लोग बीमार होकर क्यों मरते हैं

बीमारी और स्वास्थ्य का रहस्य कुछ शब्दों में निहित है जैसे बायोइलेक्ट्रिसिटी जीवो के शरीर में मौजूद विद्युत ऊर्जा ! बायो मैग्नेटिक ! जीवो के शरीर की चुंबक के द्वारा ब्रह्मांड के वाहय ऊर्जा अंणुओं जैविक वृहदाकार अंणु लधुआकार अंणु   {माइक्रो, मैगा मौलिक्यूल }   को एकत्रित करके अपने शरीर को बढ़ाने की जैविक प्रवृत्ति © , शरीर को नियमित रूप से स्थिर करने का प्रयास ! स्थिरीकरण ऊर्जा /स्थितिज ऊर्जा गतिज और स्थितिज ऊर्जा को नियंत्रित सक्रिय अवस्था में रखने वाले ऊर्जा अणु  ताप का उत्पादन ! रूल्स ऑफ थर्मोडायनेमिक्स !  का ज्ञान होना आवश्यक है। सभी जीव अपने दैनिक कार्यों के दौरान  सक्रियता के कारण अपनी निजी ऊर्जा को गति के दौरान खोते रहते हैं । परंतु अपने को स्थिर स्थाई अवस्था में लाने के लिए सभी जीव स्थिर स्थाई अवस्था में जीने के लिए स्थितिज ऊर्जा की इच्छा रखते हैं । 
             परंतु कुछ वाहय सूक्ष्मजीव ऐसे भी हैं जो जीवो के ना गति करने पर भी उनके शरीर मैं घुसकर उनके शरीर को संगठित करने वाले जैविक अणु को उनके  तोड़कर शरीर से हटाते रहते हैं इन्हें हम लोग रोगजनक  सूक्ष्म जीव कहते हैं । जो बाहय सूक्ष्म जीव बड़े जीवों के शरीरों  को नष्ट करते रहते हैं ।उन्हें हम रोगजनक जी्व कहते हैं । यह वाहय जगत के बड़े जीवो के शरीर में घुसकर उनके विभिन्न प्रकार के ऊर्जा अणुओं को तोड़ कर खाकर ऊर्जा प्राप्त करते रहते हैं जिससे बड़े शरीर वाले जीवों की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का अनुपातिक तारतम्य खराब हो जाता है और बड़े जीव रुग्ण अवस्था कार्य की क्षमता हीन  अवस्था में आ जाते हैं जिन्हें हम बीमार कहते हैं ।
      इसके अलावा मनुष्य का व्यर्थ मानसिक चिंतन भी  ऊर्जा की समस्या उत्पन्न करता रहता है । ऊर्जा भी एक प्रकार के  ऊष्मा / फोटाँन  कंण है जो  चिंतन मनन करने की प्रक्रिया में विचार में परिवर्तित होकर /  बदल कर विचार से शब्द चित्र और वीडियो के रूप में बदल कर शरीर की अस्थायी भूतिक अवस्था में अक्सर प्रकटन से दृश्य विलुप्ति करण से अदृश्य होते रहते हैं । जिनके कारण  फिल्म कल्पनाओं में बदल कर साकार निराकार की अवस्था में आकर जी्व को दृश्य अदृश्य स्थिर अस्थिर की स्वप्न ,कल्पना, जैविक दृश्यों की   भ्रमित अवस्था में करते रहते हैं । जो निरंतर अपघटित होकर छोटे बड़े होते रहते हैं । संगठित होकर बढ़ते रहते हैं । इस प्रकार ऊर्जा के अपघटन की प्रक्रिया से बृहदाकार अंणु निरंतर टूट टूट कर सूक्ष्मता से नष्ट हो जाते हैं ।  तो  छोटे छोटे कंण निरंतर संगठित होकर बड़े वृहदाकार जैविक कंणोंं में बदल कर शरीर का आकर बढ़ाते   चले जाते हैं 
     इस प्रकार से ऊर्जा के सूक्ष्म कणों के द्वारा निरंतर संगठित होकर बड़े आकार के जैविक अणु बनते हैं । जो जीवो के शरीर का निर्माण करते हैं । परंतु जब  ऊर्जा के कण  अप घटितहोकर छोटे होने लगते हैं । यह वृहद जैविक अणु जो कि बड़े आकार थे के थे निरंतर अटघठित होकर छोटे होने लगते हैं या नष्ट होने लगते हैं । ऐसे में जीवो के शरीर से यह शरीर को संगठित करके बढ़ाने वाले वृहदाकार अणु  आयु और रोग के अनुरूप घटते चले जाते हैं जिससे जीवो का शरीर निरंतर छोटा होने लगता है । जब जीवो का शरीर बड़े से छोटा होता है तो जीव को ऊर्जा की कमी से जीवन जीने में समस्या महसूस होती है । जिससे रोग कहा जाता है । यह जीव की रोग अवस्था ह  जिस में आने पर जी्व को पीड़ा का अनुभव होती है । जीव अक्षमता भी महसूस करता है । उससे अपना जीवन जीने के लिए उसके निजी आवश्यक जैविक कार्य भी उससे नहीं हो पाते हैं। इसके अलावा जी्व के अन्य जैविक क्रियाकलप भी हैं जिनमें ऊर्जा कंण अपने आप भी नष्ट होती रहती है गतिज ऊर्जा की कमी उत्पन्न करता है जिससे जीवो का शरीर घटने लगता है बुढ़ापा आने लगता है । 
      मेंटेनेंस अवस्था जिसमें रूल आफ थर्मोडायनामिक्स के अनुसार शरीर भी कई प्रकार के जैविक कार्य करने के दौरान विभिन्न प्रकार की ऊर्जा अणुओं को खोते पाते रहते हैं जिससे शरीर में  गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग स्थिर साम्य बना रहता है । जब तक जीवो के शरीर की ऊर्जा मेंटेनेंस स्थिति बरकरार है जीव का शरीर  स्वास्थ्य अवस्था में रहता है ।  जब मेंटेनेंस की स्थिति बिगड़ने लगती है ऐसे में जीव का शरीर बिगड़ने लगता है उसके शरीर के ऊपर जमे हुए बड़े आकार के जैविक अणु कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिनस के जो जैविक अणु  उसके जैविक चुंबकत्व खराब होने के कारण उसके शरीर में जमे हुए थे वह उखड़ने लगते हैं। ःजिससे जीव पीड़ा महसूस करता है । जीव के शरीर को जीने में जैविक ऊर्जा की कमी पड़ जाती है । जीव के शरीर का ताप गिर जाता है जैसे ही जीव के शरीर का जैविक ताप गिरना शुरू होता है उसका जैविक चुंबक जैविक विद्युत का प्रमाण घट जाता है । उसके शरीर में मौजूद छिपे हुए बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं और उसके शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपना पोषण करने लगते हैं। इस प्रकार से प्रत्येक जीव का शरीर का अस्तित्व उसकी जैविक विद्युत और जेब चुंबकत्व , जैविक ताप थर्मोडायनामिक्स के गुण पर निर्भर करता है । परंतु यह जैविक विद्युत और जैव चुंबकत्व भी उस जीव के निजी विचार अवस्था मानसिक चुंबकत्व वासना ( पूरक आपूर्ति भाव संस्कार )  कामना ( करने योग्य आवश्यक कर्म )  भाव प्रभाव अभाव स्वभाव आदि से जीव के मंन की दीर्घकालिक स्थिर अवस्था खुशी विचलित अवस्था दुख के कारण पर निर्भर करती है ।  
  जीवो के शरीर की एनर्जी मेंटेनेंस जीवो के शरीर तरह तरह के संक्रमण के द्वारा प्रभावित होते रहते हैं जिससे उनके उपयोगी जैविक अंणु उनके शरीर से दूर जाते रहते हैं शरीर छोड़कर हट जाते हैं दूसरे जीव उसके शरीर उपयोगी अणुओं को अपने शरीर में जोड़ने के लिए दूसरे जीवो के शरीर के जैविक अंणुओं का भक्षण करते हैं । इस प्रकार का विचित्र कृत्य वे विभिन्न कार्य के दौरान  ऊर्जा व्यय होने पर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए  करते हैं । उस उर्जा के पूर्ति वह दूसरे जीवो के शरीर को खाकर करते हैं । यदि क्षय ऊर्जा अंणु  और भक्षण ऊर्जा अंणुओं दोनों का अनुपात समान है तो जीवो का शरीर स्वस्थ अवस्था में रहता है । यदि क्षय ऊर्जा अंणुओं परिमाण बढ़ जाता है भक्ष्य ऊर्जा अंणुओं का परिमाण घट जाता है तो  जीवो के शरीर की जैविक क्षमता उनके आवश्यक जैविक कार्य करने के लिएकम हो जाती है । जीव बीमार रहने लगते हैं । इस प्रकार से बक्श उर्जा अनु और 6 उर्जा अणुओं का अनुपात ही जीवो के स्थिर स्वास्थ्य या चलित स्वास्थ्य की पहचान है।

No comments:

Post a Comment