कुचला एक पौधा है जिसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम Strychnos nuxvomica है जिसे नक्सवोमिका /नक्स के औषधीय व्यापारिक नाम से जानते हैं होमयोचिकित्सक , और आयुर्वेदिक चिकित्सक कुचला के नाम से जानते हैं । इसका पौधा एक मीटर तक लम्बा हो सकता है ,जिसकी पत्तियाँँ जामुन जैसी फूल नीले सफेद ,फल छोटा अमरूद जितना, जो पकने पर पीला हो जाता है।इस फल के अंदर 4 -5 बीज होते हैं गोलाकार लगभग 1इन्च के और 1–2 मिली मी ० मोटे इन बीजों के ऊपर लाल रंग का बीज आवरण होता है।
कुचला एक विषैले फल का बीज होता है जो विषैला होता है।जिससे होमयोचिकित्सक नक्सवोमिका दवाई बनाते हैं और आयुर्वेदिक चिकित्सक पक्षाघात, संधि वात और शरीर में गैस विकार, कृमिनाशक दवाएं बनाते हैं विषाक्त गुँण की तीव्रता को ध्यान रखते हुए। इस के विषैले पन के गुँण को विशेष औषधीय कर्म से न्यूनतम किया जाता है ।जिसे कुचला शोधन या कुचला मारण कहते हैं। मेरे चाचाजी और ससुरसाहब इस विधा के ज्ञाता थे वे अब मौजूद नहीं रहे नहीं तो मैं इसके शोधन की विधि कौ लिख देता ।अयुर्वेदचिकित्सा विधान में विष चिकित्सा सबसे अन्त में उपयोग किया जाता है ।जब रोग वैद्य के नियंत्रण में ना रहे ।तब विष चिकित्सा विकल्प को वैद्य काम में लेते हैं ।
कुचला एक जहरीले पौधे का फल होता है जिसे कुत्ता विष /डोग किलर्स के नाम से जाना जाता है । इइ फल की थोड़ी सी मात्रा भी कुत्ते को आसानी से मार देती है।
शारंगधर संहिता चिकित्सा ग्रंथ के अनुसार यह पितज प्रकृति का जहर होता है ( हीमोटोकसिक )जो रक्त संचालन तंत्र और पाचनतंत्र पर असर करता है यदि किसी ने भी इसे बिना शोधन किए इसके जहर अंश को मारे बिना खा लिया और वह पितज प्रकृति के शरीर वाला है तो उसका मरना तय है यदि वह वातज प्रकृति के शरीर का है तो उसकी चिकित्सा कठिन है मरने की संभावना ज्यादा है, यदि विष भक्षण कर्ता कफज शरीर का है तो उचित समय पर उचित चिकित्सा से उसका जीवन कठिनता से बच सकता है ।लिहाजा कुचला विष की बिना शोधन परीक्षण किये परीक्षा न ली जाय ।
कुचला विष को बिना शोधन किये नहीं खाया जाता है ।
कुचला विष एक ऊष्ण प्रकृति का विष है खाये जाने पर यह शरीर में गर्मी पैदा करता है ।उदर में छिपे कृमियों कौ मारता है ।परंतु इस को आयुर्वेदिक चिकित्सक के निर्देशन में खाया जाय । इसकी शोधित कुचला की भक्षय मात्रा एक दिन में एक चावल जितनी होती है जो रोग वेग अनुसार दो बार यानि आधा आधा चावल के परिमाण में व्यस्क 60किलो भार व्यक्ति की है ।यह बच्चों को निषेध है । वैद्य रोग वेग के अनुसार मात्रा में परिवर्तन कर सकते हैं।सामान्य व्यक्ति विष चिकित्सा करने का दुस्साहस /क्रूर कर्म न करें। अन्यथा विष चिकित्सा से रोगी का अहित होने पर उनके खिलाफ विष देकर मारने का केस बन जाता है ।
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