वस्तुओं कृत्य कृत्या कर्मचक्रों का क्या आधारभूत कारण है ?

समस्त प्रकार के कर्मचक्रों और उनमें घूमने वाली वस्तुओं के कृत्य, कृत्या कर्मों का आधार ध्वनि है जो अपने प्रिय रुप अमृत और अप्रिय रूप विष के रूप में समस्त ब्रह्मांड में व्यवस्थित है । जो विभिन्न प्रकार के जीवों और उनके कर्म कृत्य कृत्या कृतियों के रूप में समस्त जीवों को उनके कर्मप्रभाव के रूप में विभिन्न कर्मचक्रों में घुसाकर घुमाकर निर्माण और विनाश उनके निजी निर्णय क्षमता तथा उनके सहायक निर्देशक के निर्देश ज्ञान के रूप में चला रही है। जब यह ध्वनि सूक्ष्म खंडित ऊर्जा रूप में व्यवस्थित स्थित हो जाती है तो नाद /अनुनाद में बदलकर अक्षर /क्षर रुप वाणी /वाक या बोली में बदल जाती है । जिसे मनुज अक्षर संसाधन स्रोत व्याकरण द्वारा साहित्य /ज्ञान सागर में बदल दिया करते हैं। 
   इस पर कार्लपियर्सन ने कहा है कि ब्रह्मांड में ब्रह्मांड की समस्त वस्तुओं के अंतर्गत जीवित अजीवित सभी प्राणियों का निर्माण विभिन्न ध्वनि स्रोतों से आने वाली विभिन्न आवृत्ति की ध्वनि से बने अक्षरों से हुआ है ।

          जिससे सभी जीव अक्षरों के संचित  परिणाम परिमाण के संचालकों की भावनाओं के आधार पर अपनी अपनी आजीविका जीया करते हैं। इस आजीविका कर्म में वे जीव अक्षरों को ज्ञान रूप में मस्तिष्क में अमृत विष के संचित धन रुप चित्रांकन वीडियो के रूप में संचित करते हैं। तथा अक्षरों के परिस्कृत संशोधित रूप को विभिन्न प्रकार के अन्न के अमृत विष रुप से धारण करते हुए अपने अपने हित के अनुसार रोगी निरोगी काया अवस्था में जीते हैं । अक्षरों के अति परिस्कृत संशोधित रुप महाअन्ना रुप वीर्य पुरुषों के लिए अमृत स्त्रियों के लिए विष तथ रज स्त्रियों के लिए अमृत पुरुषों के लिए विष रुप से धारण करके विभिन्न प्रकार की अमृत विष गुंणवत्ता युक्त विभिन्न प्रकार की संतान/संतति उत्पन्न करते हुए जीवन जीते हैं। जीव से जीव की उत्पत्ति के कर्म क्रम में यह अमृत विष जीवों के शरीर में घटता बढ़ता बना रहता है । जिसके परिणाम परिमाण के अनुसार वे विभिन्न मानव निर्माण विनाश क्षमता दक्षता योग्यता धारणा धारण करते हैं। उनकी यह मनुज गुंणवत्ता समयानुसार समय समय पर समयरेखा /ग्राफ के अनुसार घटती बढ़ती मुड़ती सीधी वृत्तांतिक गति करती रहती है। 

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