मानव समाज में अलिखित नियम क्या है जिन्हें सभी को जानना चाहिए

भी आपराधिक कृत्य जो एक मनुष्य के द्वारा उसके निजी हित में किए जाते हैं जिससे उसका निजी  विकास निर्धारित होता है , परंतु उन आपराधिक कृत्यों के कारण मनुष्य के समाज के परिवार के दूसरे लोगों की दुर्गति होती है,,  पतन होता है । वह उस मनुष्य का एक निजी अपराधी कृत्य ए लिखित मानव निजी संविधान होता है। जब इन अपराधी ए लिखित कृतियों को मानव समाज के विशेष पुरुष महापुरुष करने लगते हैं। तो यह अलिखित नियम सामाजिक नियम रीति-रिवाजों सामाजिक परंपराओं में बदल जाते हैं।।  जो अल्पसंख्यक अपराधी लोगों के द्वारा प्रत्यय कर क्रियाकलाप के रूप में आरंभ में किए जाते हैं उन कर्मों को अपराधी लोग अपने विकास के लिए करते हैं,  परंतु उन कर्मों के करने से समाज का दूसरे  परिवार का पतन कहा जाता है अपराधी कृत अभी तक अलिखित हैं ।जब तक वह लिखे नहीं जाते ,या दूसरे लोगों के द्वारा समझे नहीं जाते हैं । तब तक वे  सर्वमान्य नहीं हो पाते या उनकी लिखित में संवैधानिक समीक्षा नहीं होती है । जब वह अपराधी कृत्य लिख दिए जाते हैं अखबारों में छप जाते हैं उनकी मानव समाज में संवैधानिक चर्चा होने लगती है । वह समाज में अखबारों के द्वारा चर्चा का मुद्दा बनने लगते हैं । स्कूलों में चर्चाएं जाने लगते हैं । फिर वह अलिखित सामाजिक नियम अलिखे सामाजिक नियम नहीं कहे जाते । अलिखित सामाजिक नियम नहीं रहते अपितु लिखित सामाजिक सामूहिक संविधान नियम कहे जाते हैं व्यवहार में अपराधी कृत्य लिखित निजी या सामूहिक सामाजिक नियम परंपराएं पहले भले ही अलिखित रहे हों परन्तु बाद में मानव समाज हित कानूनों की निर्माणी संस्था संसद या नरइष्टका  में परंतु अपराध के इन एलिखित नियमों के लिए अपराध दंड संवैधानिक रूप से लिखित संविधान कहा जाता है । ऐसा विचित्र क्रियाकलाप आदिकाल से समाज में चला आ रहा है । लिखित नियम तुनै और अलिखित नियम मुनैः जिससे भदेश भाषा में तूने मुन्ने कायदा कहते हैं । वर्तमान में भी इस अपराध कृत्य की समाज में गहरी जड़ें जमी हुई हैं । अलिखित सामाजिक नियमों को समझना परम आवश्यक है जो लोग इन नियमों को समझ जाते हैं वही अपना और अपने परिवार का विकास कर पाते हैं । वही अपनी प्राण रक्षा परिवार की प्राण रक्षा करने में समर्थ हो जाते हैं और अपराधियों के बुरे कृपया कृतियों से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा करने में समर्थ हो पाते हैं।

यह मानव समाज सभ्यता संस्कृति प्राय लिखित मानव समाज समूह नियम संविधान से रुकी हुई है परंतु अलिखित नियमों से चल रही है । मानव समाज समूह सभ्यता संस्कृति की एक अलग पहचान संग रहने का विधान संविधान है । जो समाज में नीति प्रधान ग्रंथ कहा जाता है ।।  यह संविधान अनेक प्रकार के होते हैं लिखित संविधान , अलिखित संविधान , लोकतांत्रिक संविधान , अलोकतांत्रिक /राजतंत्र संविधान , धर्मनिरपेक्ष संविधान (सैक्यूलरिज्म/सरकुर ) संविधान ,  धर्म सापेक्ष संविधान , इनमें वर्तमान समय में शिक्षित सभ्य समाज में लिखित संविधान का नियम आज पूरे विश्व में सार्वजनिक है ।। 
   परंतु जिस क्षेत्र के लोग अशिक्षित होते हैं जहां कबीलाई संस्कृति होती है वहां लिखित संविधान       काम नहीं करते अर्थात ऐसे अशिक्षित लोगों के कबीलाई समाज अलिखित संविधान के द्वारा संचालित होते हैं अलिखित संविधान में रीति कुरीति अनीति की प्रधानता होती इसमें नीतियां नाम मात्र को होती हैं।
      जब इन सामाजिक न्याय सत्यता नीति नियमों की पारदर्शिता सत्यता में परिवर्तन अपने मानक स्तर से अत्यधिक हो जाता है जिससे उस मानव समूह समाज के सभी बुद्धिजीवी ,फुद्दीजीवी , देहजीवी ,भ्रष्टाचारीयों प्रकार के लोगों को उस मानव तंत्र में सम्मिलित होकर रहने में असुविधा होती है । तो ऐसे चतुर चालाक चालबाज लोग अपने जीवन के हित के लिए अपनी वंशिका वंशावली के हित के लिए उसी पूर्व समाज में रहते हुए अपने हित के लिए नए-नए गोपनीय नियम रचने बनाने लगते हैं ।   गुप्त रूप से गुप्त गोपनीय नियमों को अलिखित नियम कहते हैं यह अलिखित नियम :: समाज में रीति कुरीति अनीति के रूप में पाए जाते हैं , किसी भी समाज में व्याप्त रीति कुरीति अनीति से अपने निजी जीवन को अपने बुद्धि कौशल के द्वारा मानव तंत्र में छलिया पनपुर तरीके से जीवन जीने को भ्रष्टाचार अभिचार कहा जाता है ।
  मानव के बौद्धिक विकास की संभावनाओं को देखते हुए अभी तक कोई भी ऐसा संविधान लिखित रूप में अचल अटल दीर्घकालिक सभी मनुष्यों के लिए नहीं बन सका है , जो सभी मनुष्यों की आवश्यकता के अनुसार हो सभी मनुष्यों के सभी समूह समाज को नियंत्रित करने में समर्थ हो ,,  ऐसा पूर्णकालिक संविधान एक मानव सामान्य समूह समाज के लिए बनाना असंभव है क्योंकि प्रकृति में परिवर्तन का नियम शाश्वत है ।  परिवर्तन के नियम के कारण नित नई जीवन पद्धतियां उत्पन्न होती हैं जिनके अनुसार नित नई संस्कृतियों बनती हैं । जिससे समय-समय पर पुरानी संस्कृतियों को नई संस्कृति नई सभ्यता के लोग नष्ट कर दिया करते हैं ।। अपने अपने तरीके से कुछ उग्र हिंसा के द्वारा तो कुछ मंद हिंसा जैसे शिक्षा में परिवर्तन करके धर्मांतरण परिवर्तन करके तरह-तरह के तरीकों से लोग दूसरे लोगों का मत मति परिवर्तन करते रहते हैं ।। इस प्रकार से यह कहना असंभव है कि अलिखित संविधान कितना बड़ा है कितनी इसकी सीमा है इसके बारे में कुछ भी बात कही नहीं असंभव लगती है परंतु फिर भी जो लोग व्यापक अध्ययन करते हैं वह    अलिखित नियमों के बारे में काफी हद तक जान जाते हैं ।
       इसी बात को देखते हुए मैं कुछ ग्रंथों का संदर्भ देना उचित समझता हूं।  यदि किसी को इन अलिखित  नियमों की पूरी  जानकारी चाहिए , तो वह भी कम पड़ जाएगी । इसके लिए विशाल विस्तार अध्ययन की आवश्यकता होगी । परंतु फिर भी पाठकों की सुविधा  की दृष्टि को देखते हुए मैं कुछ देसी विदेशी साहित्य की पुस्तकों के विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं । जिनको पढ़कर काफी हद तक  झंडाधारी नियमों के बारे में जानकारी प्राप्त करके वे  मानव शिरोमणि लोग अपने जीवन में काफी हद तक इन संविधान जनित समस्याएं और मानव जनित समस्याओं को अपने विशेष ज्ञान से कम कर सकते हैं । जैसे वे यह संस्कृत भाषा में 108 उपनिषद संस्कृत भाषा में अनुवाद है , 16 भारतीय दर्शन संस्कृत भाषा में , तीन ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण , गोपथ ब्राह्मण , महा ब्राह्मण सभी संस्कृत में ,   पंचतंत्र संस्कृत भाषा में अनुवाद , भरत हरी शतक संस्कृत भाषा , चरक संहिता संस्कृत भाषा , अनुवाद लाहौर वाला , मनु स्मृति संस्कृत भाषा अनुवाद राजस्थान प्रकाशन व अन्य भारतीय स्मृति ग्रंथ संग्रह इसी की श्रेणी में आते हैं।
 इसके अलावा  विदेशी भाषाओं की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद की पुस्तकें भारत में उपलब्ध हैं जैसे रॉबर्ट ग्रीन की शक्ति के 48 नियम , डेल कार्नेगी की लोक व्यवहार , चिंता छोड़ो सुख से जियो , रोमेश शर्मा की अपनी आत्मा की शक्ति को पहचाने , भिखारी जिसने फेरारी बेच दी ,  राबर्ट किओसाकी  की रिच डैड पुअर डैड , स्टीफन कवि की आठवीं आदत ,  सात प्रभावशाली लोगों की मुख्य आदतें इन पुस्तकों को पढ़कर भी काफी हद तक अलिखित नियमों के बारे में जाना जा सकता है।
    जो भी व्यक्ति अपना बौद्धिक विकास करना चाहते हैं या संसार में धूर्त धुरंधरों कुर्रम लोगों  से  उत्पन्न समस्याओं के दुखों को कम करना चाहते हैं । उनको यह सभी पुस्तकें तो पढ़नी ही पड़ेंगे इन सभी पुस्तकों को मैं पढ़ चुका हूं । इसके अलावा उनको अब अलग से भी अपने लिए अपने हित के अनुसार विविध प्रकार की पुस्तकें पढ़नी होंगी , तब जाकर विशेष  विद्वान पुरुषों की संगत मेँ जाकर    अलिखित समाज नियमों की विशेष विस्तार में जानकारी प्राप्त हो पाएगी ।  परंतु अंततः वह भी संक्षिप्त ही रह जाएगी । क्योंकि ज्ञान का दायरा मनुष्य की बुद्धि से असीम है परिवर्तन के नियम से ।
  यह है अलिखित सामाजिक नियम सभी धर्म संस्कृति में चल रहे हैं । 
    जो लोग इन बिना लिखे नियमों को समझ जाते हैं उनके जीवन में संघर्ष की मात्रा कम हो जाती है वही जीवन में अधिकतम तरक्की कर पाते हैं ।  यह बिना लिखे नियम कुछ इस प्रकार से समझे जा सकते हैं जैसे प्रत्येक देश में संविधान में शादी के नियम हैं। परंतु शादी के बाद कहीं पर भी यौन - संतुष्टि के बारे में कोई नियम साहित्य पूर्णतया सार्वजनिक रूप से सत्य प्रमाणित उपलब्ध नहीं है । ऐसे में जो लोग इस अपरिचित  अलिखित मस्तराम की यौन शिक्षा से पढ़कर यौन शिक्षा में अशिक्षित रह जाते हैं । वह अपने जीवन में यौन समस्याओं को लेकर परेशान रहते हैं । परंतु जिन लोगों को थोड़ी सी यौन शिक्षा टूटी फूटी कहीं से भी मिल जाती है वह अपने यौनसमस्या ग्रस्त जीवन को एंजॉय करते हैं । परंतु जिन लोगों को योग शिक्षा नाम मात्र की भी नहीं मिलती है ऐसे में भी योन अशिक्षित स्त्री पुरुष यौन आनंद की तलाश में तलाक दर तलाक के गलत निर्णय लेकर अनेक शादियां करते चले जाते हैं । अनेक स्त्री पुरुषों से पुरुष स्त्रियों से संबंध बनाते चले जाते हैं । परंतु उन्हें कहीं पर भी यौन संतुष्टि आसानी से उपलब्ध नहीं होती है । अपितु उनके ऐसे गलत निर्णय के कारण उनके घर में मानव संतति आबादी बढ़ती चली जाती है । वह फिर भी यौन आनंद से दूर दुखी जीवन जिया करते हैं । ऐसे अनेकों अलिखित नियम मानव समाज नियमों की जानकारी एंथ्रोपोलॉजी में जूलॉजी में सायकोलॉजी में और एनिमल बिहेवियर में विशेष रुप से मिल सकती है। इसके लिए पाठकों को अपना निजी अध्ययन का दायरा बड़ा करना होगा तब जाकर वे समाज के    अलिखित नियमों के बारे में जानकारी प्राप्त कर पाएंगे। 

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