हमारा मन बार-बार उसकी संवेदनशीलता से प्रभावित होने से उसके पूर्व के संवेदनशीलता के कोने में जाकर अटक जाता है । हमारा मन उस शत्रु भावनात्मक व्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता का भाव बनाकर अपनी प्रतिक्रिया करता है । ऐसे में उस बदले हुए स्त्री पुरुष की दुष्टता हमें महसूस नहीं होती । उसके दुष्कर्म कुकृत्य भी हमें सदकृत्य सुकृत्य नजर आते हैं । हम ऐसे लोगों से बार-बार हनि उठाते रहते हैं । इन्हें अपने जीवन से नहीं निकाल पाते हैं । अपमानित नुकसान होते रहने पर भी हम उन्हें नहीं छोड़ पाते । इसका दूसरा कारण हमारे माता-पिता के द्वारा हमारी की गई गलत परवरिश शिक्षा है । जिसमें वे अब प्रिय शत्रु भाव धारी दोस्त रिश्तेदार लोगों को हमारे अवचेतन मन में हीरो वर्सेस सिस्टम से बिठा देते हैं ।कि वे हमारे परम हितकारी आराध्य पूज्य भगवान के समान हैं । हमारे आफ ईश्वर हैं । वे हमारी लाईफ लाईन को रोककर हमें संकटग्रस्त कर सकते हैं । हम मानसिक रूप से उनके गुलाम हो जाते हैं और उनके बिना जीना हमारी कल्पना से परे चला जाता है ।
हम ऐसे दोस्त रिश्तों के संचालक लोगों से बार-बार हानि उठाकर भी उनसे अपने संबंध बनाए रहते हैं । जिनके माता-पिता अपने बलवान शत्रु या दोस्त रिश्तेदार मित्र के मानसिक गुलाम रहे हो तो उनकी संतान भी अपने माता पिता की देखा देखी उनके प्रति मानसिक दासता भाव अपनान लगती है । ऐसे में उन जागरूक माता पिता का कर्तव्य है कि अपनी संतान को पूर्व में मित्र रहे लोगों के बदलकर शत्रु भाव अपनाने पर उन परिवर्तित मधुर्भाव धारी शतरूपा वाले मित्रों के बारे अपने बच्चों को परिचित कराएं । अपने बच्चों में हीरो वर्सेस सिस्टम बदलने की शिक्षा डालें । जैसे यदि कोई हमारा पूर्व में मित्र है तो वह कभी तक मित्र है जब तक वह हमारा हितकारी है यदि उसके भाव बदलकर वह हमारे प्रति दुष्ट भाव अपना लेता है । हमारा नुकसान करने लगता है बार-बार हमें जलील करता है हमारे प्रति कमीनापन अपनाता है । तो हमें अपनी संतान को उसके प्रति बताते हुए सतर्क कर देना चाहिए कि वह ऐसे रिश्तेदार मित्र और संबंधी से दूर रहें ।।
उन परिवर्तित हुए वर्तमान में शत्रु भाव ले चुके , पूर्व में रहे मित्र लोगों के प्रति भी हमें अपने मन के अंदर उनकी प्रिय कृत्य को भुलाकर कर मुक्त फिल्म के बारे में सुबह शाम संध्याकाल में उचित मानस पटल भाव चित्रण को देखते हुए बदलते रहना चाहिए । समय के अनुसार ऐसा नहीं है कि जो व्यक्ति वर्तमान में शत्रु भावना रहा है तो ऐसे हम उसके पूर्व का मित्र भाग स्मरण करें । उसे क्षमा करते रहें अपितु इसके लिए जरूरी है कि यदि वह वर्तमान में शत्रु भाव अपना चुका है तो हम भी उसके शत्रु भाव का अपने मन में चित्रण करें । तभी हमारा मन उसे शत्रु भाव में धारण करेगा । हम तभी उसे अपने उज्जवल भविष्य के लिए बचने की तरह तरह की युक्तियां सोच पाएंगे । यदि हम अपने मानसिक चित्रण फिल्म को नहीं चलाती बदलते देखते हैं । तो ऐसे में वह हमें पूर्व में डाले हुए प्रिय मानसिक चित्र उस व्यक्ति के प्रति सहानुभूति युक्त सद्भावना व्यवहार करने को बाध्य रखते हैं । जिन्हें वह हमारी विनम्रता या कमजोरी समझता है । जिससे हम फिर से उसकी और अधिक दुष्टता का शिकार होते हैं ।
ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जो लोग हमारे प्रति विरोधी भावना रहे हैं दोस्त अपना रहे हैं हम भी उनकी बुरी छवि को अपने मन में स्थान देने लगे उनकी पुरानी अच्छी छवि को मन से निकाल दें या कम करें इससे हमारे उनके प्रति शत्रु भाव से हमारे प्रति व्रत बहाव अपनाकर हम उससे बचने का प्रयास करेंगे यदि हम उनके प्रति शत्रुता के बदले मित्रता भाव रखते हुए हैं तो इसे वे हमारी कमजोरी समझेंगे और अपनी शत्रुता आचरण की डिस्क्रिप्टिव से हमें बराबर परेशान करते रहेंगे ।
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