गुरुवार को बाल दाढ़ी क्यों नहीं कटवाना चाहिए?


हिंदू धर्म समाज संस्कृति में गुरु का स्थान मनुष्य होने पर भी आराध्य भगवान से ऊंचा माना /जाना /समझा जाता है ।पुरातन संस्कृति वैदिक के अनुसार दो मुख्य विचार धारा एं हैं एक असुर विचार धारा जिसके प्रवर्तक शुक्राचार्य हैं ।दूसरी सुर या देवताओं की विचारधारा जिसके प्रवर्तक वृहस्पति हैं । असुर विचार धारा के अनुसार शुक्राचार्य के अनुयाई शुक्रवार /जुम्मा को पवित्र मानते हैं । जबकि सुर/देवता विचार धारा के अनुसार देश/सुर समाज संस्कृति के लोग वृहस्पतिवार को पवित्र मानते हैं ।

कबीर के अनुसार :- गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पांय ।बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए ।।

अब आपके सवाल का जवाब:-सभी धर्मों में बाल कटने को शक्ति हीनता का सूचक माना जाता है यह हिंदुओं में छौर कर्म छुरित कर्म कहा जाता है जो छुरा या उस्तरा से किया जाता है इसमें बालों को शरीर से हटाया जाता है जिससे क्षेत्र के स्थान से नाम दिया जाता है यदि मुंड या सिर क्षेत्र के बाल छुरी /उस्तरा से हटाए जाते हैं तो उसे मुंडन कहा जाता है ।इसमें यदि दाढ़ी मूछ और शरीरांग के अनुसार बाल जोड़ दिए जा तो इसे छौर कर्म कहा जाता है ,जो अक्सर माता पिता के मरने के समय पर किया जाता है , या बालक के 6 माह 1 साल 5 साल पूरा होने पर किया जाता है । इस छौर कर्म को अपवित्र या संक्रमण कारी मानते हुए , रोग उत्पत्ति दायक मानते हुए इससे अपवित्र कर कहा जाता है जिससे कराने के बाद नहाना जरूरी है । और नहाने के बाद बाल कटे हुए स्थान पर रोग विरोधी क्रीम या तेल लगाया जाना जरूरी माना जाता है।

आपने जो अपनी शंका वृहस्पति वार को छोड़कर केस मुंडन के बारे में कही है । वह उचित नहीं है ऐसा सभी धर्म ग्रंथों में वर्णित है जैसे बाइबल में लिखा है सप्ताह के 6 दिन काम करो और ७वें दिन घर की शरीर की सफाई करो, आराम करो । जबकि इस्लाम में एक लाइन और जोड़ी गई है कि सुंदर सुरंगारीत होने के बाद घर में मत बैठे रहो इस दिन भाइयों के साथ समाज में शरीक हो मतलब नमाज जाओ , देश विदेश घूमने जाओ ईमान और रोजी रुजक बढ़ाओ । ईसाइयों में इतवार का दिन पवित्र माना जाता है इसके लिए वे छौर कर्म बाल कटवाने /मुंडन को शनिवार को उचित मानते हैं ।यहूदियों में शनिवार को पवित्र दिन माना गया है वह छौर कर्म के लिए शुक्रवार या जुम्मा को उचित मानते हैं । हिंदुओं में छौर कर्म वृहस्पतिवार के लिए इसलिए निषेध है क्योंकि इससे शक्ति का क्षय /कमी काद्धांत जुड़ा हुआ है , इसे मानते हुए हिंदू लोग बृहस्पतिवार को विशेष पवित्रता का ध्यान रखते हुए ना तो छौर कर्म करते हैं ,ना धोबी कर्म कपड़ों की धुलाई करते हैं , ताकि वह संक्रमण से बचे रहें और समाज में सभी से मिलजुल कर अपना सामाजिक दायरा बढ़ा कर के पद क्रमिक व्यवस्था के अनुसार अपना औहदा /सामाजिक रुतबा बरकरार कर सकें , जो राजनीति में समाज नीति में बहुत उपयोगी होता है। अब हम थोड़ा सा इसका दायरा और बड़ा करते हैं हिंदू धर्म में अनेक जातियों अनेक वर्गों के लोग रहते हैं जिनके अपने अपने देवता उन्होंने बनाए हैं ताकि वह उस दिन विशेष साफ सफाई से शुद्ध होकर देव आराधना कर सकें और इस दिन वे सभी अपनी व्यावसायिक कार्य बंद रखते हैं जिससे उन्हें भी 1 दिन आराम मिल सके और अगले दिन से उनमें फिर से उर्जा संचार होने से पूरे हफ्ते निरंतर ऊर्जा प्रवाह बना रह सके । जैसे मंगलवार के दिन हनुमान के अनुयाई अर्थात श्रमिक वर्ग के लोग पवित्र मानते हैं वे हनुमान के लिए निर्धारित हुए मंगलवार के दिन बाल नहीं काटते कटवाते और ना ही कोई सामाजिक गतिविधि में लिप्त होते हैं ।

यह अपनी-अपनी धर्म समाज संस्कृति विचारों के अनुसार मनुष्य के लिए उसके धर्म समाज संस्कृति संचालक लोगों ने निर्धारित किया है जैसे शंकराचार्य /महंत /पंडितों ने तरह-तरह के नियम हिंदू समाज के लिए बनाए , ईसाईयों के लिए विशप और फादर अपने नियम बनाए । ध्यान रखना ऐसे सबाल गुरु गोबिंद सिंह जी के अनुयायियों में ऐसे प्रश्न मत कर बैठना । नहीं तो यदि वहां पर कट्टर सिक्ख निहंग मौजूद हुए तो मुझे दोष मत देना कि पहले बताया न था ।


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