छद्म आध्यात्मिकता क्या है?


छद्म आध्यात्मिकता का मतलब है लोगों को आध्यात्मिकता दर्शन के नाम से छलना ,उनको ज्ञान के नाम से ज्ञान की ओट /आड़ में अज्ञान ,भ्रमज्ञान देना ::/छल कपट करके उनका ब्रैन बाश करके उनको अपनी इच्छाओं अपने मानकों के आधार पर उनके मन मस्तिष्क में उनकी सोच विचार पर अपना अधिकार /कब्जा करके उनको अपनी डिक्शनरी/शब्द कोश के अनुसार बोलना सोचना करना सिखा कर आदमी की संतान को अपना पालतू बनाकर अपने भावी परिवार जनों की सुख सुविधाओं को अक्षय /अमर /अमिट करना । खुद भी मौज करना बिना कर्म किए-कराए और अपनी वंशावली की भी मौज पार्टी /पुख्ता इंतजाम करना जिससे उनको भी बिना कुछ कर्म किए उत्तम से उत्तम भोग भोजन पदार्थो की आपूर्ति की निरंतरत व्यवस्था बनी रहे ।

मुंड़ मुड़ाए तीन गुंण , सिर की मिट जाए खाज ।

भोजन दें बावा कहें , लोग कहें महाराज ।।

जब पिता की सम्पत्ति में पुत्री का भी बराबर का अधिकार है तो फिर दहेज लेना और देना अपराध कैसे? क्या इन्हें एक-दूसरे का पर्याय समझा जाए?


पहले तो दहेज का मतलब समझो फिर ऐसी सोच विचार बनाओ

दहेज की परिभाषा है :-शादी के समय पर पुत्री को ,न कि वर पक्ष को ; पिता पक्ष की ओर से उनके भविष्यक जीवन की सुविधा सुरक्षा के लिए दिये गये उपहार और धनराशि को दहेज कहते हैं ।

यह प्रथा नहीं , आवश्यकता है सहमति है पुत्री के भावी जीवन में सामाजिक सुविधा है । अधिकार नहीं है ; अनुबंध नहीं है ;वैद्युत बंध नहीं है कि यदि दहेज नहीं मिला है तो शादी विवाह संबंध खट्टे कड़वे या खत्म कर दिये जायें ।

आपकी सोच के अनुसार दहेज एक यह गरीब निर्धन व्यक्ति और उसकी पुत्री के जवान होने पर उसे उसकी जवानी की कीमत का सामाजिक दंड है ,कि उस गरीब की बेटी पर जवानी क्यों आईं ? , उस गरीब की बेटी को गरीबी में यौनानन्द के मौलिक पशुज ,मानव अधिकार से कैसे रोका जाए ?उस गरीब की बेटी को , युग्ल की संतान को पैदा होने से कैसे रोका जाए? यह उस गरीब की बेटी के जैविक ,पशुज , मानवीय अधिकारों का हनन है ।क्या किसी भी गरीब की बेटी को धन की कमी से ,पर्याप्त दहेज न मिलने पर उसके विवाह संबंध से वंचित कर देना , विवाह संबंध खत्म कर देना ,यह दहेज नहीं अर्थदंड है ।। जो उसके बाप से वसूली करना चाहिए कि उस गरीब के घर बेटी क्यों पैदा हुई ?

। जिसे आप अधिकार बनाने की सोच की फिराक में हैं आपका यह दहेज प्रथा का अधिकार समाज संस्कृति को बहुत मंहगा और भारी पड़ेगा ।अब से १४००वर्ष पहले अरब के लोगों की यही मानसिकता बन गई थी जिसे मुहम्मद साहब ने ऐसा ठीक कर दिया कि आज उनके अनुयायियी धन से धनी लोगों के धर्म काफिर (काफिलान) काफिया संस्कृति पर भारी पड़ रहे हैं ।।

समझ लेना इसी से ना समझ में आये तो कुछ पैसे ख़र्च करके कुरान पढ़ना अब यह हिन्दी में भी उपलब्ध है लखनऊ वाला ज्यादा विश्वसनीय है ।।अब से १४०० वर्ष पहले जब अरब के लोग बहुत बड़े व्यवसाई थे उनका यूरोपीय क्षेत्र रोम रूमानिया यूनानी क्षेत्र तक प्रभाव था । उनमें भी आज का L G B T W यौन विकृति संबंध सामान्य थे तब उनको मुहम्मद साहब ने अरबी भाषा में समझाया था और वो सुधर गये थे ।। आपको यह दहेज प्रथा से उत्पन्न दुष्परिणाम फोकट /मुफ्त में नहीं समझ में आने वाले । वर्तमान में इसका दूसरा यौन विकृत रूप L,G,B,T,W, है जो धन से ग़रीब , दिमाग से धनी लोगों में पैदा हो रहा है ।

भारतीय अपनी बेहतरीन संस्कृति को छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति के पीछे क्यों भाग रहे हैं?


आपने कैसे समझ लिया कि भारतीय संस्कृति अच्छी गुणवत्तापूर्ण है । कोई व्यक्ति तो क्या पशु भी जो अच्छे बुरे का विवेक बुद्धि रखता है वह अच्छे संस्कार संस्कृति को क्यों छोड़ेगा और बुरे संस्कार संस्कृति को क्यों अपनायेगा । आखिर कुछ तो कमी है भारतीय संस्कृति संस्कार ओं में कि लोग भारतीय संस्कृति संस्कार को छोड़कर कर विदेशी संस्कृति संस्कार अपना रहे हैं जैसे इस्लामिक , ईसाईयत संस्कृति ।

भारतीय संस्कृति मित्थक /भ्रम ज्ञान/कापी राइट एक्ट /पेटेंट एक्ट पर आधारित धन प्रभाव से संचालित है जिसमें जिसके पास पर्याप्त धन नहीं उसका धर्म नहीं धर्म समाज संस्कृति नहीं ।। वह व्यक्ति धन की कमी से सत्य /वास्तविक ज्ञान से वंचित रहता है और अपने धर्म जाति जीवन को धार्मिक मिथकीय अवधारणा से जीता है जो सच कम और झूठे ज्यादा होते हैं ।। जिसके पास धन नहीं है देने को गुरु जनों को वह फोकटिया /मुफ्त के ज्ञान की तलाश में समाज में फोकटिया ज्ञान स्थल सत्संग सभा समारोह संगोष्ठी ओं में आजीवन जाता /घूमता रहता है और घूम घूमकर भ्रम ज्ञान एकत्र करके अपने जीवन को भ्रम से जीता रहता है ।। जिसके पास धन नहीं है वह कापी राइट एक्ट पेटेंट के तहत तरह तरह की मिथकीय अवधारणा भरी भ्रम पैदा करने वाली अनेक असंख्य किताबों /पुस्तकों को आजीवन पढ़कर जीवन भर अपने जीवन को तरह-तरह के किताबों के मुताबिक मिथकीय भ्रमणीय कथन संग्रह करके अपने जीवन को भ्रमर /भंवरे के समान जीता है । हिन्दू है तो कभी मुसलमान बनना चाहता है तो कभी ईसाई बनना चाहता है कभी सिख बनना चाहता है कभी बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर बौद्ध बनना चाहता है कभी जैन बनना चाहता है ।। लेकिन जो लोग अपने हिंदू धर्म को छोड़कर कर दूसरा धर्म अपना कर दूसरे धर्म मतावलंबी बने हैं क्या उनकी सोच मानसिकता में कोई अंतर आया है तो उसका जवाब है नहीं ।। ब्राह्मण इस्लाम धर्म में इमाम मौलाना उलेमा मुफ्ती बना है ईसाई धर्म में फादर कामिल बनता है सिख धर्म में ग्रंथी बना है बौद्ध धर्म में भंते जैन धर्म में मुनि या श्रमण बनता है । ठाकुर इस्लाम में पठान , ईसाई धर्म में जैकब ,सिख धर्म में निहंग बनता है । बनिए ने सभी धर्मों के ठेकेदार जनों को धन दौलत देकर अपना धर्म अहम् वर्चस्व कायम रखा है इसके बाद बड़े स्तर पर श्रमिक जातियों के धर्म परिवर्तन का वृत्तांत हिंदू जलसेवक जातियों के लोग इस्लाम में सक्का भिश्ती , नाईयों को हज्जाम सलमानी में बदला है हिंदू खटीक कटारिया मुसलमानों कसाईयों में बदल गये । कारण में कि उन्होंने अपने आप अपनी इच्छाओं के अनुसार हित में कभी सोचना सीखा ही नहीं अपना व्यवसाय परक सोच नहीं बदली ।उनकी सोच सदैव मुफ्त में डाउनलोड हुए ज्ञान पर आधारित होती है । जिसका परिणाम लाभकारी कम हानिकारक ज्यादा होता है । जिन्होंने अपना हिन्दू धर्म समाज संस्कृति छोड़कर दूसरे धर्म समाज संस्कृति को अपनाया था तो उसका पहला मूल मुख्य कारण धन से प्रभावित होकर धन लेकर धर्म बदलना रहा है दूसरा मुख्य कारण जब अपने धर्म भाईयों से सुविधा सम्मान सुरक्षा ना मिली तब दूसरा धर्म अपनाया , लेकिन यहां पर भी मुख्य कारण धन प्रभाव प्रधानता रही ।आज भी यह धर्म समाज संस्कृति परिवर्तन की बिमारी बरकरार है ।

धर्म जाति संप्रदाय संस्कार संस्कृति एक सामाजिक राजनीतिक परिवारिक संगठन व्यवस्था होती है /बनी हुई है जो मनुष्य ने अपने मुश्किल समय के लिए बनाई है प्रत्येक धर्म समाज संस्कृति जाति संप्रदाय संस्कार संगठन व्यवस्था का वैज्ञानिक वैधानिक कारण आपस में सहयोग सहायता पर आधारित/निर्भरता है जब किसी भी धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय में लोगों में आपसी सहमति सहयोग सहायता भावना कम से कमतर होती हुई लुप्त हो जाती है तो वह धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय सभी संस्कारों सही शिक्षा ज्ञान विज्ञान की कमी से लुप्त /नष्ट हो जाते हैं । ऐसे में उस विलुप्त प्राय सभ्यता संस्कृति वर्ग जाति धर्म संप्रदाय के लोग सहयोग सहायता संस्कार की कमी से दूसरे उस धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति धर्म संप्रदाय की ओर रुख किया करते हैं जिनमें सहयोग सहायता संस्कृति संस्कार भावना पायी जाती है ।यही सब हिंदू धर्म समाज संस्कृति में आज घटित हो रहा है । ऐसे में पढ़े लिखे विद्वान शिक्षित लोग पाश्चात्य संस्कृति संस्कार की ओर शिक्षित वर्ग रुख कर रहा है ।। तो अशिक्षित निर्धन गरीब लोग अपनी सूविधा सुरक्षा मान सम्मान इस्लाम धर्म समाज संस्कृति में अनुभव करते हुए मुसलमानों में निकट जा रहे हैं ।

कहने का अभिप्राय यह है कि जब भी लोगों को अपने धर्म जाति संप्रदाय समाज संस्कृति के लोगों से सहयोग सहायता संस्कार संस्कृति शिक्षा सही नहीं मिलती है तो वे अपने जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए सुविधा सुरक्षा सहायता देने वाले मनुष्य ओं के नये या पुराने धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय संगठनों की ओर जाने लगते हैं ।अपना घर परिवार धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय संस्कार संगठन व्यवस्था को छोड़कर दूसरे लोगों के धर्म संस्कृति शिक्षा समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय को अपनाने लगते हैं ।।शेष है.

रावण महापंडित था, अत्यंत शक्तिशाली था, शिवभक्त था, महान शासक था। फिर भी क्यों लोग अपने पुत्र का नाम रावण नहीं रखते हैं?


रावण शब्द का वाल्मीकि रामायण के अनुसार अर्थ है :— सभी को रूलाने वाला /परेशान /दुखी करने वाला । यह रावण का निक नेम /पुकारु नाम था जो पीड़ित ऋषि मुनि लोगों ने रखा था । जो नामकरण संस्कार संस्कृति के अनुसार नहीं रखा गया था ।

क्या आप जानते हुए अपने बेटे का नाम ऐसा रखना चाहेंगे जिसके नाम से पहले ही समाज में घृणा/नफरत समाज संस्कृति के लोगों के मन मस्तिष्क में व्याप्त है । जैसे कि अतिरिक्त नाम :: दुर्योधन है ।

ऐसे अन्य दूसरे घृणा सूचक नामों को कोई भी श्रेष्ठ /उत्तम पंडित नामकरण संस्कार संस्कृति के अनुसार किसी का भी नाम रखना पसंद नहीं करता है ।

क्या यह भविष्यवाणी सच है,की हर 100 सालों के बाद एक महामारी होगी ?


महामारी का तो पता नहीं पर यह जरूर सुना है :- सौ साल बढ़ै वन और सौ साल बढ़ै जन यह जरूर सुना है ।

दूसरा वाक्य/कथन :- जो गया है बढ़ कर गया है /नष्ट हुआ है ।जो जीव अपनी सामान्य सीमा से ज्यादा बढ़ जाता है शरीर में वह शीघ्र नष्ट होता है जल्दी मरता है ,उसकी आयु कम होती है उसके जाति भाईयों /जातकों की तुलना में । जो जीव जाति अपनी सामान्य सीमा से अधिक बढ़ने लगती है दूसरे जीवों को खतरा बनने लगती है वह जाति भी नष्ट होने लगती है ।इस नियम की पुष्टि जीव विज्ञान की एक शाखा जीवाशमिकी का अध्ययन करने से होती है , जिसके अनुसार डायनोसोर ही उल्कापात से नष्ट नहीं हुए हैं अपितु अनेकों असंख्य जानवर और पेड़ पहले भी नष्ट हुए हैं जिनकी पूर्व में अनियंत्रित असीमित वृद्धि हुई थी । वह अब भी जीवाश्म में मिलते हैं ।पत्थर वाला कोयला पौधों का जीवाश्म ईंधन रुप है । डायनोसोर की जीवाश्म कथा से सभी परिचित हैं ।

मनुष्य हो या कोई भी अन्य जाति जीव हो जब वह दूसरे जीवों को अकारण निर्दोष होने पर मारने लगता है । या जीवों को आवश्यकता से अधिक मात्रा में मारकर उनके शरीर से जीविकोपार्जन धनार्जन करने लगता है । तो उसे नष्ट करने नियंत्रित करने का कार्य , सबकी नियंत्रण करता /जन्म मृत्यु स्वामिनी //माता प्रकृति अपने हाथ में लेकर उसे नष्ट करने /नियंत्रित करने के लिए तरह तरह की बिमारियाँ /महामारी पैदा करके उसे नष्ट करके या नियंत्रित करने का प्रयास किया करती है । यदि यह प्रकृति मनुष्य के अक्षम्य कार्यक्रम कार्यकलापों को रोकने में असमर्थ हो जाती है मनुष्य की विशेष बल बुद्धि प्रयोग यांत्रिकी क्षमता से तो ऐसे में यह अपना नियंत्रण कार्य अपने स्वामी ईश्वर को सौंप दिया करती है ।

तब ईश्वर मनुष्य को नियंत्रित किया करता है :- तब ईश्वर मनुष्य को चैताने ,चेतावनी देने के लिए मानव समाज में तरह तरह की नयी नयी व्याधियाँ उत्पन्न करता है , पहले अपने मंद हिंसक कालभैरव के द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास करता है जो मानव पशु समाज में तरह तरह की बिमारियों को पैदा करके मर्यादा हीन लोगों को अनियंत्रित व्यवहार करनेवाले लोगों को व्याधि ग्रस्त बीमार करके असाधारण असाध्य कुसाध्य बिमारियों से ग्रसित करके आचरण हीन मर्यादा हीन लोगों को यमराज के हवाले कर के नष्ट कर दिया करता है । यदि इस कालभैरव से मानव समाज के लोग नियंत्रित नहीं होते हैं ।। तब ईश्वर बिगाड़ देता है बुद्धि मनुष्य ओं की और शुरू हो जाते हैं जनता में उपद्रव उत्पात अशांति मारकाट शुरू हो जाता है ग्रह युद्ध जनता /प्रजा आपस में लड़ने लगती है ।लोग दो खेमों मेँ बंट जाते हैं कुछ अमन शान्ति का प्रयास हवन यज्ञ ,वार्ता संगोष्ठियों से लोगों को समझाने में लग जाते हैं ।कुछ लड़ाई झगड़े से लूटपाट से धन एकत्रित करने में लग जाते हैं ।ऐसे में विधाता भेज दिया करता है वीरभद्र को जो नष्ट कर दिया करता है उन बदले हुए लोगों को भी जो डरकर भक्त /सज्जन पुरुष बन जाते हैं । वीरभद्र केवल उन्हीं लोगों को जिन्दा छोड़ता है ।जो सत्य मेव जयते में विश्वास /यकीन रखते हैं । जन्म जात संत वृत्ति शान्त सज्जन भाव से पैदा हुए थे , या जिन्होंने बचपन या युवा अवस्था में सत्य ज्ञान प्राप्त होने पर सज्जन भाव अपनाया दान भाव अपनाया ,सत्य कथन अपनाया ,संतोष संतुष्ट धर्म अपनाया ,कंजूसी और व्यापार वृत्ति का आर्थिक वृद्धि का त्याग कर दिया हैं ।

परंतु जब कालभैरव और वीरभद्र भी मनुष्य की बल बुद्ध धन यांत्रिकी धूर्तता के आगे फेल /परास्त /पराजित /हार जाते हैं तब विधाता विवश होता है फिर से नयी सृष्टि सृजन करने के लिए ,इसके लिए जरूरी है ऐसे धूर्त लोगों को पूरी तरह से नष्ट करना इसके लिए विधाता भेजता है तेज हवा ( बवंडर ), अधिक जल (अतिवृष्टि) , अधिक गर्मी ( उष्ण युग ) , अधिक ठंड ( हिम युग ) लेकिन अबकि बार प्रलय आकाश से अग्नि पिंड वर्षा से एस्ट्रायड के जमीन से टकराने से होगी ।ये आकाशीय पिंड पत्थर छोटे छोटे या बड़े भी हो सकते हैं हिन्दू ग्रंथ मारकण्डेय पुराण ,शिव पुराण , ईसाई ग्रंथ बाईबिल , मुस्लिम ग्रंथ कुरान के अनुसार ।

यदि प्रकृति अपने मिशन /महाकार्य /धर्म स्थापना मेँ सफल नहीं हो पाती है तो उस महाकार्य को पूरा करने के लिए विधाता /प्रकृति नियंता अपना प्रतिनिधि महापुरुषों की फौज युगपुरुष के साथ भेजता है जिसे अवतार वाद कहते हैं ।जैसे राम के आने से पहले उनके सहायक विशेष बली भालू वानर पैदा हो गए थे बाली ,सुग्रीव, हनुमान, जामवंत, आदि .।।कृष्ण के लिए सहायक विशेष अर्जुन भीम युधिष्ठिर आदि पैदा हो गए, ब्राह्मणोँ के अति वध प्रवृत्तियों को रोकने के लिए महावीर स्वामी जैनतीर्थंकर ,गौतम बुद्ध ,सम्राट अशोक ,आदि पैदा हो गए थे ।जब मुगल मुसलमान , अंग्रेज ईसाई , और ब्राह्मण अपनी अधार्मिक ,भ्रामक ,मित्थया , कल्पित शिक्षा से मनुष्यों को मानवपशु बनाने में लगे थे तब अन्य मनुष्य ओं को मानवपशु बनाने से रोकने के लिए महर्षि दयानंद भीम सतपाल (भीमराव आंबेडकर) , राजाराम मोहन राय , मदनमोहन मालवीय ,सरसैयद अहमद खां आदि अनेक ऐसे विशेष विभूति जन पैदा हुए ।जिनके संयुक्त प्रयास से भारत क्षेत्र में रहने वाले मनुष्य मानवपशु बनने से बच गए ।

ये महा पुरुष हर समय हरकाल में पृथ्वी पर विद्यमान रहते हैं यदि ये अपना दायित्व जो ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है । जिसके लिए ईश्वर इन महा पुरुषों को विशेष बल बुद्धि प्राकृतिक अधिकारों से युक्त करके अधिकारी बनाता है । जब ये महापुरुष विशेष निज बल बुद्धि होने पर भी , राज्य अधिकारों से युक्त शक्ति मान होने पर भी अपना ईश्वरीय धर्म नियमों का पालन नहीं करते हैं । अपने अस्तित्व को अपनी निष्ठा विश्वास को समाज नियंता शासन कर्ता के आधीन मानते हुए अधर्म और अज्ञान का प्रचार प्रसार में संलिप्त हो जाते हैं । यह महापुरुष और अधिकारी गण लोकतंत्र व्यवस्था में या राजतंत्र व्यवस्था में अपने जीवन को ईश्वर नियमों के अनुसार न जीकर अपने जीवन को दूसरों के प्रभाव के अनुसार जीते हैं और दूसरे लोगों को पशुओं को उनका जीवन प्राकृतिक नियमों के अनुसार न जीने देकर उनका जीवन भी अपनी इच्छाओं अपने नियमों के आधार पर जीने को विवश /मजबूर करने लगते हैं ।ऐसे मनुष्य जिनमें विशेष विद्या बल बुद्धि है जिनमें निर्माण विनाश सामर्थ्य ह ऐसे ब्रह्म के अणु /लघु रुप ब्रह्म अणु समान जन ब्राह्मण जातक राजपुरुष नेता और प्रशासन अधिकारी समाज के लोगों को अपने विशेष वाकचातुर्य से शासन सत्ता शक्ति से समाज के लोगों को पशु बनाने लगते हैं ।। राजकीय सामाजिक नियमों की अति प्रति बद्धता से मनुष्य को पशुओं में बदलने लगते हैं । ऐसे में इन कृत्रिमता पूर्ण जीवन जीने वाले महापुरुषों ,अधिकारियों ,बैल मनुष्य ओं को नियंत्रित करने के लिए ईश्वर और प्रकृति अपनी अपनी शक्ति /ताकत दिखाने लगते हैं जिसका नतीजा यह आता है कि कार्य का परिणाम उसके विपरीत उल्टा आने लगता है ।समाज परिवार शिक्षा देने पर भी परिणाम बच्चों में पाशविक प्रवृत्तियां पैदा होने लगती हैं ।चारों तरफ समाज में मनुष्यओं में , वन में पशुओं में असामान्य व्यवहार पनपने लगता है ।चहुंओर , वैर विरोध असहयोग असहिष्णुता का वातावरण बन जाता है , तो समझो विधाता , प्रकृति , मानव जीवन पशु जीवन के विपरीत विरुद्ध हैं ।। ऐसे में जो जागरूक लोग अपने जीवन को प्राकृतिक जीवन के अनुसार जीने लगते हैं । अति संचय /कंजूस भाव /व्यापार भाव छोड़ /त्याग दिया जाता है ।। तो उनके जीवन की रक्षा सुरक्षा हो जाती है ।यदि वो अति संचय करनेवाले व्यापार बुद्धि पर बने रहते हैं तो उनका जीवन खतरे में आ जाता है ।या नष्ट हो जाता है ।।इसे कयामत कहते हैं ।। जीव जनजागरूकता से उत्पन्न परिस्थिति जनजागरण /कयामत कहते हैं ।

।अब से 1400वर्ष पूर्व अरब क्षेत्र में ऐसी भीषण विषम परिस्थितियाँ बन गई थीं ,जब मनुष्य की मौलिक मूल भावनाओं का भी उदारीकरण के चलते आर्थिकीकरण कर दिया गया था ,जैसा आज फिर से दुनिया में हो रहा है ।किसी स्त्री का पति मर गया मार दिया गया दे दो रुपये अपराध मांफ , किसी औरत के साथ ब्लात्कार हुआ या किया दे दो रुपये ब्लात्कार अपराध मांफ ,किसी बच्चों के मां या बाप मर गए या मार दिए दे दो रुपये उन यतीम बच्चों को अपराध मांफ , पैसा रुपया दो समाज बनाने को पैसा पर रुपयों पर भाड़े के मां बाप बच्चे बहन भाई सभी मिलेंगे /बन जायेंगे ,कोई नैतिक जिम्मेदारी मानव मूल्य नहीं मनुष्य दो पैरों वाला पशु बन गया था जो रुपये पैसे के लिए बंदर बनकर नाचता फिरता था आज के आधुनिक सोच के मानव की तरह ।अरब क्षेत्रों में आपसी सहमति सहयोग विशवास नष्ट होने से मनुष्यो में पशुओं जैसी सोच समझ आचरण व्यवहार बन गया था । गांव शहरों का वातावरण जंगली बन गया था ।। तब मुहम्मद साहब ने उनको समझायाऔर अरब बच गया लेकिन अबकि बार काबा बंद होना ।24घंटे लगातार चलने वाली हज यात्रा बंद होना बताता है कि अबकि बार कुछ नया होना है कि मंदिर बंद ,मस्जिद बंद ,गुरुद्वारा बंद ,चर्च /गिरजाघर बंद , बौद्ध पूजा स्थल स्तूप बंद , समर्थ समृद्ध धनी लोगों के भागकर प्राण बचाने के संसाधन रेल जहाज /वायुयान जलयान बंद बता रहे हैं , जता रहे हैं कि अबकि बार कुछ हटकर नया होने वाला है ।

इस खतरनाक परिस्थिति में अपने जीवन की सुरक्षार्थ हम सभी को अपना जीवन ईश्वरीय विधान नियमों के अनुसार जीना चाहिए और दूसरे कमजोर दुर्भाग्यपूर्ण दुर्बल मूर्ख बुद्धि मनुष्य ओं को और अन्य जीवों को भी अपना जीवन प्राकृतिक रूप से जीने देना चाहिए ।इसके लिए हम सभी को प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का संग्रह या प्राकृतिक जीवन संसाधन भूमि अधिग्रहण, क्रयविक्रय , जल व्यापार ,वायु व्यापार , आदि ना करें ।। सभी जीवों को निरधन दुरबल कमजोर मनुष्य को अपना जीवन प्राकृतिक सुविधाओं के साथ जीने दिया करें ।। यह ईश्वरीय विधान नियम हैं ।। कहने का तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य सभी का व्यापार करने लगता है हर वस्तु का मानक मूल्यांकन करने लगता है तो वह ईश्वरीय व्यवस्था को खतरा बन जाता ह ।ऐसे में सृष्टि नियंता जब सृष्टि नियंत्रण की कमान अपने हाथों में संभाल लेता है तो विनाश का अनुमान /आंकलन करना मनुष्य की बुद्धि क्षमता से बाहर की बात है ।

लेकिन हर बार पैदा हुई महामारी / अति मृत्यु दायक विशेष बीमारी एक नयी शिक्षा देकर जाती है ।

पुरानी शिक्षा संस्कृति संसकारों में परिवर्तन /बदलाव लाने की जरुरत है ।

बदलो अपने मन को ,बदलो शिक्षा को ,बदलो शिक्षा जनित धर्म कर्म काण्ड पर पर आधारित जीवन पद्धति को को , छोड़ो उन रस्म रिवाजों को आचार विचार व्यवहार को, जो तुमको मौत के दरवाजे पर ले आये ।

अपनाओ उन नये जीवन दायक नियमों को जो तुम्हारा जीवन स्थिर और लम्बा करेंगे ।

गुरुवार को बाल दाढ़ी क्यों नहीं कटवाना चाहिए?


हिंदू धर्म समाज संस्कृति में गुरु का स्थान मनुष्य होने पर भी आराध्य भगवान से ऊंचा माना /जाना /समझा जाता है ।पुरातन संस्कृति वैदिक के अनुसार दो मुख्य विचार धारा एं हैं एक असुर विचार धारा जिसके प्रवर्तक शुक्राचार्य हैं ।दूसरी सुर या देवताओं की विचारधारा जिसके प्रवर्तक वृहस्पति हैं । असुर विचार धारा के अनुसार शुक्राचार्य के अनुयाई शुक्रवार /जुम्मा को पवित्र मानते हैं । जबकि सुर/देवता विचार धारा के अनुसार देश/सुर समाज संस्कृति के लोग वृहस्पतिवार को पवित्र मानते हैं ।

कबीर के अनुसार :- गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पांय ।बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए ।।

अब आपके सवाल का जवाब:-सभी धर्मों में बाल कटने को शक्ति हीनता का सूचक माना जाता है यह हिंदुओं में छौर कर्म छुरित कर्म कहा जाता है जो छुरा या उस्तरा से किया जाता है इसमें बालों को शरीर से हटाया जाता है जिससे क्षेत्र के स्थान से नाम दिया जाता है यदि मुंड या सिर क्षेत्र के बाल छुरी /उस्तरा से हटाए जाते हैं तो उसे मुंडन कहा जाता है ।इसमें यदि दाढ़ी मूछ और शरीरांग के अनुसार बाल जोड़ दिए जा तो इसे छौर कर्म कहा जाता है ,जो अक्सर माता पिता के मरने के समय पर किया जाता है , या बालक के 6 माह 1 साल 5 साल पूरा होने पर किया जाता है । इस छौर कर्म को अपवित्र या संक्रमण कारी मानते हुए , रोग उत्पत्ति दायक मानते हुए इससे अपवित्र कर कहा जाता है जिससे कराने के बाद नहाना जरूरी है । और नहाने के बाद बाल कटे हुए स्थान पर रोग विरोधी क्रीम या तेल लगाया जाना जरूरी माना जाता है।

आपने जो अपनी शंका वृहस्पति वार को छोड़कर केस मुंडन के बारे में कही है । वह उचित नहीं है ऐसा सभी धर्म ग्रंथों में वर्णित है जैसे बाइबल में लिखा है सप्ताह के 6 दिन काम करो और ७वें दिन घर की शरीर की सफाई करो, आराम करो । जबकि इस्लाम में एक लाइन और जोड़ी गई है कि सुंदर सुरंगारीत होने के बाद घर में मत बैठे रहो इस दिन भाइयों के साथ समाज में शरीक हो मतलब नमाज जाओ , देश विदेश घूमने जाओ ईमान और रोजी रुजक बढ़ाओ । ईसाइयों में इतवार का दिन पवित्र माना जाता है इसके लिए वे छौर कर्म बाल कटवाने /मुंडन को शनिवार को उचित मानते हैं ।यहूदियों में शनिवार को पवित्र दिन माना गया है वह छौर कर्म के लिए शुक्रवार या जुम्मा को उचित मानते हैं । हिंदुओं में छौर कर्म वृहस्पतिवार के लिए इसलिए निषेध है क्योंकि इससे शक्ति का क्षय /कमी काद्धांत जुड़ा हुआ है , इसे मानते हुए हिंदू लोग बृहस्पतिवार को विशेष पवित्रता का ध्यान रखते हुए ना तो छौर कर्म करते हैं ,ना धोबी कर्म कपड़ों की धुलाई करते हैं , ताकि वह संक्रमण से बचे रहें और समाज में सभी से मिलजुल कर अपना सामाजिक दायरा बढ़ा कर के पद क्रमिक व्यवस्था के अनुसार अपना औहदा /सामाजिक रुतबा बरकरार कर सकें , जो राजनीति में समाज नीति में बहुत उपयोगी होता है। अब हम थोड़ा सा इसका दायरा और बड़ा करते हैं हिंदू धर्म में अनेक जातियों अनेक वर्गों के लोग रहते हैं जिनके अपने अपने देवता उन्होंने बनाए हैं ताकि वह उस दिन विशेष साफ सफाई से शुद्ध होकर देव आराधना कर सकें और इस दिन वे सभी अपनी व्यावसायिक कार्य बंद रखते हैं जिससे उन्हें भी 1 दिन आराम मिल सके और अगले दिन से उनमें फिर से उर्जा संचार होने से पूरे हफ्ते निरंतर ऊर्जा प्रवाह बना रह सके । जैसे मंगलवार के दिन हनुमान के अनुयाई अर्थात श्रमिक वर्ग के लोग पवित्र मानते हैं वे हनुमान के लिए निर्धारित हुए मंगलवार के दिन बाल नहीं काटते कटवाते और ना ही कोई सामाजिक गतिविधि में लिप्त होते हैं ।

यह अपनी-अपनी धर्म समाज संस्कृति विचारों के अनुसार मनुष्य के लिए उसके धर्म समाज संस्कृति संचालक लोगों ने निर्धारित किया है जैसे शंकराचार्य /महंत /पंडितों ने तरह-तरह के नियम हिंदू समाज के लिए बनाए , ईसाईयों के लिए विशप और फादर अपने नियम बनाए । ध्यान रखना ऐसे सबाल गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुयायियों में ऐसे प्रश्न मत कर बैठना । नहीं तो यदि वहां पर कट्टर सिक्ख निहंग मौजूद हुए तो मुझे दोष मत देना कि पहले बताया न था ।


साधक के चेहरे पर तेज क्यों होता है?


साधक लोग ब्रेन मैपिंग माइंड सेटिंग में एक्सपर्ट होते हैं वह अपने विचारों को अपने अनुसार नियंत्रित करना सीख जाते हैं और उनकी शारीरिक एक्टिविटी भी उनके विचार और इच्छा के अनुसार होती हैं जिससे जिससे वह न्यूनतम जैविक ऊर्जा व्यय करते हैं जो थोड़े से भोजन से भी संतुलित बनी रहती है या पूरी रहती है जिसस शरीर को , मस्तिष्क को पूरा पोषण मिलता है ।

चेहरे पर तेज/चमक का एक बेसिक /पहला साधारण नियम है कि यदि मन में कोई चिंता तनाव/दबाव न हो भोजन /खान-पान पुष्टि कर हो , दूसरे नियम मेहनत के अनुसार भोजन किया जाय , तीसरे नींद /निद्रा मेहनत के अनुसार आती रहे तो चेहरे पर चमक/तेज अपने आप आ जाता है । भोजन में प्रोटीन वसा विटामिन खनिज लवण उचित अनुपात में हैं तो चमक /तेज स्वत आती है ।

वैज्ञानिक व्याख्या मानव मस्तिष्क में अरबों न्यूरोंन /तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं और प्रत्येक न्यूरोंन कोशिका में ऊर्जा उत्पादन कर्ता ईकाई माईट्रोकोन्डिया की संख्या ५००००से २०००००तक होती है कार्य आवश्यकता के अनुसार । अधिक चिंता करने से या व्यर्थ की चिंता की आदत पड़ जाने पर मानसिक रोग लग जाने पर, दुष्चरित्र व्यवहार स्वभाव बन जाने पर मनुष्य जितना भोजन खाता है उससे ज्यादा व्यर्थ के कामों में अपनी शारीरिक मानसिक ऊर्जा व्यय करता है जिससे उसके अवचेतन मन को शरीर की पूर्ण मरम्मत करने का अवसर नहीं मिलता है जिससे अति वायु कुपित शरीर बन जाने से /उच्च आक्सीकरण दर शरीर बन जाने से ,तन और मन दोनों ही की सैटिंग ख़राब हो जाती है । जिससे शरीर की चमक उड़ जाती है चेहरा निष्तेज हो जाता है।

जो लोग साधक स्वभाव के उत्तम चरित्र होते हैं जिनको भोजन और श्रम /थकान दायक मेहनत का ज्ञान हो जाता है , वे मानसिक श्रम व्यर्थ चिंतन और शारीरिक श्रम पर दृष्टि पात निरंतर बनाये रखने से , तथा भोजन के श्रम अनुपात के प्रति जागरूक होने से अपने तन मन की ऊर्जा का अपव्यय नहीं करते हैं । जिससे उनका अवचेतन मन शरीर की मरम्मत आवश्यकता अनुसार करता रहता है । शरीर पर विशेष चमक और चेहरा तेजपूर्ण बना रहता है ।

साधक लोग अपने दिमाग में ज्यादातर के फालतू विचार नहीं रखते हैं । वह समाज के दूसरे लोगों से सहानुभूति कमतर रखते हैं ,नहीं रखते हैं । ऐसे में वह समाज के संगठन क्षेत्र से अलग रहते हैं ।। उनके ऊपर किसी का भी सामाजिक दबाव नहीं पड़ता है और ना ही वह किसी मनुष्य से परिवार से जाति से सहानुभूति रखते हैं जिससे दूसरे मनुष्यों के समस्याएं संभावनाएं महसूस कर सकें , ऐसे में उनके मन मस्तिष्क के पास उनकी अपनी थोड़ी सी सीमित समस्याएं होती हैं जिनका वे निदान भी जानते हैं और अनिष्ट की आशंका से चिंतित की चिंता नहीं करते ।। साधारण मनुष्य के मन मस्तिष्क पर उनकी अपनी सामाजिक समस्याओं का चिंतन भार होता है इसके अलावा वे समाज में घर परिवार में जिन लोगों से जुड़े रहते हैं उनकी भी समस्याओं का चिंतन भार अपने मन मस्तिष्क पर संवेदनशीलता के गुण से डालते रहते हैं ।जिससे उनके मस्तिष्क का चिंतन भार बढ़ जाता है चिंता की संख्या बढ़ जाने से चिंता सामाधान या चिंता हल करने की क्षमता घट जाती है जिससे वे अक्सर उदास, उदगिनर खिन्न निराश रहते हैं । समय-समय पर दूसरे लोगों की चिंताओं का चिंतन होते रहने से उनका मस्तिष्क उनकी निजी जैविक ऊर्जा को अकारण व्यय करता रहता है ।। जो उनके किसी काम नहीं आती जबकि साधक लोगों के पास दूसरों की कोई समस्या नहीं होती उनकी अपनी चिंता चिंता समस्याएं कम होती हैं जिसका हल समाधान वह जानते हैं । जिससेउनके शरीर में जैविक ऊर्जा पर्याप्त होती है । इसके अलावा उनके अवचेतन मन की कार्यप्रणाली नियंत्रित रहने से उनका हृदय धड़कन सामान्य बनी रहती है उन्हें निद्रा सामान्य आती है जिससे उनका और चेतन मन उनके तन मन की रिपेयर समय अनुसार करता रहता है । जिससे उनके चेहरे पर पर्याप्त तेज बना रहता है क्योंकि वह अनावश्यक कार्य नहीं करते अनावश्यक चिंतन नहीं करते वह श्रम केयर करने के बारे में अति जागरूक होते हैं ।