जीवन में प्रगति आक्रमक रवैया , सक्रियता , विस्तारवादी सोच पर निर्भर है या रक्षण निष्क्रियता और संकुचनवाद पर निर्भर है !

मनुष्य के जीवन में प्रगति उसकी सोच के रवैया पर निर्भर करती है यदि मनुष्य का आक्रामक  व्यवहार आक्रमणकारी रवैया / सोच सक्रियता विस्तारवादी सोच के नर विचारों  की अधिकता है ।उसका जीवन ऊर्जा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक उच्च   स्तर  ह । तो ऐसे में उसकी प्रगति संघर्ष शील सोचविचार से  आसान होती है । परंतु यदि उसमें रक्षण  निष्क्रियता अल्प सक्रियता जैसा रवैया और संकुचन वादी सोच है।उसका बौद्धिक शारीरिक ऊर्जा स्तर सामान्य या सामान्य से कम है । तो उसकी प्रगति के संभावना कम ही है।

संस्कृति जैविक नियम निर्धारण पद्धति क्या है और कितने प्रकार की होती है ?

प्रत्येक संस्कृति के चार आधार नियम हैं । 
गायन ( शब्द आधार )
 वादन  ( ध्वनि आधार )
 नृतन ( जीव चेष्टाएँ ) 
परिवर्तन ( मर्यादा शीलता :नियम बद्धता राम आचारी , मर्यादा हीनता :नियम अवस्था स्थिति दृश्यता अदृश्यता आभाष कृष्ण आचारी  )
जो नियम का आधार नीति , नियम स्थिति , नियम संचालन , नियम में परिवर्तन ,( रीति ) नियम से समस्या तथा समस्या निवारण ( कुरीति ) नियमों का स्थायित्व ( अनीति ) 
प्रत्येक क्षेत्र में दो प्रकार की संस्कृति समाज नियम पाये जाते हैं
 निर्माण प्रधान नियम नारी प्रधान नियम संस्कृति  (लेने पर आधारित है)
विनाश प्रधान नियम नर प्रधान नियम संस्कृति ( देने पर आधारित है ) 

त्रिकालदर्शी किसे कहते हैं और क्यों

जो व्यक्ति टाइम ट्रेवल आर्ट साइंस जानता है। वह समय के चारों आयामों में से 3 आयामों में वर्तमान काल ,भूतकाल ,भविष्य काल मैं दर्शन की क्षमता सीख जाता है । अर्थात वह इन तीनों तरह के समय में योग वशिष्ठ के अनुसार आ जा सकता है। परंतु मन का चौथा आयाम जिससे गुप्त काल भी कहा जाता है जिसमें मनुष्य प्राणी का मान मरने के बाद शरीर के इंतजार की प्रतीक्षा में विश्राम करता है ऐसे गुप्त काल में टाइम ट्रैवलर्स व्यक्ति त्रिकालदर्शी व्यक्ति नहीं पहुंच पाता है। इसमें केवल मनुष्य का अवचेतन मन ही जा पाता है ।। उसमें त्रिकालदर्शी व्यक्ति के आने जाने की सामर्थ नहीं रहती है ऐसा विचित्र को तू वही मनुष्य कर   सकता है । जिसका अपने मन की सभी प्रकार की चैतन्य अचैतन्य अवचेतन और सुपर चेतन अवस्था में आने जाने की स्थिति पर अपनी इच्छा से नियंत्रण कर लेता है। वही व्यक्ति त्रिकालदर्शी या टाइम ट्रैवलर बन सकता है । यह मन की निर्मल अवस्था कही जाती है जिसमें मन की गति को रोकने वाला कोई भी किसी भी तरह का भावनात्मक , वासन आत्मक कामनात्मक बाधा मन की गति को नहीं रोक पाती है और मन की गति कालचक्र के तीनों आयामों में आबाध /निर्बाध रूप से होने लगती है।

हमारा मन कभी-कभी इतना कमजोर क्यों पड़ जाता है कि हम चाह कर भी किसी को आसानी से अपनी जिंदगी से नहीं निकाल पाते

जिन लोगों की वीडियो ऑडियो दिमाग में बार-बार कई बारअधिक मात्रा में  डल चुकी है। तो उन लोगों की स्मृति चित्रों की अधिकता के आधार पर हमारा मन उन लोगों के अनुसार उनकी प्रियता मानक को अधिक मानते हुए उनके अनुसार बार बार उनकी रूचि के अनुसार उन्हीं का हितकारी कार्य करने को बाध्य हो जाता है । जैसे यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे प्रिय या अप्रिय मनुष्य के फोटो वीडियो की अपने मन में  3 से 5 लाख मात्रा तक फोटो चित्रों को अपने दिमाग में संचित कर लेता है। तो उसका मन उस पुरुष और स्त्री के प्रति दास स्वभाव अनिवार्यता धारण कर लेता है ।उनके अप्रिय दुष्ट भाव को सहन करना उसकी मजबूरी सी बन जाती है । वह जलील करता रहता है वह जलील होता रहता है उसके दुष्ट स्वभाव को सहन करता रहता है । ऐसे में उस मनुष्य से भले ही हमारी पहली मित्रता रही हो , पूर्व में मित्र भाव रहा हो ,, परंतु बाद में समय परिवर्तन होने पर उसकी मनोवृति में शत्रु भाव आ जाने पर भी हम उसे उसके पूर्व के पूर्व के बुरे प्रभाव को अपने मन मस्तिष्क से नहीं निकाल पाते हैं । हम चाहते हैं कि वह हमें बार-बार पीटता रहे और हम उस से मार खा खा कर हनी खा खा कर खुश होते हैं ऐसी मूर्खतापूर्ण दिमाग की सेटिंग हो जाती है।
         हमारा मन बार-बार उसकी संवेदनशीलता से प्रभावित होने से उसके पूर्व के संवेदनशीलता के कोने में जाकर अटक जाता है ।  हमारा मन  उस  शत्रु भावनात्मक व्यक्ति के  प्रति संवेदनशीलता का भाव बनाकर अपनी प्रतिक्रिया करता है । ऐसे में उस बदले हुए स्त्री पुरुष की दुष्टता हमें महसूस नहीं होती । उसके दुष्कर्म कुकृत्य भी हमें सदकृत्य सुकृत्य नजर आते हैं । हम ऐसे लोगों से बार-बार हनि उठाते रहते हैं । इन्हें अपने जीवन से नहीं निकाल पाते हैं । अपमानित नुकसान होते रहने पर भी हम उन्हें नहीं छोड़ पाते ।  इसका दूसरा कारण हमारे माता-पिता के द्वारा हमारी की गई गलत परवरिश शिक्षा है । जिसमें वे अब प्रिय शत्रु भाव धारी दोस्त रिश्तेदार लोगों को हमारे अवचेतन मन में हीरो वर्सेस सिस्टम से बिठा देते हैं ।कि वे हमारे परम हितकारी आराध्य पूज्य भगवान के समान हैं । हमारे आफ ईश्वर हैं । वे हमारी लाईफ लाईन को रोककर हमें संकटग्रस्त कर सकते हैं ।  हम मानसिक रूप से उनके गुलाम हो जाते हैं और उनके बिना जीना हमारी कल्पना से परे चला जाता है । 
           हम ऐसे दोस्त रिश्तों के संचालक   लोगों से बार-बार हानि उठाकर भी उनसे अपने संबंध बनाए रहते हैं ।  जिनके माता-पिता अपने बलवान शत्रु या दोस्त रिश्तेदार मित्र के मानसिक गुलाम रहे हो तो उनकी संतान भी अपने माता पिता की देखा देखी उनके प्रति मानसिक दासता भाव अपनान लगती है । ऐसे में उन जागरूक माता पिता का कर्तव्य है कि अपनी संतान को पूर्व में मित्र रहे लोगों के बदलकर शत्रु भाव अपनाने पर उन परिवर्तित मधुर्भाव धारी शतरूपा वाले मित्रों के बारे अपने बच्चों को  परिचित कराएं । अपने बच्चों में हीरो वर्सेस सिस्टम बदलने की शिक्षा डालें । जैसे यदि कोई हमारा पूर्व में मित्र है तो वह कभी तक मित्र है जब तक वह हमारा हितकारी है यदि उसके भाव बदलकर वह हमारे प्रति दुष्ट भाव  अपना लेता है । हमारा नुकसान करने लगता है बार-बार हमें जलील करता है हमारे प्रति कमीनापन अपनाता है । तो हमें अपनी संतान को उसके प्रति बताते हुए सतर्क कर देना चाहिए कि वह ऐसे रिश्तेदार मित्र और संबंधी से दूर रहें ।। 
    उन परिवर्तित हुए वर्तमान में शत्रु भाव ले चुके , पूर्व में रहे मित्र लोगों के प्रति भी हमें अपने मन के अंदर उनकी प्रिय कृत्य को भुलाकर कर मुक्त फिल्म के बारे में सुबह शाम संध्याकाल में उचित मानस पटल भाव चित्रण को देखते हुए बदलते रहना चाहिए । समय के अनुसार ऐसा नहीं है कि जो व्यक्ति वर्तमान में शत्रु भावना रहा है तो ऐसे हम उसके पूर्व का मित्र भाग स्मरण करें । उसे क्षमा करते रहें अपितु इसके लिए जरूरी है कि यदि वह वर्तमान में शत्रु भाव अपना चुका है तो हम भी उसके शत्रु भाव का अपने मन में चित्रण करें । तभी हमारा मन उसे शत्रु भाव में धारण करेगा ।  हम तभी उसे अपने उज्जवल भविष्य के लिए बचने की तरह तरह की युक्तियां सोच पाएंगे । यदि हम अपने मानसिक चित्रण फिल्म को नहीं चलाती बदलते देखते हैं । तो ऐसे में वह हमें पूर्व में डाले हुए प्रिय मानसिक चित्र उस व्यक्ति के प्रति सहानुभूति युक्त सद्भावना व्यवहार करने को बाध्य रखते हैं । जिन्हें वह हमारी विनम्रता या कमजोरी समझता है । जिससे हम फिर से उसकी और अधिक दुष्टता का शिकार होते हैं ।
      ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जो लोग हमारे प्रति विरोधी भावना रहे हैं दोस्त अपना रहे हैं हम भी उनकी बुरी छवि को अपने मन में स्थान देने लगे उनकी पुरानी अच्छी छवि को मन से निकाल दें या कम करें इससे हमारे उनके प्रति शत्रु भाव से हमारे प्रति व्रत बहाव अपनाकर हम उससे बचने का प्रयास करेंगे यदि हम उनके प्रति शत्रुता के बदले मित्रता भाव रखते हुए हैं तो इसे वे हमारी कमजोरी समझेंगे और अपनी शत्रुता आचरण की डिस्क्रिप्टिव से हमें बराबर परेशान करते रहेंगे ।

सौ साल निरोग जीवन के क्या नियम हैं ?

सभी जीव का जीवन और निरोगी काया इस बात /नियम पर निर्भर करती है कि जीव ने अपने जीवन में अपने लिए निर्धारित समय और समय के अनुसार निर्धारित ब्रह्माण्ड से मिलीं जीव काया ऊर्जा  कार्य ऊर्जा का कैसे उपयोग सदउपयोग दुर्उपयोग किया । यदि वह अपने जीवन के लिए ब्रह्माण्ड से मिली ऊर्जा का सदुपयोग किया करता है तो निसंदेह 100साल या अधिक समय जीवन जिया करता है । यदि वह अपने जीवन के लिए मिली जैविक विचार और कार्य करने के लिए मिली ब्रह्माण्ड ऊर्जा का दुरुपयोग किया करता है तो 100 साल और 50 साल के मध्य में अपना जीवन अपनी हिकमत तिकारत के अनुसार 60, 70,80,90 -100साल जिया करता है । जीव को जन्म लेने के बाद अपना जीवन खुशहाल समृद्धि योजना से जीने के लिए आजकल की शिक्षा में ऊर्जा दुर्उपयोग सिखाया जाता है जिससे जीव अपना जीवन सौ साल से पहले पूरा करके दुनिया में से चला जाता है।
ऊर्जा के उत्पत्ति :-  नियम 
लाँ  आफ थर्मोडायनामिक्स ( आक्सीकरण, अपचयन)
लाँ आफ इनर्जी ट्रांसफर (चालन,संवहन, विकिरण )
लाँ आफ इनर्जी फिक्सिंग ( मैटाबोलाईट रुपान्तरण ) फोटोसिंथेसिस )
     जीव को निजदृष्टिकोण से निजी जीवन के क्षेत्र में उपलब्ध ऊर्जा उपयोग का ज्ञान होना चाहिए 

मानव समाज में अलिखित नियम क्या है जिन्हें सभी को जानना चाहिए

भी आपराधिक कृत्य जो एक मनुष्य के द्वारा उसके निजी हित में किए जाते हैं जिससे उसका निजी  विकास निर्धारित होता है , परंतु उन आपराधिक कृत्यों के कारण मनुष्य के समाज के परिवार के दूसरे लोगों की दुर्गति होती है,,  पतन होता है । वह उस मनुष्य का एक निजी अपराधी कृत्य ए लिखित मानव निजी संविधान होता है। जब इन अपराधी ए लिखित कृतियों को मानव समाज के विशेष पुरुष महापुरुष करने लगते हैं। तो यह अलिखित नियम सामाजिक नियम रीति-रिवाजों सामाजिक परंपराओं में बदल जाते हैं।।  जो अल्पसंख्यक अपराधी लोगों के द्वारा प्रत्यय कर क्रियाकलाप के रूप में आरंभ में किए जाते हैं उन कर्मों को अपराधी लोग अपने विकास के लिए करते हैं,  परंतु उन कर्मों के करने से समाज का दूसरे  परिवार का पतन कहा जाता है अपराधी कृत अभी तक अलिखित हैं ।जब तक वह लिखे नहीं जाते ,या दूसरे लोगों के द्वारा समझे नहीं जाते हैं । तब तक वे  सर्वमान्य नहीं हो पाते या उनकी लिखित में संवैधानिक समीक्षा नहीं होती है । जब वह अपराधी कृत्य लिख दिए जाते हैं अखबारों में छप जाते हैं उनकी मानव समाज में संवैधानिक चर्चा होने लगती है । वह समाज में अखबारों के द्वारा चर्चा का मुद्दा बनने लगते हैं । स्कूलों में चर्चाएं जाने लगते हैं । फिर वह अलिखित सामाजिक नियम अलिखे सामाजिक नियम नहीं कहे जाते । अलिखित सामाजिक नियम नहीं रहते अपितु लिखित सामाजिक सामूहिक संविधान नियम कहे जाते हैं व्यवहार में अपराधी कृत्य लिखित निजी या सामूहिक सामाजिक नियम परंपराएं पहले भले ही अलिखित रहे हों परन्तु बाद में मानव समाज हित कानूनों की निर्माणी संस्था संसद या नरइष्टका  में परंतु अपराध के इन एलिखित नियमों के लिए अपराध दंड संवैधानिक रूप से लिखित संविधान कहा जाता है । ऐसा विचित्र क्रियाकलाप आदिकाल से समाज में चला आ रहा है । लिखित नियम तुनै और अलिखित नियम मुनैः जिससे भदेश भाषा में तूने मुन्ने कायदा कहते हैं । वर्तमान में भी इस अपराध कृत्य की समाज में गहरी जड़ें जमी हुई हैं । अलिखित सामाजिक नियमों को समझना परम आवश्यक है जो लोग इन नियमों को समझ जाते हैं वही अपना और अपने परिवार का विकास कर पाते हैं । वही अपनी प्राण रक्षा परिवार की प्राण रक्षा करने में समर्थ हो जाते हैं और अपराधियों के बुरे कृपया कृतियों से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा करने में समर्थ हो पाते हैं।

यह मानव समाज सभ्यता संस्कृति प्राय लिखित मानव समाज समूह नियम संविधान से रुकी हुई है परंतु अलिखित नियमों से चल रही है । मानव समाज समूह सभ्यता संस्कृति की एक अलग पहचान संग रहने का विधान संविधान है । जो समाज में नीति प्रधान ग्रंथ कहा जाता है ।।  यह संविधान अनेक प्रकार के होते हैं लिखित संविधान , अलिखित संविधान , लोकतांत्रिक संविधान , अलोकतांत्रिक /राजतंत्र संविधान , धर्मनिरपेक्ष संविधान (सैक्यूलरिज्म/सरकुर ) संविधान ,  धर्म सापेक्ष संविधान , इनमें वर्तमान समय में शिक्षित सभ्य समाज में लिखित संविधान का नियम आज पूरे विश्व में सार्वजनिक है ।। 
   परंतु जिस क्षेत्र के लोग अशिक्षित होते हैं जहां कबीलाई संस्कृति होती है वहां लिखित संविधान       काम नहीं करते अर्थात ऐसे अशिक्षित लोगों के कबीलाई समाज अलिखित संविधान के द्वारा संचालित होते हैं अलिखित संविधान में रीति कुरीति अनीति की प्रधानता होती इसमें नीतियां नाम मात्र को होती हैं।
      जब इन सामाजिक न्याय सत्यता नीति नियमों की पारदर्शिता सत्यता में परिवर्तन अपने मानक स्तर से अत्यधिक हो जाता है जिससे उस मानव समूह समाज के सभी बुद्धिजीवी ,फुद्दीजीवी , देहजीवी ,भ्रष्टाचारीयों प्रकार के लोगों को उस मानव तंत्र में सम्मिलित होकर रहने में असुविधा होती है । तो ऐसे चतुर चालाक चालबाज लोग अपने जीवन के हित के लिए अपनी वंशिका वंशावली के हित के लिए उसी पूर्व समाज में रहते हुए अपने हित के लिए नए-नए गोपनीय नियम रचने बनाने लगते हैं ।   गुप्त रूप से गुप्त गोपनीय नियमों को अलिखित नियम कहते हैं यह अलिखित नियम :: समाज में रीति कुरीति अनीति के रूप में पाए जाते हैं , किसी भी समाज में व्याप्त रीति कुरीति अनीति से अपने निजी जीवन को अपने बुद्धि कौशल के द्वारा मानव तंत्र में छलिया पनपुर तरीके से जीवन जीने को भ्रष्टाचार अभिचार कहा जाता है ।
  मानव के बौद्धिक विकास की संभावनाओं को देखते हुए अभी तक कोई भी ऐसा संविधान लिखित रूप में अचल अटल दीर्घकालिक सभी मनुष्यों के लिए नहीं बन सका है , जो सभी मनुष्यों की आवश्यकता के अनुसार हो सभी मनुष्यों के सभी समूह समाज को नियंत्रित करने में समर्थ हो ,,  ऐसा पूर्णकालिक संविधान एक मानव सामान्य समूह समाज के लिए बनाना असंभव है क्योंकि प्रकृति में परिवर्तन का नियम शाश्वत है ।  परिवर्तन के नियम के कारण नित नई जीवन पद्धतियां उत्पन्न होती हैं जिनके अनुसार नित नई संस्कृतियों बनती हैं । जिससे समय-समय पर पुरानी संस्कृतियों को नई संस्कृति नई सभ्यता के लोग नष्ट कर दिया करते हैं ।। अपने अपने तरीके से कुछ उग्र हिंसा के द्वारा तो कुछ मंद हिंसा जैसे शिक्षा में परिवर्तन करके धर्मांतरण परिवर्तन करके तरह-तरह के तरीकों से लोग दूसरे लोगों का मत मति परिवर्तन करते रहते हैं ।। इस प्रकार से यह कहना असंभव है कि अलिखित संविधान कितना बड़ा है कितनी इसकी सीमा है इसके बारे में कुछ भी बात कही नहीं असंभव लगती है परंतु फिर भी जो लोग व्यापक अध्ययन करते हैं वह    अलिखित नियमों के बारे में काफी हद तक जान जाते हैं ।
       इसी बात को देखते हुए मैं कुछ ग्रंथों का संदर्भ देना उचित समझता हूं।  यदि किसी को इन अलिखित  नियमों की पूरी  जानकारी चाहिए , तो वह भी कम पड़ जाएगी । इसके लिए विशाल विस्तार अध्ययन की आवश्यकता होगी । परंतु फिर भी पाठकों की सुविधा  की दृष्टि को देखते हुए मैं कुछ देसी विदेशी साहित्य की पुस्तकों के विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं । जिनको पढ़कर काफी हद तक  झंडाधारी नियमों के बारे में जानकारी प्राप्त करके वे  मानव शिरोमणि लोग अपने जीवन में काफी हद तक इन संविधान जनित समस्याएं और मानव जनित समस्याओं को अपने विशेष ज्ञान से कम कर सकते हैं । जैसे वे यह संस्कृत भाषा में 108 उपनिषद संस्कृत भाषा में अनुवाद है , 16 भारतीय दर्शन संस्कृत भाषा में , तीन ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण , गोपथ ब्राह्मण , महा ब्राह्मण सभी संस्कृत में ,   पंचतंत्र संस्कृत भाषा में अनुवाद , भरत हरी शतक संस्कृत भाषा , चरक संहिता संस्कृत भाषा , अनुवाद लाहौर वाला , मनु स्मृति संस्कृत भाषा अनुवाद राजस्थान प्रकाशन व अन्य भारतीय स्मृति ग्रंथ संग्रह इसी की श्रेणी में आते हैं।
 इसके अलावा  विदेशी भाषाओं की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद की पुस्तकें भारत में उपलब्ध हैं जैसे रॉबर्ट ग्रीन की शक्ति के 48 नियम , डेल कार्नेगी की लोक व्यवहार , चिंता छोड़ो सुख से जियो , रोमेश शर्मा की अपनी आत्मा की शक्ति को पहचाने , भिखारी जिसने फेरारी बेच दी ,  राबर्ट किओसाकी  की रिच डैड पुअर डैड , स्टीफन कवि की आठवीं आदत ,  सात प्रभावशाली लोगों की मुख्य आदतें इन पुस्तकों को पढ़कर भी काफी हद तक अलिखित नियमों के बारे में जाना जा सकता है।
    जो भी व्यक्ति अपना बौद्धिक विकास करना चाहते हैं या संसार में धूर्त धुरंधरों कुर्रम लोगों  से  उत्पन्न समस्याओं के दुखों को कम करना चाहते हैं । उनको यह सभी पुस्तकें तो पढ़नी ही पड़ेंगे इन सभी पुस्तकों को मैं पढ़ चुका हूं । इसके अलावा उनको अब अलग से भी अपने लिए अपने हित के अनुसार विविध प्रकार की पुस्तकें पढ़नी होंगी , तब जाकर विशेष  विद्वान पुरुषों की संगत मेँ जाकर    अलिखित समाज नियमों की विशेष विस्तार में जानकारी प्राप्त हो पाएगी ।  परंतु अंततः वह भी संक्षिप्त ही रह जाएगी । क्योंकि ज्ञान का दायरा मनुष्य की बुद्धि से असीम है परिवर्तन के नियम से ।
  यह है अलिखित सामाजिक नियम सभी धर्म संस्कृति में चल रहे हैं । 
    जो लोग इन बिना लिखे नियमों को समझ जाते हैं उनके जीवन में संघर्ष की मात्रा कम हो जाती है वही जीवन में अधिकतम तरक्की कर पाते हैं ।  यह बिना लिखे नियम कुछ इस प्रकार से समझे जा सकते हैं जैसे प्रत्येक देश में संविधान में शादी के नियम हैं। परंतु शादी के बाद कहीं पर भी यौन - संतुष्टि के बारे में कोई नियम साहित्य पूर्णतया सार्वजनिक रूप से सत्य प्रमाणित उपलब्ध नहीं है । ऐसे में जो लोग इस अपरिचित  अलिखित मस्तराम की यौन शिक्षा से पढ़कर यौन शिक्षा में अशिक्षित रह जाते हैं । वह अपने जीवन में यौन समस्याओं को लेकर परेशान रहते हैं । परंतु जिन लोगों को थोड़ी सी यौन शिक्षा टूटी फूटी कहीं से भी मिल जाती है वह अपने यौनसमस्या ग्रस्त जीवन को एंजॉय करते हैं । परंतु जिन लोगों को योग शिक्षा नाम मात्र की भी नहीं मिलती है ऐसे में भी योन अशिक्षित स्त्री पुरुष यौन आनंद की तलाश में तलाक दर तलाक के गलत निर्णय लेकर अनेक शादियां करते चले जाते हैं । अनेक स्त्री पुरुषों से पुरुष स्त्रियों से संबंध बनाते चले जाते हैं । परंतु उन्हें कहीं पर भी यौन संतुष्टि आसानी से उपलब्ध नहीं होती है । अपितु उनके ऐसे गलत निर्णय के कारण उनके घर में मानव संतति आबादी बढ़ती चली जाती है । वह फिर भी यौन आनंद से दूर दुखी जीवन जिया करते हैं । ऐसे अनेकों अलिखित नियम मानव समाज नियमों की जानकारी एंथ्रोपोलॉजी में जूलॉजी में सायकोलॉजी में और एनिमल बिहेवियर में विशेष रुप से मिल सकती है। इसके लिए पाठकों को अपना निजी अध्ययन का दायरा बड़ा करना होगा तब जाकर वे समाज के    अलिखित नियमों के बारे में जानकारी प्राप्त कर पाएंगे। 

लोग बीमार होकर क्यों मरते हैं

बीमारी और स्वास्थ्य का रहस्य कुछ शब्दों में निहित है जैसे बायोइलेक्ट्रिसिटी जीवो के शरीर में मौजूद विद्युत ऊर्जा ! बायो मैग्नेटिक ! जीवो के शरीर की चुंबक के द्वारा ब्रह्मांड के वाहय ऊर्जा अंणुओं जैविक वृहदाकार अंणु लधुआकार अंणु   {माइक्रो, मैगा मौलिक्यूल }   को एकत्रित करके अपने शरीर को बढ़ाने की जैविक प्रवृत्ति © , शरीर को नियमित रूप से स्थिर करने का प्रयास ! स्थिरीकरण ऊर्जा /स्थितिज ऊर्जा गतिज और स्थितिज ऊर्जा को नियंत्रित सक्रिय अवस्था में रखने वाले ऊर्जा अणु  ताप का उत्पादन ! रूल्स ऑफ थर्मोडायनेमिक्स !  का ज्ञान होना आवश्यक है। सभी जीव अपने दैनिक कार्यों के दौरान  सक्रियता के कारण अपनी निजी ऊर्जा को गति के दौरान खोते रहते हैं । परंतु अपने को स्थिर स्थाई अवस्था में लाने के लिए सभी जीव स्थिर स्थाई अवस्था में जीने के लिए स्थितिज ऊर्जा की इच्छा रखते हैं । 
             परंतु कुछ वाहय सूक्ष्मजीव ऐसे भी हैं जो जीवो के ना गति करने पर भी उनके शरीर मैं घुसकर उनके शरीर को संगठित करने वाले जैविक अणु को उनके  तोड़कर शरीर से हटाते रहते हैं इन्हें हम लोग रोगजनक  सूक्ष्म जीव कहते हैं । जो बाहय सूक्ष्म जीव बड़े जीवों के शरीरों  को नष्ट करते रहते हैं ।उन्हें हम रोगजनक जी्व कहते हैं । यह वाहय जगत के बड़े जीवो के शरीर में घुसकर उनके विभिन्न प्रकार के ऊर्जा अणुओं को तोड़ कर खाकर ऊर्जा प्राप्त करते रहते हैं जिससे बड़े शरीर वाले जीवों की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का अनुपातिक तारतम्य खराब हो जाता है और बड़े जीव रुग्ण अवस्था कार्य की क्षमता हीन  अवस्था में आ जाते हैं जिन्हें हम बीमार कहते हैं ।
      इसके अलावा मनुष्य का व्यर्थ मानसिक चिंतन भी  ऊर्जा की समस्या उत्पन्न करता रहता है । ऊर्जा भी एक प्रकार के  ऊष्मा / फोटाँन  कंण है जो  चिंतन मनन करने की प्रक्रिया में विचार में परिवर्तित होकर /  बदल कर विचार से शब्द चित्र और वीडियो के रूप में बदल कर शरीर की अस्थायी भूतिक अवस्था में अक्सर प्रकटन से दृश्य विलुप्ति करण से अदृश्य होते रहते हैं । जिनके कारण  फिल्म कल्पनाओं में बदल कर साकार निराकार की अवस्था में आकर जी्व को दृश्य अदृश्य स्थिर अस्थिर की स्वप्न ,कल्पना, जैविक दृश्यों की   भ्रमित अवस्था में करते रहते हैं । जो निरंतर अपघटित होकर छोटे बड़े होते रहते हैं । संगठित होकर बढ़ते रहते हैं । इस प्रकार ऊर्जा के अपघटन की प्रक्रिया से बृहदाकार अंणु निरंतर टूट टूट कर सूक्ष्मता से नष्ट हो जाते हैं ।  तो  छोटे छोटे कंण निरंतर संगठित होकर बड़े वृहदाकार जैविक कंणोंं में बदल कर शरीर का आकर बढ़ाते   चले जाते हैं 
     इस प्रकार से ऊर्जा के सूक्ष्म कणों के द्वारा निरंतर संगठित होकर बड़े आकार के जैविक अणु बनते हैं । जो जीवो के शरीर का निर्माण करते हैं । परंतु जब  ऊर्जा के कण  अप घटितहोकर छोटे होने लगते हैं । यह वृहद जैविक अणु जो कि बड़े आकार थे के थे निरंतर अटघठित होकर छोटे होने लगते हैं या नष्ट होने लगते हैं । ऐसे में जीवो के शरीर से यह शरीर को संगठित करके बढ़ाने वाले वृहदाकार अणु  आयु और रोग के अनुरूप घटते चले जाते हैं जिससे जीवो का शरीर निरंतर छोटा होने लगता है । जब जीवो का शरीर बड़े से छोटा होता है तो जीव को ऊर्जा की कमी से जीवन जीने में समस्या महसूस होती है । जिससे रोग कहा जाता है । यह जीव की रोग अवस्था ह  जिस में आने पर जी्व को पीड़ा का अनुभव होती है । जीव अक्षमता भी महसूस करता है । उससे अपना जीवन जीने के लिए उसके निजी आवश्यक जैविक कार्य भी उससे नहीं हो पाते हैं। इसके अलावा जी्व के अन्य जैविक क्रियाकलप भी हैं जिनमें ऊर्जा कंण अपने आप भी नष्ट होती रहती है गतिज ऊर्जा की कमी उत्पन्न करता है जिससे जीवो का शरीर घटने लगता है बुढ़ापा आने लगता है । 
      मेंटेनेंस अवस्था जिसमें रूल आफ थर्मोडायनामिक्स के अनुसार शरीर भी कई प्रकार के जैविक कार्य करने के दौरान विभिन्न प्रकार की ऊर्जा अणुओं को खोते पाते रहते हैं जिससे शरीर में  गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग स्थिर साम्य बना रहता है । जब तक जीवो के शरीर की ऊर्जा मेंटेनेंस स्थिति बरकरार है जीव का शरीर  स्वास्थ्य अवस्था में रहता है ।  जब मेंटेनेंस की स्थिति बिगड़ने लगती है ऐसे में जीव का शरीर बिगड़ने लगता है उसके शरीर के ऊपर जमे हुए बड़े आकार के जैविक अणु कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिनस के जो जैविक अणु  उसके जैविक चुंबकत्व खराब होने के कारण उसके शरीर में जमे हुए थे वह उखड़ने लगते हैं। ःजिससे जीव पीड़ा महसूस करता है । जीव के शरीर को जीने में जैविक ऊर्जा की कमी पड़ जाती है । जीव के शरीर का ताप गिर जाता है जैसे ही जीव के शरीर का जैविक ताप गिरना शुरू होता है उसका जैविक चुंबक जैविक विद्युत का प्रमाण घट जाता है । उसके शरीर में मौजूद छिपे हुए बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं और उसके शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपना पोषण करने लगते हैं। इस प्रकार से प्रत्येक जीव का शरीर का अस्तित्व उसकी जैविक विद्युत और जेब चुंबकत्व , जैविक ताप थर्मोडायनामिक्स के गुण पर निर्भर करता है । परंतु यह जैविक विद्युत और जैव चुंबकत्व भी उस जीव के निजी विचार अवस्था मानसिक चुंबकत्व वासना ( पूरक आपूर्ति भाव संस्कार )  कामना ( करने योग्य आवश्यक कर्म )  भाव प्रभाव अभाव स्वभाव आदि से जीव के मंन की दीर्घकालिक स्थिर अवस्था खुशी विचलित अवस्था दुख के कारण पर निर्भर करती है ।  
  जीवो के शरीर की एनर्जी मेंटेनेंस जीवो के शरीर तरह तरह के संक्रमण के द्वारा प्रभावित होते रहते हैं जिससे उनके उपयोगी जैविक अंणु उनके शरीर से दूर जाते रहते हैं शरीर छोड़कर हट जाते हैं दूसरे जीव उसके शरीर उपयोगी अणुओं को अपने शरीर में जोड़ने के लिए दूसरे जीवो के शरीर के जैविक अंणुओं का भक्षण करते हैं । इस प्रकार का विचित्र कृत्य वे विभिन्न कार्य के दौरान  ऊर्जा व्यय होने पर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए  करते हैं । उस उर्जा के पूर्ति वह दूसरे जीवो के शरीर को खाकर करते हैं । यदि क्षय ऊर्जा अंणु  और भक्षण ऊर्जा अंणुओं दोनों का अनुपात समान है तो जीवो का शरीर स्वस्थ अवस्था में रहता है । यदि क्षय ऊर्जा अंणुओं परिमाण बढ़ जाता है भक्ष्य ऊर्जा अंणुओं का परिमाण घट जाता है तो  जीवो के शरीर की जैविक क्षमता उनके आवश्यक जैविक कार्य करने के लिएकम हो जाती है । जीव बीमार रहने लगते हैं । इस प्रकार से बक्श उर्जा अनु और 6 उर्जा अणुओं का अनुपात ही जीवो के स्थिर स्वास्थ्य या चलित स्वास्थ्य की पहचान है।