जीवन में दुख का मूल कारण क्या है?

जीवननाम भूमंडल पर अदृश्य आत्मा का क्षणिक दृश्य स्थिति अहसास होता है ।जो दीर्घकालिक नहीं होता है। अदृश्य आत्माओं द्वारा जो भूमंडल पर विद्यमान हैं उनके जगत में आकर रुकने जीने मरने की अवस्था व्यवस्था है । जो द्विध्रुवीय गतिविधि नियम से संचालित है।  जो धरती की आत्माएं अदृश्य आत्माओं को अदृश्य लोक से बुलाती है, उनको जीवन जीने में सहयोग करती हैं उन्हें सुखदातार  देवता आत्मा कहते हैं । इन सुख दातार दातार आत्माओं के पास पर्याप्त ज्ञान , बंल धन के कारण यह समृद्ध शाली होती हैं । जिससे यह दूसरे जीवो के जीवन को भी सुखी समृद्ध बनाने की सोच रखती हैं।। अब इनके विपरीत जो ज्ञान हीन , विपरीतमति, दुष्ट ,,  दुखी - सतज्ञान हीन  बल हीन, श्रम हीन, धनहीन दुखी आत्माएं होती हैं । जो दूसरे सुखी समर्द्ध जीवो के जीवन जीने में बाधा उत्पन्न करती हैं । जीवित सुखी जीवो के सुख संसाधनों को नष्ट करती,  छीनती हुई  जीवो को जीवन जीने में बाधा, अवरोध उत्पन्न करती हैं ।अपने दुष्ट प्रभाव की उग्रता से  उन सुखी आत्माओं को शीघ्र तरह तरह के मानसिक शारीरिकी रोग लगाकर उनकी जीवन अवधि से पहले उन्हें मृत्यु अवस्था में पहुंचा देती हैं । उन्हें सुखलेवता  या दुखीः देवता आत्माएं कहते हैं ।
          सुखदाता देवता आत्माओं के प्रभाव से हम अपना जीवन आसानी से सुविधा पूर्वक जीते हैं और जीवन के प्रति आसक्ति सद्भाव धारण कर निरंतर सुख की ओर जीवन प्रियता सुप्तभाव शाँति की ओर चलते हैं। दुखी आत्मा या दुख दाता देवता आत्माओं के प्रभाव से हम जीवन भर जागते हुए उग्र भाव अति से अशांति बेचैनी से अभाव प्रभाव प्रभाव स्वभाव  अनासक्ति भाव धारण कर दुख मार्ग की ओर चलने लगते हैं ।  समाज  में  पृथ्वी पर गरीबी निर्धनता दरिद्रता व्याधियों समस्याएं व्यापक रूप से इन्हीं दुख दाता आत्माओं के प्रभाव से व्याप्त हैं  । दुख या हानि दीर्घकालिक रिक्त का विनाश से उत्पन्न होता है,  जब कोई इच्छा दीर्घकाल तक पूरी नहीं होती तो वह दुख में बदल जाती है। दुख उत्पन्न कर देती है।  इसी प्रकार से सुख सदैव इच्छा कामना वासना पूरी होने पर/ निर्माण कार्य से होता है ,, जब तक इच्छाएं जल्दी-जल्दी पूर्ण होती रहती हैं हम सुख महसूस करते हैं।।  दुख गहरा होकर दीर्घकालिक होने से रोग में बदल जाता है जिन लोगों के दिमाग में दीर्घकालीन सतत चिंतन का रोग लग जाता है तो अक्सर उनके शरीर में दर्द रहने लगता है , दुख का मुख्य कारण निम्न स्तरीय चिंतालू  सामाजिक जीवन है , सुखों का मुख्य कारण उच्च स्तरीय चिंता हीन सामाजिक जीवन है । 
   { इस सुख-दुख की प्रक्रिया में सुखी समृद्ध लोग अपने सुखों को अक्षय बनाने के लिए सदैव अल्प बुद्धि लोगों को भ्रमित करने के लिए समाज के नीचे के स्तर पर गलत शिक्षा देकर बनाए रखते हैं । दुख प्राप्ति के मार्ग साधन संधान अनेक हैं दुख सदैव भय  से उत्पन्न होता है दुख इच्छा पूरी ना होने से होता है।  जो अब अप्पू संकल्प अवचेतन मन में जाकर दिमाग की सेटिंग खराब करके सोच आदत व्यवहार खराब कर देता हैं।  इसके अलावा दुख -- शब्दों के द्वारा बाबू बाँस  शिक्षक आप्तानी प्रिय जनों से प्राप्त होता है । जो मन के ऊपरी चैतन्य स्तर में तरह-तरह के गलत शब्द डालकर मस्तिष्क को दूखी कर देते हैं । ।।  इसके अलावा दुख शब्दों चित्रों फिल्म व्हाट्सएप फेसबुक द्वारा अपने मित्र बंधुओं से प्राप्त होता है यह सबसे हल्का कृत्रिम दुख होता है जो निद्रा से शांत हो जाता है सबसे खतरनाक प्रकार का दुख न  सुलझने योग्य असंभव समस्याओं के द्वारा शिक्षित महाबली शत्रुओं द्वारा बना कर दिया जाता है । जो शुगर में रक्तदाब कैंसर जैसी भयंकर रोगों में बदल जाता है समस्त रोग इसी प्रकार से नकारात्मक समस्याओं से उत्पन्न दुख से पैदा होते हैं ।}
 । जब यह निकम्मी श्रमहीन सतज्ञान हीन  दुख दाता आत्माएं सुख की इच्छा करती हैं तो यह जो सुख लेती वह सुखी आत्माओं के हिस्सों का लेतीं हैं  , परंतु सुखी जीवो को उसके बदले में सतत दुख देकर निरंतर  दुखी करती रहती हैं ।
     प्रत्येक जीव और मनुष्य के जीवन की निरंतरता के लिए उसके जीवन में प्रकृति द्वारा  हर दिन हर समय दो प्रकार के व्यक्ति एक सुखदेव  उसके सुखों/दुखों का देवता की व्यवस्था करके प्रत्येक जीव को सुख और दुख के मध्य में संधि स्थान पर करके रखती है ।।  जो लोग जिस प्रकार के जीव पशु मानव आदि का सर्वत्र सर्वाधिक चिंतन करते हैं उसे अपने मन में जीवन में स्थान देते हैं , उस मनुष्य से जुड़ने पर उसके गुण स्वभाव रिद्धि सिद्धि दुख सुख संपत्ति के गुण उसे अपने आप स्वयं प्राप्त होते रहते हैं । हम सुख-दुख अपनी चिंतन अवस्था से खुद प्राप्त करते हैं ।। प्रत्येक मनुष्य को उसके जीवन में सुख -- दुख के बीच नियंत्रित रखने के लिए एक फराओ /  फिरौन की व्यवस्था निर्धारित कर रखी है ।  जो उसे सुख होने पर दुख की ओर प्रेरित करती है और दुख होने पर सुख की ओर प्रेरित करती है यह फिरौनी /  फराओ नियंता लोग निरंतर सत्य को दबाने वाले झूठ का व्यवहार करने में निपुण होते हैं । दूसरों को मूर्ख बनाना उनके सामने दुख सुख हानि का विकल्प पैदा करना इन फिरौनी /   फिराओ  लोगों का मुख्य  शक्ल या शौक होता है । पहले  मेरा फिरौन /फिराओ खलनायक  बिल्लन था ।  अब दूबे है ।  जो निरंतर मेरे सुख समृद्धि घटाने दुख विपत्ति बढ़ाने की सोच कर्म रखने करने वाला सूचनादाता  है । जिन्होंने सभी लोगों को मूर्ख बनाना सीख लिया है जो सुखी होने पर उन्हें दुख की ओर ले जाते हैं और दुखी होने पर सुख की आशा दिखाते हैं ऐसे मनफिराओ  लोगों से बचना हमारा निजी विवेक ज्ञान कहा जाता है । जो दूसरे लोगों को खिलौना समझते हैं और उनके जीवन को खेलने की चीज अर्थात दूसरों के जीवन से खेलते रहते हैं । जो लोग इन मन फिराऊ लोगों को समझ जाते हैं , इनके द्वारा प्रेरित धूर्त ज्ञान भूत ज्ञान से बचना सीख जाते हैं वही सत्य ज्ञानी या सच्चा ज्ञानी है ।
   हम जितना अधिक दुखों से बचने की सोचते हैं उतना अधिक दुखों का दुखों की श्रंखला का चिंतन करते हैं । ऊतने अधिक परिमाण में दुखों को अपने पास बुलाते हैं । क्योंकि हमें जीवन जीना है और हमने  अपना जीवन जीने में दुख को सुख से ज्यादा वरीयता का स्थान दिया है । तभी तो हम निरंतर दुख चिंतन /समस्याओं की इच्छा रखते हैं ।।  काश हमने सुख पाने के लिए सुखों की चिंतन करना सुखों की अनिवार्यता सुखों की वरीयता देखकर सुखों की श्रंखला का चिंतन मनन करना सीखा होता हम भी सुख से जीना सीख जाते ।।  परंतु हमने सीखा जीवन जीने के लिए ज्ञानी बन्ना दूसरों की समस्याओं दूसरों के दुखों का निदान करना नतीजा हमने दूसरों के दुख दूसरों की सोच विचार मंत्रणा से खुद के लिए अधिक मात्रा में दुखों को आमंत्रित करना सीख लिया कि आओ हम तुम्हारा दुखों का निवारण करेंगे ।  हम ज्ञानी बने ज्ञानी कहलाए जाने लगे परंतु ज्ञानी बनने पर हमने क्या पाया अपनी सुखी होने पर भी अपने सुखों को तिलांजलि देकर दूसरों के दुखों की श्रंखला को अपने आगे लगा- लिया अब हम दूसरों के दुखों से परेशान हैं । आपने हमारी निजी दुखों की मात्रा बहुत कम है और हम दूसरों के दुखों से दुखी हो रहे हैं ज्ञानी बनने के लालच में , परंतु हम इससे ज्ञानी देवता बनने के चक्कर में मूर्खता अपना रहे हैं ।


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