इस ऊर्जा रूपांतरण के ऊर्जा स्थिरीकरण के नियम के अनुसार भौतिक ऊर्जा लगभग अनियंत्रित होती है , रासायनिक ऊर्जा अर्ध नियंत्रित होती है ,, और जैविक ऊर्जा अधिकतम नियंत्रित होती है । सभी सजीव जीवो के शरीर उनके शरीर में स्थित जैविक ऊर्जा के आधार पर बने होते हैं । यह जैविक ऊर्जा समय-समय पर भौतिक कार्य करने के दौरान या अवस्था परिवर्तन की आवश्यकता के अनुसार घटती बढ़ती रहती है , जिससे सजीवों के शरीर बढ़ते . घटते . बनते . बिगड़ते, नष्ट होते रहते हैं । जिन लोगों /जीवोंके शरीर में इस जैविक ऊर्जा का उपयोग न्यूनतम होता है उनके शरीर अधिकतम समय तक सक्रिय निरोग युवा रहते हैं उनके बाल अधिकतम आयु की सीमा तक काले बने रहते हैं । उनकी त्वचा के मेलेनिन कोशिकाएं पूर्ण परिमाण में या अल्प परिमाण में सुरक्षित रहती हैं ।
परंतु जो लोग अपनी इस जैविक ऊर्जा का पूर्ण क्षमता से दोहन किया करते हैं । अपनी जैविक ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करते हैं उनके शरीर की मेलेनिन कोशिकाएं जैविक ऊर्जा की कमी पड़ जाने के कारण बननी कम हो जाती हैं । जिससे उनके बाल सफेद होने लगते हैं । जब वह अपनी जैविक ऊर्जा का सामान्य क्षमता से अधिकतम उपयोग करने लगते हैं। तो उनकी त्वचा के मेलेनिन कोशिकाएं तक धीरे-धीरे बनना बंद हो जाती हैं । यहां तक कि पहले उनके केश अधिक मात्रा में सफेद होने लगते हैं । वह समय से पहले वृद्ध दिखने लगते हैं ।।
किसी भी मनुष्य के बालों का सफेद होना उसके अत्यधिक मानसिक चिंतन प्रवृत्ति को व्यक्त करता है । कि वह मनुष्य अपनी जैविक ऊर्जा का अधिकतम उपयोग मानसिक चिंतन में कर रहा है। जिससे उसके शरीर की अन्य कोशिकाओं की अधिकतम जैविक ऊर्जा उपयोग /दोहन क्षमता से अधिक मात्रा में होने से मैलैनिन कोशिकाओं को स्वस्थ रहने के लिए अपना पिगमेंटेशन /रंग बनाने के लिए पर्याप्त जैविक ऊर्जा A.T.P # A.D.P. ऊर्जा पैकेट निर्माण प्रक्रिया सामान्य नहीं अपितु ऐसा मान्य है।
जो प्रोटीन संश्लेषण के दौरान आवश्यकता अनुसार सम्यक रूप से उपलब्ध नहीं मिल पा रही है । जिससे उसके शरीर की अन्यमैलैनिन कोशिकाएं ,अस्थि कोशिकाएं ,दंत कोशिकाएं लिंगीय कोशिकाएं के एक निश्चित समय पश्चात नष्ट होने के बाद फिर से दोबारा मरम्मत के द्वारा जल्दी नहीं बन पा रही है । जिससे शरीर अपना कार्य पूर्ण निष्ठा से सही तौर पर नहीं कर पा रही हैं । जिससे उसकी मैलैनिन कोशिकाओं के अलावा शरीर की अन्य आवश्यक कोशिकाएं जैसे अस्थि कोशिका त्वचा कोशिका रक्त कोशिका आदि सही रूप से नहीं बन पा रही है । उनकी अधिकतम संख्या नष्ट होती जा रही है वे न्यूनतम प्रमाण में बन पा रही है। परंतु अधिकतर जैविक कोशिकाएं शीघ्रता से नष्ट होती जा रही हैं । इन कोशिकाओं के शीघ्रता से नष्ट होने से मनुष्य आयु से पहले वृद्ध होने लगता है या वृद्ध दिखने लगता है । यदि मेलेनिन कोशिकाओं के अलावा अन्य आवश्यक कोशिकाएं नहीं बन पाती है । कोशिकाओं में लुप्त होने से , या कभी कभी मैलैनिन कोशिकाओं को श्वेत रक्त कणिकाओं द्वारा भक्षण करने से त्वचा में सफेद दाग या ल्यूकोडर्मा जैसी अवस्था दिखने लगती है ।जो केवल गेहुआ रंग के लोगों में या मोडिफायर जीन की अधिक सक्रियता मैलैनिन संश्लेषण कम होने पर या मैलैनिन संश्लेषण अनियंत्रित हो जाने से दिखाई देती है । जबकि यह काले लोगों में नहीं दिखाई देती परंतु एलबिनो लोगों में इस अवस्था का दिखना का कोई औचित्य नहीं है।।
इस जैविक ऊर्जा का दूसरा महत्वपूर्ण उपयोगी पक्ष जीवन के संतान उत्पत्ति क्षमता से देखा जाता है जिन जीवों के शरीर में पर्याप्त जैविक ऊर्जा संचित होती है केवल वही उचित परिमाण में संतान उत्पन्न कर पाते हैं । जिनके शरीर में जैविक ऊर्जा उत्पादन सुचारू रूप से काम नहीं करता जिसके कारण उनके जनन अंग सामान्य क्षमता युक्त ना हो करके अल्प क्षमता युक्त या निष्क्रिय रह जाते हैं वे जीव संतान उत्पन्न नहीं कर पा ये है। परंतु कुछ अनावश्यक रूप से मोटे लोगों और स्त्रियों में देखा गया है कि उनके शरीर के अंदर यह जैविक ऊर्जा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता उनकी अधिकतम जैविक ऊर्जा उनके शरीर के सुरक्षा निर्माण में प्रयुक्त होती रहती है । जिससे उनके शरीर के ऊपर जाकर अनावश्यक रूप से वास संचित होती रहती है या कुछ पहलवान को अपने शरीर में अनावश्यक रूप से प्रोटीन संचित करते रहते हैं जिससे उनके जनन अंगों को सामान्य जैविक ऊर्जा उपलब्ध नहीं हो पाती जिससे उन मोटे लोगों और पहलवान लोगों के जनन अंग उतने सक्रिय नहीं रह पाते जितने सामान्य लोगों के जनन सक्रिय होते हैं।
जैविक ऊर्जा रूपांतरण नियम के साथ-साथ जैविक ऊर्जा का संचालन संवहन विकिरण नियम भी पूरी तरह से लागू होता है जिसके अनुसार कोशिकाएं सही स्थान पर बनने के बाद पहुंचती रहती हैं ।
जैविक ऊर्जा रूपांतरण का नियम सिर्फ कोशिकाओं तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए अभी तू यह जैविक ऊर्जा रूपांतरण का नियम कोशिका निर्माण के उपरांत बने जीव शरीरों के ऊपर भी लागू होता है जिसके अनुसार जहां पर प्रारंभिक या प्राइमरी जैविक ऊर्जा हरियाली अधिक मात्रा में उपलब्ध होती है वहीं पर द्वितीय स्तरीय जैविक ऊर्जा कीट पतंग पशु पक्षियों के शरीर रूप में होती है वह उपलब्ध होती है जिसका चैतन्यता और शरीर के आकार के अनुसार शरीर में चालन होता है जिसके अनुसार इनके शरीर की कोशिकाएं आवश्यकता के अनुसार शरीर में की चुंबकीय ऊर्जा विद्युत ऊर्जा के अनुसार जाकर शरीर के आकार को बढ़ाती रहती हैं । तो इसके संवहन नियम के अनुसार अनेक जीव आक्रमण रक्षण से प्रभावित होकर समूह बनाकर गतिशील रहते हैं आपातकाल में अनेक जीव प्राण रक्षा संकट उपस्थित होने पर उसे स्थान से वेज पलायन करके भाग करके अलग दूर चले जाते हैं जिससे जैविक ऊर्जा का विकिरण /वितरण नियम का पता चलता है। मेरा निजी अनुभव ,,
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