भारतीय अपनी बेहतरीन संस्कृति को छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति के पीछे क्यों भाग रहे हैं?


आपने कैसे समझ लिया कि भारतीय संस्कृति अच्छी गुणवत्तापूर्ण है । कोई व्यक्ति तो क्या पशु भी जो अच्छे बुरे का विवेक बुद्धि रखता है वह अच्छे संस्कार संस्कृति को क्यों छोड़ेगा और बुरे संस्कार संस्कृति को क्यों अपनायेगा । आखिर कुछ तो कमी है भारतीय संस्कृति संस्कार ओं में कि लोग भारतीय संस्कृति संस्कार को छोड़कर कर विदेशी संस्कृति संस्कार अपना रहे हैं जैसे इस्लामिक , ईसाईयत संस्कृति ।

भारतीय संस्कृति मित्थक /भ्रम ज्ञान/कापी राइट एक्ट /पेटेंट एक्ट पर आधारित धन प्रभाव से संचालित है जिसमें जिसके पास पर्याप्त धन नहीं उसका धर्म नहीं धर्म समाज संस्कृति नहीं ।। वह व्यक्ति धन की कमी से सत्य /वास्तविक ज्ञान से वंचित रहता है और अपने धर्म जाति जीवन को धार्मिक मिथकीय अवधारणा से जीता है जो सच कम और झूठे ज्यादा होते हैं ।। जिसके पास धन नहीं है देने को गुरु जनों को वह फोकटिया /मुफ्त के ज्ञान की तलाश में समाज में फोकटिया ज्ञान स्थल सत्संग सभा समारोह संगोष्ठी ओं में आजीवन जाता /घूमता रहता है और घूम घूमकर भ्रम ज्ञान एकत्र करके अपने जीवन को भ्रम से जीता रहता है ।। जिसके पास धन नहीं है वह कापी राइट एक्ट पेटेंट के तहत तरह तरह की मिथकीय अवधारणा भरी भ्रम पैदा करने वाली अनेक असंख्य किताबों /पुस्तकों को आजीवन पढ़कर जीवन भर अपने जीवन को तरह-तरह के किताबों के मुताबिक मिथकीय भ्रमणीय कथन संग्रह करके अपने जीवन को भ्रमर /भंवरे के समान जीता है । हिन्दू है तो कभी मुसलमान बनना चाहता है तो कभी ईसाई बनना चाहता है कभी सिख बनना चाहता है कभी बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर बौद्ध बनना चाहता है कभी जैन बनना चाहता है ।। लेकिन जो लोग अपने हिंदू धर्म को छोड़कर कर दूसरा धर्म अपना कर दूसरे धर्म मतावलंबी बने हैं क्या उनकी सोच मानसिकता में कोई अंतर आया है तो उसका जवाब है नहीं ।। ब्राह्मण इस्लाम धर्म में इमाम मौलाना उलेमा मुफ्ती बना है ईसाई धर्म में फादर कामिल बनता है सिख धर्म में ग्रंथी बना है बौद्ध धर्म में भंते जैन धर्म में मुनि या श्रमण बनता है । ठाकुर इस्लाम में पठान , ईसाई धर्म में जैकब ,सिख धर्म में निहंग बनता है । बनिए ने सभी धर्मों के ठेकेदार जनों को धन दौलत देकर अपना धर्म अहम् वर्चस्व कायम रखा है इसके बाद बड़े स्तर पर श्रमिक जातियों के धर्म परिवर्तन का वृत्तांत हिंदू जलसेवक जातियों के लोग इस्लाम में सक्का भिश्ती , नाईयों को हज्जाम सलमानी में बदला है हिंदू खटीक कटारिया मुसलमानों कसाईयों में बदल गये । कारण में कि उन्होंने अपने आप अपनी इच्छाओं के अनुसार हित में कभी सोचना सीखा ही नहीं अपना व्यवसाय परक सोच नहीं बदली ।उनकी सोच सदैव मुफ्त में डाउनलोड हुए ज्ञान पर आधारित होती है । जिसका परिणाम लाभकारी कम हानिकारक ज्यादा होता है । जिन्होंने अपना हिन्दू धर्म समाज संस्कृति छोड़कर दूसरे धर्म समाज संस्कृति को अपनाया था तो उसका पहला मूल मुख्य कारण धन से प्रभावित होकर धन लेकर धर्म बदलना रहा है दूसरा मुख्य कारण जब अपने धर्म भाईयों से सुविधा सम्मान सुरक्षा ना मिली तब दूसरा धर्म अपनाया , लेकिन यहां पर भी मुख्य कारण धन प्रभाव प्रधानता रही ।आज भी यह धर्म समाज संस्कृति परिवर्तन की बिमारी बरकरार है ।

धर्म जाति संप्रदाय संस्कार संस्कृति एक सामाजिक राजनीतिक परिवारिक संगठन व्यवस्था होती है /बनी हुई है जो मनुष्य ने अपने मुश्किल समय के लिए बनाई है प्रत्येक धर्म समाज संस्कृति जाति संप्रदाय संस्कार संगठन व्यवस्था का वैज्ञानिक वैधानिक कारण आपस में सहयोग सहायता पर आधारित/निर्भरता है जब किसी भी धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय में लोगों में आपसी सहमति सहयोग सहायता भावना कम से कमतर होती हुई लुप्त हो जाती है तो वह धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय सभी संस्कारों सही शिक्षा ज्ञान विज्ञान की कमी से लुप्त /नष्ट हो जाते हैं । ऐसे में उस विलुप्त प्राय सभ्यता संस्कृति वर्ग जाति धर्म संप्रदाय के लोग सहयोग सहायता संस्कार की कमी से दूसरे उस धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति धर्म संप्रदाय की ओर रुख किया करते हैं जिनमें सहयोग सहायता संस्कृति संस्कार भावना पायी जाती है ।यही सब हिंदू धर्म समाज संस्कृति में आज घटित हो रहा है । ऐसे में पढ़े लिखे विद्वान शिक्षित लोग पाश्चात्य संस्कृति संस्कार की ओर शिक्षित वर्ग रुख कर रहा है ।। तो अशिक्षित निर्धन गरीब लोग अपनी सूविधा सुरक्षा मान सम्मान इस्लाम धर्म समाज संस्कृति में अनुभव करते हुए मुसलमानों में निकट जा रहे हैं ।

कहने का अभिप्राय यह है कि जब भी लोगों को अपने धर्म जाति संप्रदाय समाज संस्कृति के लोगों से सहयोग सहायता संस्कार संस्कृति शिक्षा सही नहीं मिलती है तो वे अपने जीवन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए सुविधा सुरक्षा सहायता देने वाले मनुष्य ओं के नये या पुराने धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय संगठनों की ओर जाने लगते हैं ।अपना घर परिवार धर्म समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय संस्कार संगठन व्यवस्था को छोड़कर दूसरे लोगों के धर्म संस्कृति शिक्षा समाज संस्कृति वर्ग जाति संप्रदाय को अपनाने लगते हैं ।।शेष है.

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