हानि नहीं पहुंचा सकती जब तक माइटोकांड्रिया में ग्लूकोज ऑकसीडेशन नियंत्रित सुचारू बनी हुई है। मसल्स क्षय के पश्चात माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या घटने से पर रक्त मैं उत्सर्ग शर्करा अवस्था अनियंत्रित रहने लगती है। वृद्धावस्था में इतना अधिक परिश्रम  की कार्टिलेज  घिसने से हड्डियों मे दर्द बनने लगे वृद्धावस्था में उचित नहीं रहता करण की वृद्धावस्था में कोशिका निर्माण की दर कट जाती है ।  परंतु इतना कम परिश्रम  ना किया जाए की पेशीयां क्षय से गलकर कोशिकाओं की संख्या कम हो जाने से माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या घटकर रक्त उत्सर्ग शर्करा मुक्त होकर रक्त में अति उच्च शर्करा स्टार स्तर बन जाने से मधुमेह व्याधि उत्पन्न होने लगे। दांत छह के बाद कान श्रय दृष्टि  क्षय के बाद नेत्र छय के पश्चात लिवर क्षय किडनी  क्षय के पश्चात मस्तिष्क  क्षय मैं फालिस पड़ना अंगमारी अर्ध शरीर के पश्चात किसी भी समय हृदय आघात कार्डियक फैलियर जैसी अचानकजीवन पूर्ण व्याधि  से बचते हुए जीवन को पूर्ण जातक आयु तक जिया जाए ।

जीवन में शिक्षा के द्वारा प्रगति का रहस्य क्या है

जो लोग अपने जीवन में विकास और प्रगति करते हैं अपने जीवन को सुख-सुविधा पूर्ण बनाना चाहते हैं। वह अपने जीवनको जागरूकता सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनेजीवन में विकास और प्रगति के लिए आवश्यक शिक्षण-प्रशिक्षण के दौरान अपने जीवन को प्रियता सक्रियता जागरूकता के गुण धर्म K,L,M,N,O, के साथ जीते हैं। 
 
Kफॉर काइनेटिक्स:- यह लोग अपने जीवन को सिर्फ अपने लिए उपयोगी  समझते हुए अपनी न्यूनतम शारीरिक मनसिक ऊर्जा उपयोग सिद्धांत के द्वारा  अपने जीवन को सिर्फ अपने लिए उपयोगी समझते हुए अपनी मनमर्जी के अनुसार जीते हैं । यह समाज परिवार की अवहेलना उपेक्षा करते हुए अपने  जीवन को कांईंयांपन से न्यूनतम स्तर का अति आवश्यक परिश्रम श्रम करते हुए जीते हैं। इनकी रक्त शर्करा का स्तर 60 ,120 होता है जो परिश्रम के दौरान 140 तक चला जाता है अपने जीवन को निम्नतम परिश्रम करने के कारण उनके रक्त शर्करा 140 से आगे नहीं जा पाती जिससे यह प्रमेह मधुमेह। और अन्य शारीरिक राज रोग और अन्य रोगों में रोगी नहीं बन पाते हैं इनका स्वस्थ जीवन भर उच्च कोटि का होता है। जीवन के लिए उपयोगी शिक्षा शिक्षण जगत की शिक्षाओं की परवाह नहीं करते । यह अपने जीवन को अशिक्षा,न्यूनतम शिक्षा, अल्पम शिक्षा, अर्थहीन शिक्षा, बिना धन की शिक्षा पाने वाले सत्संगी शिक्षा से प्रशिक्षित भ्रमित शिक्षा, या अपरिचित परंतु शत्रुओं के शत्रुता दृष्टिकोण वाली विपरीत गुणधर्मों से परिलक्षित शिक्षा से प्रशिक्षित होकर अपने जीवन को दूसरों की शिक्षा दिशा निर्देशों के अनुसार अबोध और बुद्धिहीन तरीके से जीते हैं ।  
L एल लेबर:-यह लोग अपने जीवन को दूसरे पारिवारिक समाजिक लोगों की इच्छा आवश्यकता आकांक्षाओं के दिशा निर्देशों के अनुसार अपने लिए कम दूसरों के लिए ज्यादा ऊर्जा  उपयोगिता के सिद्धांत के अनुसार परिवार समाज के लिए अधिक परिश्रम करते हुए अपने जीवन को परिश्रम उपयोगिता से जीते हैं।  L फॉर लेवर यह समाज के सबसे निम्न स्तरीय परिश्रमी जगत के अल्प शिक्षित अल्प बुद्धि मेहनतकश होते हैं । यह विकास और तरक्की के आधार शिक्षा की ओर से उदासीन होते हैं । यह अपने जीवन में अपने परिश्रम को दूसरे लोगों के  निशा निर्देशों के अनुसार करते हुए अपने जीवन को दूसरों के नियंत्रण में जीते हैं । इनका रक्त शर्करा स्तर 70, और140 तक होता है जो परिश्रम के दौरान 160 तक चला जाता है इनका स्वास्थ्य उच्च कोटि का होता है यह प्रमेय मधुमेह और अन्य प्रकार के शारीरिक रोगों के रोगी नहीं बनते। इनमें निजी चिंतन क्षमता नहीं होती यह दूसरे के दृष्टिकोण के अनुसार यदि यह सकारात्मक दृष्टिकोण वाले हैं तो इनका स्वास्थ्य अच्छा होने से यह रोगों के जाल में नहीं फंसते। परंतु यदि इनका नकारात्मक दृष्टिकोण बन जाता है तो यह नकारात्मक दृष्टिकोण वाली असाध्याय कुसाध्य रोगों में आजीवन फंसे रहते हुए अपने जीवन को विभिन्न प्रकार की समस्याओं में फंसे हुए अपने जीवन को निरंतर गरीबी निर्धनता में जीते हैं । यह अपने जीवन में विकास और प्रगति नहीं कर पाते । 
 
Mफार मैकेनिकल:- इस प्रकार के जीवन स्तर से जीवन में विकास और पगति की शुरुआत होती ह। यह अपने जीवन में मशीन के समान अधिक समय तक परिश्रम करने वाले अध्ययनशील स्वाध्यायी होते हैं । परिश्रमी प्रवृत्ति होने के कारण उनके रक्त शर्करा का स्टार 80 160 तक होता है जो उच्च परिश्रम के दौरान 180 तक चला जाता है प्रमेय और मधमेह से संबंधित अन्य शरीररोग शुरुआत रक्त शर्करा स्तर 180 केबाद शुरू होती है 180 रक्त शर्करा स्तर के बाद मूत्र में शुगर जाने लगती है 190 के बाद रक्त शर्करा पसीने से बाहर निकाल कर त्वचा के ऊपर एकत्रित होने लगती है जिससे त्वचा पर तरह-तरह की त्वचा रोग फोड़ा फुंसी मसूरीका दाद खाज खुजली एग्जिमा आदि उत्पन्न होते हैं । यह मशीनीकृत दृष्टिकोण वाले लोग भीभी स्वस्थ परिश्रमी निरोग शरीर वाले होते हैं। थे ये न इनका अधिकतर समय उपयोगीता पूर्ण अध्ययन करने में उपयोगिता पूर्ण वार्तालाप करने में उपयोगी कार्य करने में व्यतीत होता है यह अपने जीवन को सार्थकता पूर्ण नजरिया से जीते हैं। तो स्वस्थ रहते हैं । यदि उनकी शिक्षा त्रुटि पूर्ण विपरीत परिणाम की हो जाती है तो यह दुष्ट शिक्षा के प्रभाव से हाइपोकांड्रियायस मनोरोगी होने से लोगों की तरह की नकारात्मक और विविध रोगों की चर्चा  सुनकर अपने को रोगी मान लेने से तरह-तरह के रोगों में घिरकर अपने जीवन को जीते हैं। यदि इनको सही समय पर सही ज्ञान सही शिक्षा मिलती है तो यह अपने जीवन में अपने लिए विकास और प्रगति का आधार निर्धारित करते हैं।
N थे फार नोटोरियस:-यह विशेष विचारक चिंतनशील अपने जीवन को अपनी इच्छा अपनी आशा अपनी आकांक्षाओं के अनुसार जागरूक जीवन पद्धति से अपने जीवन को जीते है। यह जीवन जीने के दौरान गलती होने पर, असफल / फेल होने पर रुक कर अपने लिए हित चिंतन करने वाले अपने जीवन को योजना पूर्ण तरीके से विकास और पगतिशील  सार्थक जीवन जीते हैं।  
ओ फार ऑपरेटर:- यह अपने जीवन को दूसरे लोगों को नियंत्रित करते हुए आप नेता या अफसर या प्रशासक बनकर समाज के बहुसंख्यक लोगों को नियंत्रित करते हुए उनके परिश्रम से लाभ उठाते हुए उनका शारीरिक मानसिक आर्थिक सामाजिक शोषण करते हुए स्वयं आति पोषित दूसरों को न्यूनतम पोषण देते हुए दूसरों के जीवन को दिशा निर्देश देते हुए विश्व में जीवन स्वामी बनाकर नियंत्रण कर्ता बनकर अपने जीवन को जीते हैं। इनका दृष्टिकोण IAS, ब्राह्मण IPSक्षत्रप IBS उच्च व्यवसायिक उद्योगपति वाला समाज नियंता धर्माधिकारी वाला धर्म समाज शिरोमणि होता है । यह अपने बुद्धि वि
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  वेक से तरह-तरह के संगठनों का निर्माण करते हैं तरह-तरह की संगठनों का संचालक स्वामी रूप से करते हैं।

पिता से द्वेष करनेवालीे माता से प्रेम करने वाली या किसी से भी प्रेम न करने वाली संतान सदैव अर्ध पक्षीय आधी बात सुनने वाली आधी बात ना सुनने वाली एक पक्षीय दृष्टि -कोण वाल ध्यान से पूरी बात ना सुनने वाली संतान सदैव प्रगतिहीन विकासहीन रहती है ?

जिस घर परिवार में पति-पत्नी में माता-पिता में अक्सर लड़ाई झगड़ा गृह क्लेश विद्वेष रहता है। ऐसे क्लेषित परिवार के बच्चे अपने-अपने हित क्षमता के अनुसार अपने मन के अनुसार पक्षपाती दृष्टिकोण उत्पन्न हो जाने से अक्सर उनके बुद्धिमान बेटा बेटी भी अर्ध पक्षीय या एक पक्षीय मानसिक दृष्टिकोण रखते हुए जीवन के दूसरे गोपनीय दूसरे पक्ष से अनभिज्ञ होने से विकास युक्त प्रगतिशील सोच होने पर  माता भक्ति भाव प्रिय या पिता भक्तिभाव प्रिय  परशुराम या श्रवण- -कुमार बन जाने से अक्सर अपना सम्यक विकास नहीं कर पाते । यह दो आंखों के होते हुए भी एक आंख से देखने वाले काने , दो कानों के होते हुए भी एक कान से आधी अधूरी बात सुनने वाले कलुषित कलेशित दृष्टिकोण बन जाने से अपने जीवन में प्रगति के एक पक्ष में विकास की उच्चतम सीमा तक जाते हैं । परंतु जीवन में दूसरे अज्ञात अदृश्य पक्षों से अपरिचित होने से यह जीरो या हीरो बनते हैं। माता-पिता के भक्त खाड़कू जंगजू दृष्टिकोण के होने से उनके बच्चे अपने-अपने हित के अनुसार पिता में या माता मे अपना हित ढूंढते हुए वह पिता से अनुराग करने वाले पितृ भक्त या माता से अनुराग करने वाले मातृभक्त दृष्टिकोण को अपनाने लगते हैं । ऐसे में उनका प्रेम अनुराग जिस भी माता-पिता पक्ष की ओर होता है वह उसी के गुण अपने अंतर्मन में भरने लगते हैं । जिससे उनका निजी जीवन में द्विपक्षीय से लेकर बहुपक्षीय तक का  सम्यक विकास बाधित होता है उनका विकास द्विपक्षीय बहुपक्षीय ना होने से उनकी समझ सही समय पर सही तरीके से विकसित नहीं हो पाती । उनमें उनमें सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाने की क्षमता विकसित हो पाती है । वे जीवन भर निर्णय  हीन बालक अवस्था में जीवन जीना चाहते हैं। दूसरों की हिकमत दूसरों की सीख के अनुसार दूसरों के विचार, दूसरों की अकल/ समझ के अनुसार जीवन जीना उनकी नियति बन जाती है । द्विपक्षीय उत्थान पतन का समयक ज्ञान न होने पर एक पक्षीय उत्थान प्रिय या एक पक्षीय पतन प्रिय  के समान हो जाती है।
नतीजा माता-पिता की लड़ाई में जो बच्चे पिता से द्वेष रखते हैं माता से प्रेम करते हैं या दोनों से द्वेष रखते हैं । ऐसे अर्ध पक्षीय दृष्टिकोण वाले या एक पक्षीय दृष्टिकोण वाले बच्चे , बैरागी किसी से भी प्रेम ना करने वाले  या स्वार्थी मतलबी पक्षपाती बच्चे जीवन के दूसरे अदृश्य आवश्यक पक्ष का ज्ञान करना भी अपने लिए उचित नहीं समझते , यह अपने जीवन को कम से कम ज्ञान / कम से कम परिश्रम के सहारे जीने की फिराक में रहते हैं अपने जीवन मे कभी प्रगति नहीं कर पाते हैं । 
बच्चे और बच्चियों के सम्यक विकास के लिए माता-पिता के बीच आपसी समझ अंतर्बूझ अंतर्दृष्टि सूझ होनी का अनुमान लगा लेने का कला विज्ञान का ज्ञान  का होना आवश्यक है। बच्चों के सम्यक विकास के लिए यह जरूरी है  कि माता-पिता बच्चों के सामने लड़ाई झगड़ा ना करें बच्चों से अपने मन के अंतर्भेद साझा ना करें अपने मन के अंतर् भेद होने पर भी बच्चों से उनकी राय ना ले, बच्चों से सलाह ना ले कि तुम मेरे हो या अपने पापा के हो या तुम मेरे हो या अपनी मम्मी के हो । बच्चों से ऐसी बातें करना  असुरक्षा वाली मानसिक स्थिति की माता की मानसिक व्यथा की पहचान है ।  बच्चों से ऐसी बातें करना उनके मन में दूसरे पक्ष के प्रति माता या पिता के प्रति वैराग्य वैर वैमनस्य जैसी दुर्भावना उत्पन्न कर देता है ।
    अक्सर अशिक्षित अल्प शिक्षित भ्रम पूर्ण शिक्षित या विपरीतमति परिणाम वाली गुंण धर्म-कर्म की विजातीय विदेशी संस्कृति से शिक्षित माता-पिता में असुरक्षा की भावनाओं से प्रभावित माताएं अपने बच्चों मैं अपना भविष्यफल को सुरक्षित देखते हुए अपने बच्चों से पूछ पूछ कर उनमें अपने पिता के प्रति वैर वैमनस्य भाव उत्पन्न करके भरकर उनको एक पक्षीय दृष्टिकोण वाला अंजाने में बना देती है । इससे वह अपने लिए हितकारी दूसरे के लिए शत्रुता पूर्णभाव रखने वाला पक्षपाती संतान बना देती है । ऐसे एक पक्षीय रुचि अभिरुचि दृष्टिकोण  वाले बच्चे अपने जीवन में वांछित प्रगति नहीं कर पाते हैं।
       अब इसके विपरीत जो बच्चे अपने माता-पिता दोनों से सामान प्रेम करते हैं दोनों में समान अनुराग रखते हैं दोनों को समान सहयोग करते हैं। किसी एक माता या पिता पक्ष को सुनकर अनसुना नहीं करते । अपने पिता की माता की बातों को ध्यान से सुनते हैं। अपने पिता माता की आज्ञा का सामान पालन करते हैं ऐसे सहयोगी मिलनसार बच्चे अपने जीवन में अधिकतम विकास और प्रगति करते हैं।
    मैं कहता हूं लड़ाई में, भोजन में, प्रेम संबंध में  असाधारण मजा है इसलिए लड़ाई लड़ना जरूर सीखिए । लड़ाई युद्ध विद्या की ओर से अशिक्षित मत रहिए  । परंतु लड़ाई  भोजन और प्रेम-संबंध जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है इसलिए लड़ाई के पात्र शत्रु पर प्रेम और कृपादृष्टि और संदेह रखते हुए जागरूक रहकर अपने जीवन को जीना सीखिए ।  वह आपका शत्रु दृष्टिकोण वाला व्यक्ति आपको भविष्य में समय-समय पर परेशान करता रहेगा आपका बुरा सोचता रहेगा अवसर मिलते ही आपका बुरा करता रहेगा । लड़ाई हमेशा निर्बल शत्रु से करना सीखिए बलवान शत्रु से लड़ाई करने का जोखिम मत लीजिए बलराम शत्रु लड़ाई के दौरान लड़ाई के बाद भी आपकी अकल नस्ल सकल सुख समृद्धि सब कुछ बिगाड़ सकता है। लड़ाई लड़ते समय लड़ाई की सीमा रेखा पर नजर जरूर रखिए इसे शास्त्रों में मर्यादा कहा गया है। लड़ाई किससे करनी है कब तक लड़नी है किस समय तक लड़नी है इस सब का विवेक लड़ाई के योद्धा को होना बहुत जरूरी होता है। लड़ाई लड़िए सोच समझ कर लड़िए । अपने से लड़ाई लड़ना समझदार नहीं मूर्ख की पहचान है जिसे अपने भावी जीवन मैं जीवन जीने के लिए निजी जीवन हित का ज्ञान नहीं है ।
    अक्सर हम बच्चे को उसके बालनकाल में सर्वप्रथम लड़ने के लिए उसे उकसाते हैं सीखाते हैं मार -भैया- मार इस लाइन से बच्चा यह सीख जाता है कि उसे जीवन भर दूसरों को मारते पीटते रहना है। नतीजा इसका यह आता है कि निम्न स्तरीय परिवार के बच्चों में बच्चों में क्रुरता और दुष्कर्म दुष्टतापूर्ण जीवन पद्धति जीने के दौरान  उसे सदैव अकारण अचानक अनावश्यक रूप से दूसरों का विरोध करना दूसरों की चाल रोकना अपनी गलत बात को भी सही सिद्ध करना जैसा स्वयं अपने अपनों के लिए भी शत्रुता पूर्ण दृष्टिकोण भाव वाला बना देता है । जिसका बुरा नतीजा यह आता है कि वह अपनों से ही लड़ना अपनों से ही संघर्ष करना सीख जाता है उसका जीवन अपनों से लड़ते जूझते रहने में व्यतीत होता है । ऐसे में उसके लिए दुश्मनों की फौज उसके अपने पारिवारिक समाजिक लोग ही बन जाते हैं । जिसका नतीजा यह आता है की जो व्यक्ति युद्ध विद्या में पारंगत होता है जीवन भर दूसरों से संघर्ष लडाई युद्ध में जीतता रहता है । वह अपने लड़ाकू खड़कू स्वभाव से अपनी लड़ाई अपनों से लड़ता हुआ जीवन के अंत विकासवान प्रगतिशील होते हुए भी अपनी संतान के प्रगतिहीन विकासहीनता से हारा हुआ प्रमाणित हो जाता है।

रक्त का उच्च शर्करा व्याधि रोग प्रमेह मधुमेह कैसे होता है

सभी प्राणियों के शरीर की तन मन धन की सक्रियता और निष्क्रियता उन प्राणियों के द्वारा अपनाए गए स्वीकार किए गए शब्दों की ध्वनि की आवृत्ति आयाम तारत्व तारतम्य पर आधारित  कर्तव्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा की निरंतर दैनिक उपलब्धि मात्रा मंत्र मंत्री हित हिट प्रभाव पर निर्भर है। किसी भी मनुष्य को पूर्णतया निरोग होने के लिए शरीर के रोग निदान के लिए औषधि से रोग निदान के लिए सद्ज्ञान सत्यज्ञान का होना परम आवश्यक है । कारण की अवचेतन मन सदैव सत्य को स्वीकार करता है । सत्यता के साथ रहते हुए शांतचित से शरीर की जैविक क्रियाओं  का क्रियान्वयन करता हुआ प्रत्येक मनुष्य  को उसकी जातक आयु के अनुसार उसकी निश्चित जीवन अवधि तक जीने देता है। परंतु हाइपोकांड्राइसिस मनोरोगी का मन असत्य बातों को भी सहजता से स्वीकार करने लगता है । जब उसके मन में सत्य बातें अधिकांश मात्रा प्रमाण में एकत्रित हो जाती हैं तो उसकी मन मरने बुझने क्लेशित होने के जीवन विकल्प के अनुसार अपनी सेटिंग फिर से चेंज करने का प्रयास करने लगता है मन मरने पर पूरी तरह से परिवर्तित होकर नया मन बनने का प्रयास करता है यदि मन पूरी तरह से बदलकर नया हो जाता है तो व्यक्तित्व पूरी तरह से बदल जाता है अवसादी अपराधी महात्मा हो सकता है, साधारण लोग अपराधी बन जाते हैं । यदि मन बुझने/दवने लगता है तो व्यक्ति अवसाद और अपराध की और चलने लगता है। यदि क्लेषित या मां की मालीनता के अनुसार दुखी  रहने लगता है तो मन मैं संचित क्लेश और दुख के अनुसार शरीर में तरह-तरह के विषय रसायन बनने से व्यक्ति तरह-तरह के शारीरिक मानसिक रोगों में ब्लड प्रेशर शुगर कैंसर डिप्रेशन चिंतन हीनता पागलपन में चला जाता है। अधिकतर ऐसे परम चिंतनशील लोगों की मुखाकृति और शरीर क्रशय/कमजोर पिचका चेहरा से दुबला कमजोर शरीर युक्त होते जाते हैं। कारण है शरीर के रक्त में उपलब्ध शर्करा का सम्यक समुचित प्रयोग ना कर पाने से रक्त का शर्करा स्तर बढ़ जाता है।
      लचर/भृष्ट अधिकांश बहुसंख्यक प्राणी अपने जीवन को असत्यता से जीते हुए कम आयु जीवन जीते हैं। परंतु जो लोग अपने जीवन को सत्यता ईमानदारी के अनुसार इशिता पर आधारित ईश्वरीय और प्राकृतिककृतिक नियमों से जीते हैं। उनका जीवन काल दीर्घायु होता है। परंतु जो लोग ईश्वरीय नियमों की अवहेलना करते हुए अपने जीवन को असत्यता और भ्रम कीअधिकता से जीते हैं इसका उनके अवचेतन मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सभी प्राणियों का अवचेतन मन अशांत  होने पर दुखी होकर जातक की आयु को नियंत्रित रखते हुए कम से काम करने का  प्रयास करता है अत्यंत दुखी होने पर उसकी आयु काम करने की कोशिश करता है दुख की अति से यह प्राणी को अकाल मौत मरने तक को बाध्य कर देता है। अवचेतन मन के क्रियाकलाप को शरीर को उसकी आवश्यकता के अनुसार ऊर्जा तूषणा स्थिति की व्यवस्था करने से अवचेतन मन का कार्य व्यवहार समझा पहचाना जा सकता है। यह महात्मा जनों की आयु बढ़ता है सामाजिक सांसारिक जनों को जातक आयु देता है सामाजिक लोगों की जातक आयु को रोगों से क्षय/कम करता है दुष्ट लोगों की जातक आयु को कुशाध्य असाध्य रोग उत्पन्न करके उनको समय से पहले समाप्त करने का प्रयास करता रहता है । उन्हें जीवन नियंत्रित करने वाले रज रोग  टीवी कैंसर एचआईवी आदि रोगों से अकाल मौत में मरने को बाध्य करता रहता है । 

प्रमेहसे उत्पन्न मधुमेह उच्च रक्त शर्करा व्याधि को रोग माना जाता है। जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से प्रमेय रोग नहीं अपित सत्य जनी व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार जीवन जीने के लिए ब्रह्मांड से प्रदत्त तूषणा ऊर्जा की निरंतर नैतिक व्यवस्था है । जो मनुष्य को उसकी इच्छा वासना आकांक्षा कर्म सस्कार  की अधिकता महत्वाकांक्षा के अनुसार प्राप्ति है। अल्प ज्ञानियों के लिए मधुमेह ही शरीर में समस्त रोगों का कारण है। दुष्ट जनों और अज्ञानयों के जीवन को नियंत्रित करने दुष्टकर्म की मात्रा के अनुसार उनके जीवन को समय से पहले समाप्त करने की यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था है। 
   आज आध्यात्मिकता के अभाव में , सत्यज्ञान से जीवन जीने की ईश्वरीय निर्देश पद्धति के अभाव में प्रमेय व्याधि मनुष्य की सामान्य जीवन पद्धति का बहुसंख्यक मानव आबादी का समस्याप्रद रोग बन गया है। जबकि यह कोई शरीर में संक्रमण या संक्रामक रोग नहीं है सूक्ष्म जीवों से वायरस बैक्टीरिया कृमि सूक्ष्म-आर्थ्रोपोडा जीवो की उपस्थिति से उत्पन्न शारीरिक रोग नहीं है ।  अपितु यह मनुष्य की सामान्य जीवन पद्धतिKLMNO के अनुसार अपना जीवन सामान्य तरीके से ना जी पाने के कारण अपने जीवन स्तर से अत्यधिक उच्च स्तर वाली कामनाओं उच्च महत्वाकांक्षाओं और आत्महीनता के बाइपोलर डसऑर्डर की संयुक्ति से दिमाग में बैठाने से उत्पन्न एक मनोरोग होता है । जो बाद में उसके मेटाबॉलिक सिस्टम को डिस्टर्ब करके उसके मेटाबॉलिक डिस ऑर्डर्स से उसके शरीर की जैविक ऊर्जा व्यवस्था प्रणाली को छिन्न भिन्न करके अनियंत्रित करके शारीरिक रोग में बदल जाता है । 
   प्रत्यय प्राणी के  अवचेतन मन संरचना बनावट के प्रभाव के अनुसार मनुष्य में जैविक आयु परिवर्तन चक्र चलता है जिसकी अति परिमाण में भ्रम और असत्यता ज्ञान संचय अनुसार वृद्धावस्था का आगमन कुछ मनुष्यों को समय पर कुछ को समय से पहले वृद्धा अवस्था का आगमन होता है। परंतु कभी-कभी अक्सर गलत शिक्षा दीक्षा गलत गुरु जनों के सानिध्य से ईश्वर और प्रकृति के आदेश नियमों की अवहेलना करने से प्रमेह व्याधि उत्पन्न हो जाता है या किसी निम्न स्तरीय आत्मा के उच्च स्तरीय परिवार में उत्पन्न होने पर निम्न बौद्धिक भौतिक स्तर होने से  या उच्च स्तरीय संत महात्मा कुकर्म दोष से आत्मा के निम्न स्तरीय परिवार मे उत्पन्न होने पर परिवार समाज में अति अनावश्यक संघर्षों की अधिकता से उसके मन-मस्तिष्क में  डर बैठ जाने से भी पारिवारिक संस्कार भेद विविधता से प्रमेह व्याधि रोग उत्पन्न  होता है।          जब तक  प्राणी के शरीर में उसको अपना जीवन जीने के लिए आवश्यक जैविक ऊर्जा निर्धारित जीवन पद्धति के अनुसार उपलब्ध होती है उसके मन में उसके जाति कुल वंश परिवार स्तर के अनुसार आकांक्षाएं होती है । जिनको वह अपने हित के अनुसार अपने निकट परिवार जनों से सीख कर एकत्रित करता है । जिनके मन में महत्वाकांक्षा नहीं होती उसको प्रमेह रोग नहीं हो सकता है। परंतु जब उसके मन में उसके जाति परिवार कुल स्तर से बहुत उच्च स्तर की महत्वाकांक्षाएं उसके मन मस्तिष्क में जमकर स्थिर हो जाती है ।  परंतु उस उच्च स्तरीय जीवन प्रणाली के लिए उसको ब्रह्मांड में  तूषणी ऊर्जा उसकी जैविक इच्छा के अनुसार उपलब्ध नहीं होती जिससे उसकी मन अशांत क्लेषित होने लगता है । मन की बेचैनी के अनुसार उसके रक्त वाहिकाओं में शर्करा का स्तर उसकी आवश्यकता के स्तर से उच्च रहने लगता है । तो उसके शरीर के अंग इंद्रियां दिमाग ठीक-ठाक काम नहीं करता है उसे ओवर थिंकिंग का मनोरोग हो जाता है , जिसमें बिना काम के सोचने का बिना काम के काम करने का रोग उत्पन्न हो जाता है जिसमें पहले इंद्रीहीनता बहरापन अंधापन उत्पन्न होता है बाद में शारीरिक ऊर्जा नियंत्रक अंग यकृत  पेनक्रियाज/ अग्नाशय ग्रंथिया विकार युक्त होकर धीरे-धीरे अपनी क्षमता क्षरिता उत्पन्न होने से रक्त का शर्करा स्तर सामान्य ना होने पर असामान्य उच्च ग्लाइसीमिया निम्न रक्त शर्करा स्तर हाइपोग्लासीमिया जैसी वृद्धावस्था के लक्षण उत्पन्न होने लगताहैं जिसमें वह हाइपर ग्लिकेमिया उत्पन्न होने पर रक्त शर्करा स्तर अत्यधिक बढ़ जाने पर मानसिक अवसाद और निष्क्रिय अवस्था में बिऐ किसी काम के चुपचाप बैठा-बैठा भी हाथ-पैर हिलाता चलाता रहता है। वृद्धावस्था में इसे पर्किंसन हाथ पैर कांपने का रोग उत्पन्न होता है । हाइपोग्लाइसीमिया की स्थिति में रक्त शर्करा स्तर सामान्य से कम हो जाने पर अपने जीवन को सक्रिय जीवन जीने के बजाय अपने जीवन को निष्क्रिय तरीके से आलसी निकम्मा होकर जीने लगता है ।    परंतु जिसका मस्तिष्क सक्रिय रहता है शरीर अनावश्यक रूप से बिना काम के काम करता रहता ह। उसे तूषणी अपनी जैविक इच्छा ऑन को पूरा करने के लिए आवश्यक ब्राह्मणी उत्पादन ऊर्जा/ब्राह्मंडीय प्रोडक्ट निर्माण कार्य की   की सही समझ ना होने से उसका दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है उसे यह बोध नहीं रहता कि इस समय क्या काम करना आवश्यक है ? और क्या अनावश्यक काम किया जा रहा है? वह बिना किसी रोग के पहली अवस्था में जैविक स्तर से उच्च महत्वाकांक्षा का मानसिक रोगी बन जाता है । तरह-तरह की कल्पना करता हुआ परिकल्पना रचता हुआ अपने वैचारिक जगत में पागलपन अवस्था में खोया रहने लगता है ।  जिसमें वह अपनी मानसिक ऊर्जा का व्यर्थ अकारण अपव्यय अनुपयोगी विचार चिंतन करता रहता है। जब सामान्य जीवन पद्धति के दौरान आवश्यकता के अनुसार अपने लिए उपयोगी विचार चिंतन की सामान्य विचार पद्धति के स्थान पर अपनी सामान्य जीवन पद्धति में विशेष जैविक स्तर की आवश्यकता से अधिक उच्च स्तर की जीवन पद्धति की विचार पद्धति अपनाने लगता है ।जब आनियंत्रित विचार प्रणाली में  अति उच्च स्तर की महत्वाकांक्षाएं अत्यधिक मात्रामें सम्मिलित हो जाती हैं । तब मनुष्य के जीवन को उसकी आदतों के अनुसार चलाने वाले अवचेतन मन पर अनावश्यक दवाव पड़ने लगता है । जिससे मनुष्य का मस्तिष्क अकारण कर्म के अनावश्यक कर्म में व्यस्त  रहने लगता है । वह अनुपयोगी अनावश्यक सूचनाओं पर अमूर्त चिंतन करनेलग जाता है।  ऐसे में उसके मस्तिष्क के अनावश्यक रूप से सक्रिय रहने पर उसके रक्त में शर्करा स्तर सामान्य से उच्च रहने लगता है। उसके दिमाग की सेटिंग डिस्टर्ब हो जाती है। इसका कारण उसे मनुष्य का अपन शरीर को अपनी आदतों के अनुसार चलने वाली अवचेतन मन की सेटिंग का खराब हो जाना है।
       उल्लेखनीय तथ्य यह है सभी जीव अपने जीवन को अपनी आदतों के अनुसार कम ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीते हैं  यदि जीव अपने जीवन को सक्रिय अवस्था में अत्यधिक मानसिक ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो उनके लिए अपने जीवन को जीना असंभव हो जाता है। अत्यधिक जाकर मानसिक ऊर्जा के उपयोग करने सेअवचेतन मन की सेटिंग खराब होने के साथ ही शरीर के संचालनकी सेटिंग भी अपने आप बिगड़ने लगती है। उसका उसके हृदय से नियंत्रण अनियंत्रित हो जाने से उसके हदय की धड़कन उसकी नाड़ी लगातार लंबे समय तक नियंत्रित न रहते हुए अनियंत्रित हो जाती है। उसके हृदय की धड़कन कभी अपने आप अचानक ही बढ़ जाती है तो कभी अपने आप अचानक घट जाती है जिससे उसके मस्तिष्क को पहुंचने वाले जीवन सिग्नल का तारत्र्व्य बिगड़ जाता है । उसका दिमाग उसका स्वास्थ्य सही होते हुए भी उसके दिमाग को गलत जीवन सिग्नल भेजने लगता है जैसे थकान से निद्रा उत्पन्न होने पर , भूख से रक्त शर्करा का स्तर गिरने पर उसको जीवन संकट की सूचना मृत्युक्षण की आपत्तिजनक स्थिति के रूप में भेजने लगता है। अब तू मरेगा मर सकता है तेरे जीवन को खतरा है। मल मूत्र त्याग जैसे आवश्यक कार्य करते समय उसमें भी जल्दी का सिग्नल भेजना लगता है जिससे मलमूत्र त्याग का तार्तव्य बिगड़ जाता है कब्ज रहने लगती है पेशाब रूक रुक उतरने लगता पितज प्रमेह उषण मूत्रता उत्पन्न होने लगती है। दोनों आंखों में एक साथ दृष्टि ध्यान केंद्रित करने के बजाय एक आंख में दृष्टि ध्यान केंद्रित करता हुआ दूसरे दृष्टि केंद्र आंखकी अनदेखी बेगौरी लंबे समय तक होने से अनजाने में आंखों मे दृष्टि दोष की समस्या उत्पन्न होने लगती है । एक नेत्र की ज्योति कम होते होते दृष्टि मंडता धुंधलापन उत्पन्न होने से बढ़कर से आगे दृष्टिखत्म तक हो जाती है दूसरे नेत्र की ज्योति सामान्य होती है तब पहले नेत्र में नेत्र दृष्टि मैं धुंधलापन उत्पन्न होने पर दृष्टि अक्षमता उत्पन्न होने पर मोतियाबिंद पर जाकर रुकती है । रक्त में शर्करा का सामान्य स्तर 70 से 200 तक है 200 से आगे 300 तक पहले यकृत पितदोष बाद में नेत्र दृष्टि दोष 400 से आगे किडनी दोष उत्पन्न होकर यह अंग खराब या निष्क्रिय भी हो जाते हैं।

मूर्ख विद्वान अल्प शिक्षित शिक्षक लोग कौन होते हैं कितने प्रकार के होते हैं इनकी क्या पहचान है।

यह प्रश्न बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी मनोवैज्ञानिक व्याधि समस्या पर आधारित है। जिसके अनुसार एक जीव का जीवन दो धुर्वो के दो शीर्ष प्रगति बिंदु उत्थान और पतन के बीच में फंसकर भ्रमित जैसा हो गया है उसे समझ नहीं आ रहा है कि उसके लिए क्या अच्छा है? क्या बुरा है? क्या श्रेष्ठ है? क्या अश्रेष्ठ है ? उसकी समझ नहीं आ रहा कि उत्थान के रूप में ऊंची गति करते हुए विकास के अंतिम उत्कर्ष बिंदु तक पहुंचा जाए या पतन के रूप में जीवन के सबसे नीचे अंतिम विकास बिंदु पर अधोगति से गिरते चलते हुए अंतिम निम्न स्तरीय बिंदु पतन तक पहुंच जाए ।
   इस जीवन लक्ष्य की प्राप्ति को पाने के लिए प्रत्येक जीव ने अपने लिए आवश्यक कर्म करने के लिए जीवन माध्यम सामग्री सम्यक उचित जैविक ऊर्जा का चयन किया है । जिसके सम्यक परिमाण के अनुसार वह एक निश्चित लिङ्गधारी प्राणी नर या मादा शरीर धारण करता है । अधिक  ऊर्जावान एक नर लिंगी या अल्प ऊर्जावान एक मादा लिंगी के शरीर का चयन करता है। परंतु सृष्टि नियंता प्रकृति या ईश्वर ने इसमें भी घपला कर दिया है या लोचा हो गया । 
        प्रकृति में हमें सामान्य तौर पर नहीं अपितु कभी-कभी कहीं पर इसका विपरीत भी देखा जाता है जिसके अनुसार अल्प ऊर्जावान नारी लिंगी प्राणी कभी-कभी अति ऊर्जावान नर लिंगी प्राणी पर भारी पड़ती हुई यह सिद्ध कर देती है कि नारी नर से कम नहीं ,  ना शारीरिक ऊर्जा क्षेत्र में ना मानसिक ऊर्जा क्षेत्र में बल्कि कभी-कभी तो वह नर प्राणी के लिए चुनौती ही नहीं उत्पन्न अपितु उस पर प्रभावी  सिद्ध हो जाती है । प्रत्येक जीव एक पक्षीय प्रदर्शित लिङ्गधारी गुंण होते हुए भी दूसरे पक्ष के विपरीत लिङ्गीय लक्षणों को दबाकर छिपाए रहता है । जैसे नर प्राणी में नारी प्राणी के  गुणधर्म छिपे रहते हैं । जिससे नर सदैव नर जैसे गुणों का प्रदर्शन नहीं करता अपितु नर में नारीयों जैसे अल्प ऊर्जावान गुणधर्म परिलक्षित होने लगते हैं । जिससे इस अर्ध नारीश्वर धारणा के अनुसार इस सृष्टि में उपद्रव संघर्ष की संभावना प्रत्येक प्राणी को आजीवन बनी रहती है। इसका परिणाम यह आता है कि सृष्टि में बुद्धिमान मूर्ख पर भारी पड़ते हैं बलवान निर्बल पर भारी पड़ते हैं यह नियम है । परंतु कभी-कभी मूर्ख भी विद्वानों पर अपनी अकड़ू अकाट्य तर्कशील ज्ञान बल पर विद्वानों पर भारी पड़ जाते हैं और निर्बल प्राणी के हाथों बलवान मारे जाते हैं । 
      हम सृष्टि में प्रकृति में मूर्ख उस मनुष्य को कहते हैं जिसमें चेतना का विकास वंछित प्रकार का नहीं हो पाया है। जैसा हम उसमें चेतना का विकास करना चाहते हैं  जैसा वह अपने लिए हितकारी विकासशील समृद्ध शाली विकसित होना चाहता है। जिसको हम शिक्षा देकर शिक्षित और बुद्धिमान बनाना चाहते थे । हम उस अनपढ़ अशिक्षित मंदबुद्धि को प्रबुद्ध महाबुद्धिमान व्यक्ति बनाकर उसका  विकास करना चाहते थे। परंतु वह बुद्धिहीन अशिक्षित होने से न प्रगति करना सीख पाया, न विकास करना सीख पाया अपितु प्रगति की फिराक में अपनी मानसिक क्षमता से ज्यादा ज्ञान अर्जित करके बौद्धिक रूप से भ्रमित हो जाने पर उसकी प्रगति शीलता की चाल रुक गई। विकास के फेर में/ लालच में उसका पतन हो रहा है । वह न अपना विकास कर पा रहा है न अपने जीवन को प्रगतिशीलता से जी रहा है उसकी जीवन पद्धति जैविक संघर्ष मंडल में गिरकर फंस जाने पर विकृत हो गई है । ऐसी विकृत मानसिकता वाला शिक्षित व्यक्ति एलजीबीटी ए आई क्यू ई LGBTAIQE की एक नवीनतम मानव सामाजिक ग्रुप में न अपना दीर्घकालीन हित समझ पाया है ना दूसरों का दीर्घकालीन हित को समझ पाया है। जिसके मूर्खतापूर्ण धूर्त कार्यों से अक्सर दूसरों का हित के लालच में हित के प्रयास में हितकर प्रयास करने पर हित होता रहता है । परंतु वह अपना हित करने के लालच में अक्सर अपना भी अहित करता रहता है । तरह-तरह की अपनों के लिएअज्ञात अरिष्ट आशंकाओं में व्यर्थ मानसिक चिंता करता हुआ अपनी मानसिक ऊर्जा का अपवहन चालन संवहन विकिरण द्वारा करता रहता है। उसको अपना अहित बोध नहीं होता है , तो दूसरों का हित बोध उनका की प्रगति को देखकर आवश्यक होता रहता है । 
    परंतु जो मनुष्य अपने बौद्धिक कार्यों द्वारा जानबूझकर अपना हित करने में कुशल दूसरों का अहित करने में पारंगत हो जाता है। वह मूर्ख नहीं हो सकता है। यह मूर्ख बौद्धिक चैतन्य जागरूकता  के आधार पर बुद्धिमानों में भी उनके अनेक प्रकार के होते हैं जिनको उनके कर्मकांडी लक्षणों के द्वारा उनको पहचाना जा सकता है । इनके दिमाग की सेटिंग खराब और विकृत होती है। इनके दिमाग की सेटिंग निजीकृत हितकारी ना होते हुए इनकी माता-पिता गुरु मित्र रिश्तेदार संबंधी के द्वारा दूसरों के लिए पर हितकारी परोपकारी होती है परंतु अपने लिए हानिकारक होती है। यह मानसिक रूप से बामन के बैल होते हैं जो ना अपने लिए उपयोगी होते हैं ना दूसरों के लिए उपयोगी होते हैं। इनके पास अपने विचार विचरणा नहीं होती । यह सदैव दूसरों के शब्दों का  उपयोग प्रयोग अपनी वार्तालाप के दौरान करते हैं।
          यह मूर्ख विद्वान शिक्षित लोग अपने मानसिक ऊर्जा का उपयोग सदुपयोग करना नहीं जानते कि कब उसे अपने दिमाग का उपयोग करना है ? कब दिमाग को आराम देना है ? इनका अपने दिमाग के स्मृति पक्ष पर नियंत्रण नहीं होता जबकि विस्मृति अनियंत्रित होती है अक्सर उनके दिमाग से उनके लिए उपयोगी बातें भी फिसलते रहती हैं। इनके दिमाग में आपात कालीन स्थिति के लिए संचित रिजर्व ऊर्जा नहीं होती, थकने के बाद इनको बुरी तरह नींद आ जाती है इनका नींद पर नियंत्रण नहीं होता इनको नींद अधिक मात्रा में आती रहती है।
     चेतन्य मूर्ख, निरक्षर मूर्ख, अशिक्षित मूर्ख, साक्षर मूर्ख , धूर्त शिक्षक, विद्वान मूर्ख इनमें हम अपना ध्यान विद्वान मूर्ख और धूर्त लोगों पर फोकस करके चलेंगे जिनके दिमाग की सेटिंग गलत शिक्षा-दीक्षा से होती है, यह अपने निजी व्यवहार में गलत कल्पना/असंभव परिकल्पनाएं करते रहते हैं। अनुपयोगी विपरीत बौद्धिक चिंतन में समय व्यतीत करते हैं जिससे ना इनका भला होता है ना उसका भला होता है !  जिसके लिए यह चिंतन कर रहे होते हैं । यह ओवर थिंकिंग / नियंत्रित कल्पना परिकल्पनाओं को करने वाली व्यर्थ की बातें करने वाली बकवादी मनोरोगी होते हैं।  यह लोगों से मिल कर उनसे उपयोगी वार्तालाप करना नहीं चाहते जिससे इनमें कम्युनिकेशन स्किल नहीं होती है । यह अपने लिए उपयोगी सामाजिक महाशय महाजन लोगों से संपर्क करना नहीं जानते, इन मूर्ख विद्वानों में जिम्मेदारी पूर्णता का सामाजिक बंधन बनाने के लिए अपने हितकारी लोगों से मिलना जुड़ना चिपकना नहीं आता । 
    इन विद्वान मूर्ख जनों को उपयोगीता पूर्ण समद्ध लोगों से बौद्धिक आर्थिक सामाजिक लाभ  लेना नहीं आता । गलत अनूपयोगी विकृत भयंकर अपराधी साहित्य अध्ययन करना इनकी पहचान है। इन विद्वान मूर्ख लोगों के अनेक विचित्र असंभव असंभव कृत्य कर्म कार्य होते हैं । जिनसे उनके दिमाग की खराब सेटिंग की पहचान हो जाती है यह पढ़ लिखकर भी जीवन में अधिकतर फेल होते रहते हैं। यह आजीवन अपने लिए उपयोगी पढ़ाई नहीं पड़ते अपितु अपने लिए अनुपयोगी पढ़ाई में पढ़कर अपना अध्ययन का समय व्यर्थ होते हैं । यह विद्वान मूर्ख जन अपने जीवन में अक्सर तरह-तरह की सामाजिक आर्थिक राजनीतिक भौतिक रासायनिक जविक समस्याओं से प्रभावित रहते हैं तरह-तरह के असंक्रमित रोग जैसे उच्च रक्त शर्करा / शुगर, ब्लड प्रेशर , कैंसर बीमार रहते हैं जो इनके गलत खतरनाक भौतिक चिंतन से इनमें उत्पन्न होते हैं। ऐसे में जो मनुष्य पढ़ा लिखा शिक्षित होते हुए भी तरह-तरह के राजरोगों से ग्रस्त है जो अतिधूर्त बुद्धि के उपयोग और लालच की अति से  बारंबारता की पुनरावृत्ति से उत्पन्न होते हैं जैसे यक्ष्मा टीवी उच्च रक्त शर्करा कैंसर  हाथ पैर शरीर में गांठगट्टे, चेहरे पर झाइयां चंडालता  मलिनता कालिख  रोगों से ग्रस्त है। तरह-तरह की आर्थिक सामाजिक राजनीतिक पारिवारिक शरीर स्वास्थ समस्याओं में गिरा घिरा हुआ है तरह-तरह की समस्याओं से प्रभावित है उसे हम शिक्षित नहीं कह सकते वह पढ़ा-लिखा व्यक्ति विद्वान मूर्ख कहा जा सकता है। आज की तारीख में ऐसी पढ़ी-लिखी विद्वान मूर्ख शिक्षकों की भरमार हो गई है यह गलत गलत खतरनाक साहित्य लिख रहे हैं । यह विद्वान मूर्ख स्कूलों मे शिक्षक अध्यापक नियुक्त होकर शिक्षा देने के कार्य के दौरान छात्रों का बौद्धिक नाश कर रहे हैं।