पशु मनुष्य की तरह वृद्धावस्था में इंद्री ही अंधे , बहरे , दंतविहीन - पोप्ले नहीं होते , जबकि मनुष्य वृद्धावस्था में इंद्री हीन अंधा , बहरा , दंतविहीन पोपला हो जाता है ! ऐसा क्यों होता है ?

मनुष्य के शरीर की दो मुख्य अवस्थाएं होती हैं, उत्साह से परिपूर्ण ऊर्जावान अवस्था और   उत्साह से हीन ऊर्जाहींन अवस्था ,   जिसे हम निराशा याने नैराश्य भी कहते हैं । जबकि पशुओं के जीवन में सिर्फ एक ऊर्जावान अवस्था होती है , पशु जीवन में कभी भी निराशा या नैराश्य अवस्था में नहीं जाते हैं । पशु अपने जीवन में जन्म लेने के बाद मरने तक अधिकतर होशो हवास में उत्साह से पूर्ण ऊर्जा पूरित रहते हैं पशु अपनी शारीरिक ऊर्जा मानसिक ऊर्जा का व्यर्थ के कार्यों में अपव्यय नहीं करते हैं। जब उन्हें जिस भी कार्य की आवश्यकता होती है वह उसी क्षण में अपनी मन ऊर्जा और तन ऊर्जा को तभी उस कार्य में प्रयुक्त करते हैं
 जैसे पशु सदैव प्रजनन कार्य में रत नहीं रहते हैं ,  वह प्रकृति के आदेशानुसार ही प्रजा धर्म या पशु कार्य में रत होते हैं ।  पशु सदैव भूखे नहीं रहते उन्हें जब भूख लगती है तो वह भोजन या मैथुन कर्म  करते हैं ।।  जबकि मनुष्य प्रजा कार्य में अपनी ऊर्जा को अकारण अपव्यय करता है,  सदैव भूखा रहता है जिसके कारण वह दूसरे जीवो को अकारण निरपराध निर्दोष होने पर भी अपने भूख व्यापार करने के लिए बिना वजह मारता रहता है और भूख का उद्यम धन के रूप में करता है । युवावस्था में आने के बाद ऐसा लगता है जैसे मनुष्य के पास सिर्फ और सिर्फ मैथुन का ही कार्य करना उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य है वह मैथुन के लिए ही अपना जीवन जी रहा होता है । जो की बौद्धिक दृष्टिकोण से उचित नहीं है हमें अपना जीवन जीने के लिए मिला है जिसमें हम अपनी जीवन की अधिकतम समस्याओं को हल कर सके और अपने जीवन को अपने मौलिक अर्जित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपना जीवन जिए।
 । इसके अलावा पशुओं में अमूर्त चिंतन  मनन ,  ध्यान करने की क्षमता का अभाव /कमी  होती है । जिससे पशुओं में मानसिक ऊर्जा अपव्यय न्यूनतम   होता है ।   जबकि मनुष्य पढ़ाई-लिखाई  अध्ययन में, अमूर्त चिंतन मनन और ध्यान करने के  दौरान अपने निजी स्मृति क्षेत्र में/ मेमोरी में हलचल वृद्धि विस्तार ,निस्तारण डीलीट करना सीखकर अधिकतम मानसिक ऊर्जा अपव्यय करता  है वह अधिकतर निरर्थक अनुपयोगी अध्ययन ज्यादा सार्थक उपयोगी जानकारी वाला अध्ययन कम से कमतर न्यूनतम करता है ऐसे में मानसिक ऊर्जा का अपव्यय अधिकतम करता है , वह नकारात्मक निराशा वादी अध्ययन ज्यादा करता है ।  वह नकारात्मक निराशा वाली बातें ज्यादा करता है जिन्हें करने के दौरान उसकी शारीरिक मानसिक ऊर्जा का अपव्यय इतना अधिक हों जाता है , कि उसके  शरीर के जैविक कार्यों शरीर निर्माण  शरीर के सुचारू संचालन के लिए शरीर अंगों को आवश्यक ऊर्जा बहुत ही कम रह जाती है । ऐसे में मनुष्य के शरीर की दुर्गति का कारण उसके दिमाग की विकृत स्मृति अवस्था नैराश्य ,,  शरीर की विकृत रुग्णता अवस्था ऊर्जा हीनता है जो दुख से उत्पन्न होती है ।  जिसका कारण मनुष्य शरीर में तरह-तरह के विविध प्रकार के तरीकों से विकृत ध्यान करना पड़ता  है ।  परंतु उसे यह ज्ञान नहीं होता कि वह कैसा ध्यान करता हुआ अपना जीवन यापन कर रहा है । विकृत ध्यान के अलावा मनुष्य ज्ञान प्रक्रिया में तरह-तरह के असत्य गलत विकृत करने वाले शब्दों को भी दूसरे लोगों से स्वीकार कर लेता है जिससे उसे अक्सर कारण , अकारण मानसिक भय उत्पन्न होता रहता है । यदि उसका ध्यान ऊर्जा पूरित सकारात्मक आशावादी होता है तो उसके शरीर में निरोगता उत्पन्न होती है । यदि उसका ध्यान   निराशावादीता उत्पन्न  करता है। गलत ध्यान से दुख और पीड़ा अपने शरीर में उत्पन्न करता रहता है। जब मनुष्य दुख की अवस्था में अपने शरीर का ध्यान करने में मगन हो जाता है  ।  तो ऐसे में मनुष्य अपनी गलत ध्यान अमूर्त चिंतन अवस्था से अपने शरीर को स्वयं खराब करता रहता है । गलत ध्यान करने की प्रक्रिया में मनुष्य के शरीर में जगह जगह दर्द उत्पन्न होता है क्षेत्र अंग स्फुरण उत्पन्न होता है । इसके अलावा उस स्थान पर संचित वायु के उखड़ने से तरह-तरह की धातु उखड़ने लगती हैं और उसका वह अंग क्षेत्र अपने आप रोगी विकृत होने लगता है ।
    इसका विचार अथर्व वेद में कुछ इस प्रकार से दिया हुआ है जिसमें लिखा हुआ है आप जो भी काम कर रहे हैं तो काम करने का पता आपके दिमाग को निजी इंद्र को  होना चाहिए ।   शरीर की इंद्रियों को आपके काम करने का पता और तौर तरीका का पता नहीं होना चाहिए । नहीं तो आप के दिमाग की अवस्था के अनुसार शरीर की इंद्रियां निजी अहम् से  इंद्र के अवज्ञा करने से अपना धर्म छोड़ने लगती हैं । जैसे यदि भोजन कर रहे हैं तो ध्यान भोजन में होना चाहिए दांतो और जीभ में नहीं ।  यदि ध्यान दातों पर दांतों के द्वारा या जीभ में , जीभ  पर , जीभ के द्वारा किया जाता है , तो मुंह दिमाग की  सष्क्रिय अवस्था के कारण दंत विहीन हो जाता है । खाने में अक्सर जीभ कटने लगती है मुंह की त्वचा फटने लगती है ।।  इसी प्रकार से जब हम किसी को देखते हैं तो हमें अपना ध्यान उस दृश्य वस्तु पर दृश्य क्षेत्र पर करना चाहिए अपने दृश्य इंद्रियां नेत्रों में नहीं , परंतु हम अक्सर यह गलती दुनिया को देखने में भी कर जाते हैं जब हम किसी को देखते हैं तो देखने से पहले अपना ध्यान अपनी आंखों में लगाते हैं जो मस्तिष्क की निराशा नैराश्य दुख अवस्था के कारण काम करने से परेज करने लगती हैं । जिसस नेत्रों में इंद्री हीनता दर्शन क्षमता में कमी आदि अनेक विकृतियां आ जाती हैं ।  ठीक ऐसा ही हम सुनते समय करते हैं जब हम किसी की बात सुनते हैं तो हमें उसकी बात सीधे-सीधे प्रत्यक्ष सुननी चाहिए लेकिन हम सुनने से पहले अपने कानों को चेक करते हैं अपना ध्यान कानों पर लाते हैं और कान भी वही गड़बड़ी करने लगते हैं जो दांत जीभ आंख करती हैं । कान भी दिमाग की नैराश्य अवस्था ऊर्जा हीनता अवस्था के कारण उर्जा हीन क्षमता हीन होने लगते हैं मस्तिष्क को सहयोग नहीं करते हैं इसी प्रकार से कमोबेश यही अवस्था शरीर के संचालन करने वाली पेशयों के बारे में भी है ।  जबकि कोई भी पशु गति करने से पहले हाथ पैर की अवस्था की चेकिंग नहीं करता पशु अकारण अक्षर व्यायाम नहीं करते हैं वह व्यायाम में अपनी शारीरिक ऊर्जा का अपव्यय नहीं करते हैं ।। कहने का मतलब यह है कि इंद्रियां इंद्र की सहायक होनी चाहिए इंद्र की आज्ञाकारी होनी चाहिए जब हम इंद्रियों पर ध्यान धरने लगते हैं तो इंद्रियों में भी अहम भाव से स्वामित्व भाव उत्पन्न हो जाता है वह भी इंद्र के नियंत्रण प्राण के नियंत्रण से अपने को अलग समझकर अहंकारी होने लगती हैं । ऐसे में इंद्रियों के अतिअहं  बोध भाव से इंद्रियां इंद्र से दूरी बनाकर रहने लगती है । जिसकी पहचान यह है कि हम देख रहे हैं लेकिन दिमाग को पता नहीं । सुन रहे हैं कान को पता नहीं। खा रहे हैं दिमाग तो पता। नहीं चल रहे हैं हाथ पैरों को पता नहीं। ऐसी इंद्रियों की दूरी तय अवस्था में इंद्रियों के अति अभिमान के कारण इंद्रियां बौद्ध भीम प्रज्ञाहीन होने के कारण धीरे-धीरे अपने अतीत से क्षमता हीन होने लगती हैं ।
शरीर की सुरक्षा के लिए इंद्रियों का निजी धर्म बहिर्मुखी होना है जब तक इंद्रियां बहिर्मुखी हैं शरीर सुरक्षित है परंतु आजकल उल्टा ज्ञान देने वाले ज्ञानी गुरु जनों ने इंद्रियों के अंतर्मुखी होने पर बहुत अधिक जोर दिया है जिससे इंद्रियां अंतर्मुखी होने से इनकारी हो गई हैं और इंद्रियां और इंद्र के बीच एक अंतर आ गया है जिससे इंद्रियां इंद्र के नियंत्रण में ठीक प्रकार से नहीं रहते हुए कार्य कर रही हैं और जीव के अंदर इंद्र के ठीक होते हुए इंद्रियों के ठीक होते हुए इंद्रियों के कार्य करने की क्षमता में कमी आ गई है ऐसे में यदि हमें आरोग्य शरीर आरोग्य इंद्रियां चाहिए तो हमें भी पशुओं की तरह अपनी समस्त इंद्रियों को उनके प्राकृतिक मौलिक गुण बहिर्मुखी होने पर विशेष ध्यान देना होगा इंद्रियों को अंतर्मुखी होने से बचना रोकना होगा।
   मनुष्य की वृद्धावस्था में पशुओं से भी ज्यादा बुरी दुर्गति होने का मुख्य कारण मनुष्य का अपने इंद्र पर ध्यान कम अपनी इंद्रियों पर शरीर पर ज्यादा ध्यान को रखते हुए मनुष्य अपना जीवन जीते हैं जिससे अक्सर नकारात्मक विचारों के अधिक मात्रा में ग्रहण करने से इंद्रियां और मन भी नकारात्मक सोच के हो जाते हैं जो अपने इंद्र की आज्ञा का पालन नहीं करते जिसके कारण से आंखें अपने देखने का दायित्व ऊर्जा हीनता से समय  पहले छोड़ने लग जाती है जिसके कारण मनुष्य में अंधापन पहले आंशिक रूप में आता है धीरे-धीरे जो बढ़ता हुआ पूर्णतया अंधापन में बदल जाता है जिसके अनुसार पहले नजर धीरे-धीरे गिरती है उसके बाद एक आंख अपना काम बंद कर देती है उसके बाद दूसरी आंख भी अपना काम बंद कर देती है इस प्रकार से मनुष्य पूर्ण अमृता अवस्था में आकर शीघ्रता से यम पास में फंसकर चला जाता है कमोबेश यही हालत कानों की भी है मनुष्य के कान भी ऊर्जा हीनता के कारण धीरे-धीरे अपना धर्म छोड़ने लगते हैं जिससे मनुष्य को पहले मंदा सुनाई देना आरंभ होता है और बाद में वह पूर्ण रूप से बहरा हो जाता है इसी प्रकार से मनुष्य जब सांसारिक जीवन जीते हुए सांसारिक कर्मों का त्याग करना शुरू कर देता है तो जिस जीवन को जीने के लिए विधाता ने मनुष्य को सक्रिय पेशियां और पेशियां के लिए ऊर्जा की निरंतर व्यवस्था की है जब वह विधाता देखा है कि यह पेशीय के सक्रिय होते हुए भी हाथ पैर नहीं चलता तो विधाता धीरे-धीरे हाथ पैर की ऊर्जा में कटौती करना शुरू कर देता है जिस हाथ पैर की पेशियां समय से पहले निष्क्रिय डिजैनरेट हो जाती हैं जिसके कारण पेशीय के ऊपर की खाल लटकने लगते हैं।
   अब सबसे लास्ट में चर्चा करते हैं दांत हीनता या पोपलापन मनुष्य अक्सर खाना खाते समय अपना ध्यान भोजन पर न रखते हुए अधिकतर स्वाद के लालच में अपना ध्यान जीभ और दांतों पर रखता है उसके मन मस्तिष्क में खाते समय भी उसका ध्यान भोजन पर नहीं रहता उसके दिलों दिमाग में चल रहे नकारात्मक विचारों के अंधड़ पर बना रहता है जिससे उसका ध्यान भोजन में न होने से अक्सर कभी-कभी उसके दांत जीभ को काट देते हैं तो कभी दांत मुंह की खाल को काट देते हैं जब उसके दांत उसकी जीभ और मुंह के खाल को काटने लगते हैं तो उसके अवचेतन मन से दिमाग को एक गलत संदेश जाता है की इन गलत दांतों की जरूरत नहीं है जो बार-बार जीभ को काट रहे हैं मुंह की खाल को काट रहे हैं । इसका नतीजा यह होता है कि अपना अवचेतन मन उन दांतों को समय से पहले नष्ट करने का उद्यम करने लगता है । वह शरीर में दांतों को नष्ट करने के लिए कुपित वायु करने के लिए अम्लपित्त की मात्रा बढ़ा देता है यह शरीर में बड़ी हुई अमलता की मात्रा और इससे उत्पन्न हुई कुपित व मनुष्य के दांतों के समय से पहले क्षय का कारण बनती है जबकि पशुओं के अंदर केवल अपना ध्यान भोजन पर रखने के कारण पशु मरते दम तक दांत बने रहते हैं । जिससे पशु पोपले /दंत हीन नहीं  होते हैं ।  तभी तो पशु मरते समय अपने दांत साथ लेकर जाते हैं।

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