क्या यह भविष्यवाणी सच है,की हर 100 सालों के बाद एक महामारी होगी ?


महामारी का तो पता नहीं पर यह जरूर सुना है :- सौ साल बढ़ै वन और सौ साल बढ़ै जन यह जरूर सुना है ।

दूसरा वाक्य/कथन :- जो गया है बढ़ कर गया है /नष्ट हुआ है ।जो जीव अपनी सामान्य सीमा से ज्यादा बढ़ जाता है शरीर में वह शीघ्र नष्ट होता है जल्दी मरता है ,उसकी आयु कम होती है उसके जाति भाईयों /जातकों की तुलना में । जो जीव जाति अपनी सामान्य सीमा से अधिक बढ़ने लगती है दूसरे जीवों को खतरा बनने लगती है वह जाति भी नष्ट होने लगती है ।इस नियम की पुष्टि जीव विज्ञान की एक शाखा जीवाशमिकी का अध्ययन करने से होती है , जिसके अनुसार डायनोसोर ही उल्कापात से नष्ट नहीं हुए हैं अपितु अनेकों असंख्य जानवर और पेड़ पहले भी नष्ट हुए हैं जिनकी पूर्व में अनियंत्रित असीमित वृद्धि हुई थी । वह अब भी जीवाश्म में मिलते हैं ।पत्थर वाला कोयला पौधों का जीवाश्म ईंधन रुप है । डायनोसोर की जीवाश्म कथा से सभी परिचित हैं ।

मनुष्य हो या कोई भी अन्य जाति जीव हो जब वह दूसरे जीवों को अकारण निर्दोष होने पर मारने लगता है । या जीवों को आवश्यकता से अधिक मात्रा में मारकर उनके शरीर से जीविकोपार्जन धनार्जन करने लगता है । तो उसे नष्ट करने नियंत्रित करने का कार्य , सबकी नियंत्रण करता /जन्म मृत्यु स्वामिनी //माता प्रकृति अपने हाथ में लेकर उसे नष्ट करने /नियंत्रित करने के लिए तरह तरह की बिमारियाँ /महामारी पैदा करके उसे नष्ट करके या नियंत्रित करने का प्रयास किया करती है । यदि यह प्रकृति मनुष्य के अक्षम्य कार्यक्रम कार्यकलापों को रोकने में असमर्थ हो जाती है मनुष्य की विशेष बल बुद्धि प्रयोग यांत्रिकी क्षमता से तो ऐसे में यह अपना नियंत्रण कार्य अपने स्वामी ईश्वर को सौंप दिया करती है ।

तब ईश्वर मनुष्य को नियंत्रित किया करता है :- तब ईश्वर मनुष्य को चैताने ,चेतावनी देने के लिए मानव समाज में तरह तरह की नयी नयी व्याधियाँ उत्पन्न करता है , पहले अपने मंद हिंसक कालभैरव के द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास करता है जो मानव पशु समाज में तरह तरह की बिमारियों को पैदा करके मर्यादा हीन लोगों को अनियंत्रित व्यवहार करनेवाले लोगों को व्याधि ग्रस्त बीमार करके असाधारण असाध्य कुसाध्य बिमारियों से ग्रसित करके आचरण हीन मर्यादा हीन लोगों को यमराज के हवाले कर के नष्ट कर दिया करता है । यदि इस कालभैरव से मानव समाज के लोग नियंत्रित नहीं होते हैं ।। तब ईश्वर बिगाड़ देता है बुद्धि मनुष्य ओं की और शुरू हो जाते हैं जनता में उपद्रव उत्पात अशांति मारकाट शुरू हो जाता है ग्रह युद्ध जनता /प्रजा आपस में लड़ने लगती है ।लोग दो खेमों मेँ बंट जाते हैं कुछ अमन शान्ति का प्रयास हवन यज्ञ ,वार्ता संगोष्ठियों से लोगों को समझाने में लग जाते हैं ।कुछ लड़ाई झगड़े से लूटपाट से धन एकत्रित करने में लग जाते हैं ।ऐसे में विधाता भेज दिया करता है वीरभद्र को जो नष्ट कर दिया करता है उन बदले हुए लोगों को भी जो डरकर भक्त /सज्जन पुरुष बन जाते हैं । वीरभद्र केवल उन्हीं लोगों को जिन्दा छोड़ता है ।जो सत्य मेव जयते में विश्वास /यकीन रखते हैं । जन्म जात संत वृत्ति शान्त सज्जन भाव से पैदा हुए थे , या जिन्होंने बचपन या युवा अवस्था में सत्य ज्ञान प्राप्त होने पर सज्जन भाव अपनाया दान भाव अपनाया ,सत्य कथन अपनाया ,संतोष संतुष्ट धर्म अपनाया ,कंजूसी और व्यापार वृत्ति का आर्थिक वृद्धि का त्याग कर दिया हैं ।

परंतु जब कालभैरव और वीरभद्र भी मनुष्य की बल बुद्ध धन यांत्रिकी धूर्तता के आगे फेल /परास्त /पराजित /हार जाते हैं तब विधाता विवश होता है फिर से नयी सृष्टि सृजन करने के लिए ,इसके लिए जरूरी है ऐसे धूर्त लोगों को पूरी तरह से नष्ट करना इसके लिए विधाता भेजता है तेज हवा ( बवंडर ), अधिक जल (अतिवृष्टि) , अधिक गर्मी ( उष्ण युग ) , अधिक ठंड ( हिम युग ) लेकिन अबकि बार प्रलय आकाश से अग्नि पिंड वर्षा से एस्ट्रायड के जमीन से टकराने से होगी ।ये आकाशीय पिंड पत्थर छोटे छोटे या बड़े भी हो सकते हैं हिन्दू ग्रंथ मारकण्डेय पुराण ,शिव पुराण , ईसाई ग्रंथ बाईबिल , मुस्लिम ग्रंथ कुरान के अनुसार ।

यदि प्रकृति अपने मिशन /महाकार्य /धर्म स्थापना मेँ सफल नहीं हो पाती है तो उस महाकार्य को पूरा करने के लिए विधाता /प्रकृति नियंता अपना प्रतिनिधि महापुरुषों की फौज युगपुरुष के साथ भेजता है जिसे अवतार वाद कहते हैं ।जैसे राम के आने से पहले उनके सहायक विशेष बली भालू वानर पैदा हो गए थे बाली ,सुग्रीव, हनुमान, जामवंत, आदि .।।कृष्ण के लिए सहायक विशेष अर्जुन भीम युधिष्ठिर आदि पैदा हो गए, ब्राह्मणोँ के अति वध प्रवृत्तियों को रोकने के लिए महावीर स्वामी जैनतीर्थंकर ,गौतम बुद्ध ,सम्राट अशोक ,आदि पैदा हो गए थे ।जब मुगल मुसलमान , अंग्रेज ईसाई , और ब्राह्मण अपनी अधार्मिक ,भ्रामक ,मित्थया , कल्पित शिक्षा से मनुष्यों को मानवपशु बनाने में लगे थे तब अन्य मनुष्य ओं को मानवपशु बनाने से रोकने के लिए महर्षि दयानंद भीम सतपाल (भीमराव आंबेडकर) , राजाराम मोहन राय , मदनमोहन मालवीय ,सरसैयद अहमद खां आदि अनेक ऐसे विशेष विभूति जन पैदा हुए ।जिनके संयुक्त प्रयास से भारत क्षेत्र में रहने वाले मनुष्य मानवपशु बनने से बच गए ।

ये महा पुरुष हर समय हरकाल में पृथ्वी पर विद्यमान रहते हैं यदि ये अपना दायित्व जो ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है । जिसके लिए ईश्वर इन महा पुरुषों को विशेष बल बुद्धि प्राकृतिक अधिकारों से युक्त करके अधिकारी बनाता है । जब ये महापुरुष विशेष निज बल बुद्धि होने पर भी , राज्य अधिकारों से युक्त शक्ति मान होने पर भी अपना ईश्वरीय धर्म नियमों का पालन नहीं करते हैं । अपने अस्तित्व को अपनी निष्ठा विश्वास को समाज नियंता शासन कर्ता के आधीन मानते हुए अधर्म और अज्ञान का प्रचार प्रसार में संलिप्त हो जाते हैं । यह महापुरुष और अधिकारी गण लोकतंत्र व्यवस्था में या राजतंत्र व्यवस्था में अपने जीवन को ईश्वर नियमों के अनुसार न जीकर अपने जीवन को दूसरों के प्रभाव के अनुसार जीते हैं और दूसरे लोगों को पशुओं को उनका जीवन प्राकृतिक नियमों के अनुसार न जीने देकर उनका जीवन भी अपनी इच्छाओं अपने नियमों के आधार पर जीने को विवश /मजबूर करने लगते हैं ।ऐसे मनुष्य जिनमें विशेष विद्या बल बुद्धि है जिनमें निर्माण विनाश सामर्थ्य ह ऐसे ब्रह्म के अणु /लघु रुप ब्रह्म अणु समान जन ब्राह्मण जातक राजपुरुष नेता और प्रशासन अधिकारी समाज के लोगों को अपने विशेष वाकचातुर्य से शासन सत्ता शक्ति से समाज के लोगों को पशु बनाने लगते हैं ।। राजकीय सामाजिक नियमों की अति प्रति बद्धता से मनुष्य को पशुओं में बदलने लगते हैं । ऐसे में इन कृत्रिमता पूर्ण जीवन जीने वाले महापुरुषों ,अधिकारियों ,बैल मनुष्य ओं को नियंत्रित करने के लिए ईश्वर और प्रकृति अपनी अपनी शक्ति /ताकत दिखाने लगते हैं जिसका नतीजा यह आता है कि कार्य का परिणाम उसके विपरीत उल्टा आने लगता है ।समाज परिवार शिक्षा देने पर भी परिणाम बच्चों में पाशविक प्रवृत्तियां पैदा होने लगती हैं ।चारों तरफ समाज में मनुष्यओं में , वन में पशुओं में असामान्य व्यवहार पनपने लगता है ।चहुंओर , वैर विरोध असहयोग असहिष्णुता का वातावरण बन जाता है , तो समझो विधाता , प्रकृति , मानव जीवन पशु जीवन के विपरीत विरुद्ध हैं ।। ऐसे में जो जागरूक लोग अपने जीवन को प्राकृतिक जीवन के अनुसार जीने लगते हैं । अति संचय /कंजूस भाव /व्यापार भाव छोड़ /त्याग दिया जाता है ।। तो उनके जीवन की रक्षा सुरक्षा हो जाती है ।यदि वो अति संचय करनेवाले व्यापार बुद्धि पर बने रहते हैं तो उनका जीवन खतरे में आ जाता है ।या नष्ट हो जाता है ।।इसे कयामत कहते हैं ।। जीव जनजागरूकता से उत्पन्न परिस्थिति जनजागरण /कयामत कहते हैं ।

।अब से 1400वर्ष पूर्व अरब क्षेत्र में ऐसी भीषण विषम परिस्थितियाँ बन गई थीं ,जब मनुष्य की मौलिक मूल भावनाओं का भी उदारीकरण के चलते आर्थिकीकरण कर दिया गया था ,जैसा आज फिर से दुनिया में हो रहा है ।किसी स्त्री का पति मर गया मार दिया गया दे दो रुपये अपराध मांफ , किसी औरत के साथ ब्लात्कार हुआ या किया दे दो रुपये ब्लात्कार अपराध मांफ ,किसी बच्चों के मां या बाप मर गए या मार दिए दे दो रुपये उन यतीम बच्चों को अपराध मांफ , पैसा रुपया दो समाज बनाने को पैसा पर रुपयों पर भाड़े के मां बाप बच्चे बहन भाई सभी मिलेंगे /बन जायेंगे ,कोई नैतिक जिम्मेदारी मानव मूल्य नहीं मनुष्य दो पैरों वाला पशु बन गया था जो रुपये पैसे के लिए बंदर बनकर नाचता फिरता था आज के आधुनिक सोच के मानव की तरह ।अरब क्षेत्रों में आपसी सहमति सहयोग विशवास नष्ट होने से मनुष्यो में पशुओं जैसी सोच समझ आचरण व्यवहार बन गया था । गांव शहरों का वातावरण जंगली बन गया था ।। तब मुहम्मद साहब ने उनको समझायाऔर अरब बच गया लेकिन अबकि बार काबा बंद होना ।24घंटे लगातार चलने वाली हज यात्रा बंद होना बताता है कि अबकि बार कुछ नया होना है कि मंदिर बंद ,मस्जिद बंद ,गुरुद्वारा बंद ,चर्च /गिरजाघर बंद , बौद्ध पूजा स्थल स्तूप बंद , समर्थ समृद्ध धनी लोगों के भागकर प्राण बचाने के संसाधन रेल जहाज /वायुयान जलयान बंद बता रहे हैं , जता रहे हैं कि अबकि बार कुछ हटकर नया होने वाला है ।

इस खतरनाक परिस्थिति में अपने जीवन की सुरक्षार्थ हम सभी को अपना जीवन ईश्वरीय विधान नियमों के अनुसार जीना चाहिए और दूसरे कमजोर दुर्भाग्यपूर्ण दुर्बल मूर्ख बुद्धि मनुष्य ओं को और अन्य जीवों को भी अपना जीवन प्राकृतिक रूप से जीने देना चाहिए ।इसके लिए हम सभी को प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का संग्रह या प्राकृतिक जीवन संसाधन भूमि अधिग्रहण, क्रयविक्रय , जल व्यापार ,वायु व्यापार , आदि ना करें ।। सभी जीवों को निरधन दुरबल कमजोर मनुष्य को अपना जीवन प्राकृतिक सुविधाओं के साथ जीने दिया करें ।। यह ईश्वरीय विधान नियम हैं ।। कहने का तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य सभी का व्यापार करने लगता है हर वस्तु का मानक मूल्यांकन करने लगता है तो वह ईश्वरीय व्यवस्था को खतरा बन जाता ह ।ऐसे में सृष्टि नियंता जब सृष्टि नियंत्रण की कमान अपने हाथों में संभाल लेता है तो विनाश का अनुमान /आंकलन करना मनुष्य की बुद्धि क्षमता से बाहर की बात है ।

लेकिन हर बार पैदा हुई महामारी / अति मृत्यु दायक विशेष बीमारी एक नयी शिक्षा देकर जाती है ।

पुरानी शिक्षा संस्कृति संसकारों में परिवर्तन /बदलाव लाने की जरुरत है ।

बदलो अपने मन को ,बदलो शिक्षा को ,बदलो शिक्षा जनित धर्म कर्म काण्ड पर पर आधारित जीवन पद्धति को को , छोड़ो उन रस्म रिवाजों को आचार विचार व्यवहार को, जो तुमको मौत के दरवाजे पर ले आये ।

अपनाओ उन नये जीवन दायक नियमों को जो तुम्हारा जीवन स्थिर और लम्बा करेंगे ।

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