21/01/93, टोंक राजस्थान, में जन्म हुआ| पिछला वर्ष मेरे निजी संबंधो के लिए अच्छा नहीं था|अब मेरी अरेंज शादी होने वाली है. क्या पूर्व संबंधो की तरह शादी के बाद भी परेशानी के योग है ? इस राहू महादशा में किन बातो का ख्याल रखना चाहिए?

मैं पेशेवर ज्योतिषी नहीं हूँ जो लिखा वह मेरा निजी अनुभव अध्ययन सहित था जो परिवार रिश्तेदार के विवरण ओं पर आधारित है ।
राहु कल्पना शीलता गुण का देवता है ।जिसकी स्थिति मुख दंत कैनाईन में है । राहु का जीवविज्ञान राहु माने सिर केतु माने धड़ अर्थात माँसाहारी जीव बड़ा सिर बड़ा मुँह बड़े कैनाईन दाँत राक्षस वृत्ति सूचक राहु प्रधान जातक लक्षण है केतु प्रधान जातक का सिर छोटा मुँह छोटा, कैनाईन/कृतंक छोटे शाकाहारी वृति लक्षण है ।तो राहु केतु के ज्योतिष जंजाल में मत पड़ो यह अर्ध सत्य 50/प्रति शत अंदाजे बयाँ करता है । नये विचारों से नया दिमाग बनाओ । आवश्यक गुण लक्षण युक्त अर्धांगिनी का चुनाव करो मिल जाय तो बेझिझक शादी करो ।पत्नी के भाव भावनाओं को प्राथमिकता दो । आपके सुखी वैवाहिक जीवन का यही रहस्य है ।
विप्र वर्णा कन्या मुँह से माँगने में समझदारी है ,रत्न वर्णि कन्या माँगना तो क्या धन देकर लेने में समझदारी है ,सेवक वर्णा की सेवा का लाभ लो ,वैश्य वर्णा से धन का अभाव नहीं रहेगा ,क्षत्रप वर्णा की रक्षा की चिंता नहीं करनी पड़ेगी । अच्छाई खोजो पत्नी में ग्रहस्थ जीवन अच्छा बनेगा । यदि पत्नी में पत्नी पक्ष में कमी ढूँढ़ने की गलती /जुर्रत की , तोअच्छी से अच्छी श्रेष्ठ कन्या से कुल से विवाह सबंध बनने के बाद भी आपका वैवाहिक जीवन परेशानियों से भरा रहेगा । ज्योतिष की कम समझदारी की जरूरत ज्यादा है । यही जीवन सूत्र है
राहु जन्मकुण्डली के चौथे भाव में स्वग्रही होने पर श्रेष्ठ फल देता है ।बाकी सभी जगह हर ग्रह की चाल बढ़ा कर उसे भगा,दौड़ कर उसकि दिशा दशा दोनों खराब कर देता है ।इसका शादी से विशेष संबंध नहीं है शादी के ग्रह सूर्य उद्यमिता रोजगार चंद्रमा प्यार मंगल पत्नी रक्षा नियंत्रण गुरु ज्ञान शुक्र भोग शनि विवेक अरण /इन्द्र प्रभाव आदि हैं।
राहु केतु दोनों योनि ऊर्जा के स्वामी सेवक संचालक हैं ।अब ऊर्जा विधान का अध्ययन जिससे जीवो का जीवन चलता रूकता है।शरीर में 8मुख्य चक्र हैं जिनमें 7की चर्चा होती है 7फेरे का विधान है।परंतु 6चक्र विवेचन योग्य है जिनमें 3चक्र निचे के स्त्री के बलवान होते हैं और 3चक्र ऊपर के पुरुषों के बलवान होते हैं ।7तवाँ चक्र प्राण दोनों का आधा आधा अलग अलग हो ता है इस सप्तचक्रों के मिलान के विधान को विवाह कहते हैं ।
अरस्तू ने बताया ःः…मनुष्य एक जटिल तम प्राणी /पशु है । इस ज्ञय्पति के अनुसार हर मनुष्य के भीतर एक गुप्त रूप से पशु छिपा होता है जिसे उसका योनि कहते हैं ।ज्योतिष शास्त्र में यह योनि सर्ग में लिखे होते हैं जिनका संख्या कम है पर उनके आधार पर मनुष्य ओं के जोड़े में योनि दोष का विचार किया जाता है । शत्रु योनि, मित्र योनि सम योनि, विषम योनि आदि का विचार किया जाता है ।
पं राधेश्याम भट्ट के अनुसार ब्राह्मण में नाड़ी (रक्त &मैटाबॉलिज्म सिस्टम )क्षत्रिय में वर्ण (ओज रंग )वैश्य में गण (मैत्री मित्र मंडली व्यवहार ) शूद्र में योनि (शरीर गुण लक्षण )विशेष विचारणीय है परन्तु मेरे विचार से योनि प्रथम नाड़ी द्वितीय वर्ण तृतीय गण चतुर्थ क्रम पर होना चाहिए । इसमें वंश कुल जाति धर्म का विशेष प्रथक वर्णन की आवश्यकता नहीं है ,इसे सभी के लिए अच्छा समझा जाय ।यह सभी जनों के हितार्थ लिखा है ।सभी जनो को उत्तम वंश वृद्धि , समझदार पत्नी की कामना /इच्छा होती है ।
मित्र आपकी समस्या पढ़ी मालूम पड़ा आप नारी असहयोग से पीड़ित हो इसका हल ज्योतिष में नहीं कामसूत्रम् ज्ञान से है इसके लिए वैंकटेश्वर स्टीम प्रैस वालों का कामसूत्रम् ग्रंथ से रति कर्म चरण /सोपान सानिध्यम् स्पर्शम आलिंगनम चुम्बनम मुद्रा प्रहारणम नख दंत उपयोगम संवेशनम संतुष्टिम पुरुषायतम ज्ञान पढ़े चरक संहिता लाहौर प्रैस का पूर्वाअर्ध भाग से योनि भेद जीव भाव पढ़ो 500–700रूपये लगेंगे यह सोदा समस्या कोरा से मुफ्त में हल नहीं होगा ।

चिड़ेयाघर में किन जानवरों का संकरण (cross-breeding) किया जा सकता है? जैसे शेर/सिंह की जोड़ी? क्या ये जानवर सहयोग करते हैं? क्या प्रकृति में, बिना मनुष्य से प्रेरित या सहज किए ऐसा होता है? क्या इन जानवरों के संतती में भी आगे चलकर संकरण हो सकता है?

प्रकृति में दो अलग अलग जाति /भिन्न योनियों के जीवों में नैतिक प्राकृतिक रूप से संकरण नहीं हो सकता ।प्रकृति में यदि ऐसा विचित्र संबंध प्राकृतिक रूप से नैतिक बने या अनैतिक बने मानव द्वारा बनवाया जाय तो ःः
प्रकृति के आईसोलेशन शुद्ध प्राकृतिक व्यवस्था नियम के अनुसार पहली पीढी नपुंसक होगी यदि किसी कारणवश पहली पीढ़ी सपुंसक /फरटाईल होती है तो इस पीढ़ी के सदस्यो के जननांगों का आकार पूर्व की मातृ पक्षीय और पितृ पक्षीय सदस्यों से मैच /मेल नहीं करेगा और परिणाम तः संकरण से उत्पन्न सदस्यों को आपस में ही यौन संबंध /जनन संबंध बनाना होगा जिसका परिणाम यह होगा कि तीसरी पीढ़ी के सदस्य हर हाल में नपुंसक ही पैदा होंंगे ।
इसे हम घोड़े और गधे के मिलन /संकरण से समझ सकते हैं।हम देखते हैं कि घोड़े और गधे के सहयोग संकरण से उत्पन्न संतान नपुंसक खच्चर पैदा होता है नर में मूत्राँग तो होता है परंतु जननांग वृषण नहीं होते ,मादा में मूत्राँग योनि द्वार तो होता है परन्तु सफल मैथुन के लिए आवश्यक उचित आकार की योनि नली नहीं होती है जिसमें मैथुन /जननक्रिया के दौरान गधे का ,घोड़े का ,खच्चर का नर जननाँग प्रवेश कर सके और सामान्य रूप में नर शुक्राणु स्खलन (सीमैन डिस्चार्ज ) क्रिया समपन्न हो सके ।
मानव प्रयास से ऐसा अनैतिक यौन संबंध बल पूर्वक बनवाया जाय या कृत्रिमता से करवाया जाय तो खच्चर मादा का गर्भाशय अविकसित अतिछोटा होता है जिससे खच्चर मादा गर्भावस्था के दौरान मर सकती है मर जायेगी ।मादा खच्चर में जनन करने को परम आवश्यक मादा युग्मक अन्डाणु उत्पादन अंग अन्डाश्य नहीं होता जिससे उसमें नर गधे घोड़े के खच्चर के शुक्राणुओं से मिलन को स्वजातीय अंडाणु पैदा हो सकें । जिससे मादा खच्चर न घोड़े न गधे से जनन संबंध बना सकती है ।
पर मादा खच्चर हो या नर खच्चर दोनों में बरसात के मौसम /ऋतु में यौन उत्तेजना उत्पन्न होती है ।जिसके दौरान वे नर व मादा खच्चर आपस मेंं पहले बाद में गधों घोड़ो के ऊपर बैठने ,चढ़ने ,व उनको आगे चलने बढ़ने से रोकने के लिए उनके आगे खड़े हो जाते /अड़ जाते हैं ।आखिर तः उनमें भी तो जीवों की मूलक वंश वृद्धि भावना होती है।जिससे वे भी वंश वृद्धि कामना पूरक यौन क्रीड़ा व्यवहार करते हैं ।
यह विवरण मेरे निजी अनुभव पर आधारित है , मेरे घर के पास कुम्हार /प्रजाति जन रहते हैं वे गधे घोड़े खच्चर रखते हैं स्थान की कमी के कारण वे अपने गधे घोड़े खच्चर को अक्सर मेरे बाग में बाँध देते और खेतों में फसल न होने पर गधे घोड़े खच्चर को हमारे खेतों में चरने /घूमने को छोड़ देते थे ।
शेर और टाइगर के संकरण से बना लाईगर भी नपुंसक होता है प्रजनन के अयोग्य उसके शरीर का विशाल आकार इतना बड़ा और भारी हो जाता है कि शेर और टाइगर में उससे मिलने /मैथुन करने की हिम्मत नही बनती ।
इसे नेचर का आइसोलेशन रूल या जातियों की यौन शुचिता /पवित्रता का नियम कहते हैं ।जिसका मतलब है कि सभी जीवो की जातियों की शुचिता /पवित्रता बनी रहे ।सभी जातियाँ नियमित रूप से स्थिर स्थाई रहें ।
इस आईसोलेशन नियम को लेकर कर भंग करनेवाले /तोड़ने वाले ओं को न्यिओटोनिक पेन का सामना करना पड़ता है जिससे अक्सर मादा जीव को यौनिक पीड़ा होती है जिसमें अक्सर मादा जीव की मौत हो जाती है असामान्य यौन संबंध बन जाने के कारण ।। इस भय से प्रकृति /सृष्टि में सभी मादा जीव अपनी स्वजातीय नर से जनन संबंध बनाते हैं और सृष्टि चल रही है अपने आप ।
यह अमर्यादित संबंध पर एक एम्फिबियन जीव की जाति एक्सोलोटल से जीवनियोटोनिक पेन कन्सैप्ट आया है जिसमें आयोडीन की कमी से एक्सोलोटल एम्फिबियन के लार्वा /बच्चे बिना व्यस्क हुए उनके शरीर सामान्य से ज्यादा बड़े हो जाते हैं जो अपनी ही जाति को समस्या पैदा करते हैं यौंन संबंधों में ।परिणाम तः सामान्य मादाएं बड़े आकार वाले नर एक्सोलोटल से पीड़ित होती हैं उनसे मिलना मैथुन /संकरण करना पसंद नहीं करतीं वे उन स्वजातिय नर को विजातीय नर समझती हैं परन्तु बड़े आकार वाले नर उनसे स्वजातिय होने से बल पूर्वक यौन /जनन संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं ।इसअसामान्य बड़े शरीर के नर से यौन संबंध के दौरान मादाको पीड़ा का जो यौन संबंध बनाने में पीड़ा होती है उसे नियोटोनिक पेन ( असामान्य मिलन के दौरान यौनांग क्षेत्रीय पीड़ा ) कहते हैं ।जिस कारण से सामान्य मादाएं बड़े शरीर वाले नरों से बचती हैं दूर रहतीं हैं उनसे मिलन /संकरण उचित नहीं समझती हैं । और सामान्य नरों को बड़े आकार की एक्सोलोटल लार्वा मादा सफल मैथुन न कर पाने से बार बार मैथुन को प्रेरित करती हैं जिससे सामान्य नर असामान्य रूप से बड़ी मादा से पीड़ित /परेशान होते हैं /रहते हैं ।

क्या गर्भावस्था और माहवारी साथ-साथ हो सकते हैं?

यह प्रश्न यदि किसी कोरा पर महिला से पूछा जाता तो अच्छा विश्वासनिय जबाब मिलता ।अब कारणवश मेरे प्रोफाइल में आगया है तो इसका जबाब लिखना मेरी नैतिक जिम्मेदारी है।जीवविज्ञान पी.जी.टी.होने से मैं इसका पुस्तकीय जबाब लिख रहा हूँ ।
महावारी एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे महिलाओं में प्रति माह 28 दिन के अन्तराल पर महिलाओं के गर्भाशय की आन्तरिक शुद्धि/सफाई होती है ।इस प्रक्रिया में गर्भाशय के अन्दर की ऊपरी परत ऐन्डोमैट्रीयम स्तर की क्रियाशील कोशिकाएं गर्भ न ठहरने के कारण पुरानी पड़ने पर निष्क्रिय होजाती हैं ।जिससे महिलाओं में गर्भ धारण की क्षमता समाप्त हो जाती है ।महिला तब तक गर्भ धारण नहीं कर सकती जब तक उसके गर्भाशय में से यह पुराने महीने की कोशिकाओं की पुरानी पर्त नहीं हटकर गर्भाशय में से बाहर नहीं निकल जाती ।क्योंकि इस पर्त में पिछले /पुराने महीने की अनिषेचित अन्डाणु कोशिका चिपकी होती है ।जब तक गर्भाशय में पुराने महीने के अनिषेचित अन्डाणु कोशिका हो या निषेचित अन्डाणु कोशिका तब तक महिला की महावारी नारी धर्म की क्रिया रूकी रहेंगी ।
स्त्रियों में प्रत्येक माह गर्भधारण के लिए उसके दोनों अंडाशय ओं में से केवल एक अंडाशय से एक अन्डाणु गर्भाधान क्रिया के लिए गर्भाशय की ओर आता है ।जिससे स्त्रियां एक बार में एक बच्चा जनतीं हैं । अपवाद कारण कभी कभी दोनों अन्डाश्यों से दोनों अन्डाणु आ जाते हैं जिससे दो बच्चे एक साथ अलग अलग शक्ल सूरत के पैदा हो जाते हैं ।यह स्वाभाविक प्राकृतिक नारी गर्भ धारण क्रिया नहीं है ।
गर्भाश्य में अन्डाश्य से आये अन्डाणु का नर शुक्राणु से पूर्ण मिलन /निषेचन हो जाता है तो माहवारी पूर्ण रूप से रुक जाती है गर्भ ठहर जाता है ।परंतु यदि गर्भ नहीं ठहरा है तो तब तक गर्भ नहीं ठहरेगा जब तक स्त्री के गर्भाशय में से पुराना अनिषेचित अन्डाणु और नर के मृत शुक्राणु ओं अंश पूरी तरह से बाहर नहीं निकल जाता ।इसलिए महिलाओं में गर्भ धारण धर्म के लिए पिछले पुराने महीने के अनिषेचित अन्डाणु और मृत नर शुक्राणु ओं का गर्भाशय में से बाहर निकलना अत्यंत जरूरी है जिसके लिए महिलाओं के गर्भाशय की पूर्ण सफाई और उसका नवीनीकरण जरूरी है जिससे गर्भाशय में पुनः नया गर्भ धारण किया जा सके ।
महावारी मासिक नारी धर्म क्रियाओं का नियंत्रण दो नारी धर्म हार्मोन एस्ट्रोजन, प्रोजैसट्रोन रसायन ओं की मात्रा नियंत्रण पर निर्भर करता है ।एस्ट्रोजन से नारी शरीर का ताप सामान्य की तुलना में कुछ थोड़ा सा बढ़ता है । शरीर का ऊर्जा स्तर बढ़ जाता है ।नर के प्रति आकर्षण भाव उत्पन्न होने लगता है । शरीर में रक्त संचार बढ़ने से हल्का सा रक्त दाब बढ़ने से गर्भाशय की ओर विशेष रक्त संचार होता है ।और गर्भाशय में जमीं हुई पिछले पुराने महीने की ऊपरी परत की कोशिकाओं का स्तर उखड़ने लगता है जिस से। महिलाओं को महावारी के शुरू आत में किसी को हल्का कम या किसी को ज्यादा असहनीय दर्द होता है । कोशिकाओं की परत के उखड़ ने से गर्भाशय के अन्दर रक्त बहने लगता है जो योनि नाल से होता हुआ योनि द्वार से बाहर निकलता है । जिसे महिलाओं में माहवारी या मासिक योनि रक्त स्राव क्रिया कहते हैं । यह 3 -5दिन तक क्रिया चलती है वैसे इसका सामान्य काल 4दिन है जो महिला के शरीर में रक्त की मात्रा स्तर पर निर्भर है ।
गर्भधारण पश्चात शरीर में प्रोजैसट्रोन हार्मोन स्तर बढ़ने से महिलाओं के शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है।गर्भ शरीर में स्थिर स्थित हो जाता है। यदि गर्भ धारण ना हो तो अर्ध माह 14दिन बाद शरीर का ताप प्रोजैसट्रोन हार्मोन स्तर बढ़ने से सामान्य हो जाता है।शारीरिक ऊर्जा स्तर भी सामान्य होने लगता है।नर के प्रति आकर्षण भाव गिरने /कम होने लगता है ।
सामान्य तः यह नियम है कि महावारी पश्चात महिला के गर्भवती होने पर महावारी क्रिया रुक जाती है ।गर्भधारण और महावारी एक साथ नहीं चल सकतींं हैं ।यदि गर्भधारण के बाद महावारी लक्षण योनि से रक्त स्राव होता है तो गर्भपात हो जाता है ।स्थित गर्भस्थ शिशु समय से पहले गर्भाअवधि पूर्व गर्भाश्य से बाहर निकल कर योनि द्वार से बाहर निकल जाता है।यह दुर्घटना अक्सर गर्भधारण के शुरू के 3–4महीनों में आसानी से घट सकती है यदि गर्भ के प्रति जागरूक नहीं है तो, गर्भ स्थिति नियम सावधानी बरतने में गलती ?/भूल हो गई तो । 4महीने बाद यह दुर्घटना घटने के अवसर कम हो जाते हैं । कभी कभी गर्भवती स्त्री के गर्भ क्षेत्र में उदर के निचले भाग पेढ़ू में आघात लगने से, घात चोरी मारने चोट लगने से भी गर्भस्राव योनि मार्ग से रक्त आ जाता है । जो उचित समय पर उचित चिकित्सा से ठीक हो जाता है । इसको गर्भावस्था में माहवारी न समझा जाय । महावारी का विशेष लक्षण है रक्त का 3 - से 4 दिन आना ।
अब अपवाद या नियमहीनता की घटना का प्रमाण
कारणवश उस महिला का नाम नहीं लिया जा सकता है।वो जिन्दा नहीं है । एक दिन वह महिला किसी दूसरी महिला को अपना संस्मरण बता रही थी । कि उसका चौथा बच्चा गर्भ में था वह पेट से थी इस दौरान खुद उसे बच्चे के पैदा होने तक आठ माह तक लगातार माहवारी होती रही ।आठ बार माहवारी आयी वह हर बार माहवारी के समय घबरा /डर जाती थी कि गर्भपात हो जायेगा अबकी बार ,और इसी डर के चलते हुए उसको आठ महीने हो गए तब नौवें महींने में लड़का हुआ ।इस असामान्य अपवाद की घटना की चर्चा करते समय उसे मेरी मौजूदगी का ध्यान नहीं रहा बाद में जब मैं उसकी नजर आया, तब वह हँसकर बोली , . अये लोग तुम खड़े रये छुप कै हम लुगाइयों की बात सुनते रये इ बताऔ तुमनै का सुनौ ? तब मैंने अज्ञानी मुद्रा भाव बना कर कहा ,भावी मैंने कछु ना सुनौ । मेरौ ध्यान कहूँ और हौ मोय ना पतो तुम का बात कर रयी हीं ।
तब वह आश्वस्त हुई ,कि मैंने उसकी चर्चा नहीं सुनी थी ःसच बोलने से लड़ाई होने का डर जो था ।
अब महावारी के अपवाद की एक घटना ः इस पर किसी को भी विश्वास नहीं होगा ।हमारे कुल में एक शादी समारोह था जिसमें शामिल होने के लिए रिश्तेदार आये थे ,उन रिश्तेदार ओं में एक वृद्धा महिला 75 वर्ष से ज्यादा उम्र होगी उसे रजोनिवृत्ति30 वर्ष पूर्व होचुकी थी । उसे महावारी सूचक लक्षण बनने लगे बाद में उसे स्त्री रोग विशेषज्ञ को दिखाया गया तब उसका इस आसमयिक बिमारी से पीछा छुटा । तो भाई इस टोपिक पर इन बातों पर ज्यादा शंका सवाल मत करो । और ना ही ऐसे सवाल कोरा पर छोड़ा करो । ऐसी बातों की चर्चा समाज में खुले में करनेवाले की पिटाई होने की संभावना रहती है ।
गर्भधारण के साथ महावारी के बनने /पैदा होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है ।नारियों मेंं गर्भावस्था में महावारी नारी का एक विकार रोग है जो उसके अधिक तनाव में काम भावनाओं के बढ़ने से होता है हो सकता है तुमने भी कहीं से ऐसी घटना को सुनकर कोरा पर असामान्य प्रश्न डाला है ।जिसका असामान्य जबाबी संस्मरण मैंने भी लिख दिया है।इसकी सत्य ता विश्वास के परे है इसे सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र समाज में मत चर्चा करना। सार्वभौमिक सत्य समझने की गलती/भूल मत करना ।
एक और ऐसी असामान्य महावारी से जुड़ी घटना अपवाद
नियम यह है कि गर्भाधान /गर्भधारण महावारी के बाद ही होता है परंतु कुछ बच्चे /लोग ऐसे भी होते हैं जो बिना महावारी के पैदा हो जाते हैं इन बच्चों /लोगों को लामर कंस अंशी कहते हैं ,कंस का जन्म भी बिना महावारी के हुआ था ।ये अपवित्र आत्मा एं होती हैं जो महावारी के बिना हुए अशुद्ध गर्भाशय में आती हैं ।
ऐसे बच्चे प्रायः गर्भपात के बाद कभी कभी बिना महावारी के पैदा हो जाते हैं ये चंडाल स्वभाव के क्रूर कर्मा ,ऋण आवेशित होते हैं इन पर आकाशीय बिजली गिरने की संभावना ज्यादा रहती है ।इसमें मेरी अनुमति शामिल है । मेरे परिवार में से कईयों का वृत्तांत मुझे मालूम है ।जब भी बादलों में बिजली कड़कड़ाती है तो बादल इनके ऊपर ज्यादा समय रुकता है । वैसे मुझे यह लक्षण अनुवांशिक लगता है ।दुष्ट ता का लक्षण अनुवांशिक होता है जो बच्चों में उनके पितर वर्तमान में से आता है पर सभी में नहीं आता समान रूप से नहीं आता । अनुवांशिक ता 1से50% तक विश्वास योग्य हैअनूवाँशिकता 10%सत्य नहीं होती ।माँबाप के पूरे के पूरे 100%गुण लक्षण संतान में नहीं आते हैं ।आँशिक लक्षण आते हैं ।
यह प्रश्न भी गोपनीय है समाज में सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र में चर्चा करने योग्य नहीं है ।
तो इसका जबाब भी गोपनीय है ।
सार्वजनिक क्षेत्र में से चर्चा करने पर चर्चा करने वाला झूँठों में गिना जायेगा ।

मन की अनुपस्थिति के कुछ सबसे रोचक उदाहरण क्या हैं?

दुर्घटना ःः प्रत्येक दुर्घटना तभी संभव होती है जब मन दुर्घटना स्थल पर नहीं होता है ।मन के उचित स्थान पर होने पर ,दिमाग के सही तरीके से काम करने पर दुर्घटना की संभावना कम होती है । जब कोई प्रश्न को सुनने के बाद कहे इसे फिर से कहो तो इसका मतलब है कि उसका मन कहीं और था वह हमारी बात नहीं सुन रहा था ।

कुचला क्या होता है? इसे खाने से क्या हो सकता है?



कुचला एक पौधा है जिसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम Strychnos nuxvomica है जिसे नक्सवोमिका /नक्स के औषधीय व्यापारिक नाम से जानते हैं होमयोचिकित्सक , और आयुर्वेदिक चिकित्सक कुचला के नाम से जानते हैं । इसका पौधा एक मीटर तक लम्बा हो सकता है ,जिसकी पत्तियाँँ जामुन जैसी फूल नीले सफेद ,फल छोटा अमरूद जितना, जो पकने पर पीला हो जाता है।इस फल के अंदर 4 -5 बीज होते हैं गोलाकार लगभग 1इन्च के और 1–2 मिली मी ० मोटे इन बीजों के ऊपर लाल रंग का बीज आवरण होता है।
कुचला एक विषैले फल का बीज होता है जो विषैला होता है।जिससे होमयोचिकित्सक नक्सवोमिका दवाई बनाते हैं और आयुर्वेदिक चिकित्सक पक्षाघात, संधि वात और शरीर में गैस विकार, कृमिनाशक दवाएं बनाते हैं विषाक्त गुँण की तीव्रता को ध्यान रखते हुए। इस के विषैले पन के गुँण को विशेष औषधीय कर्म से न्यूनतम किया जाता है ।जिसे कुचला शोधन या कुचला मारण कहते हैं। मेरे चाचाजी और ससुरसाहब इस विधा के ज्ञाता थे वे अब मौजूद नहीं रहे नहीं तो मैं इसके शोधन की विधि कौ लिख देता ।अयुर्वेदचिकित्सा विधान में विष चिकित्सा सबसे अन्त में उपयोग किया जाता है ।जब रोग वैद्य के नियंत्रण में ना रहे ।तब विष चिकित्सा विकल्प को वैद्य काम में लेते हैं ।
कुचला एक जहरीले पौधे का फल होता है जिसे कुत्ता विष /डोग किलर्स के नाम से जाना जाता है । इइ फल की थोड़ी सी मात्रा भी कुत्ते को आसानी से मार देती है।
शारंगधर संहिता चिकित्सा ग्रंथ के अनुसार यह पितज प्रकृति का जहर होता है ( हीमोटोकसिक )जो रक्त संचालन तंत्र और पाचनतंत्र पर असर करता है यदि किसी ने भी इसे बिना शोधन किए इसके जहर अंश को मारे बिना खा लिया और वह पितज प्रकृति के शरीर वाला है तो उसका मरना तय है यदि वह वातज प्रकृति के शरीर का है तो उसकी चिकित्सा कठिन है मरने की संभावना ज्यादा है, यदि विष भक्षण कर्ता कफज शरीर का है तो उचित समय पर उचित चिकित्सा से उसका जीवन कठिनता से बच सकता है ।लिहाजा कुचला विष की बिना शोधन परीक्षण किये परीक्षा न ली जाय ।
कुचला विष को बिना शोधन किये नहीं खाया जाता है ।
कुचला विष एक ऊष्ण प्रकृति का विष है खाये जाने पर यह शरीर में गर्मी पैदा करता है ।उदर में छिपे कृमियों कौ मारता है ।परंतु इस को आयुर्वेदिक चिकित्सक के निर्देशन में खाया जाय । इसकी शोधित कुचला की भक्षय मात्रा एक दिन में एक चावल जितनी होती है जो रोग वेग अनुसार दो बार यानि आधा आधा चावल के परिमाण में व्यस्क 60किलो भार व्यक्ति की है ।यह बच्चों को निषेध है । वैद्य रोग वेग के अनुसार मात्रा में परिवर्तन कर सकते हैं।सामान्य व्यक्ति विष चिकित्सा करने का दुस्साहस /क्रूर कर्म न करें। अन्यथा विष चिकित्सा से रोगी का अहित होने पर उनके खिलाफ विष देकर मारने का केस बन जाता है ।

मेरे पास गाय है जिसका एक थन दो साल पहले व दूसरा एक साल पहले बंद हो गया, अब दो थन से दुध आता है। कुछ समय से आस पड़ोस की गायों में भी यह समस्या आ रही है। ये समस्या क्यों, कैसे आती है? क्या इसका कोई देशी व अन्य कोई इलाज है?

इस समस्या का कोई देशी या आयुर्वेदिक इलाज नहीं है मेरे पड़ोसी फूलसिंह ताउ जो गौताने थे पशुओं का देशी आयुर्वेदिक दवाओं से इलाज करते थे ।मैंने उनके साथ गाँव में कई ऐसे पशुओं के केस देखे थे ।जिनका इलाज सफल नहीं हुआ था।पशुओं के थन क्रमशः एक के बाद एक मरते जाते थे । अन्त में एक थन बचता था जिसमें अधिकतम दूध आता था लेकिन चार थनों की पूरी क्षमता से कम ,ऐसे में एक थन का आकार असामान्य रूप से बड़ा होजाता था तीन थन छोटे हो जाते थे ,दुधारू पशु देखने में भोंडा लगता था रोग की अन्तिम अवस्था में। . ऐन . टेढ़ा हो जाता था ।
( लगता है उस स्थान पर मिट्टी बैक्टीरिया /प्रोटोजोआ से संक्रमित हो गई है। जिससे लगता है यह पशुमहा रोग बन गया है ।)
उस टेढ़े ऐन वाले पशु को लोग अच्छा नहीं समझते । धनी लोग ऐसे टेढ़े ऐन वाले पशुओं को दूसरे निर्धन लोगों को मुफ्त में देदेते थे ।या फिर जंगलों में छोड़ देते थे ।
इस बिमारी को ताउ के शब्दों में थन मरना कहते हैं।
इस रोग में पशु के शरीर का ताप कम रहने लगता है जिसको सामान्य तौर से ऊँचा रखने के लिए करेला ,नीम ,चिरायता, पित्त पापड़ा ,जेब सामर्थ्य से जो उचित हो वह खिलाएं ।चारा में ज्वार गेहूं भूसा फिलर चारा तथा हर चारा खिलाएं । गलती /भूल से भी मक्का ,धान का ठंडा गुण वाला चारा न खिलाएं । यह रोग गरीब लोगों को असाध्य है परंतु आज इस रोग का इलाज संभव है। यह एक बैक्टीरिया /प्रोटोजोआ का संक्रमण है ।जिसके मौजूदगी से पशु के थनों में सिस्ट बन जाती हैं गाँठें पड़ जाती हैं जो दूध के मार्ग को रोकने लगती हैं अन्ततः आखिर में दूध मार्ग को पूरी तरह से रोक देती हैं । इस की उचित एलोपैथिक चिकित्सा उपलब्ध है एन्टीबायोटिक दवाओं से पूरा इलाज होता है। कृपया आलस्य न करें ।पशु की ऐलोपैथिक चिकित्सक से चिकित्सा करायें जो पूर्ण प्रशिक्षित पशु चिकित्सक बी. वी . एस . सी . की बेसिक डिग्री वाला उच्च शिक्षित हो ।
बाजार में पशुथनों में दूध की ब्लौकेज खोलने की आज होम्योपैथी क दवाईयाँ भी उपलब्ध हैं ।अच्छे प्रशिक्षित होम्योपैथिक चिकित्सक से संपर्क करें ।

यदि किसी लड़की के कुंडली में निम्न मंगल दोष है और लड़के की कुंडली में कोई मंगल दोष नहीं है, तो स्थिति से निपटने के लिए क्या उपाय हैं?

साधारणतः निम्न मंगली दोष विचारणीय नहीं होता । यदि उच्च घर में 1 - 6 तक मंगल उच्च दशा में उत्तम युति श्रेष्ठ ग्रह चंद्र शुक्र गुरु के साथ है विग्रही युति में है ।परंतु निम्न घर 7–12 तक में मंगल नीच दशा में आने पर ग्रह स्थिति अनुसार नीचा प्रभाव हीन पड़ने लगता है जो उत्तम युति में थोड़ा सा प्रभाव हीन होता है परंतु नींच ग्रहों की युति इसके दुष्ट और क्रूर प्रभाव को बढ़ाया करती है । जैसे राहु के सानिध्य में दुष्ट वार्ता कर्म से लड़ाई युद्ध परिस्थितियों को पैदा करके पराजय करा देना ,केतु के सानिध्य में पराक्रम हीन करके पिटवा मरवा देना , शनि सानिध्य में गलत विवेक पैदा करके सीधे सीधे युद्ध परिस्थितियों को पैदा करके सम्मुख विरोधी को निर्दोष होते हुए मारवा कर अपमान अपयश अकारण मिलना या युद्ध भय से विवेक हीन करके जातक को आत्महत्या के विचार बनने से जातक का आत्महत्या करना या जेल में बंद जीवन बिताते हैं।पर 8 वें 12 वें में मंगल दोष उच्च हो या निम्न जातक तो क्या जातक के परिवार को भी अपमान अपयश भोगना पड़ता है ।
मंगल दोष का मेरे विचार से कोई निदान /इलाज नहीं है । यह जीव के दिमाग की नैचुरल सैटिंग है । यदि आप इसका निराकरण करना चाहते हैं तो रत्न राशि ग्रह दोष के चक्कर में ना पड़ें ,हो सके तो मंगल दूषित जातक को समय समय पर श्रेष्ठ उत्तम शिक्षा दिलायें मर्यादा पालन मर्यादा हीनता विवेक अच्छी तरह सिखायें । समस्त लड़ाई झगड़े उपद्रव इसी लाईन से उत्पन्न होते हैं । जातक का जीवन देवता . मर्यादा पुरुषोत्तम राम . को अपनायें और झगड़ालू टंटे खोरा देवताओं के अपनाने पूजन से बचें ।जिससे बुद्धि निर्मल बने । राम नाम का जाप करें फुर्सत के समय और रामपरिवार का रामदरबार का अधिकतम दर्शन करते रहें ।
मेरी पुत्री भी श्रेष्ठ अष्टम भाव से मंगली दोष युक्त है लेकिन रामभक्ति के प्रभाव से मैं स्वयं भी बच जाता हूँ और मेरा परिवार भी बच जाता है सिर्फ और सिर्फ झगड़ा उत्पन्न होने पर मर्यादा पालन और मर्यादा हीनता की अक्सर चर्चा वार्ता विवेचना करते रहने से ।दूसरा मंगल दोष का निराकरण है मंगली जातक की कुंडली अनुसार निम्न मंगली की निम्न श्रेष्ठ मंगली से शादी ,या उच्च मंगली की उच्च श्रेष्ठ मंगली से शादी ।
परंतु किसी भी सूरत में दुष्ट क्रूर मंगली से शादी की सोच मंगली जातक पर मंगली जातक के परिवार पर भयंकर आपदाएं लाता है । परिवार के हित के लिए भले मंगली जातक की शादी उत्तम विजातीय से कर दो ।या फिर क्रूर दुष्ट मंगली जातक अंतरराष्ट्रीय अंतर्जातीय विवाह करे उसका विरोध मत करो । बरहाल हरहाल में मंगली जातक के बुरे प्रभाव से खुद को परिवार को बचाओ ।या फिर बेहतर होगा उसका परिवार त्याग करे लेकिन दुष्ट क्रूर मंगली की आग में परिवार को न झोंके ।