जीवन में तरक्की के स्थान पर अवनति फेलियर नाकामयाबी असफलता का क्या कारण है ?

      सभी जीवो के जीवन में तरक्की का मुख्य कारण उनकी रुचि और उनके मन के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है जहां से उनके पास समृद्धि और निर्धनता की शुरआत होती है ।
 जिसमें निर्धनता की सोच के अतर्गत पास में कुछ भी नहीं होना चाहिए घर खाली दिखाई देना चाहिए घर में कबाड़ पुरानी टूटी फूटी वस्तुएं संचित दिखाई देनी चाहिए। परंतु सब चाहिए ! इस सोच के अंतर्गत गरीबी दरिद्रता कंगाली असफलतएं घर को खाली रखने के लिए अपने आप आती चली जाती हैं । जबकि समृद्धि की सोच के अंतर्गत पास में सब कुछ होना चाहिए घर में अधिकतर उपयोगी सामान दिखाई देना चाहिए। परंतु कुछ नहीं चहिए । इस सोच के अंतर्गत मनुष्य के पास कामयाबी सफलता समृद्धि अमीरी अपने आप आती चली जाती है।
  जीवन में सफलता सफलता निर्धनता समृद्धि इन्हीं दो प्रकार की दृष्टिकोण पर निर्भर करता है जिसका मुख्य कारण आधार जीव को अपनी निजी जैविक ऊर्जा का उपयोग करना आता है या अपनी निजी जैविक ऊर्जा का उपयोग करना नहीं नहीं चाहता है। इसमें मानसिक शारीरिक ऊर्जा का जीवन में प्रयोग मुख्य कारण आधार है । जो उनकी सही या ग़लत शिक्षा दीक्षा उच्च या निम्न शिक्षा क्वालिटी के संस्कार पर निर्भर करता है। जिसे सत्यज्ञान ब्रह्म ज्ञान कहते हैं। जिन लोगों को उनके परिवार में अपने माता-पिता से जिस परिमाण में जितना* सत्यज्ञान / ब्रह्म ज्ञान मिलता है। वह अपने जीवन में उसी सत्यज्ञान ब्रह्म ज्ञान के आधार पर उतनी ही तरक्की/ विकास कर पाते हैं। यह ब्रह्म ज्ञान गोपनीय , महंगा होता है । इसे माता-पिता के अलावा कोई भी आसानी से नहीं बताता है । गॉडफादर टीचर या सद्गुरु लोग बताते हैं। अकसर लोग सस्ते ज्ञान के चक्कर में दूसरे शिक्षक गुरु लोगों से धार्मिक शिक्षकों से मुफ्त में मिले २* भ्रम ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान समझ लेते हैं जिससे भ्रम ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात अत्यधिक परिश्रम से विकास और प्रगति के दर्शन होते हैं।३* मिथ्या ज्ञान अक्सर  लोगों को बिना सद्गुरु निर्देशन के अत्यधिक मात्रा में भ्रमित साहित्य के अध्ययन करने से , पिक्चर सिनेमा मोबाइल लैपटॉप अखबार आदि से मिथ्या ज्ञान अधिक मात्रा में मिलता है। इसके अत्यधिक परिश्रम से भी थोड़ी सी ही प्रगति कर पाती है। ४* जो लोग ज्ञान के लिए पूरी तरह से दूसरों के ऊपर निर्भर रहते हैं स्वयं अध्ययन नहीं करते स्वाध्यायी नहीं होते जिनके पास उच्च कोटि के सद्गुरु मित्र मंडल नहीं होता शुभचिंतक नहीं होते अपनी निजी लाइब्रेरी नहीं होती । ऐसे लोग दूसरे लोगों से मिले मुफ्त के फोकटिया ज्ञान पर निर्भर होने से उनके द्वारा चयनित काल्पनिक ज्ञान अधिक मात्रा में प्राप्त करने से बहुत कम मात्रा में प्रगति कर पाते हैं। ५* विपरीत ज्ञान  जो लोग समाज के निम्न स्तरीय लोग अपराधी परिवार में पैदा होते हैं । दुष्कर्मा लोगों के सानिध्य में रहते हैं शत्रु बुद्धि लोगों को गुरु बनाते हैं । स्वयं अध्ययन सत्संग नहीं करते अच्छे गॉडफादर शिक्षक गुरु नहीं रखते ऐसे लोग विपरीत ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान समझ कर भ्रमित होकर विपरीत धर्म ज्ञान धारण करके जीवन भर दुःख दरिद्रता निर्धनता कंगाली गरीबी में जीवन जीते हुए धरती पर जीते जी त्रासित होते हुए नरक भोगते हैं । उनके दिलों दिमाग की सेटिंग खराब हो जाती है । जिससे यह अच्छे को बुरा बुरे को अच्छा समझ कर जीवन भर शंका संदेह के स्वभाव युक्त भीरू मन डर्रू स्वभाव शंकालु प्रवृत्ति के मन होने से  जीवन में सही फैसला नहीं ले पाते। इनको शत्रु और मित्रों का भेद स्पष्ट नहीं होता यह नफरत करने वाले ईर्ष्यालु शत्रु बुद्धि लोगों को अपने पारिवारिक रश्तेदार  संबंधी मित्र  समझ कर जीवन भर उनसे हानि उठाते रहते है। परंतु अपने ईर्ष्यालु शत्रु बुद्धि परिवार जनों रिश्तेदारों तक से बचना नहीं सीख पाते हैं । लालच और सामाजिक सुरक्षा के भय से  यह उनसे जीवन भर जुड़े हुए उनसे आजीवन हानि उठते रहते हैं । उनको नींद में भी वाहियात बेतुके सपने आकर उनकी नींद खराब करते रहते हैं। इनकी मानसिक ऊर्जा का सपनों में भी अत्यधिक अपव्यय होता है। इनको सपनों में भी इनका अवचेतन मन सही ज्ञान सूचना नहीं देता। इनके दिमाग की रिफॉर्मिंग प्रोग्रामिंग उल्टी हो जाती है।? इसका अध्ययन करना अभी शेष है
       वैज्ञानिक  आधार पर उनके शरीर में सामान्य  मानक ऊर्जा कोशिकाओं में माईट्रोकौंड्रियाओं की मानक संख्या तय से कम होती है करण की एमपी मानसिक शारीरिक परिश्रम करने में रुचि नहीं होती है । जिससे इनका सामान्य ऊर्जा स्तर और लोगों की तुलना में शारीरिक मनसिक  रूप से कम होता है । इनमें खाद्य पदार्थों के सामान्य से मंद  आक्सीकरण दर से  ऊर्जा उत्पादन  सामान्य से  निम्न होता है । धीमा ऊर्जा उत्पत्ति पैटर्न होने से  इनको थकान आलस निकम्मापन घेरे रहता है।  इनका स्टैमिना बहुत कम होता है । देर तक यह है किसी काम को लगातार नहीं कर पाते हैं यह थोड़े से परिश्रम से बहुत अधिक थक जाते हैं। इनको अपने जीवन में प्रायोरिटी लिस्ट/आवश्यक वरीयता क्रम स्पष्ट नहीं होता इनके जीवन में नींद का विशेष स्थान होता है यह अंधकार प्रिय निद्रा शयन करते हैं । 
प्रायः अधिकांशतः सभी जीवों में उनका एक सामान्य ऊर्जा स्तर होता है  एक निम्नतम ऊर्जा स्तर दूसरा उच्चतम ऊर्जा स्तर । जिसमें से अधिकतर सभी जीव  .आराम पसंद निम्न ऊर्जास्तरीय जीवन यापन करना पसंद करते हैं । अपने निजी जीवन में उच्च ऊर्जा स्टैमिना का उपयोग करना पसंद नहीं करते हैं । जिससे ऐसे लोग अपनी जीवन अभावों दरिद्रता दरिंदगी निर्धनता में  जीते हैं । जबकि तरक्की याफ़्ता लोग अपने जीवन को उच्च ऊर्जा स्तर उपयोग के अनुसार जीते हैं ।
प्रत्येक व्यक्ति / जीव को उसकि निजी आवश्यकताओं के अनुसार ब्रह्मांड से जीवन जीने के लिए निश्चित ऊर्जा की दैनिक आपूर्ति कोटेशन के अनुसार आरक्षित होती है । यह सृष्टि में ऊर्जा का पहला प्राईमरी का बेसिक नियम है ।
    अपनी को मिली ब्रह्मांड ऊर्जा में से  जो लोग अपने जीवन को निम्न स्तर की ऊर्जा से जीवन जीते हैं । ऐसे लोग जिंदगी में तरक्की नहीं कर पाते हैं ये आयाराम गयाराम होते हैं ,ये जैसे आये थे वैसे ही चले जाते हैं ,, ये अपने जीवन को सुविधाओं सुरक्षाओं के सीमित दायरे कंफर्ट जोन में जीते हैं ये अपने जीवन में रिस्क नहीं उठाया करते हैं ,खतरों से दूर रहते हुए अपने जीवन को जीते हैं कुल मिलाकर यह संघर्षों से बचकर जीवन जीते हैं संघर्ष का सामना यह स्वयं नहीं किया करते हैं अपितु इनके पास संघर्ष निस्तारण समिति फोकटिया वकीलों , राड़ी योद्धाओं , नशैंड़ी सलाहकारों -  की फौज होती है  जिनकी ये अपने जीवन में रक्षणीय सेवाएं लेते हुए अपना संघर्षहीन जीवन जीते हैं ये सारी उम्र दूसरों को लड़ाते रहते हैं लेकिन खुद कोई भी लड़ाई झगड़ा बखेड़ा नहीं लड़ा करते हैं ।।
   परंतु जो लोग ब्रह्मांड से मिली दैनिक ऊर्जा को उच्चतम स्तर उपयोग करते हुए अपना जीवन संघर्षों से घिरे घिरे हुए रहते हुए अपने जीवन को सत्यता पूर्वक आवश्यकता अनुसार संघर्ष शील परिस्थितियों के अनुसार जीते हैं । अर्थात जो अपने शरीर की विद्यमान व्याप्त ऊर्जा अपने स्टैमिना का अधिकतम उपयोग करना जानते हैं। ऐसे लोग जीवन में तरक्की कर पाते हैं यही जी
G गिफ्टिड / विशेष पुरुष के स्तर से आगे के प्रगति पुरुषों की लाईन में विपरीत परिस्थितियों में अपना जीवन जीने वाले विप्र /विशेष पुरुष से आगे  महापुरुष (नेता ) विधाता पुरुष (विधायक) विधान निर्माता ( मनु ) संविधान की रक्षा करने वाले विधानवरदे  इंद्र पुरुष से भी आगे की छठी युग परुष की श्रेणी में गिने जाते हैं ।
      जो लोग अपने शरीर की मानसिक शारीरिकी ऊर्जा का न्यूनतम ऊर्जा का उपयोग करते हैं। यदि अगर बुद्धिमान भी हैं तो भी उनकी आराम पसंद लग्जूरियस लाइफ उन्हें मेहनत से दूर ले जाती है और ऐसे लोग जिंदगी में निकम्मे आलसी जीवन जीते हुए विशेष तरक्की नहीं कर पाते हैं । कहने का अभिप्राय यह है यदि गधा भी अपने शरीर की अधिकतम ऊर्जा का उपयोग करता हुआ अपने जीवन को जीता है तो वह भी अपने जीवन को घोड़ों के स्तर में ले जा सकता है ।  वैसे गधा का घोड़ा बनना प्रकृति में असंभव है । तो ऐसे में उसे हम प्रगतिशील गधा कहेंगे ,  परंतु यदि घोड़ा अपनी समस्त शारीरिक उर्जा का अपने तरीके से इस्तेमाल ना करते हुए उसमें से थोड़ी सी ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीता है तो वह अपने जीवन को गधा स्तर में ले जाता है ।
     कुछ ऐसी ही कहानी मनुष्य की है जो समाज के विधायक दिशानिर्देशक  लोग हैं जैसे नेता गण  शिक्षक , वकील , जज , प्रशासनिक अधिकारी ,  चिकित्सक , इंजीनियर ,निर्माणी उद्योगपति आदि  यह लोग यह अपने शरीर में विद्यमान मानसिक शारीरिक  ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करते हैं । इसके अलावा दूसरे कुछ मेहनत कश परिश्रमी लोग भी होते हैं जो अपने शरीर में विद्यमान ऊर्जा में से केवल शारीरिक ऊर्जा का उपयोग भी अपने हिस्से अपने हिसाब से कम से कम करने की कोशिश करते हैं , तथा अपनी मानसिक ऊर्जा का उपयोग नहीं किया करते हैं ,,  जिससे वह अपनी शैक्षिक परिश्रमी  उपलब्धि अधिक नहीं दिखा पाते हैं ।  ऐसे लोग निम्नतम स्तर में ही अपना जीवन जीते हुए चले जाते हैं । 
   इसका सबसे बुरा मुझे अनुभव रॉबर्ट ग्रीन की किताब से हुआ जो शक्ति के 48 नियमों की तो बात करती है परंतु उन नियमों में सबसे पहला नियम अपने जीवन में कम से कम ऊर्जा का उपयोग करते हुए अपने जीवन को अधिक समय तक जीना बुद्धिमानी है की पैरवी करती है  ।। यह नियम बहुत से लोगों के द्वारा दुरुपयोग में किया जा रहा है जो अधिकतर बुद्धिमान लोगों को यह मूर्खों  की लाइन में ले जा रहा है । जबकि वह मूर्ख नहीं है परंतु निम्न स्तरीय ऊर्जा उपयोग उपलब्धि होने से उनकी गिनती मूर्खों में हो जाती है। 
  इस विचार का एक अन्य आधार नियम भी मेरे दिमाग में आया एक केमिस्ट्री ऊर्जा नियम जो परमाणु सिद्धांत के अनुसार कक्षा उपकक्षा नियम KLMNO 2, 8, 18   32 तथा   एसपीडीएफ s p d f  के अनुसार 2, 6, 10, 14  है  यह रासायनिक ऊर्जा उत्पत्ति नियम केमिस्ट्री में से उत्पन्न हुआ है परंतु यह नियम बायोलॉजी में जैविक ऊर्जा उत्पत्ति के रूप में दौड़ रहा है । जिसके अनुसार मनुष्य चार मुख्य ऊर्जा श्रेणी गुंण K काइनेटिक रक्त शर्करा स्तर 60 से 120 यह बुद्धिहीन श्रेणी के लोग जीवन में तरक्की नहीं करते , L लेबर रक्त शर्करा स्तर 70 से 140 यह अपने जीवन को दूसरों के दिशा निर्देशों के अनुसार जीते हैं अपने जीवन में बहुत ही काम तरक्की कर पाते हैं ।Mमशीन रक्त शर्करा स्तर 80 से 160 जीवन में तरक्की की शुरुआत इस स्तर से आरंभ होती है । N निरंतर परिश्रम करने वाले रक्त शर्करा स्तर 90 से 180 यह लोग अपने जीवन में आशा के अनुसार प्रगति करते हैं ।,O मशीन और समूह संचालक रक्त शर्करा स्तर 100 से 200 तक  होते है यह लोग अपने जीवन में आशा से बहुत उच्च स्तर तक जाकर प्रगति करते हैं। रक्त में शर्करा की उपलब्धता का स्तर मनुष्य के मानसिक कार्य करने पर अधिक निर्भर करता है जो लोग मानसिक श्रम अधिक करते हैं उनके रक्त शर्करा का स्तर अक्सर ऊंचा होता है।
     परंतु मनुष्य जातियों में प्रगति और अवनति करने का एक अलग नियम अस्तित्व में आया है जिसके अनुसार सभी लोग अपनी अपनी प्रगति के लिए खुद को शिक्षा पर आधारित कहते हैं। परंतु शिक्षा से प्रगति नियम में फ्रांसिस गाल्टन, और कार्ल पियर्सन के अनुसार शिक्षा में भी प्रकृति का 10% प्रोग्रेसिव रूल अप्लाई हो जाता है जिसके अनुसार शिक्षित होने के दौरान हमारी शिक्षा बीते हुए समय के अनुभवों पर आधारित होती है हमारे भविष्य की प्रोग्रामिंग भविष्य के अनुसार सही सटीक ना बैठ पाने से हमारी शिक्षा प्रगति की कसौटी पर पूरी तरह से सही नहीं बैठ पाती । हम भूतकाल की शिक्षण अनुभव पर आधारित होने से वर्तमान में जीवन जीने के स्थान पर उनसे एक तारा आगे कि भविष्य में जीवन जीने की सोच बनने लगते हैं । 
   इन सभी में सबसे खराब सबसे शोचनीय स्थिति उन उच्चश्रेणी की सज्जन आत्माओं की होती है जो अपने किसी पूर्व जन्म के पाप से अभिशापित होकर अगले पुनर्जन्म में निम्न ऊर्जा स्तर के गरीब निर्धन कंगाल कंजूस दरिद्र अपराधी निम्न जातिय निम्न स्तरीय परिवारों में पैदा हो जाते हैं इन परिवारों में नफरत हिंसा स्वार्थ अनाशक्ति निर्मोहीपन धनाशक्ति लूटपाट छीन झपट्टा कृपणता सहयोग असहकार लोगों के दिलों दिमाग में भरा रहता है । कोई किसी की आपत्ति काल में भी मदद करना पसंद नहीं करता परंतु सब एक दूसरे से मदद की आशा लगाए रहते है । जिससे इनमें तन मन धन तक की सेटिंग खराब रहती है इनकी आत्मा और प्राण अन्न धन में बसते हैं । इनकी खराब शिक्षा दीक्षा के प्रभाव से मन तो क्या प्राण और आत्मा तक की सैटिंग खराब हो जाती है जिसको फिर से सुधार संशोधन परिष्कार करना उनके लिए उनके जीवन में बहुत बड़ी चुनौती साबित होती है। ऐसे लोग प्रज्ञा संज्ञान उदित होने पर वृद्धावस्था में आत्मज्ञान प्राणज्ञान उदित होने पर ही तरक्की कर पाते हैं। इनका बचपन और युवावस्था परिवार में समाज में अकारण व्यर्थ के संघर्ष में जाति समाज परिवार से मिले भ्रमित ज्ञान और असहयोग से व्यतीत होता है। 
शेष ह

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