साधक लोग ब्रेन मैपिंग माइंड सेटिंग में एक्सपर्ट होते हैं वह अपने विचारों को अपने अनुसार नियंत्रित करना सीख जाते हैं और उनकी शारीरिक एक्टिविटी भी उनके विचार और इच्छा के अनुसार होती हैं जिससे जिससे वह न्यूनतम जैविक ऊर्जा व्यय करते हैं जो थोड़े से भोजन से भी संतुलित बनी रहती है या पूरी रहती है जिसस शरीर को , मस्तिष्क को पूरा पोषण मिलता है ।
चेहरे पर तेज/चमक का एक बेसिक /पहला साधारण नियम है कि यदि मन में कोई चिंता तनाव/दबाव न हो भोजन /खान-पान पुष्टि कर हो , दूसरे नियम मेहनत के अनुसार भोजन किया जाय , तीसरे नींद /निद्रा मेहनत के अनुसार आती रहे तो चेहरे पर चमक/तेज अपने आप आ जाता है । भोजन में प्रोटीन वसा विटामिन खनिज लवण उचित अनुपात में हैं तो चमक /तेज स्वत आती है ।
वैज्ञानिक व्याख्या मानव मस्तिष्क में अरबों न्यूरोंन /तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं और प्रत्येक न्यूरोंन कोशिका में ऊर्जा उत्पादन कर्ता ईकाई माईट्रोकोन्डिया की संख्या ५००००से २०००००तक होती है कार्य आवश्यकता के अनुसार । अधिक चिंता करने से या व्यर्थ की चिंता की आदत पड़ जाने पर मानसिक रोग लग जाने पर, दुष्चरित्र व्यवहार स्वभाव बन जाने पर मनुष्य जितना भोजन खाता है उससे ज्यादा व्यर्थ के कामों में अपनी शारीरिक मानसिक ऊर्जा व्यय करता है जिससे उसके अवचेतन मन को शरीर की पूर्ण मरम्मत करने का अवसर नहीं मिलता है जिससे अति वायु कुपित शरीर बन जाने से /उच्च आक्सीकरण दर शरीर बन जाने से ,तन और मन दोनों ही की सैटिंग ख़राब हो जाती है । जिससे शरीर की चमक उड़ जाती है चेहरा निष्तेज हो जाता है।
जो लोग साधक स्वभाव के उत्तम चरित्र होते हैं जिनको भोजन और श्रम /थकान दायक मेहनत का ज्ञान हो जाता है , वे मानसिक श्रम व्यर्थ चिंतन और शारीरिक श्रम पर दृष्टि पात निरंतर बनाये रखने से , तथा भोजन के श्रम अनुपात के प्रति जागरूक होने से अपने तन मन की ऊर्जा का अपव्यय नहीं करते हैं । जिससे उनका अवचेतन मन शरीर की मरम्मत आवश्यकता अनुसार करता रहता है । शरीर पर विशेष चमक और चेहरा तेजपूर्ण बना रहता है ।
साधक लोग अपने दिमाग में ज्यादातर के फालतू विचार नहीं रखते हैं । वह समाज के दूसरे लोगों से सहानुभूति कमतर रखते हैं ,नहीं रखते हैं । ऐसे में वह समाज के संगठन क्षेत्र से अलग रहते हैं ।। उनके ऊपर किसी का भी सामाजिक दबाव नहीं पड़ता है और ना ही वह किसी मनुष्य से परिवार से जाति से सहानुभूति रखते हैं जिससे दूसरे मनुष्यों के समस्याएं संभावनाएं महसूस कर सकें , ऐसे में उनके मन मस्तिष्क के पास उनकी अपनी थोड़ी सी सीमित समस्याएं होती हैं जिनका वे निदान भी जानते हैं और अनिष्ट की आशंका से चिंतित की चिंता नहीं करते ।। साधारण मनुष्य के मन मस्तिष्क पर उनकी अपनी सामाजिक समस्याओं का चिंतन भार होता है इसके अलावा वे समाज में घर परिवार में जिन लोगों से जुड़े रहते हैं उनकी भी समस्याओं का चिंतन भार अपने मन मस्तिष्क पर संवेदनशीलता के गुण से डालते रहते हैं ।जिससे उनके मस्तिष्क का चिंतन भार बढ़ जाता है चिंता की संख्या बढ़ जाने से चिंता सामाधान या चिंता हल करने की क्षमता घट जाती है जिससे वे अक्सर उदास, उदगिनर खिन्न निराश रहते हैं । समय-समय पर दूसरे लोगों की चिंताओं का चिंतन होते रहने से उनका मस्तिष्क उनकी निजी जैविक ऊर्जा को अकारण व्यय करता रहता है ।। जो उनके किसी काम नहीं आती जबकि साधक लोगों के पास दूसरों की कोई समस्या नहीं होती उनकी अपनी चिंता चिंता समस्याएं कम होती हैं जिसका हल समाधान वह जानते हैं । जिससेउनके शरीर में जैविक ऊर्जा पर्याप्त होती है । इसके अलावा उनके अवचेतन मन की कार्यप्रणाली नियंत्रित रहने से उनका हृदय धड़कन सामान्य बनी रहती है उन्हें निद्रा सामान्य आती है जिससे उनका और चेतन मन उनके तन मन की रिपेयर समय अनुसार करता रहता है । जिससे उनके चेहरे पर पर्याप्त तेज बना रहता है क्योंकि वह अनावश्यक कार्य नहीं करते अनावश्यक चिंतन नहीं करते वह श्रम केयर करने के बारे में अति जागरूक होते हैं ।
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