विस्मृति भूलना क्या है ?

भूलना या विस्मृति मनुष्य का स्वाभाविक जैविक मौलिक गुण है । जिसके अनुसार मनुष्य का नित्य का सीखा गया ( दृश्य आत्मज्ञान ) अध्ययन किया गया ( शब्द ज्ञान ) सुना गया ( नाद / शब्द / ध्वनि ) ज्ञान जो नित्य प्रत्येक दिन सीखा गया अधिगम किया जाता है । वह सीखने के , सुनने के ,  स्मृत / अधिगमित  होने के पश्चात उसमें से अधिकतम अनुपयोगी ज्ञान जो भविष्य के लिए उपयोगी नहीं होता वह ‌विस्मृत / भूलना / मिटना या  क्षय होना शुरू हो जाता है । यह भूलने की / विस्मृति / स्मृति छिपने की प्रक्रिया रात्रि में निद्रा अवस्था में सर्वाधिक तेज गति से होती है । जिससे मानव मस्तिष्क अगले दिन के लिए जीवन को सुचारू रूप से जीने के लिए निम्नतम स्मृति स्टार के अनुसार  मानव को तैयार करता है । यदि स्मृति विस्मृत नहीं होती तो मस्तिष्क पर अनावश्यक स्मृति बाहर पढ़ने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता क्रमशः घटती चली जाती है ।  जिन लोगों में  विस्मृति / भुलक्कड़ की दर  स्मृति की तुलना में अधिक होती है उन्हें मंदबुद्धि या कम बुद्धि  कहा जाता है । जिसमें विस्मृति दर स्मृति की तुलना में बराबर या सामान्य होती है उन्हें साधारण मनुष्य कहा जाता है । जिन लोगों में स्मृति की दर अधिक और विस्मृति की दर कम होती है उन्हें विशिष्ट मेधावी मूर्धन्य विप्र ( विशेष प्रतिभाशाली लोग ) कहा जाता है । इस विस्मृति के  भुलक्कड़ पन के स्वभाव के जैविक पाशविक मानवीय गुणों की अनिवार्यता आवश्यकता के कारण मनुष्य के   मन मस्तिष्क में पूर्व में संचित किए गए अधिनियमित ज्ञान की सभी उपयोगी / अनुपयोगी ,  आवश्यक /अनावश्यक सूचनाएं अक्सर उनके मन के विभिन्न स्तरों में चेतन अचेतन अवचेतन सुपर चेतन  मन में चली जाती हैं या मिटकर विस्मृत होती रहती हैं । जो अक्सर आवश्यकतानुसार अवचेतन मन की आवश्यकता के अनुसार या विश्लेषण करने के पश्चात वापस आ जाती हैं । परंतु जो साधारण स्मृति स्तर के या मंदबुद्धि स्तर के लोग हैं उनके मस्तिष्क में यह संचित ज्ञान सूचनाओं का शीघ्रता से नष्ट हो जाता ह उसे  विस्मृति या भूल जाना कहते हैं । विप्र लोगों के मन मस्तिष्क में यह सूचनाएं   शीघ्रता से नहीं नष्ट होती जिसके कारण विप्र लोगों की स्मृति सामान्य जन की तुलना में अधिक उत्तम कही जाती है।
     मानव मन मस्तिष्क में छिपी अदृश्य गुप्त सुप्त लुप्त ज्ञान सूचनाओं में से आवश्यक सूचनाओं को दैनिक उपयोग में व्यवहार में लाने के लिए नित्य अध्ययन की आवश्यकता होती है । जो लोग नित्य अध्ययन नहीं किया करते हैं वे अपने जीवन में सभी आवश्यक सूचनाएं /आर्जित संचित ज्ञान के रूप में भूलते रहते हैं ।  मनुष्य मन को इस विस्मृति /भुलक्कड़पन के  दोष से बचाने के लिए, कम करने के लिए   समाज के परिवार के सभी लोगों को नित्य शिक्षण कार्य की आवश्यकता होती है । इस  के लिए शिक्षित लोगों द्वारा  शिक्षण के कार्य को दैनिक पाठन पठन लेखन श्रवण वार्ता आदि अनेक शिक्षण कार्यों की नित्य आवश्यकता होती है । तभी समाज में परिवार घर शिक्षित अवस्था में रह पाता है अन्यथा यदि शिक्षण कार्य सतत नहीं किया जाता या शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता तो ऐसे में अच्छे से अच्छा उच्च शिक्षित व्यक्ति हो या परिवार अपने आप अपनी अपनी विस्मृति के स्तर भुलक्कड़पन के अनुसार अशिक्षा को प्राप्त हो जाता है । समाज को इस अशिक्षा के अभिशाप से बचाने के लिए इस परम आवश्यक नित्य शिक्षा  अधिगम कार्य को निरंतर  बनाए रखने के लिए सभ्य सुसंस्कृत समाज के लोग प्रबुद्ध जन शिक्षक , धार्मिक शिक्षक , पंडित  , फादर आदि अनेक धार्मिक गुरु परिवार को, समाज को  शिक्षित रखने के लिए  शिक्षा को समाज में निरंतर बनाए रखने के लिए अपने अपने विविध प्रकार के तरीकों से निरंतर शिक्षण कार्य करते रहते हैं । जिससे वार्ता सत्संग या ज्ञान /प्रवचन  समागम कहते हैं ।  किसी भी समाज का परिवार का जागरूक होना उनकी सभ्यता का संस्कृति का चिरकालिक  स्थिर स्थाई होना उस समाज के शिक्षक जनों ,प्रबुद्ध जनों की सक्रियता पर निर्भर करता है । यह उस जनसाधारण की रूचि पर  जागरूकता पर निर्भर करता है ।  
           जिस समाज के लोग शिक्षा के प्रति उदासीन हो जाते हैं । शिक्षा ,  शिक्षक ,  संस्कृति का सम्मान नहीं करते  या  जिस समाज में शिक्षा का व्यवसायीकरण कर दिया जाता है या हो जाता है । वह शिक्षा व्यावसायिक समाज शिक्षा दाताओं गुरु जनों को शिक्षा के उपयोग मूल्य का भुगतान नहीं किया करता है । तब  वह फोकटिया परिवार , समाज  अंतः गोत्वा  अन्न धन का शिक्षा उपयोगिता के अनुसार भुगतान न करने के कारण अशिक्षित होकर नष्ट हो जाता है । आदिकाल से इस फंडे के कारण पुरानी शिक्षा संस्कृति सभ्यताएं स्वतः ही नष्ट होती आई हैं । आक्रामक जाति के लोगों ने रक्षक जाति के लोगों की शिक्षा संस्कृति को नष्ट कर दिया है। जिस कारण और नई-नई शिक्षा संस्कृति यहां पैदा हो रही है । अपनी अपनी सभ्यता संस्कृति को बचाने के लिए धार्मिक शिक्षक निरंतर धर्मशिक्षा देने में , राजनीतिक शिक्षक राज शिक्षा देने में, राजगुरु/ राजपुरुष / राजनेता विविध प्रकार की शिक्षाएं देने के लिए प्रयासरत हैं। सर्वतोन्खी विकास की शिक्षा देने के लिए शासकीय शिक्षक सक्रिय रहते हैं । विश्व की भौगोलिकता कि शिक्षा देने के लिए प्रभावी चैनल टीवी , रेडियो, पत्र पत्रिकाएं, व्हाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर आदि दिन-रात मनुष्य को शिक्षित करने के लिए सक्रिय रहते हैं । संविधान की शिक्षा देने का कार्य दायित्व न्यायपालिका - वकील जज कार्यपालिका भारतीय - प्रशासन सेवा ने संभाल रखा है। चिकित्सा शिक्षा देने के लिए भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद ,यूनानी चिकित्सा पद्धति, होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति, पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति मेडिकल, आदि ने मानव जीवन की आयु स्थिरता का दायित्व संभाल रखा है , कहने का तात्पर्य यह है कि तरह-तरह के कोटि-कोटि गुरुजनों ने समाज में मानव जीवन की सतत निरंतरता को सुचारू रूप से चलाने के लिए सभी अपने-अपने तरीकों से सक्रिय हैं ।
     लेकिन इन सभी के अथक प्रयासों के बावजूद मनुष्य अक्सर तरह-तरह की जैविक , पारिवारिक , सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक,  भौतिक रासायनिक समस्याओं से ग्रस्त है । कारण है कि कार्य करते रहने पर भी कार्य का सम्यक उचित परिणाम नहीं आता ह । या कार्य के विपरीत परिणाम आना समस्या को और भी बढ़ा देता है । जिससे मानव मन ज्ञान श्रोत संसाधनों की विशालता के होने पर भी समस्या ग्रस्त परेशान दुखी हो जाता है । जिसका मूल कारण है । मनुष्य को उसकी आवश्यकता के अनुसार सही शिक्षा न मिलना  या   मानव मन का , मस्तिष्क का भूलने का गुण विस्मृति अर्थात स्मृति को छुपा कर रखना । 
              इस मानव मस्तिष्क के इस दुर्गुण विस्मृति के समाधान करने के लिए इसे कम करने के लिए हम सभी को निजी तौर पर पारिवारिक रूप से सामाजिक रुप से नित्य व्यक्तिगत अध्ययन , दैनिक , साप्ताहिक , मासिक , वार्षिक अध्ययन की आवश्यकता होती है ।  नित्य अध्ययन एकल अवस्था में करने पर सीमित  प्रभावी होता है । एक व्यक्ति को शिक्षित करता है । सामाजिक सामूहिक अध्ययन करने पर विशेष प्रभावी होता ह। जिससेेेेे समाज शिक्षित होता ह ।  इस विशेष अध्ययन को करते हुए विशेष जागरूक, शिक्षित लोग अपने मन मस्तिष्क को भविष्य के लिए , अगले दिन के लिए , समय पूर्व मानसिक योजना वैचारिक रूप से , कार्य योजना पाठक पत्र बनाकर स्वयं को पहले से तैयार रखते हैं । वह अपने दिलो-दिमाग को नित्य दैनिक रूप से उचित नवीनतम सूचनाओं से सुसज्जित अपडेट रखते हैं । वह समाज में अधिकतम प्रगति करते हैं। ऐसे लोग न्यूनतम समस्या ग्रस्त रहते हैं जैसे प्रशासनिक वर्ग , शिक्षक वर्ग , न्यायपालिका वर्ग के लोग, स्वास्थ्य सेवा दाता , चिकित्सक , इंजीनियर आदि ,, परंतु जो लोग अपने मन और दिमाग को अधिकतम अध्ययन न करते हुए न्यूनतम अध्ययन करते हैं या अध्ययन करना उचित नहीं समझते उनके सार्थक अध्ययन न करते हुए निरर्थक अध्ययन व्हाट्सएप टि्वटर फेसबुक में अपना अधिक समय व्यतीत करते हैं । वह पढ़े लिखे भी अनपढ़ अशिक्षित जैसे रह जाते हैं । क्योंकि इन  ज्ञान  चैनलों पर प्राप्त ज्ञान दाताओं का बौद्धिक स्तर कम होता है या फिर वे अपने दिमाग का कूढ़ा /मानसिक कचरा दूसरे लोगों के दिमाग को खराब करने के लिए फैंकते रहते हैं अनावश्यक सूचनाओं के रूप में ।   इन अनावश्यक सूचनाओं का दैनिक जीवन में उपयोग कम होता है ये अनावश्यक ज्ञान , अज्ञान, कल्पना, मिथक किंवदंतियाँ , सूचनाएँ मानव मन मस्तिष्क पर अनावश्यक /फालतू का स्मृति भार बढ़ाकर मनुष्य के मन /मस्तिष्क की कार्य क्षमता को घटाती हैं / कम करती हैं । इन , टीवी  ,  व्हाट्सएप , फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर , कू आदि ज्ञानदाता चैनलों के दिए गए ज्ञान की  परीक्षाएं नहीं होती । ना  इस तरह का ज्ञान अनौपचारिक चैनलों से प्राप्त किया ज्ञान विश्वसनीय नहीं होता ह । यह ज्ञान शोधित उपचारित नहीं होता है । उस में अधिकतर अक्सर आपत्तिजनक ज्ञान भी आ जाता है ।  जिसकी   परख प्रत्येक पाठक को नहीं होती है । 
        ज्ञान की परख परीक्षा गुरुजनों के द्वारा ही संभव है। ऐसे ही बिना गुरु के नियंत्रण निर्देशन में  ज्ञान को अर्जित  हुए पढ़े लिखे लोग  निगुरे कहे जाते हैं ।  जो पढ़े लिखे होने पर  निगुरे गवार लोग ज्ञानी होने पर भी अपने जीवन में अधिकतम समस्या ग्रस्त रहते हैं । जो अपने जीवन में दरिद्रता विपन्नता गरीबी कटु वचन वक्ता निर्धनता में जीते हुए संसाधन हीन होकर अपने जीवन को दुखी मन से जिया करते हैं । मानव जीवन में समस्या निवारण के लिए या न्यूनतम समस्या में जीवन जीने के लिए स्वयं का नित्य शिक्षा ज्ञान दैनिक शिक्षा ज्ञान उचित कुल गुरु के नियंत्रण निर्देशन में अति आवश्यक है । जो  प्रबुद्ध  जनों ,महाशय जनों ,गुरुजनों , और धर्म जनों के सानिध्य /सत्संग से प्राप्त किया जाता है उस ज्ञान का भी कुलगुरु के द्वारा परिमार्जन /शोधन आवश्यक है । अतः कुलगुरु का परिवार में महत्वपूर्ण स्थान होता है ।
   मानव मस्तिष्क की विश्राम अवस्था का नाम विस्मृति है जो निद्रा नशा निकम्मापन या मानसिक निष्क्रियता अवस्था रूप में दृष्टिगोचर होती है। जिसके सामान्य से अधिक होने पर डिमेंशिया अल्जाइमर स्मृति भ्रंश  आदि मनोरोग उत्पन्न होते हैं । मानव मस्तिष्क की सक्रियता का नाम स्मृति है । जिसमें मस्तिष्क की सक्रियता से जीव जीवन को अति जागरूकता से जीते हैं । परंतु जब स्मृति भार  अपने मस्तिष्क की मानक क्षमता से अधिक हो जाती है तब दूसरे प्रकार के मनोरोग हिस्टीरिया सिजोफ्रेनिया असामान्य असभ्य व्यवहार उत्पन्न होने लगते हैं । ऐसी विचित्र अवस्था में मन का मस्तिष्क पर से नियंत्रण हटने लगता है । मनुष्य अनियंत्रित स्मृति तारतम्य टूटने से मनुष्य अनाप-शनाप बकने लगता है ।
         ऐसे में मन का उचित व्यवस्था से मस्तिष्क पर नियंत्रण करना आवश्यक  है ।ना कि मस्तिष्क का मन पर नियंत्रण करना । मस्तिष्क का अधिक ऊर्जावान होना और मस्तिष्क पर सम्यक समर्थ नियंत्रक बनना  मस्तिष्क की कोशिकाएं न्यूरॉन और न्यूरोग्लियल सेल्स ग्रे मैटर की अधिक ऊर्जा स्तर के मोटाई मानक से अधिक होने पर होता है ।  मन और मस्तिष्क दोनों की मिलीजुली सम्यक जानकारी एक दूसरे को साझा करने  नियंत्रित करने की क्रिया का नाम सपना वस्था है ।  जिसमें जब मस्तिष्क तनाव /दवाव से उग्र हो जाता है तो वह मस्तिष्क अपने को शांत /कूल करने /  नियंत्रण करने के लिए मन को  अतिरिक्त स्मृति भार चित्रों ऑडियो को निकालता है । जिससे मन को स्वप्न में भयंकर डर अनुभव होता है । परंतु जब मस्तिष्क शांत मन सक्रिय होता है तो वह मस्तिषक में से चयनित इच्छाएं के आधार पर आडियो वीडियो निकाल कर  प्रिय स्वप्न बनाता है जिसे स्वप्न में वह भय के स्थान पर प्रसन्नता महसूस होती है । जो दृश्य तन मन की इच्छा के अनुसार बनकर उभर कर आते हैं उस समय मस्तिष्क और मन शांत /सक्रिय  होते हैं । तब मन मस्तिष्क अपनी अपनी इच्छाओं के अनुसार  तनाव जनित दृश्यों की स्मृति समस्याओं को परिवर्तित करके निकालता है । जिससे स्वप्न मन मस्तिष्क की इच्छा के अनुसार नहीं आते और अक्सर ऐसे विचित्र अप्रिय स्वप्न जंजालिक दृश्य देख कर मन भर जाता है । भयंकर स्वप्न देख करके ऐसे भयंकर स्वप्न देखने के पश्चात खोपड़ी में उस विशेष  स्मृति स्थान विशेष पर दर्द अनुभव होता है । जो उस वक्त दर्शन के कुछ अंतराल के तुरंत बाद लगभग 5 से 30 मिनट के अंतराल में पुनः  विस्मृति या भुलक्कड़ पंन द्वारा यह दर्द गायब हो जाता है । पीड़ादायक स्मृति तनाव उत्पन्न करने वाले दृश्य के उखड़ जाने के पश्चात वह घटना घटित दृश्य मस्तिष्क के स्मृति पटल से पूर्णतया हट जाने से मस्तिष्क स्मृति भार से हल्का हो जाता है।
         कुछ लोग जिनमें नित्य शिक्षण सीखने की इच्छा नहीं होती है वह नया कुछ नहीं सीखते हैं वे आजीवन बच्चे बुद्धि बने रहते हैं वे अपने जीवन को बचपन में जीते हैं उनका शरीर बड़ा मुख्य मुद्राएं भाव भंगिमा बड़ी होती है शरीर से वे जवान या वृद्ध भी दिखते हैं परंतु उनका मन इसके विपरीत पलट या उल्टा भी होता है अर्थात ऐसे लोग बुड्ढे होकर भी बालक मन की अवस्था में जीते हैं ।

जैव विषाक्ता और जैव अमरत्व क्या है ? इसका हमारे मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ??

जैव विषाक्तता जीवो का वह गुण है जिसके प्रभाव से सभी जीव मरते हैं या अपने को मरने के लिए तैयार करते हैं या जीवन में मारक गतिविधियां अधिकतम करते हैं । आमतौर पर जैव विषाक्तता  की मात्रा  की अधिकता बच्चों में सबसे कम और वृद्ध जनों में सबसे अधिक होती है । जन्म लेने के पश्चात जैव विषाक्तता  विविधता के प्रभाव से सभी जीव बूढ़े होकर मरते हैं । परंतु जीव अमरत्व के प्रभाव से वह वृद्धि करते हुए बढ़ते जाते हैं । और तभी अपना पूरा जीवन जी पाते हैं । जैव अमृता के प्रभाव से सभी जी प्रजनन करके अपने जैसी सामान संतानोत्पत्ति उत्पन्न करने के पश्चात ही जेब विषाक्तता के प्रभाव से वृद्ध /मूर  होकर मरते हैं। 
     मनुष्य के क्रियाकलाप जैसे विनाशआत्मक कार्य अधिक मात्रा में करना व्यवहार का गर /विष के प्रभाव से क्रूरता और दुष्टता होना से मनुष्य के तन मन और विचारों में विषाक्ता का प्रभाव देखा जाता है । यह  जिन लोगों के तन में मन में  जितने प्रमाण  परिमाण परिणाम के अनुसार  जिन लोगों में होता है उसी  परिमाण के अनुसार परिवार के कुल के वंश के अनुसार अपना दैनिक कार्य व्यवहार करते हुए अपना जीवन जीते हैं । यह तन में उपलब्ध विष के प्रभाव से बीमार रहते हैं और मन में उपलब्ध उसके प्रभाव से विषैले कार्य करते हैं जैसे मनुष्य सांप की संतान मनुष्य सांप  ही उत्पन्न होती है । मनुष्य गधे की संतान मनुष्य गधा , मनुष्य बैल की संतान मनुष्य बैल आदि जीव पशुज गुणों से युक्त संतान मानव जाति में भी पैदा होती है । आम तौर पर जैव विष की मात्रा पशुओं में अधिक होती है । जिस कारण से पशुओं का जीवन कम होता है , परंतु उन मनुष्यों में भी विष की मात्रा अधिक कही जा सकती है जो अपने जीवन को पशुओं के समान भी जीते हैं और दूसरे लोगों के जीवनों को भी पशुओं के जैसा बनाने का प्रयास करते रहते हैं ।  ऐसे लोगों को विषाक्त पुरुष कहा जा सकता है । इस विषाक्त पुरुष की श्रेणी में समस्त वे समस्त मानव आते हैं जो अपने जीवन में अधिकतम विषाक्त क्रियाकलाप विनाशात्मक कार्य जैसे दूसरों की प्रगति में बाधा बनना , दूसरों का जीवन हरण करना दूसरे लोगों अपना जीवन जीने में  उनको समस्याएं उत्पन्न करना ,आदि कृत्य आते हैं । 
    आमतौर पर समाज में माता-पिता और गुरु को इस विषाक्तता से दूर रखा है परंतु मेरे विचार से माता पिता और गुरु भी इस विषाक्तता के प्रभाव से अछूते नहीं हैं । जिसके प्रभाव से विषाक्त माता पिता के द्वारा उत्पन्न संतान में विषाक्त कार्य प्रभाव विचार आते हैं । तो विषाक्त गुरु के सानिध्य में रहकर विद्या सीखने वाले शिष्य में भी विषाक्त   ज्ञान  विचार कार्य प्रभाव  आ  जाते हैं । जिसके प्रभाव से उसका अच्छा शिष्य भी उसकी विषाक्तता अपनाकर विनाशात्मक कार्य व्यवहार प्रभाव विचारों को गुरु से सीख जाता है ।  दृश्य और अदृश्य रूप में इसका परिणाम यह होता है कि वह विनाश बुद्धि या नाशखेत शिष्य समय से पहले विद्यालय छोड़ देता है । विद्या विमुख हो जाता है । ऐसे में उसे विद्या विमुख बनाने वाले विद्यालय से दूर करने वाले विषाक्त माता-पिता और विषाक्त गुरु का प्रभाव समाज में दिखाई देता है । लेकिन ऐसे विषाक्त माता पिता और गुरु को लोग अनदेखा अनसुना कर दिया करते हैं । तो दूसरी ओर यह विषाक्त माता पिता और गुरु अपने पुराने अतीत साहित्य का ब्यौरा देखकर अपने को समाज में पुजवाते हैं । जैसे कबीर का लिखा साहित्य :-  गुरु अंतिम सर्वश्रेष्ठ सत्य है ।
 कबीरा हरि के रूठते गुरु के  सर ने जाए ।
कह कबीर गुरु रूठते हरि नहीं होत सहाय ।।
उस कबीर को विष गुरु और विषाक्त माता-पिता का भांन पहचान अहसास नहीं था कि जिन्होंने उसे उत्पन्न तो किया पर अपनाया नहीं । नहीं प्यार से पालन पोषण शिक्षा दीक्षा दिया । इसी प्रकार से कबीर के गुरु ने भी उसे विधिवत रूप से अपनाकर अपने गुरुकुल में रखकर शिक्षा दीक्षा नहीं दी । और गुरु नाम देकर छोड़ दिया ऐसे लोग जो अपने शिष्य को मात्र नाम दान देकर छोड़ दिया करते हैं । और शिष्य की पात्रता योग्यता व क्षमता दक्षता के विकास गुंणवत्ता  गुप्त गौवा गुंण  पर ध्यान नहीं देते । और ना ही गुरु के विद्या प्राप्ति के पश्चात शिष्यों के  बाद जीवन पर ध्यान देते हैं । ऐसे लोग विषाक्त गुरु की श्रेणी में आते हैं । जो मां बाप अपने बच्चों के  नैतिक प्राकृतिक विकास पर ध्यान नहीं देते ,  अपितु अपने निजी स्वार्थ हित पूजा के लिए   भी अपने बच्चों से वाहियात वाक्य जैसे माता का पिता का कर्ज चुकाना , मां के दूध का कर्ज चुकाना ,,  पिता का कर्ज चुकाना . ऐसे एहमकाना  वाक्य अपने बच्चों में डाल डाल कर खुद को पुजवाते हैं इसका विषाक्ता परिणाम यह आता है कि उनके बच्चे भी उनकी विषाक्तता को अपना लेते हैं ।  उनके बच्चे भी प्रगति नहीं कर पाते , वह भी पतन के गर्त में जीते हैं या पतन के गर्त में गिरते चले जाते हैं प्रगति में बाधक बनते हैं वह भी विषाक्त माता-पिता के श्रृवण कुमार पूत की श्रेणी में आते हैं । जो अपने जीवन को अपने माता-पिता के कहे अनकहे सुने वाक्यों के आधार पर अपना जीवन जीने के लिए अपने को तैयार करते हैं परंतु उनके दिए गए शिक्षा कथन वाक्यों पर मनन चिंतन करना उचित नहीं समझते या मनन चिंतन करना नहीं सीख पाते जिससे वे अपना जीवन अपने हित के अनुसार जीते हुए अपना विकास पितर श्रेणी के अनुसार या अपना विकास अलग चेक करके अपने जीवन को माता-पिता के जीवन के श्रेणी के निर्धनता गरीबी के अनुसार ना जीते हुए अपने जीवन को सुखी समृद्ध और शांत जी सकें।
  जैवअमृत के अंतर्गत सभी जीवो में उत्पन्न होने के पश्चात अपना विकास करने अपने जीवन को  सुख शांति समृद्धि के साथ जीने का कला विज्ञान जैव अमरत्व है । जब अमृतपुर के अनुसार सभी जीव अपने जीवन को सतत निरंतर जीने की कामना करते हैं और इस भूमि पर सदैव स्थिर स्थाई बनने का प्रयास अमर होना चाहते हैं परंतु अमर होने का सौभाग्य साधारण लोगों को नहीं मिलता अमर लोग केवल इंद्र वर्ण या युगपुरुष ही हो पाते हैं ।आमतौर पर जब अमृत की मात्रा बच्चों में सबसे अधिक होती है जो धीरे-धीरे निरंतर जीवन जीने तक कम होती चली जाती है , वृद्ध में जैवअमृत सबसे कम होता है। और मृत जीव में जैवअमरत्व नहीं होता । इस जेब अमृत के प्रभाव से सभी जी अपने शरीर का मन का विकास करते हुए अपने जीवन को सम्यक रूप से जी पाते हैं । जिससे उनके जीवन में वह अधिक से अधिक निर्माणात्मक कार्य कर सकें , आवास का संतान उत्पत्ति का निर्माण मुख्य निर्माण कार्य हैं ।  जिसे उनके बच्चे  परिवार  कुल वंश जाति के अनुसार विकास कर सकें । यदि जाति विकास संभव ना हो तो अपना निजी स्तर पर मौलिक विकास कर सकें । यह अमरत्व का विशेष गुण  उनमें भी श्रेष्ठ संतान का निर्माण करना निरोग जीवन जीना ही मानव जीवन का उचित लक्ष्य है । 

गलतियां क्यों होती है?

  गलती का पुराण और महात्म्य 

 गलत सोच गलत ज्ञान और गलत काम परिणम:--  यह लाइन है मैंने अपने जोगी जोगड़ा छाप भिखारी गुरुजनों से सुनी है जो अक्सर भीख मांगने आ जाते हैं दरवाजे पर और ज्ञान देते हैं ःःःःगृहस्थ  अतिथि जनों  को बहुत भयंकर ःः :---कैसे सब ठाट पड़ा रह जाएगा जब लाद /छोड़  चलेगा बंजारा ,  जब तक बंज (व्यापारी)  तभी तक बंजारा (व्यापार) ,,  जब छोड़ दिया बंज तो कैसा बंजारा ,,,जब भाग गया बंजारा तो कैसा बंजारा  । ना करें बंज तो कैसा बंजारा ।। यही गलत लाइन है जो मुझे जन्म में जोगी जोगड़ा ओं गुरुजनों से मिली मैंने इन्हें कंठस्थ किया और अब उद्धृत कर रहा हूं जिसके ग्रहण करने से समय समय उसमें पर मेरे कंठ से अक्सर जीवन में गलतियां होती रही मैंने अपने इस गल्ली के गलता पुराण के पाठ को सर्वजन के हितार्थ अपने ब्लॉग पर इसलिए उड़ेल रहा हूं ताकि इसे पढ़कर कोई भी गलती से उत्पन्न होने पर गलत परिणाम से अपनी सुरक्षा कर सके जो ऐसी गलत लाइन अपने मन में पाले हुए हैं अपनी गलत लाइनों को मन से निकाल दे ।

  गलती का कारण गलती करते समय गलती करने वाले के दिलों दिमाग और कार्य में अज्ञान अल्पपज्ञान  जागरूकता की कमी से होता है , प्रज्ञा जैन इसे भूल कहते हैं जो उचित अवसर पर चूक हो जाती है जिसे अपनी गलती को सही तरीके से समझने और मानने का तरीका आ गया तथा दूसरों की गलती करने पर उन्हें गलत ठहरने का तरीका आता है उस एक बार गलती करके फिर से दोबारा गलती न करने वाले महाजन को अबुद्ध प्रबुद्ध जन  कहा जाता है । जिसका परिणाम किए गए कार्य का नतीजा सदैव उल्टा पूल्टा आता है गलती करने वाला गलता और जो गलती करने करने में संग लगे उसे कहते हैं गालता और जो दोनों  ही जन गलती करते समय ध्यान ना रहे, उसे कहते मुगालता ।। गलती करने का अधिकार केवल धनी बलवान बुद्धिमान हो अफसर अधिकारी लोगो गुरुजन कोटि लोगों को  है उनकी सभी गलतियां क्षम्य हैं । जन साधारण लोगों को, दास, सेवक गुलाम ,लोगों को अज्ञानी होते हुए भी ज्ञान ना होने पर भी गलती करने का अधिकार नहीं है । ऐसे लोग नासमझ होने पर अबूझ होने पर अबोध /अज्ञानी होने पर गलती करते हैं तो उनको गलती करने की भयंकर सजा मिलती है । 

      सभी सामान्य जनों को गलती करवाने का कारण माध्यम मन है जो क्षण क्षण बदलने वाला है  हर समय दूसरों को बदलते हुए  देखता है  परंतु खुद के अंदर आए बदलाव को कभी नहीं देखता है कि वह अपना ही मन एक क्षण के अंश में कितना बदल गया जबकि सबसे ज्यादा तो वही अपना मन बदला था अपने मन के बदलाव ने ही तो   परिवर्तन की  सही समझ ना होने के कारण मनुष्य से गलती कराई थी जिससे इच्छित लक्ष्य के इच्छित कर्म का परिणाम इच्छित वांछनीय नहीं आया जिसे हम गलती कहने लगते है । तो फिर गलती है क्या?  

  गलती का कारण है  अर्ध सत्य ज्ञान ,अर्ध  ब्रह्म अर्ध जीव भाव जो अपूर्णता से ग्रसित / प्रभावित होते हुए पूर्णता प्राप्ति का प्रयास आदिकाल से करता चला आ रहा है लेकिन पूर्णता है कि प्राप्त नहीं होती है। ऐसे में सभी  अपने अपने बोध स्तर से कृत्या / कर्म  करते रहने पर भी वांछित परिणाम की इच्छा रखते हैं । परंतु पूर्ण वांछित परिणाम कभी आता है । कभी नहीं आता है ऐसे में सूक्ष्मता से लेकर वृहद बुद्धि स्तर तक कर्म प्रयत्न करते रहने पर भी परिणाम इच्छा के अनुसार नहीं आता । ऐसे में ऐसे फल हीन / विपरीत परिणाम दायक कार्य को करना गलती करना कहते हैं ।। ऐसे में गलत कार्य होते हुए समय पर कर्ता का मन पूर्णतया तनमयता के साथ न देने से मन आधीन इंद्रियाँ भी कर्म करते समय   पूर्णकालिकसाथ नहीं देती हैं । ना  ही तन पूर्ण शारीरिक बल क्षमता से साथ देता है ।। उस छोटे से कर्म को करने के दौरान बार-बार मन विचलित होकर ध्यान बदलता रहता है । कार्य को पूर्ण रूप से संलग्न एक लक्ष्य एक पक्षीय होकर इंद्रियां ध्यान विचलित होते ही अपना धर्म बदलने लगती हैं । जिससे मन को कुछ का कुछ सुनाई देता है , आंखों को कुछ का कुछ दिखाई देने लगता है ,  ऐसे में थोड़ी देर को क्षणिक समय को लक्ष्य ओझल हो जाता है , और थोड़ी देर बाद जब लक्ष्य पूर्णतः दिखाई देता है ।  तब तक भयंकर गढ़बड़ गलती हो चुकी होती है । इसी क्षणिक समय की ध्यान भंगता  कर्म के परिणाम को परिणाम के अंश के अनुसार बदल देती है ।  इसी क्षणिक समय में करते कार्य के दौरान कथित  शरीर का  गिरता ऊर्जा स्तर रही सही कमी को पूरा करके नकारात्मक परिणाम देता है , सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाता ।  थके हुए शरीर से और थके हुए मन से किए गए कार्य में सफलता नहीं असफलता हाथ लगती है । क्यों होता है ? जब ऐसी नकारात्मकता का परिणाम जब हम सकारात्मक कार्य के दौरान जब हम पुनःप्रयास कर रहे होते हैं? पुनः प्रयास करके भी इच्छित परिणाम नहीं ले पाते ।

  काश हमने ध्यान जमाना  बिना अंगुलियाँ लगाए कान बंद करना शरीर को सतत ऊर्जावान बनाए रखने का मूल मंत्र एकाग्रता एक लक्ष्य एक दृष्टि सीखा होता ! कैसे होता है एकाग्रता से ध्यान भंग कैसे और क्यों हो जाता है? कैसे  लक्ष्य से दृष्टि हट /उड़ जाती है ? कैसे ओझल हो जाता है लक्ष्य ; क्षणभर में? कैसे कब बदल में बदल जाता ह शरीर चंचल भाव ?

  इन सभी के आदि मध्य और अंत में छिपा है परिवर्तन का बीज गलती या जीव का चंचल मति  स्वभाव इस गलती को ऐसा नहीं है कि हम पहली बार ही कर रहे हैं , यह गलती ही अन्य असंख्य रूपों में आदिकाल में हमारे पूर्वजों ने की ;  वर्तमान में हम कर रहे हैं और अंतः कॉल भविष्य में हमारे बच्चे हमारी संतति भी गलतियाँ करेंगे ; भरेंगे गलती का गलत नतीजा मुगालता यानी असफलता उल्टा परिणाम ।।  सही काम का तों पता नहीं था  लेकिन सही काम नहीं हो पाया ; भविष्य में भी पीढ़ियाँ गलती हो गई यह कहती रहेंगी । इस गलती को सुधारने के ,  कम करने के ,   बंद करने के, खत्म करने के प्रयास मानव की पूर्वज पीढ़ियाँ आदिकाल से करती चली आ रही है । तरह तरह से मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाने के लिए तरह-तरह की ध्यान पद्धतियां मानव ने विकसित की है ।भावतीत ध्यान, विपश्यना ध्यान ,प्रेक्षाध्यान , शरीर को ऊर्जावान बनाने के तरह-तरह के तरीके जिम योग और शारीरिक शिक्षा आजकल भी मुख्य है ।इस गलती को सुधारने के लिए गलती में कमी लाने के लिए वर्तमान समय में तरह-तरह के साहित्य का सकारात्मक सोच पैदा करने वाली पुस्तकों का उत्पादन बाजार में औद्योगिक स्तर पर चल रहा है ।  इंटरनेट पर भी व्यायाम लिखित व्याख्यान रूप में उपलब्ध है। तथा ऑडियो कैसेट श्रवण संसाधन के स्रोत विशेष वक्ता विशेष कार्य दक्ष सर संगठनों में गलती सुधारने गलती संशोधन करने गलतियों में कमी लाने के लिए विशेष वेतन पर पब्लिक ऑफिसर के रूप में नियुक्त हैं । परंतु गलतियां है कि कम नहीं हो पा रही हैं ,  ना समाप्त होने का नाम ले रही हैं । यह गलतियाँ सुरसा की संतान के समान अनेक असंख्य असीमित रूप में नित्य नहीं गलतियां सामने आ रही है फिर भी प्रयास जारी है कि गलतियां कब समाप्त होगी? कब ऐसा मानव बनेगा जो कभी गलती नहीं करेगा । मैं भी गलतियां होने से परेशान हूं ,  इन गलतियों में से ःः जो ना चाहते हुए भी हो जाती हैं।औंर इन सुरसा की औलाद गलती से पंगा ले बैठा और अब भुगत रहा हूं मैं भी अतीत की गलतियों का वर्तमान में गलत नतीजा :-- नफरत , संघर्ष, अप्रिय व्यवहार , दुर्व्यवहार , दंड /हानि , अपमान ,  जिल्लत, जलालत ,खिजालत ।इन गलतियों की अनेक प्रकार के रूपों से मिले दुखों के रूप में इन गलतियां करने की आदत सुधारने मेरा व्यक्तित्व बिगाड़ कर रख दिया है ।जबकि मैं कयी  प्रकार के ध्यान भावातीत ध्यान विपश्यना ध्यान प्रेक्षा ध्यान श्रव्य ध्यान दृश्य ध्यान संवेदी ध्यान गंद ध्यान स्पर्श ध्यान आदि का पाठ्यक्रम शिक्षित हूं लेकिन गलतियों से पार नहीं पड़ रहा है । 

अब जब अंतहीन गलतियां करने की सोच की सुरसा की औलाद गलतियों से पंगा ले लिया ,  जीवन आयु अवधि की पूर्णता का पता नहीं है तो फिर गलतियों के बाणों से घायल होने पर यदि दुख महसूस होने का अनुभव करने लगे तो संघर्ष की क्षमता उद्यम करने का प्रयास धीरे धीरे खत्म हो जाएगा  परिणाम वही आएगा जीते जी मौत:- निकम्मा पन , आलस्य  ः  यही वे मानवीय गुण है जो दुश्मन को बिना पराक्रम उद्यम के खुश करते हैं और मानव जीवन की प्रगति को समाज में जीते जी मनुष्य का पशु स्वरूप में परिवर्तन होता देखता है  परिणाम  मोक्ष ( कर्म झंझट से छुटकारा ) बुद्धिहीन होने से ( सोच से छुटकारा ) जीते जी बिना मरे नर्क की प्राप्ति ,  मरकर तो मोक्ष मानव प्राप्त करता है पर कर्मफल परिणाम से मुक्त होकर जीते जी मोक्ष का आनंद पशुज कोटि के मानव लेते हैं निष्काम भाव से कर्म हीन हो करके या फिर मोक्ष का आनंद लेने वाले वह कर्म हीन कर्म विमुख बिना श्रम करने वाले मानव होते हैं।  जो मानव कर्म धर्म के संकट में नहीं पड़ते जिन्हें हम पागल अबोध  बेबुद्धि प्राणी कहते हैं वह भी जीते हैं सबसे अधिक गलतियां तो यही अबुद्ध जन करते हैं। लेकिन इनकी गलतियां विचारणीय नहीं रहती है इनकी गलतियां माफ कर दी जाती है। यह बे बुद्धि लोग इस दुनिया में पूरी उम्र पर तंदुरुस्त रहते हैं। बिना कर्म बिना फल बिना कर्म किसी का फल किसी को दायित्व हीनता के निर्मल मन के सिद्धांत से कि उन्होंने कभी कोई बुरा कर्म किया ही नहीं तो फिर बुरे कर्मों का लक्ष्य हीनता दोष या बुरा फल वह क्यों देखेंगे  । विकर्म अग्नि के ताप से सदैव दूर रहकर बात बनाते हैं दूसरों को दिशा निर्देश देते रहते हैं पर स्वयं कर्म अग्निकुंड के निकट प्राप्त क्षेत्र में स्वयं नहीं आते इन्हें बांस कहते हैं यदि यह गलती से भूलवश कर्म के ताप /ऊष्मीय क्षेत्र में आ गए तो अपने अधीनस्थ कर्मचारी को तुरंत अग्नि ताप क्षेत्र में झांक देते हैं और आप कर्म अग्नि ताप क्षेत्र की पहुंच से दूर रहते हैं तभी तो वह बॉस (बर्न आउट  सिंड्रोम) सर्विसेज में रहते हैं उनकी सुविधा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है उनके अधीनस्थ कर्म की गलतियों का दोष उनके सिर पर मरता/मढता रहे और उनका बॉस निर्दोष रहे। बॉस की सुविधा सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है उससे कर्माणि क्षेत्र से दूर रखा जाता है।

 गलती को सुरसा संतति कहने का ख्याल मेरे मन में रावण से आया था पुराणों से पुस्तकों से भी पढ़ा था कि रावण ने गलती के साहित्य से पीएचडी की थी गुरु शुक्राचार्य के नियंत्रण में क्योंकि गुरु बृहस्पति जी ने उसे गलती पर संशोधन करने की विधा पीएचडी करने के लिए मना कर दिया था बृहस्पति जी गलती का समूल संशोधन कराने के कारण से ही देव गुरु बने थे । जबकि शुक्राचार्य जी अपनी गलती पर अडिग रहने और गलती की एवज में दूसरी बड़ी गलती करने के कारण दैत्य गुरु तांत्रिक सम्राट बने थे । उन्हें गलती में सुधार की विधा का पूर्ण ज्ञान था परंतु जीवात्मा के  सूक्ष्म रूप सीमितशिव शक्ति असीम सोच से उपजे मानव चित्त की चंचलता के स्वभाव का पता था । तभी तो उन्होंने गलती का सुधार बड़ी गलती करने करवाने का मूल मंत्र रावण को दिया था । लक्ष्य बोध के लिए रेखा ज्ञान विधा बड़ी रेखा के अंश को मिटाकर छोटी रेखा करना और छोटी रेखा में जोड़कर छोटी रेखा को बड़ी बना देना या उसके बराबर कर देना । अर्थात गलती करा कर छोटे जीव की मानसिक स्थिति खराब कर उसके अहम अस्तित्व को हीन करना , या , कम करना ,रावण को  यह दोनों तंत्र विधाएं एकाग्र मन से कंठस्थ थी तभी तो उसने कभी भी बलवान शत्रु बली सहस्त्रबाहु से पंगा नहीं लिया । निर्बल ओं को सताना महिलाओं पर पराक्रम प्रदर्शन करना उसका जीवन लक्ष्य की मुख्य आदत थी । उस समय जो भी विशेष महिलाएं थी उसने सामाजिक मान सम्मान को तिलांजलि देकर उन्हें बलपूर्वक लंका लाकर एकत्र किया था । उसके महल में महिलाओं/दासियाँ थी । जिसमें महिलाओं का रूप लावण्य स्फूर्ति का नित्य प्रदर्शन करना होता था । कहने भर को तो ये रावण की रानियां लिखी है ।रावण का मूल नाम उसके पिता विश्वेर ने क्या रखा था यह पता नहीं पर रावण का नाम उसके नाना ने रखा था जो बाद में शुक्राचार्य ने तंत्र दीक्षापश्चात रोवन रखा जिसका तात्पर्य है  दूसरों को अकारण रुलाते हुए कष्ट देकर खुश होना ।।   प्रगति के लिए मित्रों  की खुशहाली को नियंत्रित रखो , उन्हें इतना समर्थ मत होने दो की उनमें  स्वामी भाव पूरित हो जाएं । मित्रों कुटुंब सहायक जनों को   सदा पीड़ित परेशान दुखी रखो यदि उनमें स्वामी भाव दिखाई दे , तो उनकी समृद्धि की लाइन काट कर उनको निर्धन कर दो  ।  तभी वे सेवक बने रहेंगे अन्यथा समृद्धि से स्वामी भाव पाकर अपने स्वामी को समस्या ग्रस्त कर देंगे । सत्ता गई शासन गया ऐश्वर्या गया दुखाया चिंता शुरू जीवन दूभर इसलिए उसने अपने अधीनस्थ सेवकों को गलती कराने के लिए समय-समय पर उन्हें उनकी मानसिक शारीरिक बौद्धिक क्षमता से अधिक कार्य देकर गलतियां  करवाता था  उन्हें रुलाता रहता था । मित्रों संबंधियों के अक्सर रोते रहने से उनकी आत्मा हीनता अबोध मन निर्मल तन का पता चलता रहता है अतः किसी मानव को आत्मा वान मत रहने दो  आप महान होते ही वह प्रगति पथ पर चलने लगेगा और पंच मानव प्रगति स्तर पंच परमेश्वर विप्र नेता विधायक मनु इंद्र इंद्र आदि स्तरों से होता हुआ परम आत्मा स्तर तक चला जाएगा जो बाद में गिन गिन कर पुरानी रंजिश ई करतूतों के बदले गिन गिन कर लेगा ।अतः अधम शासक / बाँस का परम कर्तव्य है कि अधिनस्थ सेवकों को  पतित ज्ञान , कल्पित ज्ञान , भ्रम ज्ञान देकर उसे गलतियों के मार्ग पर निरंतर चलते रहने को मजबूर करो जिससे मनुष्य शिक्षा पाकर भी सेवक भाव  धरकर सदैव नीची नजर करके तुम्हारे सामने दीन हीन विकलांग हालत में रहेगा अतः मनुष्य को पशुध सेवक बनाओ उसे दानव स्वामी भाव से निरंतर नियंत्रित बाधित करते हुए पतित अवस्था में बनाकर रखो लगातार गलती करा कर गलती पर ताड़न पीटन कर मनुष्य को अवैध पशु बनाए रखो यह रावण का मूल शुक्राचार्य मंत्र था जिससे रावण के शासन में रावण के अतिरिक्त किसी में भी स्वामी भाव नहीं था । स्वामी भाव उदय होने पर रावण स्वामी भावधारी पर नजर रखता था और स्वामीभावधारी पर गलती करा कर मारपीट करके वह उस मानवको मानसिक पशु अवस्था में रखता था ।

जीवन में दुख का मूल कारण क्या है?

जीवननाम भूमंडल पर अदृश्य आत्मा का क्षणिक दृश्य स्थिति अहसास होता है ।जो दीर्घकालिक नहीं होता है। अदृश्य आत्माओं द्वारा जो भूमंडल पर विद्यमान हैं उनके जगत में आकर रुकने जीने मरने की अवस्था व्यवस्था है । जो द्विध्रुवीय गतिविधि नियम से संचालित है।  जो धरती की आत्माएं अदृश्य आत्माओं को अदृश्य लोक से बुलाती है, उनको जीवन जीने में सहयोग करती हैं उन्हें सुखदातार  देवता आत्मा कहते हैं । इन सुख दातार दातार आत्माओं के पास पर्याप्त ज्ञान , बंल धन के कारण यह समृद्ध शाली होती हैं । जिससे यह दूसरे जीवो के जीवन को भी सुखी समृद्ध बनाने की सोच रखती हैं।। अब इनके विपरीत जो ज्ञान हीन , विपरीतमति, दुष्ट ,,  दुखी - सतज्ञान हीन  बल हीन, श्रम हीन, धनहीन दुखी आत्माएं होती हैं । जो दूसरे सुखी समर्द्ध जीवो के जीवन जीने में बाधा उत्पन्न करती हैं । जीवित सुखी जीवो के सुख संसाधनों को नष्ट करती,  छीनती हुई  जीवो को जीवन जीने में बाधा, अवरोध उत्पन्न करती हैं ।अपने दुष्ट प्रभाव की उग्रता से  उन सुखी आत्माओं को शीघ्र तरह तरह के मानसिक शारीरिकी रोग लगाकर उनकी जीवन अवधि से पहले उन्हें मृत्यु अवस्था में पहुंचा देती हैं । उन्हें सुखलेवता  या दुखीः देवता आत्माएं कहते हैं ।
          सुखदाता देवता आत्माओं के प्रभाव से हम अपना जीवन आसानी से सुविधा पूर्वक जीते हैं और जीवन के प्रति आसक्ति सद्भाव धारण कर निरंतर सुख की ओर जीवन प्रियता सुप्तभाव शाँति की ओर चलते हैं। दुखी आत्मा या दुख दाता देवता आत्माओं के प्रभाव से हम जीवन भर जागते हुए उग्र भाव अति से अशांति बेचैनी से अभाव प्रभाव प्रभाव स्वभाव  अनासक्ति भाव धारण कर दुख मार्ग की ओर चलने लगते हैं ।  समाज  में  पृथ्वी पर गरीबी निर्धनता दरिद्रता व्याधियों समस्याएं व्यापक रूप से इन्हीं दुख दाता आत्माओं के प्रभाव से व्याप्त हैं  । दुख या हानि दीर्घकालिक रिक्त का विनाश से उत्पन्न होता है,  जब कोई इच्छा दीर्घकाल तक पूरी नहीं होती तो वह दुख में बदल जाती है। दुख उत्पन्न कर देती है।  इसी प्रकार से सुख सदैव इच्छा कामना वासना पूरी होने पर/ निर्माण कार्य से होता है ,, जब तक इच्छाएं जल्दी-जल्दी पूर्ण होती रहती हैं हम सुख महसूस करते हैं।।  दुख गहरा होकर दीर्घकालिक होने से रोग में बदल जाता है जिन लोगों के दिमाग में दीर्घकालीन सतत चिंतन का रोग लग जाता है तो अक्सर उनके शरीर में दर्द रहने लगता है , दुख का मुख्य कारण निम्न स्तरीय चिंतालू  सामाजिक जीवन है , सुखों का मुख्य कारण उच्च स्तरीय चिंता हीन सामाजिक जीवन है । 
   { इस सुख-दुख की प्रक्रिया में सुखी समृद्ध लोग अपने सुखों को अक्षय बनाने के लिए सदैव अल्प बुद्धि लोगों को भ्रमित करने के लिए समाज के नीचे के स्तर पर गलत शिक्षा देकर बनाए रखते हैं । दुख प्राप्ति के मार्ग साधन संधान अनेक हैं दुख सदैव भय  से उत्पन्न होता है दुख इच्छा पूरी ना होने से होता है।  जो अब अप्पू संकल्प अवचेतन मन में जाकर दिमाग की सेटिंग खराब करके सोच आदत व्यवहार खराब कर देता हैं।  इसके अलावा दुख -- शब्दों के द्वारा बाबू बाँस  शिक्षक आप्तानी प्रिय जनों से प्राप्त होता है । जो मन के ऊपरी चैतन्य स्तर में तरह-तरह के गलत शब्द डालकर मस्तिष्क को दूखी कर देते हैं । ।।  इसके अलावा दुख शब्दों चित्रों फिल्म व्हाट्सएप फेसबुक द्वारा अपने मित्र बंधुओं से प्राप्त होता है यह सबसे हल्का कृत्रिम दुख होता है जो निद्रा से शांत हो जाता है सबसे खतरनाक प्रकार का दुख न  सुलझने योग्य असंभव समस्याओं के द्वारा शिक्षित महाबली शत्रुओं द्वारा बना कर दिया जाता है । जो शुगर में रक्तदाब कैंसर जैसी भयंकर रोगों में बदल जाता है समस्त रोग इसी प्रकार से नकारात्मक समस्याओं से उत्पन्न दुख से पैदा होते हैं ।}
 । जब यह निकम्मी श्रमहीन सतज्ञान हीन  दुख दाता आत्माएं सुख की इच्छा करती हैं तो यह जो सुख लेती वह सुखी आत्माओं के हिस्सों का लेतीं हैं  , परंतु सुखी जीवो को उसके बदले में सतत दुख देकर निरंतर  दुखी करती रहती हैं ।
     प्रत्येक जीव और मनुष्य के जीवन की निरंतरता के लिए उसके जीवन में प्रकृति द्वारा  हर दिन हर समय दो प्रकार के व्यक्ति एक सुखदेव  उसके सुखों/दुखों का देवता की व्यवस्था करके प्रत्येक जीव को सुख और दुख के मध्य में संधि स्थान पर करके रखती है ।।  जो लोग जिस प्रकार के जीव पशु मानव आदि का सर्वत्र सर्वाधिक चिंतन करते हैं उसे अपने मन में जीवन में स्थान देते हैं , उस मनुष्य से जुड़ने पर उसके गुण स्वभाव रिद्धि सिद्धि दुख सुख संपत्ति के गुण उसे अपने आप स्वयं प्राप्त होते रहते हैं । हम सुख-दुख अपनी चिंतन अवस्था से खुद प्राप्त करते हैं ।। प्रत्येक मनुष्य को उसके जीवन में सुख -- दुख के बीच नियंत्रित रखने के लिए एक फराओ /  फिरौन की व्यवस्था निर्धारित कर रखी है ।  जो उसे सुख होने पर दुख की ओर प्रेरित करती है और दुख होने पर सुख की ओर प्रेरित करती है यह फिरौनी /  फराओ नियंता लोग निरंतर सत्य को दबाने वाले झूठ का व्यवहार करने में निपुण होते हैं । दूसरों को मूर्ख बनाना उनके सामने दुख सुख हानि का विकल्प पैदा करना इन फिरौनी /   फिराओ  लोगों का मुख्य  शक्ल या शौक होता है । पहले  मेरा फिरौन /फिराओ खलनायक  बिल्लन था ।  अब दूबे है ।  जो निरंतर मेरे सुख समृद्धि घटाने दुख विपत्ति बढ़ाने की सोच कर्म रखने करने वाला सूचनादाता  है । जिन्होंने सभी लोगों को मूर्ख बनाना सीख लिया है जो सुखी होने पर उन्हें दुख की ओर ले जाते हैं और दुखी होने पर सुख की आशा दिखाते हैं ऐसे मनफिराओ  लोगों से बचना हमारा निजी विवेक ज्ञान कहा जाता है । जो दूसरे लोगों को खिलौना समझते हैं और उनके जीवन को खेलने की चीज अर्थात दूसरों के जीवन से खेलते रहते हैं । जो लोग इन मन फिराऊ लोगों को समझ जाते हैं , इनके द्वारा प्रेरित धूर्त ज्ञान भूत ज्ञान से बचना सीख जाते हैं वही सत्य ज्ञानी या सच्चा ज्ञानी है ।
   हम जितना अधिक दुखों से बचने की सोचते हैं उतना अधिक दुखों का दुखों की श्रंखला का चिंतन करते हैं । ऊतने अधिक परिमाण में दुखों को अपने पास बुलाते हैं । क्योंकि हमें जीवन जीना है और हमने  अपना जीवन जीने में दुख को सुख से ज्यादा वरीयता का स्थान दिया है । तभी तो हम निरंतर दुख चिंतन /समस्याओं की इच्छा रखते हैं ।।  काश हमने सुख पाने के लिए सुखों की चिंतन करना सुखों की अनिवार्यता सुखों की वरीयता देखकर सुखों की श्रंखला का चिंतन मनन करना सीखा होता हम भी सुख से जीना सीख जाते ।।  परंतु हमने सीखा जीवन जीने के लिए ज्ञानी बन्ना दूसरों की समस्याओं दूसरों के दुखों का निदान करना नतीजा हमने दूसरों के दुख दूसरों की सोच विचार मंत्रणा से खुद के लिए अधिक मात्रा में दुखों को आमंत्रित करना सीख लिया कि आओ हम तुम्हारा दुखों का निवारण करेंगे ।  हम ज्ञानी बने ज्ञानी कहलाए जाने लगे परंतु ज्ञानी बनने पर हमने क्या पाया अपनी सुखी होने पर भी अपने सुखों को तिलांजलि देकर दूसरों के दुखों की श्रंखला को अपने आगे लगा- लिया अब हम दूसरों के दुखों से परेशान हैं । आपने हमारी निजी दुखों की मात्रा बहुत कम है और हम दूसरों के दुखों से दुखी हो रहे हैं ज्ञानी बनने के लालच में , परंतु हम इससे ज्ञानी देवता बनने के चक्कर में मूर्खता अपना रहे हैं ।


वस्तुओं कृत्य कृत्या कर्मचक्रों का क्या आधारभूत कारण है ?

समस्त प्रकार के कर्मचक्रों और उनमें घूमने वाली वस्तुओं के कृत्य, कृत्या कर्मों का आधार ध्वनि है जो अपने प्रिय रुप अमृत और अप्रिय रूप विष के रूप में समस्त ब्रह्मांड में व्यवस्थित है । जो विभिन्न प्रकार के जीवों और उनके कर्म कृत्य कृत्या कृतियों के रूप में समस्त जीवों को उनके कर्मप्रभाव के रूप में विभिन्न कर्मचक्रों में घुसाकर घुमाकर निर्माण और विनाश उनके निजी निर्णय क्षमता तथा उनके सहायक निर्देशक के निर्देश ज्ञान के रूप में चला रही है। जब यह ध्वनि सूक्ष्म खंडित ऊर्जा रूप में व्यवस्थित स्थित हो जाती है तो नाद /अनुनाद में बदलकर अक्षर /क्षर रुप वाणी /वाक या बोली में बदल जाती है । जिसे मनुज अक्षर संसाधन स्रोत व्याकरण द्वारा साहित्य /ज्ञान सागर में बदल दिया करते हैं। 
   इस पर कार्लपियर्सन ने कहा है कि ब्रह्मांड में ब्रह्मांड की समस्त वस्तुओं के अंतर्गत जीवित अजीवित सभी प्राणियों का निर्माण विभिन्न ध्वनि स्रोतों से आने वाली विभिन्न आवृत्ति की ध्वनि से बने अक्षरों से हुआ है ।

          जिससे सभी जीव अक्षरों के संचित  परिणाम परिमाण के संचालकों की भावनाओं के आधार पर अपनी अपनी आजीविका जीया करते हैं। इस आजीविका कर्म में वे जीव अक्षरों को ज्ञान रूप में मस्तिष्क में अमृत विष के संचित धन रुप चित्रांकन वीडियो के रूप में संचित करते हैं। तथा अक्षरों के परिस्कृत संशोधित रूप को विभिन्न प्रकार के अन्न के अमृत विष रुप से धारण करते हुए अपने अपने हित के अनुसार रोगी निरोगी काया अवस्था में जीते हैं । अक्षरों के अति परिस्कृत संशोधित रुप महाअन्ना रुप वीर्य पुरुषों के लिए अमृत स्त्रियों के लिए विष तथ रज स्त्रियों के लिए अमृत पुरुषों के लिए विष रुप से धारण करके विभिन्न प्रकार की अमृत विष गुंणवत्ता युक्त विभिन्न प्रकार की संतान/संतति उत्पन्न करते हुए जीवन जीते हैं। जीव से जीव की उत्पत्ति के कर्म क्रम में यह अमृत विष जीवों के शरीर में घटता बढ़ता बना रहता है । जिसके परिणाम परिमाण के अनुसार वे विभिन्न मानव निर्माण विनाश क्षमता दक्षता योग्यता धारणा धारण करते हैं। उनकी यह मनुज गुंणवत्ता समयानुसार समय समय पर समयरेखा /ग्राफ के अनुसार घटती बढ़ती मुड़ती सीधी वृत्तांतिक गति करती रहती है। 

जीवन में तरक्की के स्थान पर अवनति फेलियर नाकामयाबी असफलता का क्या कारण है ?

      सभी जीवो के जीवन में तरक्की का मुख्य कारण उनकी रुचि और उनके मन के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है जहां से उनके पास समृद्धि और निर्धनता की शुरआत होती है ।
 जिसमें निर्धनता की सोच के अतर्गत पास में कुछ भी नहीं होना चाहिए घर खाली दिखाई देना चाहिए घर में कबाड़ पुरानी टूटी फूटी वस्तुएं संचित दिखाई देनी चाहिए। परंतु सब चाहिए ! इस सोच के अंतर्गत गरीबी दरिद्रता कंगाली असफलतएं घर को खाली रखने के लिए अपने आप आती चली जाती हैं । जबकि समृद्धि की सोच के अंतर्गत पास में सब कुछ होना चाहिए घर में अधिकतर उपयोगी सामान दिखाई देना चाहिए। परंतु कुछ नहीं चहिए । इस सोच के अंतर्गत मनुष्य के पास कामयाबी सफलता समृद्धि अमीरी अपने आप आती चली जाती है।
  जीवन में सफलता सफलता निर्धनता समृद्धि इन्हीं दो प्रकार की दृष्टिकोण पर निर्भर करता है जिसका मुख्य कारण आधार जीव को अपनी निजी जैविक ऊर्जा का उपयोग करना आता है या अपनी निजी जैविक ऊर्जा का उपयोग करना नहीं नहीं चाहता है। इसमें मानसिक शारीरिक ऊर्जा का जीवन में प्रयोग मुख्य कारण आधार है । जो उनकी सही या ग़लत शिक्षा दीक्षा उच्च या निम्न शिक्षा क्वालिटी के संस्कार पर निर्भर करता है। जिसे सत्यज्ञान ब्रह्म ज्ञान कहते हैं। जिन लोगों को उनके परिवार में अपने माता-पिता से जिस परिमाण में जितना* सत्यज्ञान / ब्रह्म ज्ञान मिलता है। वह अपने जीवन में उसी सत्यज्ञान ब्रह्म ज्ञान के आधार पर उतनी ही तरक्की/ विकास कर पाते हैं। यह ब्रह्म ज्ञान गोपनीय , महंगा होता है । इसे माता-पिता के अलावा कोई भी आसानी से नहीं बताता है । गॉडफादर टीचर या सद्गुरु लोग बताते हैं। अकसर लोग सस्ते ज्ञान के चक्कर में दूसरे शिक्षक गुरु लोगों से धार्मिक शिक्षकों से मुफ्त में मिले २* भ्रम ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान समझ लेते हैं जिससे भ्रम ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात अत्यधिक परिश्रम से विकास और प्रगति के दर्शन होते हैं।३* मिथ्या ज्ञान अक्सर  लोगों को बिना सद्गुरु निर्देशन के अत्यधिक मात्रा में भ्रमित साहित्य के अध्ययन करने से , पिक्चर सिनेमा मोबाइल लैपटॉप अखबार आदि से मिथ्या ज्ञान अधिक मात्रा में मिलता है। इसके अत्यधिक परिश्रम से भी थोड़ी सी ही प्रगति कर पाती है। ४* जो लोग ज्ञान के लिए पूरी तरह से दूसरों के ऊपर निर्भर रहते हैं स्वयं अध्ययन नहीं करते स्वाध्यायी नहीं होते जिनके पास उच्च कोटि के सद्गुरु मित्र मंडल नहीं होता शुभचिंतक नहीं होते अपनी निजी लाइब्रेरी नहीं होती । ऐसे लोग दूसरे लोगों से मिले मुफ्त के फोकटिया ज्ञान पर निर्भर होने से उनके द्वारा चयनित काल्पनिक ज्ञान अधिक मात्रा में प्राप्त करने से बहुत कम मात्रा में प्रगति कर पाते हैं। ५* विपरीत ज्ञान  जो लोग समाज के निम्न स्तरीय लोग अपराधी परिवार में पैदा होते हैं । दुष्कर्मा लोगों के सानिध्य में रहते हैं शत्रु बुद्धि लोगों को गुरु बनाते हैं । स्वयं अध्ययन सत्संग नहीं करते अच्छे गॉडफादर शिक्षक गुरु नहीं रखते ऐसे लोग विपरीत ज्ञान को ब्रह्म ज्ञान समझ कर भ्रमित होकर विपरीत धर्म ज्ञान धारण करके जीवन भर दुःख दरिद्रता निर्धनता कंगाली गरीबी में जीवन जीते हुए धरती पर जीते जी त्रासित होते हुए नरक भोगते हैं । उनके दिलों दिमाग की सेटिंग खराब हो जाती है । जिससे यह अच्छे को बुरा बुरे को अच्छा समझ कर जीवन भर शंका संदेह के स्वभाव युक्त भीरू मन डर्रू स्वभाव शंकालु प्रवृत्ति के मन होने से  जीवन में सही फैसला नहीं ले पाते। इनको शत्रु और मित्रों का भेद स्पष्ट नहीं होता यह नफरत करने वाले ईर्ष्यालु शत्रु बुद्धि लोगों को अपने पारिवारिक रश्तेदार  संबंधी मित्र  समझ कर जीवन भर उनसे हानि उठाते रहते है। परंतु अपने ईर्ष्यालु शत्रु बुद्धि परिवार जनों रिश्तेदारों तक से बचना नहीं सीख पाते हैं । लालच और सामाजिक सुरक्षा के भय से  यह उनसे जीवन भर जुड़े हुए उनसे आजीवन हानि उठते रहते हैं । उनको नींद में भी वाहियात बेतुके सपने आकर उनकी नींद खराब करते रहते हैं। इनकी मानसिक ऊर्जा का सपनों में भी अत्यधिक अपव्यय होता है। इनको सपनों में भी इनका अवचेतन मन सही ज्ञान सूचना नहीं देता। इनके दिमाग की रिफॉर्मिंग प्रोग्रामिंग उल्टी हो जाती है।? इसका अध्ययन करना अभी शेष है
       वैज्ञानिक  आधार पर उनके शरीर में सामान्य  मानक ऊर्जा कोशिकाओं में माईट्रोकौंड्रियाओं की मानक संख्या तय से कम होती है करण की एमपी मानसिक शारीरिक परिश्रम करने में रुचि नहीं होती है । जिससे इनका सामान्य ऊर्जा स्तर और लोगों की तुलना में शारीरिक मनसिक  रूप से कम होता है । इनमें खाद्य पदार्थों के सामान्य से मंद  आक्सीकरण दर से  ऊर्जा उत्पादन  सामान्य से  निम्न होता है । धीमा ऊर्जा उत्पत्ति पैटर्न होने से  इनको थकान आलस निकम्मापन घेरे रहता है।  इनका स्टैमिना बहुत कम होता है । देर तक यह है किसी काम को लगातार नहीं कर पाते हैं यह थोड़े से परिश्रम से बहुत अधिक थक जाते हैं। इनको अपने जीवन में प्रायोरिटी लिस्ट/आवश्यक वरीयता क्रम स्पष्ट नहीं होता इनके जीवन में नींद का विशेष स्थान होता है यह अंधकार प्रिय निद्रा शयन करते हैं । 
प्रायः अधिकांशतः सभी जीवों में उनका एक सामान्य ऊर्जा स्तर होता है  एक निम्नतम ऊर्जा स्तर दूसरा उच्चतम ऊर्जा स्तर । जिसमें से अधिकतर सभी जीव  .आराम पसंद निम्न ऊर्जास्तरीय जीवन यापन करना पसंद करते हैं । अपने निजी जीवन में उच्च ऊर्जा स्टैमिना का उपयोग करना पसंद नहीं करते हैं । जिससे ऐसे लोग अपनी जीवन अभावों दरिद्रता दरिंदगी निर्धनता में  जीते हैं । जबकि तरक्की याफ़्ता लोग अपने जीवन को उच्च ऊर्जा स्तर उपयोग के अनुसार जीते हैं ।
प्रत्येक व्यक्ति / जीव को उसकि निजी आवश्यकताओं के अनुसार ब्रह्मांड से जीवन जीने के लिए निश्चित ऊर्जा की दैनिक आपूर्ति कोटेशन के अनुसार आरक्षित होती है । यह सृष्टि में ऊर्जा का पहला प्राईमरी का बेसिक नियम है ।
    अपनी को मिली ब्रह्मांड ऊर्जा में से  जो लोग अपने जीवन को निम्न स्तर की ऊर्जा से जीवन जीते हैं । ऐसे लोग जिंदगी में तरक्की नहीं कर पाते हैं ये आयाराम गयाराम होते हैं ,ये जैसे आये थे वैसे ही चले जाते हैं ,, ये अपने जीवन को सुविधाओं सुरक्षाओं के सीमित दायरे कंफर्ट जोन में जीते हैं ये अपने जीवन में रिस्क नहीं उठाया करते हैं ,खतरों से दूर रहते हुए अपने जीवन को जीते हैं कुल मिलाकर यह संघर्षों से बचकर जीवन जीते हैं संघर्ष का सामना यह स्वयं नहीं किया करते हैं अपितु इनके पास संघर्ष निस्तारण समिति फोकटिया वकीलों , राड़ी योद्धाओं , नशैंड़ी सलाहकारों -  की फौज होती है  जिनकी ये अपने जीवन में रक्षणीय सेवाएं लेते हुए अपना संघर्षहीन जीवन जीते हैं ये सारी उम्र दूसरों को लड़ाते रहते हैं लेकिन खुद कोई भी लड़ाई झगड़ा बखेड़ा नहीं लड़ा करते हैं ।।
   परंतु जो लोग ब्रह्मांड से मिली दैनिक ऊर्जा को उच्चतम स्तर उपयोग करते हुए अपना जीवन संघर्षों से घिरे घिरे हुए रहते हुए अपने जीवन को सत्यता पूर्वक आवश्यकता अनुसार संघर्ष शील परिस्थितियों के अनुसार जीते हैं । अर्थात जो अपने शरीर की विद्यमान व्याप्त ऊर्जा अपने स्टैमिना का अधिकतम उपयोग करना जानते हैं। ऐसे लोग जीवन में तरक्की कर पाते हैं यही जी
G गिफ्टिड / विशेष पुरुष के स्तर से आगे के प्रगति पुरुषों की लाईन में विपरीत परिस्थितियों में अपना जीवन जीने वाले विप्र /विशेष पुरुष से आगे  महापुरुष (नेता ) विधाता पुरुष (विधायक) विधान निर्माता ( मनु ) संविधान की रक्षा करने वाले विधानवरदे  इंद्र पुरुष से भी आगे की छठी युग परुष की श्रेणी में गिने जाते हैं ।
      जो लोग अपने शरीर की मानसिक शारीरिकी ऊर्जा का न्यूनतम ऊर्जा का उपयोग करते हैं। यदि अगर बुद्धिमान भी हैं तो भी उनकी आराम पसंद लग्जूरियस लाइफ उन्हें मेहनत से दूर ले जाती है और ऐसे लोग जिंदगी में निकम्मे आलसी जीवन जीते हुए विशेष तरक्की नहीं कर पाते हैं । कहने का अभिप्राय यह है यदि गधा भी अपने शरीर की अधिकतम ऊर्जा का उपयोग करता हुआ अपने जीवन को जीता है तो वह भी अपने जीवन को घोड़ों के स्तर में ले जा सकता है ।  वैसे गधा का घोड़ा बनना प्रकृति में असंभव है । तो ऐसे में उसे हम प्रगतिशील गधा कहेंगे ,  परंतु यदि घोड़ा अपनी समस्त शारीरिक उर्जा का अपने तरीके से इस्तेमाल ना करते हुए उसमें से थोड़ी सी ऊर्जा का उपयोग करते हुए जीता है तो वह अपने जीवन को गधा स्तर में ले जाता है ।
     कुछ ऐसी ही कहानी मनुष्य की है जो समाज के विधायक दिशानिर्देशक  लोग हैं जैसे नेता गण  शिक्षक , वकील , जज , प्रशासनिक अधिकारी ,  चिकित्सक , इंजीनियर ,निर्माणी उद्योगपति आदि  यह लोग यह अपने शरीर में विद्यमान मानसिक शारीरिक  ऊर्जा का अधिकतम उपयोग करते हैं । इसके अलावा दूसरे कुछ मेहनत कश परिश्रमी लोग भी होते हैं जो अपने शरीर में विद्यमान ऊर्जा में से केवल शारीरिक ऊर्जा का उपयोग भी अपने हिस्से अपने हिसाब से कम से कम करने की कोशिश करते हैं , तथा अपनी मानसिक ऊर्जा का उपयोग नहीं किया करते हैं ,,  जिससे वह अपनी शैक्षिक परिश्रमी  उपलब्धि अधिक नहीं दिखा पाते हैं ।  ऐसे लोग निम्नतम स्तर में ही अपना जीवन जीते हुए चले जाते हैं । 
   इसका सबसे बुरा मुझे अनुभव रॉबर्ट ग्रीन की किताब से हुआ जो शक्ति के 48 नियमों की तो बात करती है परंतु उन नियमों में सबसे पहला नियम अपने जीवन में कम से कम ऊर्जा का उपयोग करते हुए अपने जीवन को अधिक समय तक जीना बुद्धिमानी है की पैरवी करती है  ।। यह नियम बहुत से लोगों के द्वारा दुरुपयोग में किया जा रहा है जो अधिकतर बुद्धिमान लोगों को यह मूर्खों  की लाइन में ले जा रहा है । जबकि वह मूर्ख नहीं है परंतु निम्न स्तरीय ऊर्जा उपयोग उपलब्धि होने से उनकी गिनती मूर्खों में हो जाती है। 
  इस विचार का एक अन्य आधार नियम भी मेरे दिमाग में आया एक केमिस्ट्री ऊर्जा नियम जो परमाणु सिद्धांत के अनुसार कक्षा उपकक्षा नियम KLMNO 2, 8, 18   32 तथा   एसपीडीएफ s p d f  के अनुसार 2, 6, 10, 14  है  यह रासायनिक ऊर्जा उत्पत्ति नियम केमिस्ट्री में से उत्पन्न हुआ है परंतु यह नियम बायोलॉजी में जैविक ऊर्जा उत्पत्ति के रूप में दौड़ रहा है । जिसके अनुसार मनुष्य चार मुख्य ऊर्जा श्रेणी गुंण K काइनेटिक रक्त शर्करा स्तर 60 से 120 यह बुद्धिहीन श्रेणी के लोग जीवन में तरक्की नहीं करते , L लेबर रक्त शर्करा स्तर 70 से 140 यह अपने जीवन को दूसरों के दिशा निर्देशों के अनुसार जीते हैं अपने जीवन में बहुत ही काम तरक्की कर पाते हैं ।Mमशीन रक्त शर्करा स्तर 80 से 160 जीवन में तरक्की की शुरुआत इस स्तर से आरंभ होती है । N निरंतर परिश्रम करने वाले रक्त शर्करा स्तर 90 से 180 यह लोग अपने जीवन में आशा के अनुसार प्रगति करते हैं ।,O मशीन और समूह संचालक रक्त शर्करा स्तर 100 से 200 तक  होते है यह लोग अपने जीवन में आशा से बहुत उच्च स्तर तक जाकर प्रगति करते हैं। रक्त में शर्करा की उपलब्धता का स्तर मनुष्य के मानसिक कार्य करने पर अधिक निर्भर करता है जो लोग मानसिक श्रम अधिक करते हैं उनके रक्त शर्करा का स्तर अक्सर ऊंचा होता है।
     परंतु मनुष्य जातियों में प्रगति और अवनति करने का एक अलग नियम अस्तित्व में आया है जिसके अनुसार सभी लोग अपनी अपनी प्रगति के लिए खुद को शिक्षा पर आधारित कहते हैं। परंतु शिक्षा से प्रगति नियम में फ्रांसिस गाल्टन, और कार्ल पियर्सन के अनुसार शिक्षा में भी प्रकृति का 10% प्रोग्रेसिव रूल अप्लाई हो जाता है जिसके अनुसार शिक्षित होने के दौरान हमारी शिक्षा बीते हुए समय के अनुभवों पर आधारित होती है हमारे भविष्य की प्रोग्रामिंग भविष्य के अनुसार सही सटीक ना बैठ पाने से हमारी शिक्षा प्रगति की कसौटी पर पूरी तरह से सही नहीं बैठ पाती । हम भूतकाल की शिक्षण अनुभव पर आधारित होने से वर्तमान में जीवन जीने के स्थान पर उनसे एक तारा आगे कि भविष्य में जीवन जीने की सोच बनने लगते हैं । 
   इन सभी में सबसे खराब सबसे शोचनीय स्थिति उन उच्चश्रेणी की सज्जन आत्माओं की होती है जो अपने किसी पूर्व जन्म के पाप से अभिशापित होकर अगले पुनर्जन्म में निम्न ऊर्जा स्तर के गरीब निर्धन कंगाल कंजूस दरिद्र अपराधी निम्न जातिय निम्न स्तरीय परिवारों में पैदा हो जाते हैं इन परिवारों में नफरत हिंसा स्वार्थ अनाशक्ति निर्मोहीपन धनाशक्ति लूटपाट छीन झपट्टा कृपणता सहयोग असहकार लोगों के दिलों दिमाग में भरा रहता है । कोई किसी की आपत्ति काल में भी मदद करना पसंद नहीं करता परंतु सब एक दूसरे से मदद की आशा लगाए रहते है । जिससे इनमें तन मन धन तक की सेटिंग खराब रहती है इनकी आत्मा और प्राण अन्न धन में बसते हैं । इनकी खराब शिक्षा दीक्षा के प्रभाव से मन तो क्या प्राण और आत्मा तक की सैटिंग खराब हो जाती है जिसको फिर से सुधार संशोधन परिष्कार करना उनके लिए उनके जीवन में बहुत बड़ी चुनौती साबित होती है। ऐसे लोग प्रज्ञा संज्ञान उदित होने पर वृद्धावस्था में आत्मज्ञान प्राणज्ञान उदित होने पर ही तरक्की कर पाते हैं। इनका बचपन और युवावस्था परिवार में समाज में अकारण व्यर्थ के संघर्ष में जाति समाज परिवार से मिले भ्रमित ज्ञान और असहयोग से व्यतीत होता है। 
शेष ह

जीवन में प्रगति आक्रमक रवैया , सक्रियता , विस्तारवादी सोच पर निर्भर है या रक्षण निष्क्रियता और संकुचनवाद पर निर्भर है !

मनुष्य के जीवन में प्रगति उसकी सोच के रवैया पर निर्भर करती है यदि मनुष्य का आक्रामक  व्यवहार आक्रमणकारी रवैया / सोच सक्रियता विस्तारवादी सोच के नर विचारों  की अधिकता है ।उसका जीवन ऊर्जा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक उच्च   स्तर  ह । तो ऐसे में उसकी प्रगति संघर्ष शील सोचविचार से  आसान होती है । परंतु यदि उसमें रक्षण  निष्क्रियता अल्प सक्रियता जैसा रवैया और संकुचन वादी सोच है।उसका बौद्धिक शारीरिक ऊर्जा स्तर सामान्य या सामान्य से कम है । तो उसकी प्रगति के संभावना कम ही है।

संस्कृति जैविक नियम निर्धारण पद्धति क्या है और कितने प्रकार की होती है ?

प्रत्येक संस्कृति के चार आधार नियम हैं । 
गायन ( शब्द आधार )
 वादन  ( ध्वनि आधार )
 नृतन ( जीव चेष्टाएँ ) 
परिवर्तन ( मर्यादा शीलता :नियम बद्धता राम आचारी , मर्यादा हीनता :नियम अवस्था स्थिति दृश्यता अदृश्यता आभाष कृष्ण आचारी  )
जो नियम का आधार नीति , नियम स्थिति , नियम संचालन , नियम में परिवर्तन ,( रीति ) नियम से समस्या तथा समस्या निवारण ( कुरीति ) नियमों का स्थायित्व ( अनीति ) 
प्रत्येक क्षेत्र में दो प्रकार की संस्कृति समाज नियम पाये जाते हैं
 निर्माण प्रधान नियम नारी प्रधान नियम संस्कृति  (लेने पर आधारित है)
विनाश प्रधान नियम नर प्रधान नियम संस्कृति ( देने पर आधारित है ) 

त्रिकालदर्शी किसे कहते हैं और क्यों

जो व्यक्ति टाइम ट्रेवल आर्ट साइंस जानता है। वह समय के चारों आयामों में से 3 आयामों में वर्तमान काल ,भूतकाल ,भविष्य काल मैं दर्शन की क्षमता सीख जाता है । अर्थात वह इन तीनों तरह के समय में योग वशिष्ठ के अनुसार आ जा सकता है। परंतु मन का चौथा आयाम जिससे गुप्त काल भी कहा जाता है जिसमें मनुष्य प्राणी का मान मरने के बाद शरीर के इंतजार की प्रतीक्षा में विश्राम करता है ऐसे गुप्त काल में टाइम ट्रैवलर्स व्यक्ति त्रिकालदर्शी व्यक्ति नहीं पहुंच पाता है। इसमें केवल मनुष्य का अवचेतन मन ही जा पाता है ।। उसमें त्रिकालदर्शी व्यक्ति के आने जाने की सामर्थ नहीं रहती है ऐसा विचित्र को तू वही मनुष्य कर   सकता है । जिसका अपने मन की सभी प्रकार की चैतन्य अचैतन्य अवचेतन और सुपर चेतन अवस्था में आने जाने की स्थिति पर अपनी इच्छा से नियंत्रण कर लेता है। वही व्यक्ति त्रिकालदर्शी या टाइम ट्रैवलर बन सकता है । यह मन की निर्मल अवस्था कही जाती है जिसमें मन की गति को रोकने वाला कोई भी किसी भी तरह का भावनात्मक , वासन आत्मक कामनात्मक बाधा मन की गति को नहीं रोक पाती है और मन की गति कालचक्र के तीनों आयामों में आबाध /निर्बाध रूप से होने लगती है।

हमारा मन कभी-कभी इतना कमजोर क्यों पड़ जाता है कि हम चाह कर भी किसी को आसानी से अपनी जिंदगी से नहीं निकाल पाते

जिन लोगों की वीडियो ऑडियो दिमाग में बार-बार कई बारअधिक मात्रा में  डल चुकी है। तो उन लोगों की स्मृति चित्रों की अधिकता के आधार पर हमारा मन उन लोगों के अनुसार उनकी प्रियता मानक को अधिक मानते हुए उनके अनुसार बार बार उनकी रूचि के अनुसार उन्हीं का हितकारी कार्य करने को बाध्य हो जाता है । जैसे यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे प्रिय या अप्रिय मनुष्य के फोटो वीडियो की अपने मन में  3 से 5 लाख मात्रा तक फोटो चित्रों को अपने दिमाग में संचित कर लेता है। तो उसका मन उस पुरुष और स्त्री के प्रति दास स्वभाव अनिवार्यता धारण कर लेता है ।उनके अप्रिय दुष्ट भाव को सहन करना उसकी मजबूरी सी बन जाती है । वह जलील करता रहता है वह जलील होता रहता है उसके दुष्ट स्वभाव को सहन करता रहता है । ऐसे में उस मनुष्य से भले ही हमारी पहली मित्रता रही हो , पूर्व में मित्र भाव रहा हो ,, परंतु बाद में समय परिवर्तन होने पर उसकी मनोवृति में शत्रु भाव आ जाने पर भी हम उसे उसके पूर्व के पूर्व के बुरे प्रभाव को अपने मन मस्तिष्क से नहीं निकाल पाते हैं । हम चाहते हैं कि वह हमें बार-बार पीटता रहे और हम उस से मार खा खा कर हनी खा खा कर खुश होते हैं ऐसी मूर्खतापूर्ण दिमाग की सेटिंग हो जाती है।
         हमारा मन बार-बार उसकी संवेदनशीलता से प्रभावित होने से उसके पूर्व के संवेदनशीलता के कोने में जाकर अटक जाता है ।  हमारा मन  उस  शत्रु भावनात्मक व्यक्ति के  प्रति संवेदनशीलता का भाव बनाकर अपनी प्रतिक्रिया करता है । ऐसे में उस बदले हुए स्त्री पुरुष की दुष्टता हमें महसूस नहीं होती । उसके दुष्कर्म कुकृत्य भी हमें सदकृत्य सुकृत्य नजर आते हैं । हम ऐसे लोगों से बार-बार हनि उठाते रहते हैं । इन्हें अपने जीवन से नहीं निकाल पाते हैं । अपमानित नुकसान होते रहने पर भी हम उन्हें नहीं छोड़ पाते ।  इसका दूसरा कारण हमारे माता-पिता के द्वारा हमारी की गई गलत परवरिश शिक्षा है । जिसमें वे अब प्रिय शत्रु भाव धारी दोस्त रिश्तेदार लोगों को हमारे अवचेतन मन में हीरो वर्सेस सिस्टम से बिठा देते हैं ।कि वे हमारे परम हितकारी आराध्य पूज्य भगवान के समान हैं । हमारे आफ ईश्वर हैं । वे हमारी लाईफ लाईन को रोककर हमें संकटग्रस्त कर सकते हैं ।  हम मानसिक रूप से उनके गुलाम हो जाते हैं और उनके बिना जीना हमारी कल्पना से परे चला जाता है । 
           हम ऐसे दोस्त रिश्तों के संचालक   लोगों से बार-बार हानि उठाकर भी उनसे अपने संबंध बनाए रहते हैं ।  जिनके माता-पिता अपने बलवान शत्रु या दोस्त रिश्तेदार मित्र के मानसिक गुलाम रहे हो तो उनकी संतान भी अपने माता पिता की देखा देखी उनके प्रति मानसिक दासता भाव अपनान लगती है । ऐसे में उन जागरूक माता पिता का कर्तव्य है कि अपनी संतान को पूर्व में मित्र रहे लोगों के बदलकर शत्रु भाव अपनाने पर उन परिवर्तित मधुर्भाव धारी शतरूपा वाले मित्रों के बारे अपने बच्चों को  परिचित कराएं । अपने बच्चों में हीरो वर्सेस सिस्टम बदलने की शिक्षा डालें । जैसे यदि कोई हमारा पूर्व में मित्र है तो वह कभी तक मित्र है जब तक वह हमारा हितकारी है यदि उसके भाव बदलकर वह हमारे प्रति दुष्ट भाव  अपना लेता है । हमारा नुकसान करने लगता है बार-बार हमें जलील करता है हमारे प्रति कमीनापन अपनाता है । तो हमें अपनी संतान को उसके प्रति बताते हुए सतर्क कर देना चाहिए कि वह ऐसे रिश्तेदार मित्र और संबंधी से दूर रहें ।। 
    उन परिवर्तित हुए वर्तमान में शत्रु भाव ले चुके , पूर्व में रहे मित्र लोगों के प्रति भी हमें अपने मन के अंदर उनकी प्रिय कृत्य को भुलाकर कर मुक्त फिल्म के बारे में सुबह शाम संध्याकाल में उचित मानस पटल भाव चित्रण को देखते हुए बदलते रहना चाहिए । समय के अनुसार ऐसा नहीं है कि जो व्यक्ति वर्तमान में शत्रु भावना रहा है तो ऐसे हम उसके पूर्व का मित्र भाग स्मरण करें । उसे क्षमा करते रहें अपितु इसके लिए जरूरी है कि यदि वह वर्तमान में शत्रु भाव अपना चुका है तो हम भी उसके शत्रु भाव का अपने मन में चित्रण करें । तभी हमारा मन उसे शत्रु भाव में धारण करेगा ।  हम तभी उसे अपने उज्जवल भविष्य के लिए बचने की तरह तरह की युक्तियां सोच पाएंगे । यदि हम अपने मानसिक चित्रण फिल्म को नहीं चलाती बदलते देखते हैं । तो ऐसे में वह हमें पूर्व में डाले हुए प्रिय मानसिक चित्र उस व्यक्ति के प्रति सहानुभूति युक्त सद्भावना व्यवहार करने को बाध्य रखते हैं । जिन्हें वह हमारी विनम्रता या कमजोरी समझता है । जिससे हम फिर से उसकी और अधिक दुष्टता का शिकार होते हैं ।
      ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जो लोग हमारे प्रति विरोधी भावना रहे हैं दोस्त अपना रहे हैं हम भी उनकी बुरी छवि को अपने मन में स्थान देने लगे उनकी पुरानी अच्छी छवि को मन से निकाल दें या कम करें इससे हमारे उनके प्रति शत्रु भाव से हमारे प्रति व्रत बहाव अपनाकर हम उससे बचने का प्रयास करेंगे यदि हम उनके प्रति शत्रुता के बदले मित्रता भाव रखते हुए हैं तो इसे वे हमारी कमजोरी समझेंगे और अपनी शत्रुता आचरण की डिस्क्रिप्टिव से हमें बराबर परेशान करते रहेंगे ।

सौ साल निरोग जीवन के क्या नियम हैं ?

सभी जीव का जीवन और निरोगी काया इस बात /नियम पर निर्भर करती है कि जीव ने अपने जीवन में अपने लिए निर्धारित समय और समय के अनुसार निर्धारित ब्रह्माण्ड से मिलीं जीव काया ऊर्जा  कार्य ऊर्जा का कैसे उपयोग सदउपयोग दुर्उपयोग किया । यदि वह अपने जीवन के लिए ब्रह्माण्ड से मिली ऊर्जा का सदुपयोग किया करता है तो निसंदेह 100साल या अधिक समय जीवन जिया करता है । यदि वह अपने जीवन के लिए मिली जैविक विचार और कार्य करने के लिए मिली ब्रह्माण्ड ऊर्जा का दुरुपयोग किया करता है तो 100 साल और 50 साल के मध्य में अपना जीवन अपनी हिकमत तिकारत के अनुसार 60, 70,80,90 -100साल जिया करता है । जीव को जन्म लेने के बाद अपना जीवन खुशहाल समृद्धि योजना से जीने के लिए आजकल की शिक्षा में ऊर्जा दुर्उपयोग सिखाया जाता है जिससे जीव अपना जीवन सौ साल से पहले पूरा करके दुनिया में से चला जाता है।
ऊर्जा के उत्पत्ति :-  नियम 
लाँ  आफ थर्मोडायनामिक्स ( आक्सीकरण, अपचयन)
लाँ आफ इनर्जी ट्रांसफर (चालन,संवहन, विकिरण )
लाँ आफ इनर्जी फिक्सिंग ( मैटाबोलाईट रुपान्तरण ) फोटोसिंथेसिस )
     जीव को निजदृष्टिकोण से निजी जीवन के क्षेत्र में उपलब्ध ऊर्जा उपयोग का ज्ञान होना चाहिए 

मानव समाज में अलिखित नियम क्या है जिन्हें सभी को जानना चाहिए

भी आपराधिक कृत्य जो एक मनुष्य के द्वारा उसके निजी हित में किए जाते हैं जिससे उसका निजी  विकास निर्धारित होता है , परंतु उन आपराधिक कृत्यों के कारण मनुष्य के समाज के परिवार के दूसरे लोगों की दुर्गति होती है,,  पतन होता है । वह उस मनुष्य का एक निजी अपराधी कृत्य ए लिखित मानव निजी संविधान होता है। जब इन अपराधी ए लिखित कृतियों को मानव समाज के विशेष पुरुष महापुरुष करने लगते हैं। तो यह अलिखित नियम सामाजिक नियम रीति-रिवाजों सामाजिक परंपराओं में बदल जाते हैं।।  जो अल्पसंख्यक अपराधी लोगों के द्वारा प्रत्यय कर क्रियाकलाप के रूप में आरंभ में किए जाते हैं उन कर्मों को अपराधी लोग अपने विकास के लिए करते हैं,  परंतु उन कर्मों के करने से समाज का दूसरे  परिवार का पतन कहा जाता है अपराधी कृत अभी तक अलिखित हैं ।जब तक वह लिखे नहीं जाते ,या दूसरे लोगों के द्वारा समझे नहीं जाते हैं । तब तक वे  सर्वमान्य नहीं हो पाते या उनकी लिखित में संवैधानिक समीक्षा नहीं होती है । जब वह अपराधी कृत्य लिख दिए जाते हैं अखबारों में छप जाते हैं उनकी मानव समाज में संवैधानिक चर्चा होने लगती है । वह समाज में अखबारों के द्वारा चर्चा का मुद्दा बनने लगते हैं । स्कूलों में चर्चाएं जाने लगते हैं । फिर वह अलिखित सामाजिक नियम अलिखे सामाजिक नियम नहीं कहे जाते । अलिखित सामाजिक नियम नहीं रहते अपितु लिखित सामाजिक सामूहिक संविधान नियम कहे जाते हैं व्यवहार में अपराधी कृत्य लिखित निजी या सामूहिक सामाजिक नियम परंपराएं पहले भले ही अलिखित रहे हों परन्तु बाद में मानव समाज हित कानूनों की निर्माणी संस्था संसद या नरइष्टका  में परंतु अपराध के इन एलिखित नियमों के लिए अपराध दंड संवैधानिक रूप से लिखित संविधान कहा जाता है । ऐसा विचित्र क्रियाकलाप आदिकाल से समाज में चला आ रहा है । लिखित नियम तुनै और अलिखित नियम मुनैः जिससे भदेश भाषा में तूने मुन्ने कायदा कहते हैं । वर्तमान में भी इस अपराध कृत्य की समाज में गहरी जड़ें जमी हुई हैं । अलिखित सामाजिक नियमों को समझना परम आवश्यक है जो लोग इन नियमों को समझ जाते हैं वही अपना और अपने परिवार का विकास कर पाते हैं । वही अपनी प्राण रक्षा परिवार की प्राण रक्षा करने में समर्थ हो जाते हैं और अपराधियों के बुरे कृपया कृतियों से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा करने में समर्थ हो पाते हैं।

यह मानव समाज सभ्यता संस्कृति प्राय लिखित मानव समाज समूह नियम संविधान से रुकी हुई है परंतु अलिखित नियमों से चल रही है । मानव समाज समूह सभ्यता संस्कृति की एक अलग पहचान संग रहने का विधान संविधान है । जो समाज में नीति प्रधान ग्रंथ कहा जाता है ।।  यह संविधान अनेक प्रकार के होते हैं लिखित संविधान , अलिखित संविधान , लोकतांत्रिक संविधान , अलोकतांत्रिक /राजतंत्र संविधान , धर्मनिरपेक्ष संविधान (सैक्यूलरिज्म/सरकुर ) संविधान ,  धर्म सापेक्ष संविधान , इनमें वर्तमान समय में शिक्षित सभ्य समाज में लिखित संविधान का नियम आज पूरे विश्व में सार्वजनिक है ।। 
   परंतु जिस क्षेत्र के लोग अशिक्षित होते हैं जहां कबीलाई संस्कृति होती है वहां लिखित संविधान       काम नहीं करते अर्थात ऐसे अशिक्षित लोगों के कबीलाई समाज अलिखित संविधान के द्वारा संचालित होते हैं अलिखित संविधान में रीति कुरीति अनीति की प्रधानता होती इसमें नीतियां नाम मात्र को होती हैं।
      जब इन सामाजिक न्याय सत्यता नीति नियमों की पारदर्शिता सत्यता में परिवर्तन अपने मानक स्तर से अत्यधिक हो जाता है जिससे उस मानव समूह समाज के सभी बुद्धिजीवी ,फुद्दीजीवी , देहजीवी ,भ्रष्टाचारीयों प्रकार के लोगों को उस मानव तंत्र में सम्मिलित होकर रहने में असुविधा होती है । तो ऐसे चतुर चालाक चालबाज लोग अपने जीवन के हित के लिए अपनी वंशिका वंशावली के हित के लिए उसी पूर्व समाज में रहते हुए अपने हित के लिए नए-नए गोपनीय नियम रचने बनाने लगते हैं ।   गुप्त रूप से गुप्त गोपनीय नियमों को अलिखित नियम कहते हैं यह अलिखित नियम :: समाज में रीति कुरीति अनीति के रूप में पाए जाते हैं , किसी भी समाज में व्याप्त रीति कुरीति अनीति से अपने निजी जीवन को अपने बुद्धि कौशल के द्वारा मानव तंत्र में छलिया पनपुर तरीके से जीवन जीने को भ्रष्टाचार अभिचार कहा जाता है ।
  मानव के बौद्धिक विकास की संभावनाओं को देखते हुए अभी तक कोई भी ऐसा संविधान लिखित रूप में अचल अटल दीर्घकालिक सभी मनुष्यों के लिए नहीं बन सका है , जो सभी मनुष्यों की आवश्यकता के अनुसार हो सभी मनुष्यों के सभी समूह समाज को नियंत्रित करने में समर्थ हो ,,  ऐसा पूर्णकालिक संविधान एक मानव सामान्य समूह समाज के लिए बनाना असंभव है क्योंकि प्रकृति में परिवर्तन का नियम शाश्वत है ।  परिवर्तन के नियम के कारण नित नई जीवन पद्धतियां उत्पन्न होती हैं जिनके अनुसार नित नई संस्कृतियों बनती हैं । जिससे समय-समय पर पुरानी संस्कृतियों को नई संस्कृति नई सभ्यता के लोग नष्ट कर दिया करते हैं ।। अपने अपने तरीके से कुछ उग्र हिंसा के द्वारा तो कुछ मंद हिंसा जैसे शिक्षा में परिवर्तन करके धर्मांतरण परिवर्तन करके तरह-तरह के तरीकों से लोग दूसरे लोगों का मत मति परिवर्तन करते रहते हैं ।। इस प्रकार से यह कहना असंभव है कि अलिखित संविधान कितना बड़ा है कितनी इसकी सीमा है इसके बारे में कुछ भी बात कही नहीं असंभव लगती है परंतु फिर भी जो लोग व्यापक अध्ययन करते हैं वह    अलिखित नियमों के बारे में काफी हद तक जान जाते हैं ।
       इसी बात को देखते हुए मैं कुछ ग्रंथों का संदर्भ देना उचित समझता हूं।  यदि किसी को इन अलिखित  नियमों की पूरी  जानकारी चाहिए , तो वह भी कम पड़ जाएगी । इसके लिए विशाल विस्तार अध्ययन की आवश्यकता होगी । परंतु फिर भी पाठकों की सुविधा  की दृष्टि को देखते हुए मैं कुछ देसी विदेशी साहित्य की पुस्तकों के विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं । जिनको पढ़कर काफी हद तक  झंडाधारी नियमों के बारे में जानकारी प्राप्त करके वे  मानव शिरोमणि लोग अपने जीवन में काफी हद तक इन संविधान जनित समस्याएं और मानव जनित समस्याओं को अपने विशेष ज्ञान से कम कर सकते हैं । जैसे वे यह संस्कृत भाषा में 108 उपनिषद संस्कृत भाषा में अनुवाद है , 16 भारतीय दर्शन संस्कृत भाषा में , तीन ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण , गोपथ ब्राह्मण , महा ब्राह्मण सभी संस्कृत में ,   पंचतंत्र संस्कृत भाषा में अनुवाद , भरत हरी शतक संस्कृत भाषा , चरक संहिता संस्कृत भाषा , अनुवाद लाहौर वाला , मनु स्मृति संस्कृत भाषा अनुवाद राजस्थान प्रकाशन व अन्य भारतीय स्मृति ग्रंथ संग्रह इसी की श्रेणी में आते हैं।
 इसके अलावा  विदेशी भाषाओं की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद की पुस्तकें भारत में उपलब्ध हैं जैसे रॉबर्ट ग्रीन की शक्ति के 48 नियम , डेल कार्नेगी की लोक व्यवहार , चिंता छोड़ो सुख से जियो , रोमेश शर्मा की अपनी आत्मा की शक्ति को पहचाने , भिखारी जिसने फेरारी बेच दी ,  राबर्ट किओसाकी  की रिच डैड पुअर डैड , स्टीफन कवि की आठवीं आदत ,  सात प्रभावशाली लोगों की मुख्य आदतें इन पुस्तकों को पढ़कर भी काफी हद तक अलिखित नियमों के बारे में जाना जा सकता है।
    जो भी व्यक्ति अपना बौद्धिक विकास करना चाहते हैं या संसार में धूर्त धुरंधरों कुर्रम लोगों  से  उत्पन्न समस्याओं के दुखों को कम करना चाहते हैं । उनको यह सभी पुस्तकें तो पढ़नी ही पड़ेंगे इन सभी पुस्तकों को मैं पढ़ चुका हूं । इसके अलावा उनको अब अलग से भी अपने लिए अपने हित के अनुसार विविध प्रकार की पुस्तकें पढ़नी होंगी , तब जाकर विशेष  विद्वान पुरुषों की संगत मेँ जाकर    अलिखित समाज नियमों की विशेष विस्तार में जानकारी प्राप्त हो पाएगी ।  परंतु अंततः वह भी संक्षिप्त ही रह जाएगी । क्योंकि ज्ञान का दायरा मनुष्य की बुद्धि से असीम है परिवर्तन के नियम से ।
  यह है अलिखित सामाजिक नियम सभी धर्म संस्कृति में चल रहे हैं । 
    जो लोग इन बिना लिखे नियमों को समझ जाते हैं उनके जीवन में संघर्ष की मात्रा कम हो जाती है वही जीवन में अधिकतम तरक्की कर पाते हैं ।  यह बिना लिखे नियम कुछ इस प्रकार से समझे जा सकते हैं जैसे प्रत्येक देश में संविधान में शादी के नियम हैं। परंतु शादी के बाद कहीं पर भी यौन - संतुष्टि के बारे में कोई नियम साहित्य पूर्णतया सार्वजनिक रूप से सत्य प्रमाणित उपलब्ध नहीं है । ऐसे में जो लोग इस अपरिचित  अलिखित मस्तराम की यौन शिक्षा से पढ़कर यौन शिक्षा में अशिक्षित रह जाते हैं । वह अपने जीवन में यौन समस्याओं को लेकर परेशान रहते हैं । परंतु जिन लोगों को थोड़ी सी यौन शिक्षा टूटी फूटी कहीं से भी मिल जाती है वह अपने यौनसमस्या ग्रस्त जीवन को एंजॉय करते हैं । परंतु जिन लोगों को योग शिक्षा नाम मात्र की भी नहीं मिलती है ऐसे में भी योन अशिक्षित स्त्री पुरुष यौन आनंद की तलाश में तलाक दर तलाक के गलत निर्णय लेकर अनेक शादियां करते चले जाते हैं । अनेक स्त्री पुरुषों से पुरुष स्त्रियों से संबंध बनाते चले जाते हैं । परंतु उन्हें कहीं पर भी यौन संतुष्टि आसानी से उपलब्ध नहीं होती है । अपितु उनके ऐसे गलत निर्णय के कारण उनके घर में मानव संतति आबादी बढ़ती चली जाती है । वह फिर भी यौन आनंद से दूर दुखी जीवन जिया करते हैं । ऐसे अनेकों अलिखित नियम मानव समाज नियमों की जानकारी एंथ्रोपोलॉजी में जूलॉजी में सायकोलॉजी में और एनिमल बिहेवियर में विशेष रुप से मिल सकती है। इसके लिए पाठकों को अपना निजी अध्ययन का दायरा बड़ा करना होगा तब जाकर वे समाज के    अलिखित नियमों के बारे में जानकारी प्राप्त कर पाएंगे। 

लोग बीमार होकर क्यों मरते हैं

बीमारी और स्वास्थ्य का रहस्य कुछ शब्दों में निहित है जैसे बायोइलेक्ट्रिसिटी जीवो के शरीर में मौजूद विद्युत ऊर्जा ! बायो मैग्नेटिक ! जीवो के शरीर की चुंबक के द्वारा ब्रह्मांड के वाहय ऊर्जा अंणुओं जैविक वृहदाकार अंणु लधुआकार अंणु   {माइक्रो, मैगा मौलिक्यूल }   को एकत्रित करके अपने शरीर को बढ़ाने की जैविक प्रवृत्ति © , शरीर को नियमित रूप से स्थिर करने का प्रयास ! स्थिरीकरण ऊर्जा /स्थितिज ऊर्जा गतिज और स्थितिज ऊर्जा को नियंत्रित सक्रिय अवस्था में रखने वाले ऊर्जा अणु  ताप का उत्पादन ! रूल्स ऑफ थर्मोडायनेमिक्स !  का ज्ञान होना आवश्यक है। सभी जीव अपने दैनिक कार्यों के दौरान  सक्रियता के कारण अपनी निजी ऊर्जा को गति के दौरान खोते रहते हैं । परंतु अपने को स्थिर स्थाई अवस्था में लाने के लिए सभी जीव स्थिर स्थाई अवस्था में जीने के लिए स्थितिज ऊर्जा की इच्छा रखते हैं । 
             परंतु कुछ वाहय सूक्ष्मजीव ऐसे भी हैं जो जीवो के ना गति करने पर भी उनके शरीर मैं घुसकर उनके शरीर को संगठित करने वाले जैविक अणु को उनके  तोड़कर शरीर से हटाते रहते हैं इन्हें हम लोग रोगजनक  सूक्ष्म जीव कहते हैं । जो बाहय सूक्ष्म जीव बड़े जीवों के शरीरों  को नष्ट करते रहते हैं ।उन्हें हम रोगजनक जी्व कहते हैं । यह वाहय जगत के बड़े जीवो के शरीर में घुसकर उनके विभिन्न प्रकार के ऊर्जा अणुओं को तोड़ कर खाकर ऊर्जा प्राप्त करते रहते हैं जिससे बड़े शरीर वाले जीवों की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का अनुपातिक तारतम्य खराब हो जाता है और बड़े जीव रुग्ण अवस्था कार्य की क्षमता हीन  अवस्था में आ जाते हैं जिन्हें हम बीमार कहते हैं ।
      इसके अलावा मनुष्य का व्यर्थ मानसिक चिंतन भी  ऊर्जा की समस्या उत्पन्न करता रहता है । ऊर्जा भी एक प्रकार के  ऊष्मा / फोटाँन  कंण है जो  चिंतन मनन करने की प्रक्रिया में विचार में परिवर्तित होकर /  बदल कर विचार से शब्द चित्र और वीडियो के रूप में बदल कर शरीर की अस्थायी भूतिक अवस्था में अक्सर प्रकटन से दृश्य विलुप्ति करण से अदृश्य होते रहते हैं । जिनके कारण  फिल्म कल्पनाओं में बदल कर साकार निराकार की अवस्था में आकर जी्व को दृश्य अदृश्य स्थिर अस्थिर की स्वप्न ,कल्पना, जैविक दृश्यों की   भ्रमित अवस्था में करते रहते हैं । जो निरंतर अपघटित होकर छोटे बड़े होते रहते हैं । संगठित होकर बढ़ते रहते हैं । इस प्रकार ऊर्जा के अपघटन की प्रक्रिया से बृहदाकार अंणु निरंतर टूट टूट कर सूक्ष्मता से नष्ट हो जाते हैं ।  तो  छोटे छोटे कंण निरंतर संगठित होकर बड़े वृहदाकार जैविक कंणोंं में बदल कर शरीर का आकर बढ़ाते   चले जाते हैं 
     इस प्रकार से ऊर्जा के सूक्ष्म कणों के द्वारा निरंतर संगठित होकर बड़े आकार के जैविक अणु बनते हैं । जो जीवो के शरीर का निर्माण करते हैं । परंतु जब  ऊर्जा के कण  अप घटितहोकर छोटे होने लगते हैं । यह वृहद जैविक अणु जो कि बड़े आकार थे के थे निरंतर अटघठित होकर छोटे होने लगते हैं या नष्ट होने लगते हैं । ऐसे में जीवो के शरीर से यह शरीर को संगठित करके बढ़ाने वाले वृहदाकार अणु  आयु और रोग के अनुरूप घटते चले जाते हैं जिससे जीवो का शरीर निरंतर छोटा होने लगता है । जब जीवो का शरीर बड़े से छोटा होता है तो जीव को ऊर्जा की कमी से जीवन जीने में समस्या महसूस होती है । जिससे रोग कहा जाता है । यह जीव की रोग अवस्था ह  जिस में आने पर जी्व को पीड़ा का अनुभव होती है । जीव अक्षमता भी महसूस करता है । उससे अपना जीवन जीने के लिए उसके निजी आवश्यक जैविक कार्य भी उससे नहीं हो पाते हैं। इसके अलावा जी्व के अन्य जैविक क्रियाकलप भी हैं जिनमें ऊर्जा कंण अपने आप भी नष्ट होती रहती है गतिज ऊर्जा की कमी उत्पन्न करता है जिससे जीवो का शरीर घटने लगता है बुढ़ापा आने लगता है । 
      मेंटेनेंस अवस्था जिसमें रूल आफ थर्मोडायनामिक्स के अनुसार शरीर भी कई प्रकार के जैविक कार्य करने के दौरान विभिन्न प्रकार की ऊर्जा अणुओं को खोते पाते रहते हैं जिससे शरीर में  गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग स्थिर साम्य बना रहता है । जब तक जीवो के शरीर की ऊर्जा मेंटेनेंस स्थिति बरकरार है जीव का शरीर  स्वास्थ्य अवस्था में रहता है ।  जब मेंटेनेंस की स्थिति बिगड़ने लगती है ऐसे में जीव का शरीर बिगड़ने लगता है उसके शरीर के ऊपर जमे हुए बड़े आकार के जैविक अणु कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिनस के जो जैविक अणु  उसके जैविक चुंबकत्व खराब होने के कारण उसके शरीर में जमे हुए थे वह उखड़ने लगते हैं। ःजिससे जीव पीड़ा महसूस करता है । जीव के शरीर को जीने में जैविक ऊर्जा की कमी पड़ जाती है । जीव के शरीर का ताप गिर जाता है जैसे ही जीव के शरीर का जैविक ताप गिरना शुरू होता है उसका जैविक चुंबक जैविक विद्युत का प्रमाण घट जाता है । उसके शरीर में मौजूद छिपे हुए बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं और उसके शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करके अपना पोषण करने लगते हैं। इस प्रकार से प्रत्येक जीव का शरीर का अस्तित्व उसकी जैविक विद्युत और जेब चुंबकत्व , जैविक ताप थर्मोडायनामिक्स के गुण पर निर्भर करता है । परंतु यह जैविक विद्युत और जैव चुंबकत्व भी उस जीव के निजी विचार अवस्था मानसिक चुंबकत्व वासना ( पूरक आपूर्ति भाव संस्कार )  कामना ( करने योग्य आवश्यक कर्म )  भाव प्रभाव अभाव स्वभाव आदि से जीव के मंन की दीर्घकालिक स्थिर अवस्था खुशी विचलित अवस्था दुख के कारण पर निर्भर करती है ।  
  जीवो के शरीर की एनर्जी मेंटेनेंस जीवो के शरीर तरह तरह के संक्रमण के द्वारा प्रभावित होते रहते हैं जिससे उनके उपयोगी जैविक अंणु उनके शरीर से दूर जाते रहते हैं शरीर छोड़कर हट जाते हैं दूसरे जीव उसके शरीर उपयोगी अणुओं को अपने शरीर में जोड़ने के लिए दूसरे जीवो के शरीर के जैविक अंणुओं का भक्षण करते हैं । इस प्रकार का विचित्र कृत्य वे विभिन्न कार्य के दौरान  ऊर्जा व्यय होने पर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए  करते हैं । उस उर्जा के पूर्ति वह दूसरे जीवो के शरीर को खाकर करते हैं । यदि क्षय ऊर्जा अंणु  और भक्षण ऊर्जा अंणुओं दोनों का अनुपात समान है तो जीवो का शरीर स्वस्थ अवस्था में रहता है । यदि क्षय ऊर्जा अंणुओं परिमाण बढ़ जाता है भक्ष्य ऊर्जा अंणुओं का परिमाण घट जाता है तो  जीवो के शरीर की जैविक क्षमता उनके आवश्यक जैविक कार्य करने के लिएकम हो जाती है । जीव बीमार रहने लगते हैं । इस प्रकार से बक्श उर्जा अनु और 6 उर्जा अणुओं का अनुपात ही जीवो के स्थिर स्वास्थ्य या चलित स्वास्थ्य की पहचान है।

जैविक ऊर्जा रूपांतरण नियम क्या है क्या यह भौतिक ऊर्जा / रासायनिक रूपांतरण नियम से भिन्न है ?

जैविक ऊर्जा रूपांतरण नियम लगभग भौतिक ऊर्जा रूपांतरण  भौतिक रूप से कार्य करने के दौरान एक ऊर्जा का दूसरी ऊर्जा में बदलना जैसे यांत्रिक ऊर्जा का टरबाइन की सहायता से विद्युत ऊर्जा में बदलना और रासायनिक ऊर्जा रूपांतरण विभिन्न प्रकार के पदार्थ के आपस में परस्पर मिश्रित होने पर कोई एक नया पदार्थ बना या दो पदार्थों का आपस में एक दूसरे के अति निकट होते हुए साथ-साथ रहना नियम के जैसा ही है, जैविक ऊर्जा रूपांतरण प्रक्रिया के द्वारा दो विभिन्न नर नारी जीवन के लैंगिक युग्मकों का आपस में मिलकर एक नए शरीर धारी प्राणी का उत्पन्न होना जैविक ऊर्जा रूपांतरण नियम है जिसमें प्रकृति में नर जीव नर युग्मक अधिक ऊर्जावान होता है परंतु नारी जीव नारी युग्मक अल्प ऊर्जावान होता है ।। 
         इस ऊर्जा रूपांतरण के ऊर्जा स्थिरीकरण के नियम के अनुसार भौतिक ऊर्जा लगभग अनियंत्रित होती है , रासायनिक ऊर्जा अर्ध नियंत्रित होती है ,, और जैविक ऊर्जा अधिकतम नियंत्रित होती है ।  सभी सजीव जीवो के शरीर उनके शरीर में स्थित जैविक ऊर्जा के आधार पर बने होते हैं ।  यह जैविक ऊर्जा समय-समय पर भौतिक कार्य करने के दौरान या अवस्था परिवर्तन की आवश्यकता के अनुसार घटती बढ़ती रहती है , जिससे सजीवों के शरीर  बढ़ते . घटते . बनते . बिगड़ते, नष्ट होते रहते हैं  ।  जिन लोगों /जीवोंके शरीर में  इस  जैविक ऊर्जा का उपयोग न्यूनतम होता है उनके शरीर अधिकतम समय तक सक्रिय निरोग  युवा  रहते हैं उनके बाल अधिकतम  आयु की सीमा तक काले बने रहते हैं ।  उनकी त्वचा के मेलेनिन कोशिकाएं पूर्ण परिमाण में या अल्प परिमाण में सुरक्षित रहती  हैं ।
       परंतु जो लोग अपनी इस जैविक ऊर्जा का पूर्ण क्षमता से दोहन किया करते हैं । अपनी जैविक ऊर्जा का  अधिकतम उपयोग करते हैं उनके शरीर की मेलेनिन कोशिकाएं जैविक ऊर्जा की कमी पड़ जाने के कारण  बननी कम हो जाती हैं । जिससे उनके बाल सफेद होने लगते हैं । जब वह अपनी जैविक ऊर्जा का सामान्य क्षमता से अधिकतम उपयोग करने लगते हैं।  तो उनकी त्वचा के मेलेनिन कोशिकाएं तक  धीरे-धीरे  बनना बंद हो जाती हैं ।  यहां तक कि पहले उनके केश अधिक मात्रा में सफेद होने लगते हैं । वह समय से पहले वृद्ध दिखने लगते हैं ।।             
          किसी भी मनुष्य के बालों का सफेद होना उसके अत्यधिक मानसिक चिंतन प्रवृत्ति को व्यक्त करता है । कि वह मनुष्य अपनी जैविक ऊर्जा का अधिकतम उपयोग मानसिक चिंतन में कर रहा है। जिससे उसके शरीर की अन्य कोशिकाओं की अधिकतम जैविक ऊर्जा उपयोग /दोहन क्षमता से अधिक मात्रा में होने से मैलैनिन कोशिकाओं को स्वस्थ रहने के लिए अपना पिगमेंटेशन /रंग बनाने के लिए पर्याप्त जैविक ऊर्जा  A.T.P # A.D.P. ऊर्जा पैकेट निर्माण प्रक्रिया सामान्य नहीं अपितु ऐसा मान्य है।
 जो प्रोटीन संश्लेषण के दौरान आवश्यकता अनुसार सम्यक रूप से उपलब्ध नहीं मिल पा रही है  ।  जिससे उसके शरीर की अन्यमैलैनिन कोशिकाएं ,अस्थि कोशिकाएं ,दंत कोशिकाएं लिंगीय कोशिकाएं के एक निश्चित समय पश्चात नष्ट होने के बाद फिर से दोबारा मरम्मत के द्वारा जल्दी नहीं बन पा रही है । जिससे शरीर अपना कार्य पूर्ण निष्ठा से सही तौर पर नहीं कर पा रही हैं ।  जिससे उसकी मैलैनिन कोशिकाओं के अलावा शरीर की अन्य आवश्यक कोशिकाएं जैसे अस्थि कोशिका त्वचा कोशिका रक्त कोशिका आदि सही रूप से नहीं बन पा रही है । उनकी अधिकतम संख्या नष्ट होती जा रही है वे न्यूनतम प्रमाण में बन पा रही है। परंतु अधिकतर जैविक  कोशिकाएं शीघ्रता से नष्ट होती जा रही हैं ।  इन कोशिकाओं के शीघ्रता से नष्ट होने से मनुष्य आयु से पहले वृद्ध होने लगता है या वृद्ध दिखने लगता है । यदि मेलेनिन कोशिकाओं के अलावा अन्य आवश्यक कोशिकाएं  नहीं बन पाती है । कोशिकाओं में लुप्त होने से ,  या कभी कभी मैलैनिन कोशिकाओं को श्वेत रक्त कणिकाओं द्वारा भक्षण करने से त्वचा में सफेद दाग या ल्यूकोडर्मा जैसी अवस्था दिखने लगती है ।जो केवल गेहुआ रंग के लोगों में  या मोडिफायर जीन की अधिक सक्रियता मैलैनिन संश्लेषण कम होने पर या मैलैनिन संश्लेषण अनियंत्रित हो जाने से दिखाई देती है । जबकि यह काले लोगों में नहीं दिखाई देती परंतु एलबिनो लोगों में इस अवस्था का दिखना का कोई औचित्य नहीं है।।
       इस जैविक ऊर्जा का दूसरा महत्वपूर्ण उपयोगी पक्ष जीवन के संतान उत्पत्ति क्षमता से देखा जाता है जिन जीवों के शरीर में पर्याप्त जैविक ऊर्जा संचित होती है केवल वही उचित परिमाण में संतान उत्पन्न  कर पाते हैं । जिनके शरीर में जैविक ऊर्जा उत्पादन सुचारू रूप से काम नहीं करता जिसके कारण उनके जनन अंग सामान्य क्षमता युक्त ना हो करके अल्प क्षमता युक्त या निष्क्रिय रह जाते हैं वे जीव संतान उत्पन्न नहीं कर पा ये है। परंतु कुछ अनावश्यक रूप से मोटे लोगों और स्त्रियों में देखा गया है कि उनके शरीर के अंदर यह जैविक ऊर्जा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता उनकी अधिकतम जैविक ऊर्जा उनके शरीर के सुरक्षा निर्माण में प्रयुक्त होती रहती है ।  जिससे उनके शरीर के ऊपर जाकर अनावश्यक रूप से वास संचित होती रहती है या कुछ पहलवान को अपने शरीर में अनावश्यक रूप से प्रोटीन संचित करते रहते हैं जिससे उनके जनन अंगों को सामान्य जैविक ऊर्जा उपलब्ध नहीं हो पाती जिससे उन मोटे लोगों और पहलवान लोगों के जनन अंग उतने सक्रिय नहीं रह पाते जितने सामान्य लोगों के जनन सक्रिय होते हैं।
        जैविक ऊर्जा रूपांतरण नियम के साथ-साथ जैविक ऊर्जा का संचालन संवहन विकिरण नियम भी पूरी तरह से लागू होता है जिसके अनुसार कोशिकाएं सही स्थान पर बनने के बाद पहुंचती रहती हैं  । 
            जैविक ऊर्जा रूपांतरण का नियम सिर्फ कोशिकाओं तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए अभी तू यह जैविक ऊर्जा रूपांतरण का नियम कोशिका निर्माण के उपरांत बने जीव शरीरों के ऊपर भी लागू होता है जिसके अनुसार जहां पर प्रारंभिक या प्राइमरी जैविक ऊर्जा हरियाली अधिक मात्रा में उपलब्ध होती है वहीं पर द्वितीय स्तरीय जैविक ऊर्जा कीट पतंग पशु पक्षियों के शरीर रूप में होती है वह उपलब्ध होती है जिसका चैतन्यता और शरीर के आकार के अनुसार शरीर में चालन होता है जिसके अनुसार  इनके शरीर की कोशिकाएं आवश्यकता के अनुसार शरीर में की चुंबकीय ऊर्जा विद्युत ऊर्जा के अनुसार जाकर शरीर के आकार को बढ़ाती रहती हैं । तो इसके संवहन नियम के अनुसार अनेक जीव आक्रमण रक्षण से प्रभावित होकर समूह बनाकर गतिशील रहते हैं  आपातकाल में अनेक जीव प्राण रक्षा संकट उपस्थित होने पर उसे स्थान से वेज पलायन करके भाग करके अलग दूर चले जाते हैं जिससे जैविक ऊर्जा का विकिरण /वितरण नियम का पता चलता है।       मेरा निजी अनुभव ,,

पशु मनुष्य की तरह वृद्धावस्था में इंद्री ही अंधे , बहरे , दंतविहीन - पोप्ले नहीं होते , जबकि मनुष्य वृद्धावस्था में इंद्री हीन अंधा , बहरा , दंतविहीन पोपला हो जाता है ! ऐसा क्यों होता है ?

मनुष्य के शरीर की दो मुख्य अवस्थाएं होती हैं, उत्साह से परिपूर्ण ऊर्जावान अवस्था और   उत्साह से हीन ऊर्जाहींन अवस्था ,   जिसे हम निराशा याने नैराश्य भी कहते हैं । जबकि पशुओं के जीवन में सिर्फ एक ऊर्जावान अवस्था होती है , पशु जीवन में कभी भी निराशा या नैराश्य अवस्था में नहीं जाते हैं । पशु अपने जीवन में जन्म लेने के बाद मरने तक अधिकतर होशो हवास में उत्साह से पूर्ण ऊर्जा पूरित रहते हैं पशु अपनी शारीरिक ऊर्जा मानसिक ऊर्जा का व्यर्थ के कार्यों में अपव्यय नहीं करते हैं। जब उन्हें जिस भी कार्य की आवश्यकता होती है वह उसी क्षण में अपनी मन ऊर्जा और तन ऊर्जा को तभी उस कार्य में प्रयुक्त करते हैं
 जैसे पशु सदैव प्रजनन कार्य में रत नहीं रहते हैं ,  वह प्रकृति के आदेशानुसार ही प्रजा धर्म या पशु कार्य में रत होते हैं ।  पशु सदैव भूखे नहीं रहते उन्हें जब भूख लगती है तो वह भोजन या मैथुन कर्म  करते हैं ।।  जबकि मनुष्य प्रजा कार्य में अपनी ऊर्जा को अकारण अपव्यय करता है,  सदैव भूखा रहता है जिसके कारण वह दूसरे जीवो को अकारण निरपराध निर्दोष होने पर भी अपने भूख व्यापार करने के लिए बिना वजह मारता रहता है और भूख का उद्यम धन के रूप में करता है । युवावस्था में आने के बाद ऐसा लगता है जैसे मनुष्य के पास सिर्फ और सिर्फ मैथुन का ही कार्य करना उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य है वह मैथुन के लिए ही अपना जीवन जी रहा होता है । जो की बौद्धिक दृष्टिकोण से उचित नहीं है हमें अपना जीवन जीने के लिए मिला है जिसमें हम अपनी जीवन की अधिकतम समस्याओं को हल कर सके और अपने जीवन को अपने मौलिक अर्जित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपना जीवन जिए।
 । इसके अलावा पशुओं में अमूर्त चिंतन  मनन ,  ध्यान करने की क्षमता का अभाव /कमी  होती है । जिससे पशुओं में मानसिक ऊर्जा अपव्यय न्यूनतम   होता है ।   जबकि मनुष्य पढ़ाई-लिखाई  अध्ययन में, अमूर्त चिंतन मनन और ध्यान करने के  दौरान अपने निजी स्मृति क्षेत्र में/ मेमोरी में हलचल वृद्धि विस्तार ,निस्तारण डीलीट करना सीखकर अधिकतम मानसिक ऊर्जा अपव्यय करता  है वह अधिकतर निरर्थक अनुपयोगी अध्ययन ज्यादा सार्थक उपयोगी जानकारी वाला अध्ययन कम से कमतर न्यूनतम करता है ऐसे में मानसिक ऊर्जा का अपव्यय अधिकतम करता है , वह नकारात्मक निराशा वादी अध्ययन ज्यादा करता है ।  वह नकारात्मक निराशा वाली बातें ज्यादा करता है जिन्हें करने के दौरान उसकी शारीरिक मानसिक ऊर्जा का अपव्यय इतना अधिक हों जाता है , कि उसके  शरीर के जैविक कार्यों शरीर निर्माण  शरीर के सुचारू संचालन के लिए शरीर अंगों को आवश्यक ऊर्जा बहुत ही कम रह जाती है । ऐसे में मनुष्य के शरीर की दुर्गति का कारण उसके दिमाग की विकृत स्मृति अवस्था नैराश्य ,,  शरीर की विकृत रुग्णता अवस्था ऊर्जा हीनता है जो दुख से उत्पन्न होती है ।  जिसका कारण मनुष्य शरीर में तरह-तरह के विविध प्रकार के तरीकों से विकृत ध्यान करना पड़ता  है ।  परंतु उसे यह ज्ञान नहीं होता कि वह कैसा ध्यान करता हुआ अपना जीवन यापन कर रहा है । विकृत ध्यान के अलावा मनुष्य ज्ञान प्रक्रिया में तरह-तरह के असत्य गलत विकृत करने वाले शब्दों को भी दूसरे लोगों से स्वीकार कर लेता है जिससे उसे अक्सर कारण , अकारण मानसिक भय उत्पन्न होता रहता है । यदि उसका ध्यान ऊर्जा पूरित सकारात्मक आशावादी होता है तो उसके शरीर में निरोगता उत्पन्न होती है । यदि उसका ध्यान   निराशावादीता उत्पन्न  करता है। गलत ध्यान से दुख और पीड़ा अपने शरीर में उत्पन्न करता रहता है। जब मनुष्य दुख की अवस्था में अपने शरीर का ध्यान करने में मगन हो जाता है  ।  तो ऐसे में मनुष्य अपनी गलत ध्यान अमूर्त चिंतन अवस्था से अपने शरीर को स्वयं खराब करता रहता है । गलत ध्यान करने की प्रक्रिया में मनुष्य के शरीर में जगह जगह दर्द उत्पन्न होता है क्षेत्र अंग स्फुरण उत्पन्न होता है । इसके अलावा उस स्थान पर संचित वायु के उखड़ने से तरह-तरह की धातु उखड़ने लगती हैं और उसका वह अंग क्षेत्र अपने आप रोगी विकृत होने लगता है ।
    इसका विचार अथर्व वेद में कुछ इस प्रकार से दिया हुआ है जिसमें लिखा हुआ है आप जो भी काम कर रहे हैं तो काम करने का पता आपके दिमाग को निजी इंद्र को  होना चाहिए ।   शरीर की इंद्रियों को आपके काम करने का पता और तौर तरीका का पता नहीं होना चाहिए । नहीं तो आप के दिमाग की अवस्था के अनुसार शरीर की इंद्रियां निजी अहम् से  इंद्र के अवज्ञा करने से अपना धर्म छोड़ने लगती हैं । जैसे यदि भोजन कर रहे हैं तो ध्यान भोजन में होना चाहिए दांतो और जीभ में नहीं ।  यदि ध्यान दातों पर दांतों के द्वारा या जीभ में , जीभ  पर , जीभ के द्वारा किया जाता है , तो मुंह दिमाग की  सष्क्रिय अवस्था के कारण दंत विहीन हो जाता है । खाने में अक्सर जीभ कटने लगती है मुंह की त्वचा फटने लगती है ।।  इसी प्रकार से जब हम किसी को देखते हैं तो हमें अपना ध्यान उस दृश्य वस्तु पर दृश्य क्षेत्र पर करना चाहिए अपने दृश्य इंद्रियां नेत्रों में नहीं , परंतु हम अक्सर यह गलती दुनिया को देखने में भी कर जाते हैं जब हम किसी को देखते हैं तो देखने से पहले अपना ध्यान अपनी आंखों में लगाते हैं जो मस्तिष्क की निराशा नैराश्य दुख अवस्था के कारण काम करने से परेज करने लगती हैं । जिसस नेत्रों में इंद्री हीनता दर्शन क्षमता में कमी आदि अनेक विकृतियां आ जाती हैं ।  ठीक ऐसा ही हम सुनते समय करते हैं जब हम किसी की बात सुनते हैं तो हमें उसकी बात सीधे-सीधे प्रत्यक्ष सुननी चाहिए लेकिन हम सुनने से पहले अपने कानों को चेक करते हैं अपना ध्यान कानों पर लाते हैं और कान भी वही गड़बड़ी करने लगते हैं जो दांत जीभ आंख करती हैं । कान भी दिमाग की नैराश्य अवस्था ऊर्जा हीनता अवस्था के कारण उर्जा हीन क्षमता हीन होने लगते हैं मस्तिष्क को सहयोग नहीं करते हैं इसी प्रकार से कमोबेश यही अवस्था शरीर के संचालन करने वाली पेशयों के बारे में भी है ।  जबकि कोई भी पशु गति करने से पहले हाथ पैर की अवस्था की चेकिंग नहीं करता पशु अकारण अक्षर व्यायाम नहीं करते हैं वह व्यायाम में अपनी शारीरिक ऊर्जा का अपव्यय नहीं करते हैं ।। कहने का मतलब यह है कि इंद्रियां इंद्र की सहायक होनी चाहिए इंद्र की आज्ञाकारी होनी चाहिए जब हम इंद्रियों पर ध्यान धरने लगते हैं तो इंद्रियों में भी अहम भाव से स्वामित्व भाव उत्पन्न हो जाता है वह भी इंद्र के नियंत्रण प्राण के नियंत्रण से अपने को अलग समझकर अहंकारी होने लगती हैं । ऐसे में इंद्रियों के अतिअहं  बोध भाव से इंद्रियां इंद्र से दूरी बनाकर रहने लगती है । जिसकी पहचान यह है कि हम देख रहे हैं लेकिन दिमाग को पता नहीं । सुन रहे हैं कान को पता नहीं। खा रहे हैं दिमाग तो पता। नहीं चल रहे हैं हाथ पैरों को पता नहीं। ऐसी इंद्रियों की दूरी तय अवस्था में इंद्रियों के अति अभिमान के कारण इंद्रियां बौद्ध भीम प्रज्ञाहीन होने के कारण धीरे-धीरे अपने अतीत से क्षमता हीन होने लगती हैं ।
शरीर की सुरक्षा के लिए इंद्रियों का निजी धर्म बहिर्मुखी होना है जब तक इंद्रियां बहिर्मुखी हैं शरीर सुरक्षित है परंतु आजकल उल्टा ज्ञान देने वाले ज्ञानी गुरु जनों ने इंद्रियों के अंतर्मुखी होने पर बहुत अधिक जोर दिया है जिससे इंद्रियां अंतर्मुखी होने से इनकारी हो गई हैं और इंद्रियां और इंद्र के बीच एक अंतर आ गया है जिससे इंद्रियां इंद्र के नियंत्रण में ठीक प्रकार से नहीं रहते हुए कार्य कर रही हैं और जीव के अंदर इंद्र के ठीक होते हुए इंद्रियों के ठीक होते हुए इंद्रियों के कार्य करने की क्षमता में कमी आ गई है ऐसे में यदि हमें आरोग्य शरीर आरोग्य इंद्रियां चाहिए तो हमें भी पशुओं की तरह अपनी समस्त इंद्रियों को उनके प्राकृतिक मौलिक गुण बहिर्मुखी होने पर विशेष ध्यान देना होगा इंद्रियों को अंतर्मुखी होने से बचना रोकना होगा।
   मनुष्य की वृद्धावस्था में पशुओं से भी ज्यादा बुरी दुर्गति होने का मुख्य कारण मनुष्य का अपने इंद्र पर ध्यान कम अपनी इंद्रियों पर शरीर पर ज्यादा ध्यान को रखते हुए मनुष्य अपना जीवन जीते हैं जिससे अक्सर नकारात्मक विचारों के अधिक मात्रा में ग्रहण करने से इंद्रियां और मन भी नकारात्मक सोच के हो जाते हैं जो अपने इंद्र की आज्ञा का पालन नहीं करते जिसके कारण से आंखें अपने देखने का दायित्व ऊर्जा हीनता से समय  पहले छोड़ने लग जाती है जिसके कारण मनुष्य में अंधापन पहले आंशिक रूप में आता है धीरे-धीरे जो बढ़ता हुआ पूर्णतया अंधापन में बदल जाता है जिसके अनुसार पहले नजर धीरे-धीरे गिरती है उसके बाद एक आंख अपना काम बंद कर देती है उसके बाद दूसरी आंख भी अपना काम बंद कर देती है इस प्रकार से मनुष्य पूर्ण अमृता अवस्था में आकर शीघ्रता से यम पास में फंसकर चला जाता है कमोबेश यही हालत कानों की भी है मनुष्य के कान भी ऊर्जा हीनता के कारण धीरे-धीरे अपना धर्म छोड़ने लगते हैं जिससे मनुष्य को पहले मंदा सुनाई देना आरंभ होता है और बाद में वह पूर्ण रूप से बहरा हो जाता है इसी प्रकार से मनुष्य जब सांसारिक जीवन जीते हुए सांसारिक कर्मों का त्याग करना शुरू कर देता है तो जिस जीवन को जीने के लिए विधाता ने मनुष्य को सक्रिय पेशियां और पेशियां के लिए ऊर्जा की निरंतर व्यवस्था की है जब वह विधाता देखा है कि यह पेशीय के सक्रिय होते हुए भी हाथ पैर नहीं चलता तो विधाता धीरे-धीरे हाथ पैर की ऊर्जा में कटौती करना शुरू कर देता है जिस हाथ पैर की पेशियां समय से पहले निष्क्रिय डिजैनरेट हो जाती हैं जिसके कारण पेशीय के ऊपर की खाल लटकने लगते हैं।
   अब सबसे लास्ट में चर्चा करते हैं दांत हीनता या पोपलापन मनुष्य अक्सर खाना खाते समय अपना ध्यान भोजन पर न रखते हुए अधिकतर स्वाद के लालच में अपना ध्यान जीभ और दांतों पर रखता है उसके मन मस्तिष्क में खाते समय भी उसका ध्यान भोजन पर नहीं रहता उसके दिलों दिमाग में चल रहे नकारात्मक विचारों के अंधड़ पर बना रहता है जिससे उसका ध्यान भोजन में न होने से अक्सर कभी-कभी उसके दांत जीभ को काट देते हैं तो कभी दांत मुंह की खाल को काट देते हैं जब उसके दांत उसकी जीभ और मुंह के खाल को काटने लगते हैं तो उसके अवचेतन मन से दिमाग को एक गलत संदेश जाता है की इन गलत दांतों की जरूरत नहीं है जो बार-बार जीभ को काट रहे हैं मुंह की खाल को काट रहे हैं । इसका नतीजा यह होता है कि अपना अवचेतन मन उन दांतों को समय से पहले नष्ट करने का उद्यम करने लगता है । वह शरीर में दांतों को नष्ट करने के लिए कुपित वायु करने के लिए अम्लपित्त की मात्रा बढ़ा देता है यह शरीर में बड़ी हुई अमलता की मात्रा और इससे उत्पन्न हुई कुपित व मनुष्य के दांतों के समय से पहले क्षय का कारण बनती है जबकि पशुओं के अंदर केवल अपना ध्यान भोजन पर रखने के कारण पशु मरते दम तक दांत बने रहते हैं । जिससे पशु पोपले /दंत हीन नहीं  होते हैं ।  तभी तो पशु मरते समय अपने दांत साथ लेकर जाते हैं।