मैं पेशेवर ज्योतिषी नहीं हूँ जो लिखा वह मेरा निजी अनुभव अध्ययन सहित था जो परिवार रिश्तेदार के विवरण ओं पर आधारित है ।
राहु कल्पना शीलता गुण का देवता है ।जिसकी स्थिति मुख दंत कैनाईन में है । राहु का जीवविज्ञान राहु माने सिर केतु माने धड़ अर्थात माँसाहारी जीव बड़ा सिर बड़ा मुँह बड़े कैनाईन दाँत राक्षस वृत्ति सूचक राहु प्रधान जातक लक्षण है केतु प्रधान जातक का सिर छोटा मुँह छोटा, कैनाईन/कृतंक छोटे शाकाहारी वृति लक्षण है ।तो राहु केतु के ज्योतिष जंजाल में मत पड़ो यह अर्ध सत्य 50/प्रति शत अंदाजे बयाँ करता है । नये विचारों से नया दिमाग बनाओ । आवश्यक गुण लक्षण युक्त अर्धांगिनी का चुनाव करो मिल जाय तो बेझिझक शादी करो ।पत्नी के भाव भावनाओं को प्राथमिकता दो । आपके सुखी वैवाहिक जीवन का यही रहस्य है ।
विप्र वर्णा कन्या मुँह से माँगने में समझदारी है ,रत्न वर्णि कन्या माँगना तो क्या धन देकर लेने में समझदारी है ,सेवक वर्णा की सेवा का लाभ लो ,वैश्य वर्णा से धन का अभाव नहीं रहेगा ,क्षत्रप वर्णा की रक्षा की चिंता नहीं करनी पड़ेगी । अच्छाई खोजो पत्नी में ग्रहस्थ जीवन अच्छा बनेगा । यदि पत्नी में पत्नी पक्ष में कमी ढूँढ़ने की गलती /जुर्रत की , तोअच्छी से अच्छी श्रेष्ठ कन्या से कुल से विवाह सबंध बनने के बाद भी आपका वैवाहिक जीवन परेशानियों से भरा रहेगा । ज्योतिष की कम समझदारी की जरूरत ज्यादा है । यही जीवन सूत्र है
राहु जन्मकुण्डली के चौथे भाव में स्वग्रही होने पर श्रेष्ठ फल देता है ।बाकी सभी जगह हर ग्रह की चाल बढ़ा कर उसे भगा,दौड़ कर उसकि दिशा दशा दोनों खराब कर देता है ।इसका शादी से विशेष संबंध नहीं है शादी के ग्रह सूर्य उद्यमिता रोजगार चंद्रमा प्यार मंगल पत्नी रक्षा नियंत्रण गुरु ज्ञान शुक्र भोग शनि विवेक अरण /इन्द्र प्रभाव आदि हैं।
राहु केतु दोनों योनि ऊर्जा के स्वामी सेवक संचालक हैं ।अब ऊर्जा विधान का अध्ययन जिससे जीवो का जीवन चलता रूकता है।शरीर में 8मुख्य चक्र हैं जिनमें 7की चर्चा होती है 7फेरे का विधान है।परंतु 6चक्र विवेचन योग्य है जिनमें 3चक्र निचे के स्त्री के बलवान होते हैं और 3चक्र ऊपर के पुरुषों के बलवान होते हैं ।7तवाँ चक्र प्राण दोनों का आधा आधा अलग अलग हो ता है इस सप्तचक्रों के मिलान के विधान को विवाह कहते हैं ।
अरस्तू ने बताया ःः…मनुष्य एक जटिल तम प्राणी /पशु है । इस ज्ञय्पति के अनुसार हर मनुष्य के भीतर एक गुप्त रूप से पशु छिपा होता है जिसे उसका योनि कहते हैं ।ज्योतिष शास्त्र में यह योनि सर्ग में लिखे होते हैं जिनका संख्या कम है पर उनके आधार पर मनुष्य ओं के जोड़े में योनि दोष का विचार किया जाता है । शत्रु योनि, मित्र योनि सम योनि, विषम योनि आदि का विचार किया जाता है ।
पं राधेश्याम भट्ट के अनुसार ब्राह्मण में नाड़ी (रक्त &मैटाबॉलिज्म सिस्टम )क्षत्रिय में वर्ण (ओज रंग )वैश्य में गण (मैत्री मित्र मंडली व्यवहार ) शूद्र में योनि (शरीर गुण लक्षण )विशेष विचारणीय है परन्तु मेरे विचार से योनि प्रथम नाड़ी द्वितीय वर्ण तृतीय गण चतुर्थ क्रम पर होना चाहिए । इसमें वंश कुल जाति धर्म का विशेष प्रथक वर्णन की आवश्यकता नहीं है ,इसे सभी के लिए अच्छा समझा जाय ।यह सभी जनों के हितार्थ लिखा है ।सभी जनो को उत्तम वंश वृद्धि , समझदार पत्नी की कामना /इच्छा होती है ।
मित्र आपकी समस्या पढ़ी मालूम पड़ा आप नारी असहयोग से पीड़ित हो इसका हल ज्योतिष में नहीं कामसूत्रम् ज्ञान से है इसके लिए वैंकटेश्वर स्टीम प्रैस वालों का कामसूत्रम् ग्रंथ से रति कर्म चरण /सोपान सानिध्यम् स्पर्शम आलिंगनम चुम्बनम मुद्रा प्रहारणम नख दंत उपयोगम संवेशनम संतुष्टिम पुरुषायतम ज्ञान पढ़े चरक संहिता लाहौर प्रैस का पूर्वाअर्ध भाग से योनि भेद जीव भाव पढ़ो 500–700रूपये लगेंगे यह सोदा समस्या कोरा से मुफ्त में हल नहीं होगा ।
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