डीएनए की नकल का क्या प्रभाव है जो प्रजनन प्रक्रिया पर पूरी तरह से सटीक नहीं है?




Gene track system
F1 __50 +50 %
F2 __25 % +50&25 %
F3 __12.5 % +50 +37.5 %
F4 __6.25 % +50 + 43.75 %
F5 __ 3.125 %. +50. +46.875 %
F 6 __1.5625. %. +50 +48.4375 %
F 7 __ o.8125. %. + 50 +49.2495 %
F 8 __0 .40625. + 50 +49.65575 %
F9 __0.203125 + 50 + 49.858875 %
F 10 __0.1015625 + 50 + 49.960437 % this is the pattern or rule of genetically increase and decrease traits or cherecters which is pass out in to next generation F1 ,F2 F3 F4 F5,F6 F7 F8 F9 F10 .according to mandellow of inheritance
Hence DNA copy pattern effect is not true 100% correct accurately.
Here 50% cherecters comes from male and 50% cherecters come s female.
If we considered only one side cherecters are same 50% is Konstantin there both side cherecters are deviated .
Hence if we wants choice cherecters are increased .then after we make a certain character gene track pattern followed

This is the DNA of chromosomal nuclear genic pattern where male and female both gene participate 50&50 0/0 during reproduction procedure .

But in case of mitochondrial DNA genic pattern is quite differently ,in Which only Mother mitochondrial DNA is pass out in NextGeneration

Because during reproduction fertilization male sperm mitochondria can not entered in female ovum cell, only male sperm head contains chromosomal DNA entered in female ovum cell. Male mitochondrial DNA presents in tail region which is not entered into female ovum cell , if any one mitochondria is entered in the cytoplasm of ovum cell then after male mitochondria destroye in female ovum by phagocytosis by lysosomal enzymes activity.

Hence male mitochondria not pass out in NextGeneration . energy lavel of future generations is totally dependent on mother's mitochondrial DNA presents 100percent .

This process is governed by cytoplasmic domain inheritance rules . Variations, speciation genetic drift, mutation also includes in it .

अंडा देने वाले प्राणी को क्या कहा जाता है?

जीवन उत्तपत्ति धारणा के अनुसार जीव चार प्रकार से पैदा होते हैं ।उद्भिज , स्वेदज , अंडज , जरायुज । भारतीय पुराने विज्ञान मत के अनुसार ।
उद्भिज जीव ःः ये जीव भूमि पर उसके धरातल को तोड़कर अपने आप अपनी निजी जैविक क्षमता से पैदा होते हैं । इसके अलावा पहाड़ों पर टूटे शिला खण्डों के मध्य जो जीव वनस्पति दिखाई देते हैं ,मानवीय क्रियाओं के बिना पैदा होते हैं बिना कृषि कर्म के ,जो प्रज्या कर्म प्रजनन करते दिखाई नहीं देते . उन सभी जीव ओं को उद्भिज जीव कहते हैं ,वनस्पतिक जीव .अदृश्य सूक्ष्मदर्शी जीव . वायरस ,बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ, पोरीफैरा ,सीलेन्ट्रेटा ,प्लैटीहैल्मिंथ ,निमैटोडा ,एनिलिडा .मोल्सका ,इकाईनोडर्मेटा मत्स्य मछली मेढक आदि ।
स्वेदज ःः ये सूक्ष्म जीव उन बड़े जीव ओं के शरीर पर पैदा होते हैं जिन्हें पसींना /स्वेद अधिक मात्रा में आता है, जो अपने स्वेद को पूर्ण रूप से साफ /स्वच्छ नहीं कर सकते ,कर पाते हैं ।ऐसे में उनके शरीर के स्वेद की गंध के अनुसार उनके शरीर पर तरह तरह की शरीर गंध के अनुसार तरह तरह के सूक्ष्म दर्शी अदृश्य दर्शी जीव पैदा हो जाते हैं । सूक्ष्म कवक सृष्टि दाद छाजन एक्जिमा ,बैक्टीरिया सृष्टि ,प्रोटोजोआ सृष्टि, सूक्ष्म आर्थोपोडा जूँ चीलर, कलीली आदि परजीवी सृष्टि उत्पन्न हो जाती है यदि उनके शरीर की सुरक्षा के लिए बनी शरीर में बनी तैलीय ग्रंथियां प्राकृतिक रूप से कार्य करने में पूरी तरह से सक्रिय नहीं होती हैं ।
उनके शरीर पर शरीर सुरक्षा के लिए प्राकृतिक तेल, म्यूकस की परत नहीं होती है ।
अण्डज ःः ये जीव अपनी जातक वृद्धि के लिए प्रजनन की लैंगिक अण्डज विधि का प्रयोग करते हैं ।इन जीव ओं में एक समान जाति के नर जीव उसी स्वजातीय मादा से प्रज्या कर्म मिथुन संसर्ग करते हैं ,मादा स्वजातीय जीव नर स्वजातिय जीव के शरीर अंश शुक्र अणुओं को अपने शरीर के स्त्रिय अंगों में धारण कर लेती ह ।बाद में मादा के स्त्रिय अंगों के अण्डज संकाय में उपस्थित अण्डों से एक एक से एक के अनुसार मिलन कर्म निषेचन होता है ।बाद में निषेचित अण्डे में जीव का सूक्ष्म रूप भ्रूण बनता है , जो अण्डे में विकसित हो जाता है जीव के छोटे बच्चे के रूप में ।बाद में जीव का छोटा रूप उसके बच्चे के रूप में अण्डे से बाहर आता है । सरीसृप जगत, छिपकली कछुआ साँप मगरमच्छ ,पक्षी जगत के सदस्य परवाजी पंख ,परों से युक्त मुर्गा मोर कौआ , आदि तथा स्तनपयी जगत में डकबिल एकिडना अंडे देते हैं ।
जरायुज ःः ये सभी जीव वाहय कान वाले होते हैं इनकी त्वचा पर बाल होते हैं ,इनकी एक जाति दो उप जातक रुप नर व नारी /मादा रुप में होते हैं ,सैक्सुअल डाईमौरफिज्म . सिंगल सैक्स इन टू कास्ट । ये स्तनपयी जगत के बच्चे पैदा कर ने वाले जीव हैं इन जीवों की मादा बच्चे पैदा करती है ।बच्चों के पैदा होने से पहले उनका विकास मादा के गर्भाशय में एक सुरक्षित आवरण जेर में पलेसैंटा नाभि नाल द्वारा निर्धारित समय तक होता है ।पूर्ण विकास पश्चात एक निर्धारित निश्चित समय पश्चात बच्चे नाभि नाल सहित जेर में सुरक्षित रूप से मादा के योनिद्वार अंग से बाहर आता है ।उतपत्ति के समय बच्चे के जेरीसुरक्षा आवरण में आने से इन्हें जरायुज कहते हैं । मनुष्य गाय भैंस बकरी बंदर सिंह कुत्ता आदि

चार चैंबर दिल होने पर क्या फायदा?



विकास की प्रक्रिया में अकशेरुकी जीव ओं में एक चैंबर दिल होता है जो स्पंदन धडकन के दौरान रक्त संचार क्रियान्वयन में केवल रक्त को रक्त नलिकाओं में हिलाया करता है रक्त को निश्चित दिशाओं में नहीं संचालित करता है ।
कशेरुकी जीवों में प्रथम विकास शील प्रथम श्रेणी जीव मत्स्य/मछलियों का हृदय द्विकक्षीय होता है जिसमें एक वाल्व होता है जिससे रक्त एक निश्चित दिशा में बहता है रक्त में शुद्ध आक्सीजन वाला शवासन अंग गिल क्षेत्र में से शरीर में जाता रहता ह ।मस्तिष्क को अलग से शुद्ध रक्त नहीं मिलता ,शुद्ध आक्सीजन युक्त तथा अशुद्ध कारबनडाईआकसाईड रक्त मिश्रित होकर बहता है । मत्स्य /मछलियों की तुलना में उच्च विकसित उभयचर ओं मेढक ओं टोड का हृदय त्रिकक्षीय तीन चैंम्बर दो अलिंद एक निलय वाला होता है जिससे मेढकों टोड में तीन तरह का रक्त हृदय से प्रवाहित होता है , अधिकांश शुद्ध रक्त मस्तिष्क में प्रथम जाता है, शेष शुद्ध रक्त शरीर के अंगों में जाता है अशुद्ध रक्त कारबनडाईआकसाईड वाला फेफडों में जाता है ।कैरोटिड आर्क ,सिस्टैमैटिक आर्क , पल्मोनरी आर्क रक्त वितरण प्रणाली से ।इनमें शुद्ध अशुद्ध रक्त का मिश्रण हो जाता है । न पूर्ण शुद्ध रक्त हृदय से मस्तिष्क में जाता है न पूर्ण अशुद्ध रक्त फेफडों में जाता है पल्मोनरी आर्क सिस्टम द्वारा ।
चार चैंम्बर वाला हृदय स्तनधारी वर्ग के जन्तुओं का होता है जिसमें दो दायां अलिंद फेफड़ों से शुद्ध रक्त , बाँया अलिंद फेफडों सेअशुद्ध रक्त लेते हैं । दो निलय कक्ष दायाँ निलय शुद्ध रक्त धमनियां कक्ष में भेजता है बाँया निलय बाँयें अलिंद से प्राप्त अशुद्ध रक्त को फेफडों में भेजता है । चार कक्षीय हृदय होने से शुद्ध आकसीजन युक्त तथा कारबनडाईआक्साईड युक्त अल्प आकसीजन वाला रक्त अलग अलग रहता है । मस्तिष्क और शरीर के सभी अगों को पूर्ण शुद्ध आक्सीजन युक्त रक्त मिलने से स्तनधारी ओं का शरीर और मस्तिष्क अन्य जीव की तुलना में अधिक सक्षम सक्रिय होता है ।जिस कारण से मैमेलियन /स्तनधारी जीवों का विकास उच्च स्तरीय कहा जाता है ।अधिक मस्तिष्क सक्रिय , अधिक शरीर सक्रिय ।


दार्शनिक जबाब :

दिल में चार चैम्बर तो होते हैं ।पता चल गया ।।

नयी पहेली
एक शरीर में चार दिल होते हैं दो दिल दिमाग में एक हाईपोथैलामस या त्रिकुटी दूसरा जीभ ।
दो दिल धड़ में होते हैं एक हृदय ऊपरी एक हृदय निचला जिसे जातक हृदय गर्भाशय/शुक्र आश्य कहते हैं
इन चार ओं में एक समानता है । हृ से हरण द से देना य से यह जो स्थिर स्थित स्थान अमर है ।

क्या सक्रिय लकड़ी का कोयला काले मस्से और मुहासे का इलाज करता है?



यह अफवाह कहूँ या मित्थया कथन या फिर अपने आप को खुद ही धोखा देने जैसा है ।मैं इस पर अपना निजी सत्य अनुभव बयान कर रहा हूँ ।
मेरी बेटी को29सितंबर2015 को बेटा हुआ ,पैदा होने के8दिन बाद बेटे को दस्त की शिकायत बनी जो ठीक होने में नहीं आयी बच्चा खूब माँ का दूध पीता रहता दस्त करता रहता दस्तों की अधिकता से उसका मलद्वार स्थान के आस पास का स्थान की त्वचा गलकर फटने लगी ,बच्चे का इलाज 9 वें दिन से शुरू करवा दिया MBBS ,MD , बाल रोग विशेषज्ञों चिकित्सक द्वारा ,देशी आयुर्वेदिक दवाई मल्हम नीम, बोरोप्लस आदि जिसने बताया । पर मलद्वार क्षेत्र के आसपास की त्वचा कभी कभार ठीक दिखाई देती फिर अगले दिन फटी हुई क्षतिग्रस्त दिखाई देती । सभी परेशान कि ये कैसा रोग है जो दिल्ली में बाल रोग विशेषज्ञ ओं से भी ठीक नहीं हो पा रहा है ।
डाक्टर लोग हमारा ध्यान रोग के स्थान से हटाने को कोई नीली इंकी दवा ई देता ,कोई क्रिस्टल वायलट की बैंगनी रंगों की दवाएं देते . हमको जब तक रोग क्षेत्र दवाइयों से छिपा होता दिखाई नहीं देता ।एक सप्ताह के बाद कारनिफिकेशन प्रक्रिया पश्चात जब पुरानी त्वचा हटती तब रोग ग्रसित स्थान की त्वचा फिर से दिखाई देने लगती हम सभी परेशान थे ,ये कैसा रोग है जो ठीक नहीं हो पा रहा है । इस बीच रोग की बढती स्थिति देख कर उस पर नीम का स्वनिर्मित मल्हम लगाया जाता तो आराम हो जाता था ।3दिन बाद फिर वही क्षतिग्रस्त त्वचा दिखाई देने लगती । मेरा मन परेशान आखिर ये कैसा रोग है जिसमें फायदा नहीं होता है । बाल रोग चिकित्सक और अन्य शुभ चिंतन कर्ता सफाई की कमी बताया करते मैं परेशान था इस नये रोग से । तभी एक दिन एक बूढी पडोस की माँ आयीं और बताया
बच्चे को चुन्ने का या ततैया का रोग हो गया इसका इलाज कोई पुराना हकीम /वैद्यक कर सकता है ये रोग नये डाक्टर ओं की समझ से परे है ।
बस यही वाक्य काफी था । हमको जागरूक करने को । हमारे पास ही बुलंद शहर में पुराने यूनानी तिब्बी हकीम जी के पुत्र काली नदी के पुल के पास रहते हैं । मैं ने बच्चे को उन्हें दिखाने को भेजा साथ में छोटी बेटी को कैमरा मोबाइल देकर कहा कि वो जब हकीम थी इलाज करें तो वह विडिओ बना ती रहे ।
हकीम जी ने इलाज शुरू किया जो हुआ वह चमत्कार था ।बच्चे के मल द्वार से छोटे छोटे कृमि यों के बच्चे लार्वा छोटे छोटे गिंडार जैसे जमीन पर गिर ने लगे । वैद्य जी ने कृमि नाशक दवाई खिलाने को दी ,बच्चे की अति अल्प आयु को विषैली कृमि नाशक दवाई नहीं खिलाई पर 10दिन बाद बच्चे को फिर भेजा ,तो देखा अबकी बार लार्वा/छोटे न होकर बड़े बड़े थे जो मल द्वार से गिर रहे थे ।
बस फिर क्या था , रोग के कारक लार्वा के फोटो मिलने के बाद में उनके अध्ययन में जुट गया . मैं ने प्राणी शास्त्र में परजीवी यों का फिर से अध्ययन किया तो पता चला
बच्चे को माईसिस रोग हो गया था जिसका इलाज आपरेशन से आँतों की सफाई करना था वह भी एक माह के बच्चे की , आपरेशन की कामयाबी की सफलता आधी । बच्चे के लिए दवाई के साथ दुआ पूजा स्तुति शुरू इस दोरान बच्चे को जीवन क्षमता बढाने की दवा एं चलती रही .बाद में फिर दोबारा हकीम जी को दिखाया गया ,अन्तिम बार के वाकये पर पाठक बन्धु यकीन नहीं करेंगे बच्चे के मल द्वार से छोटे छोटे मकड़ी जैसे छोटे छोटे पंख वाले 4/5 कीड़े गिरे जिनको देख कर बच्चे का बाप यानि मेरा दामाद को गश /हल्का बेहोश होने लगा ।
प्रश्न कर्ता भाई मेरा आपसे अनुरोध है कि ऐसे बहम को मानसिक बल न दें ।कारबन /काला कोयला चेहरे पर लगाने पर मुँहासे आपको उस समय दिखाई नहीं देंगे जब तक चेहरे पर कोयला का चूर्ण/पाउडर लगा रहे गा ।जैसे ही कोयला पाउडर हटेगा मुँहासे फिर से दिखाई देंगे । मुहासों का कारण बाल की जड़ो में ,त्वचा के रोम कूप छोटे छोटे त्वक छिद्रों में रहनेवाले बैक्टीरिया /माईक्रो आर्थोपोडा आदि सूक्ष्म जीव के उपस्थित हो ने से होता है जो तैलीय त्वचा में त्वचा की तैलीय ग्रंथियों के तेल से बन्द होकर मर जाते हैं ।
इनका इलाज त्वचा की सफाई ह न कि त्वचा पर कोयला पाउडर लगाकर संक्रमित त्वचा को आँखों से ओझल रखना ।
यही बात एपिथिलियक कैंसर /त्वचा पर बने मस्सों पर भी लागू होती है । मस्सों का देशी /आयुर्वेदिक /यूनानी ईलाज बहुत अच्छा उप लब्ध ह । सावधानी बरतें त्वचा की जलन के प्रति /खुजली के प्रति जागरूक रहे । त्वचा को जलन खुजली से बचायें मस्से खुद ब खुद कम हो जायेंगे । होम्योपैथी क दवा थूजा का सेवन होम्योपैथी क चिकित्सक के निर्देशन में करें ।

जब आप पहली बार किसी पुरुष / महिला से मिलते हैं तो आप सबसे पहले क्या देखते हैं?



जब भी मैं किसी से मिलता हूँ तो सबसे पहले नजर उसके वाहय आवरण वस्त्र के रंगों पर जाती है यदि उसके वस्त्र का रंग मेरी पसंद का ह वरीयता क्रम हरा+नीला =बिरोजी तूतियाCuSo4वाला है तब पहले वस्त्र धारण तौर तरीके पर जाती है ।यदि बिरोजी रंग नहीं है तो बिरोजी घटक रंग पहले पीला फिर हरा बाद में क्रमशः रंग क्रम लाल से गुलाबी तक रेंज क्रम स्पैक्ट्रा में ,फिर काले स्पैक्ट्रा में ग्रे आदि म ,सबसे अन्त में मिश्रित रंग परिधान में जाती है ।तत्पश्चात वस्त्र धारण कर्ता के चेहरे पर फिर चेहरे के भावों भावनाओं पर जाती है ।यदि चेहरा पहली बार दिखाई देता है भाव भावनाओं से हीन है तो नजर हटाकर अन्यत्र को देखने में चली जाती है ।यदि चेहरा पहली बार में भाव भावनाओं भंगिमा ओं युक्त होता है तब नजर प्रथम बार भी चेहरे पर रुक जाती है यदि चेहरा पहले भी देखा जा चुका है तो आवृत्ति की अधिक ता के परिमाण के अनुसार यदि चेहरा परिचित है भाव भावनाओं से हीन है तब नजर चेहरे पर रूककर देखने वाले की प्रतिक्रिया की इन्तजार करती है । यदि अपरिचित चेहरे की प्रतिक्रिया आती है तो नजर हट जाती है यदि चेहरा सामने परिचित का है तब प्रतिक्रिया इंतजार का समय बढ़ जाता है । परिचित चेहरा होने पर , सुन्दर चेहरा होने पर , युवा चेहरा होने पर ,बालक बालिका चेहरा होने पर मन्त्वय प्रक्रिया अनुसार पहले अपने मन के भाव विचार प्रस्फुटन प्रक्रिया चल पड़ती है ।
प्रथम तः यदि चेहरा वय समान उम्र का है तब नजर विपरीत लिंगीय क्षेत्रों की ओर बढ़ जाती है ऊपर से नीचले अंगों की ओर चलने लगती है पैरों तक ,शरीर के आँकलन करने के बाद उससे भविष्य की कामना पूर्ति कर ने का विशलेषण मन में चलने लगता है कि इसका भविष्य में क्या क्ब क्यों कैसे उपयोग किया जा सकता है । दूसरी ओर से उचित सिग्नल मिलने पर भविष्य की प्रक्रिया शुरू , अनुचित सिग्नल मिलने पर भविष्य की सोच कल्पना का चैनल बन्द ।
यदि चेहरा मन माफिक सुन्दर है तो देखते रहे ने की प्रक्रिया चल पड़ती है । यदि चेहरा परिचित का है तब समाचारों की प्रक्रिया विचारों के लेने देने की प्रक्रिया चलने लगती है । यदि चेहरा बालक बालिका बच्चे का है तब पता नहीं चलता और हम बच्चों का चेहरा देखते देखते कब अपने बचपन में चले जाने हैं कि हम भी कभी ऐसे ही अबोध बालक होंगे ।लोग हमको भी इसी तरह से देखते होंगे कोई ममता से ,कोई प्यार से ,कोई रिसता शत्रु भाव से ,कोई ऋषि ता पढ़ाने समझा ने के भाव से ,कोई चिढ़ाने ,कोई पीटने ,कोई, घुड़की देने को ,कोई डराने को । और भी न जाने कैसी कैसी कल्पना एं मन में चलने लगती है बालक बालिका बच्चों को देखकर । जैसा जिसका बचपन बीता यदि कुछ बचपन की यादें मन में शेष हैं ।
जब हम किसी वृद्ध बुढढे चेहरे को देखते हैं तो डर जाते हैं उस बुढढे के चेहरे को लेकर कि एक दिन हमारी भी ऐसी शक्ल हो जायेगी जिनको कोई देखना पसंद नहीं करेगा ।जिस के चेहरे पर सुन्दर चमक नहीं . मुँह में दाँत नहीं ,चेहरे के सफेद बाल ,चेहरे की मुँह के आस पास की ,नेत्रों के आसपास की, सिकुड़ी त्वचा, झुर्रियों से भरा चेहरा ,सोचने लगते हैं कि कैसे जी रहा है ये मानव भोग हीन जीवन को ।आखिर जीवन खाने में समर्थ ता का ही नाम है ।ये जीवन कैसे जी रहा है बिना इन्द्रिय भक्षण के ।
पांच इन्द्रिय भक्षण नेत्रों से दर्शन, कानों से नाद आवाज संगीत , नाक से गंध ,जीभ से रस ,त्वचा से ,स्पर्श ।
पांच कर्म इन्द्रिय भक्षण हाथों से कर्म ,पैरों से गमन, उदर से भंडारण ,जननांगों से अपूर्ण अंश भक्षण, शुद्धि अंगों से उत्सर्जन मल मूत्र का ।
उपरोक्त इन दस इन्द्रियों की अल्पशक्ति का नाम है बुढढा,
शक्ति हीन ता का नाम है मौत जिसे हम दूसरों के चेहरा देखकर सीख ते पढ़ते हैं ।

अलसी के बीज वजन कम करने में कैसे मदद करते हैं?



शरीर में आकसीकरण क्रियाओं की गति ,बी.एम .आर .,गर्मी की दर बढ़ा कर ।ध्यान रहे अलसी में जैविक यौगिक संयुक्त सायनाइड अति अल्प मात्रा में होता है जो आयुर्वेद में विष चिकित्सा प्रकरण में व्यक्त है ।यह यौगिक ज्वार में भी होता है ।अतः अलसी को अति न्यून मात्रा में उपयोग में लें ।यह दस्त/ लूजमोशन से डिहाइड्रेशन उत्पन्न करने वाली ह । इसकी उपयोग मात्रा एक चम्मच से कम ह ,जो पांच मिली वाली है ।

योग से संबंधित कुछ मिथक क्या हैं?

इसके लिए आपको पतंजलि योग दर्शन की गीत प्रैस गोरखपुर वाली छोटीसी किताब स्वयं खरीद कर पढनी चाहिए ,विस्तार से योग का सही प्रमाणिक अध्ययन के लिए पातंजल योग प्रदीप स्वामी ओमानंद वाली पढ़नी चाहिए । ये दोनों पुस्तकों में योग के चार विशेष खंड /पाठ पाद रुप में हैं ,इनमें चौथा विभूति पाद उर्फ सिद्ध पाठ मन में अनेक शंका /संदेह पैदा करता है जिसमें अष्ट सिद्धधी ओं का विवरण जैसे अणिमा शरीर को अणु समान सूक्ष्म स्वयं को अदृष्य कर लेना पूर्णतः मित्थया है विज्ञान के प्रकाश का अपवर्तनांक के एक या एक से कम होने पर संभव है ।वायु का अपवर्तनाँक एक है ,जल का अपवर्तनाँक 1.3है ,पारदर्शी काँच का अपवर्तनाँक 1.5 है जबकि अपारदर्शी वस्तुओं से प्रकाश का परावर्तन होता है ।अपवर्तन नहीं ।
परावर्तन के नियमों में प्रकाश अपारदर्शी वस्तुओं से टकरा कर प्रकीर्णनित होकर वस्तु के चारों ओर बिखर कर वस्तु को दिखा देता है ,जबकि पारदर्शी वस्तुओं के काँच जल आदि के दूसरी ओर पार निकल जाता है जिसे प्रकाश का अपवर्तन/ तथा तुलनात्मक दो माध्यमों के अपवर्तन को एक के सापेक्ष दूसरे का अपवर्तनांक कहते हैं जिसमें प्रकाश किरणें एक से दूसरे में आरपार निकल जाती हैं जिससे वस्तु के पारदर्शी होने का भ्रम होता है पर दूर से । पास आने पर यह भ्रम दूर होता जाता है जैसे जैसे हम वस्तु के निकट पहुंचने लगते हैं जल ,वायु,काँच का अलग अलग विवेक उत्पन्न होने लगता है । अर्थात कोई भी वस्तु तब तक अदृष्य नहीं हो सकती जब तक प्रकाश उसके अंदर से आरपार जाने से रुक नहीं जाता ।वस्तु के अदृश्य होने के लिए प्रकाश का उसके अंदर से आरपार एक ओर से दूसरी ओर निकल जाना जरूरी होता है । यह योग सिद्धधी अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है ।
लघुमा सिद्धधी शरीर को अपनी ईच्छा नुसार सामान्य आकार से छोटा कर लेना ,अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है हनुमान सुरसा प्रकरण ।
महिमा सिद्धधी शरीर के सामान्य आकार को विस्तारित करके बढ़ा लेना ,रामायण में हनुमान का कुम्भ कर्ण से युद्ध,अहिरावण वध आदि सिद्धधी याँ प्रमाणित नहीं हुई हैं ।सभी जीवों के शरीर का एक निश्चित आकार होता है जो एक क्षण में एक सेकेंड में नहीं बदल जाता ।शरीर के आकार को बढ़ने का एक निश्चित समय सीमा होती है ।यह सिद्धधी विज्ञान के नियम मानकों पर फेल है
विशेष पेन्ट लगे स्टैल्थ विमान को रडार से अदृश्य होने के लिए निरंतर अति आवश्यक उच्च गति से उड़ना पड़ता है ।मानक स्पीड कम होने पर, या स्पीड मंदी होने पर, भूमि पर खड़ा होने पर पह अदृश्य विमान दृष्टि में आजाता ह ।
इसी प्रकार से साधन पाद /पाठ में भी अनेक खतरनाक हानिकारक आसान आदि क्रियाएं हैं ,जिनको अपनाकर करते रहने पर उनका हानिकारक प्रभाव वृद्ध आयु में आता है ।जैसे वज्रोली .अमरोली, धौति ,नेति ,वस्ति आदि ।यदि मैं कहूँ कि योग का अध्ययन, अभ्यास, किताब में से पढ़ने के बाद बिना किसी अनुभवी गुरु से सीखे करना ठीक नहीं ह ।और योग की निरंतर बुराई करना, योग योगी में कमी ढूंढना बिना योग का अध्ययन अभ्यास किये ठीक नहीं है ।
मेरे विचार से योग का मतलब है अपनी आत्मा को अपने प्राण बंध द्वारा अपने शरीर से जोड़ना ।अर्थात शरीर की प्रत्येक कोशिका पर अपनी आत्मा की विद्युत शक्ति द्वारा नियंत्रण करने की कला ।और प्रत्येक कोशिका में उपलब्ध ऊर्जा पैकेट माईटोकोन्डरिया की ऊर्जा दायी आक्सीकरण क्रियाओं पर नियंत्रण सीखना ।जो शरीर में आत्मा की प्राण क्रिया संचार नियंत्रण से आती है ।योग का मतलब शरीर को प्रत्यास्थता लोच लचीला रबड़ जैसा बनाना नहीं है ।
ऐसा न समझा जाय कि में आपको योग विद्या से डराकर आपको योग से दूर करके योग से भटका ,भ्रमित कर रहा हूँ ।
मेरे कहने का आश्य यह है कि मात्र कुछ श्लोकों के पढ़ने से योगी न बना जाय अपितु योग को पूरी तरह से संक्षेप में पढ़ा लिखा समझा जाय पतंजलि योग दर्शन की छोटी किताब से ,और योग को समग्र रूप से समझने के लिए पातंजल योग प्रदीप का विधिवत अध्ययन किया जाय 1माह से अधिक का समय देकर ।
धारणा ध्यान समाधि त्रयमेब संयंमः का अर्थ है जब हम अपनी अपनी धारणा के अनुसार, अपने ध्यान स्मृति का अभ्यास करते हुए अपनी समाधि अवस्था में जिसमें शरीर निष्क्रिय और मन सक्रिय अवस्था अवचेतन स्तर पर चले जाते हैं तो हमको उस वस्तु का चतुर्थ भाव कालों का ज्ञान हो जाता है ।यह मन की पूर्ण चैतन्य अवस्था कही गई है । जिसका मुझे आँशिक रूप में अनुभव हुआ है ,पूर्ण रूप से नहीं । जिससे मुझे अब जीवों के भाव क्रिया व्यवहार की समझ हो गई है ।
वैसे भी योग विषय जीव संबंधित होने से अर्ध सत्य के नियम पर आधारित ह ।न पूरा असत्य है, न पूर्ण रूप से सत्य है ,50ःः50 प्रति शत अब जैसा जिसका अभ्यास परिचय वैसा उसका ज्ञान ।योग को जब पढ़ोगे तब कुछ मिथक मिलेंगे ,कुछ अकाट्य सत्य
मेरे कहने लिख ने मात्र से इस विषय पर अपनी धारणा बनाना ठीक नहीं है । इसे 50से500रपए खर्च करके स्वयं के निजी अध्ययन से सीखा जाय तो सर्वश्रेष्ठ रहेगा ।पुस्तक विवरण परिचय मैंने निजी अध्ययन वाला स्वयं अनुभव का दिया है ।
योग का अर्थ मात्र आसन आदि क्रियाएं नहीं हैं अपितु योग के अष्टांग चरण घटक हैं जो इस प्रकार से हैं
1यम मर्यादा हीन ता के दुष्प्रभाव, दुष्परिणाम
2नियम मर्यादा पालन का सुप्रभाव, श्रेष्ठ परिणाम
3आसन स्थिर सुख स्थिति आरामदायक शरीर मुद्रा एं
4प्राणायाम शरीर में प्राणों का आयाम अधिक तम स्थिति
5भोजनम् श्रेष्ठ अन्न सेवन से शरीर सुदृढ़ करना
6धारणा मन में उत्तम ज्ञान धारण करना पोजीटिव कनसैप्ट कलैक्शन इन ब्रैन
7ध्यान स्मरण प्रक्रियाएं नियंत्रण करना, विषय वस्तु रूप रेखा अनुसार मन में भरी वीडियो को इच्छा के अनुसार देखना ,स्मृति नियंत्रण
8समाधि किसी भी विषय वस्तु पर ध्यान जमाकर उस विषय से संबंधित सभी जानकारी की दिमागी औडियो ,वीडियो किलिप को अपने मन में देख कर किसी भी विषय वस्तु पर लम्बे समय तक धारा प्रवाह बोलने की कला । ओजस्वी मनस्वी यशस्वी वकत्व्य क्षमता ।
ये आठ यौग के घटक हैं ।जिनका अधिकतम ज्ञान होने पर ही व्यक्ति योगी कहलाता है ।
मात्र गेरूए वस्त्र धारण करना ,गले में रुद्राक्ष पहनना ,आग जलाकर भस्म रमाना ,धूनी धूँआ करना यह योग का आँशिक रुप है रंग धारणा वर्ण स्पैक्ट्रा कलर कन्सैप्ट ,धूम्रपान चिकित्सा आदि योग में रोग व्याधियों के निस्तारण के लिए है ।

क्या समलैंगिकता एक बीमारी है?

समलैंगिकता से अभिप्राय है अपने समान लिंग वाले अपने समान जैविक जाति वाले जीव की ओर आकर्षित होकर उससे यौनिक संबंध बनाना या यौन संबंध बनाने का प्रयास करना या यौन संबंध बनाने की मानसिकता रखते हुए उस स्व समान लिंगी प्राणी से भविष्य में यौन संबंध बनाने की कामना/इच्छा रखना , सपने देखना । प्रायतः प्रकृति में सभी प्राणियों में ऐसा अद्भुत विचार कर्म नहीं मिलता विशेष रूप से पशु बुद्धि प्राणियों ,परन्तु वे प्राणी जिनका बौद्धिक विकास अधिक तम होचुका है ,विशेष कर मनुष्य में यह कुत्सित प्रवृत्ति पाई जाती रही है पुरातनकाल से । इस कुत्सित प्रथा /कुत्ता रिवाज का ब्यौरा सभी संस्कृति साहित्यिक पत्रिकाओं, पुस्तकों में मिलता है ।
योगवशिष्ठ ग्रंथ में कुम्भ ऋषि का बर्णन है कि वो दिन में पुरुष रूप में रहते थे ,रात्रि में स्त्री रूप में बदल जाते थे और समर्थ पुरुषों से स्त्रियोचित व्यवहार करते हुए यौनाचार क्रियाएँ करते थे ,रात्रि पश्चात अगले दिन में वह सामान्य पुरुषों के जैसा व्यवहार करने लगते थे ।
प्रकृति में यह गुण असामान्य रुप में स्तनधारी वर्ग में यूथीरिया उपवर्ग में बुद्धिमान प्राणी टंक /आर्डर कार्निवोरा /माँसाहारी ,तथा प्राईमेटस /बुद्धि धारी ओं के नरों में पाया जाता है । कुत्ता, बंदर, बकरा , साँड ,भैंसा ,ऐसा अमान्य कर्म करते कभी कभार कहीं नजर आ जा ते हैं यदि उन्हें उनकी मादा जीव उचित समय पर उपलब्ध नहीं है तो वे असामान्य परिस्थितियों में आपस में ऐसा विचित्र कौतूहलिक कर्म करते हैं , कभी कभी वे विजातीय दूसरी जाति के जीव ओं से भी बलपूर्वक संबंध बनाने का प्रयास किया करते हैं।
ऐसे परिणाम हीन/फलहीन निर्थक कर्म को मित्थया मैथुन कहा जाता है जिसमें नर जीव स्वजातीय नरों से या विजातीय नर/मादा ओं से बल पूर्वक मैथुन कर्म करता है परंतु उसे मैथुन /प्रज्या कर्म का संतान वृद्धि, जाति वृद्धि का सार्थक परिणाम नहीं आता ।जिससे वह नर वंश वृद्धि न होने से वंश हीनता ,जाति वृद्धि न होने से जाति हीनता को प्राप्त होता है ।
अब बात समलैंगिकता के रोग /बिमारी /व्याधि की ःः
पहले चर्चा रोग की जैसा कि रोग शब्द से स्पष्ट होता है रोग शब्द से निकल ता है ,रोने का गुण जो जीव में पैदा होता है उसकी असमर्थता से जब उसकी निजी जीवन क्षमता .जैविक क्षमता में कमी हो जाती है जीवन जीने में विवश होने लगता है।
यदि जीव अकेला है पशु है बुद्धि हीन है तब उस पर इस परिणाम हीन निर्थक फल हीन मित्थया मिथुन कर्म का को उतना प्रभाव नहीं पड़ता ।परन्तु यदि वह समूह में रहता है सामूहिकता नियम पालन करता है तो उससे प्रभावित मनुष्य उसकी पत्नी उसका परिवार जो उससे अपनी अपनी आकाक्षाओं को रखते हैं उसके माता पिता भाई बहनों के मन पर सामाजिक प्रतिष्ठा ओं पर बुरा/दुष्प्रभाव पड़ता है ।पत्नी पर विशेष रूप से ।उसकी जीवन इच्छा एं त्रासित पीड़ित होती हैं ।
इस प्रकृति में सजीव निर्जीव में अंतर केवल रिप्रोडक्शन अपनी प्रति का निर्माण आप करना यह क्षमता केवल सजीव जगत जीवों में पायी जाती है इसे प्रज्या कर्म कहते हैं जिससे सभी जीव पैदा होते मरते रहते हैं पर उनकी जाति अमर रहती है यदि वे नियमित रूप से प्रज्या कर्म से अपनी संतान उत्पन्न करने में लगे रहे तब तक उनकी जाति वंश अमर है । यदि नर समलैंगिकता की ओर आकर्षित होने लगते हैं तो उनकी पूरक अपूर्ण मादाएं/नारियां त्रासित होने लगती हैं ।नर को नारी की ,नारी को नर की योनिक तृप्ति इच्छा मित्थया भक्षण का नियम स्यूडोकैनाबोलिज्म प्रकृति का नियम है दो जीवों के एक दूसरे को मित्थया भक्षण कर्म मंद नियंत्रित हिंसा कर्म से तीसरे नये जीव का निर्माण सृष्टि का शाश्वत नियम है जिसमें दो जीव नर नारी मिलकर एक तीसरे नये जीव का निर्माण करते हैं (वृहद अरन्यक उपनिषद में गुप्त विस्तार से )
यदि नारी / मादा जीवों को उनकी इच्छा के अनुसार प्रज्या कर्म संतान उत्पन्न करने में बाधा डलती है व्यावधान /रुकावट पैदा करने का काम किया जाता है तो वे व्यथित दुखी होकर चीखने चिल्लाने, विलाप करने लगती हैं जिसे हूक,हूकरी हुक्की विलाप /रूदन या करूण क्रंदन कहा जाता है । इसे प्रज्या जनन काल में मादा कुतिया ,गाय ,भैंस की हुक्की आवाज से कुत्ता, साँड ,भैंसों को आमंत्रित करना कहते हैं ,कि वो आयेंं और अपनी पत्नी ओं से मिलकर प्रज्या कर्म में सहयोग करें । यदि नर समलैंगिकता की ओर आकर्षित होने लगता है, तो उसकी पूरक अर्धांगिनी को रोने का रोग हुक्की विलाप करूण क्रंदन का रोग पैदा हो जाता है ।
समलैंगिकता एक रोग है जिसमें नारी के समलैंगिक संबंधों का नर के मन पर वही प्रभाव पड़ता है नारी के नर वैराग्य व्यवहार से नर नारी के द्वारा नर में रूचि नहीं रखने से नर उस ठंडी षंढी नारी को छोड़कर गर्म उत्तेजक वृष्या अभिसारिका नारी की ओर आकर्षित होने लगता है । तब वह समलैंगिकता प्रिय नारी नर पर बदचलनी का आरोप लगाकर अपनी किशमत का रोना रोने लगती है क्योंकि अब उसके सामने अपने भरण पोषण, श्रृंगार सौभाग्य संकट सम्मान समस्या उत्पन्न हो गई होती है ।
अब चर्चा बिमारी की ःः
बीमारी का अर्थ है ऐसा छिपा हुआ कारक रोग जो आपको छिपे छिपे मार रहा है और दिखाई नहीं दे रहा है ।समलैंगिक विवाह संबंध ओं में भी ऐसा ही होता है ,समलैंगिक विवाह से मिथुन कर्म निरंतर करते रहने पर भी संतान उत्पन्न नहीं होती है ।नारी के नारी निरंतर सानिध्य से या नर के नर से निरंतर सान्निध्य में रहने मित्थया मिथुन कर्म से संतान पैदा नहीं होती है ःः
धीरे धीरे काल चक्र के प्रभाव से वे समलैंगिक शादी शुदा युगल जब बूढ़े हो ने लगते हैं ।तब उन को बुढ़ापे में आने से पूर्व अधेड़ उम्र में अल्पशक्ति अनुभव होने पर दीर्घकालिक सेवा दार की कमी महसूस होती है और वे संतान के विकल्पों पर सोच ना शुरू कर ते हैं अब वह समलैंगिक प्राणी विषम लैंगिक ता की ओर आने लगते हैं ।संतान उत्पत्ति की युवा वस्था में भूल सुधार के लिए
सिंग्ल पेरैंट्स सिस्टम एक माँ बिना वैध बाप के बच्चा ,एक बाप बिना वैध माँ के संतान
की ओर चलने लगते हैं ःः
बिना वैध विधिवत विधान के संतति उत्पत्ति से करते हैं उस अबोध आत्मा के साथ क्रूर मजाक जिसे पैदा होते ही समर्थ होने पर कर्ण के जैसा सामाजिक उपहास झेलने पड़ते हैं ।जबकि कर्ण की माता कुंती से अवैध संतान उत्पत्ति अपराध अज्ञान ता से हुआ था । शेष ह बाद मेंं लिखूँगा ।टिप्पणी से जोड़ कर

भारत में cancer रोगियों की संख्या दिनों दिन क्यूँ बढ़ती जा रही है इसके निदान के लिये आप क्या सलाह देंगे ?

विटामिन बी 17 अमिडगैलिन को नैट से अध्ययन करें
जिन खाद्य पदार्थों में पाया जाता है उनको भोजनम् में शामिल किया जाय ।
अपने दिमाग /मन को बज्र बुद्धि न बनने दिया जाय ।उसमें अपने विचार कर्म चित्राँकन संचालन कर्ता अपने चित्रगुप्त को सक्रिय किया जाय जो दूसरे लोगों के विचारों के संग्रह से विक्षिप्त अवस्था में नवीनतम निर्णय क्षमता से हीन होचुका ह ।जो नये निर्णय नहीं ले पा रहा है ।दूसरे लोगों के द्वारा दिये अनावश्यक काम तनाव से बचें ।कैंसर अति तनाव की अवस्था लम्बी चलते हुए होता है ।
अपने दिमाग को लचीला बना कर अपने दिमाग के अमिडगैला क्षेत्र को सक्रिय किया जाय ।मन को तनाव से मुक्त करने के लिए भाव अतीत ध्यान प्रक्रिया द्वारा मन में छिपे हानिकारक विचारों को किसी श्रेष्ठ गुरु के निर्देश न में निकाल कर समाप्त किया जाय जो मनोवैज्ञानिक हो ,उत्तम बुद्धि का हो ,मनोरोगी को लम्बे समय तक बिमार बना कर चिकित्सा करनेवाले ओं में न हो ।
भोजन में गीता ग्रंथ निर्धारित सातविक भोजन किया जाय जिसमें जैविक अंश की प्रचुर ता ह ,राजसी परिवर्तित स्वाद का भोजन कम से कम ,तामसिक भोजन विकृत स्वाद ,भ्यंकर स्वाद वाले चाईनीज भोजन से बचा जाय ।
जैसा तन वैसा मन या फिर इसे यूँ भु कहते हैं जैसा मन होगा वैसा तन होगा , इस नियम को मैंने स्वयं पर आजमाया हैं ।
कैंसर कोई रोग नहीं है जो सूक्ष्म जीव जगत के जीव वायरस बैक्टीरिया से फैलता है ःः।यह अपने ही दिमाग के अल्पनियंत्रित्र होने से शरीर पर से पूरी तरह से नियंत्रिण न कर पाने की एक मानसिक विकृति है जो स्वयं को दूसरों के अनुसार अपने को नियंत्रित होने देते हैं अति आदर्श बनने के फेर में या फिर स्वयं ही स्वयं पर से नियंत्रण छोड़ ने लगते हैं मन पर से अपना नियंत्रण हटा कर । ये दिमाग के एक पक्ष का अत्यधिक उपयोग किया करते हैं । अतिपोजिटिव पुरुषोचित या अति निगेटिव मानसिक ता वाले अर्थात ये यूनिपोलर माईंड लोग हौते हैं इनके दिमाग के दोनों भाग दाया / बायाँ सम समान कार्य नहीं करते ।इनमें मानसिक स्वयं के विचार का स्वयं प्रतिरोध क्षणिक करने की क्षमता नहीं होती जिससे एक मस्तिष्क के विचार उद्भव ठीक से न होने पर इनके मन में असंख्य विकृत मनो विकारी ग्रंथि याँ उत्पन्न होती जाती हैं ,इन विकृत मनोविकारी ग्रंथियों के प्रभाव से शरीर नियंत्रण केंद्र हाईपोथैलामस की मस्तिष्क को सक्रिय रखने की सिग्नल व्यवस्था गड़बड़ हो जाती है । जिससे शरीर में जगह जगह जैविक प्रक्रियाओं के विषाक्त मैटाबोलाईट का समुचित सफाया नहीं हो पाती ।जिससे भोजन के द्वारा शरीर में आए विष कण इन विषैले मैटाबोलाईट ओं में जुड़कर शरीर की विषाक्ता को बढ़ाते जाते हैं जिन्हें सीमित नियंत्रित करने के प्रयास में शरीर में जहरीली कोशिकाएं बनने लगती हैं । इनको कैंसर कोशिकाएं कहते हैं ।ये कैंसर कोशिकाएं तभी तक सक्रिय रहती हैं जब तक शरीर नियंता सूक्ष्म शरीर निर्माता आत्मा / प्राण सम्यक रुप में सक्रिय नहीं होता । प्राण के सम्यक रुप से सक्रिय होते ही ये कैंसर कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं । जिससे कैंसर ठीक हो जाता है पर अपनी मानसिक शक्ति के बढऩे से परन्तु सात्विकता के सिद्धांत को अपनाने पर ।
यह था कैंसर का संक्षिप्त एक पक्षिय मात्र वैचारिक विवेचन
अब भोजन पक्ष विवेचन इसमें भोजन के प्रोटीन विटामिन बी 1–12, और बी 17 ,विटामिन सी शरीर के शोधन को आवश्यक है ।
आयुर्वेदिक औषधि हरण , आँवला का सेवन जरूरी है हरण शरीर में छिपे विषैले पदार्थों को मल के साथ बाहर करके शरीर का शोधन करता है ,आँवल विष को भोजन में से शरीर में नहीं चढने देता । कृपया विष मिला कर भोजन करने के बाद आँवले की परीक्षा का दूस्साहस न करें ,मेरा मतलब आजकल के उस विष से है जिसे हम प्लास्टिक वस्तुओं से तरह तरह के बजारु रंगीय भोजन में खारहे है तरह तरह के कृत्रिम स्वाद में खा रहे हैं

ओशो रजनीश के बारे मे क्या जानते हैं जो कोई दूसरा नहीं जानता?


मैं कभी भी ओशो के ,आश्रम के, शिष्यों के ,सानिध्य में नहीं रहा ।जो भी जानकारी धारण एं हैं वह पत्रिकाओं, साहित्यिक अध्ययन पर आधारित हैं कि ःःःःःः
कि एक भारतवर्ष में भी सुकरात पैदा हुआ जिसने भारतीयों लोगों को ज्ञान को ज्यों का त्यों ग्रहण करने के बजाय ज्ञान का भी विवेचन शोधन दर्शन कला कर्म सिखाया ।
मैं धन्यवाद देता हूँ ओशो को जिसके साहित्य को पढ़कर मुझे सोचने बोलने लिखने की समझ पैदा हुई ।

ऐसी छोटी छोटी चीज़ें क्या हैं जिनसे वज़न कम करके एक बड़ा बदलाव लाया जा सकता है?



वजन कम करने का सिर्फ एक ही सही प्रमाणिक तरीका है जीवो के शरीर में भी कोशिश की ऊर्जा उत्पादन ईकाई माईट्रोकोन्डिया की संख्या ओं की जानकारी और उन माईट्रोकोन्डिया के आक्सीकरण क्रियान्वयन के पैटर्न की सम्यक जानकारी ःःसंक्षेप में यह जानकारी नैट ज्ञान से आधारित है और मेरा अनुभव शामिल है मैं इसका अनुमोदन /स्वीकृत करता हूँ
माईट्रोकोन्डिया की संख्या लीवर सैल मै1000–2000, हृदय सैल में 5000–6000तक तथा मस्तिष्क कोशिश न्यूरॉन में 10000–50000 तक होती है यह संख्या स्थिर स्थाई नहीं है समय आयु कार्य आवश्यकता लिंग आदि कारकों के अनुसार बदलती रहती है । माईट्रोकोन्डिया सदैव संतान में उसकी माता से आते हैं । मनुष्य में पिता के माईट्रोकोन्डिया कभी भी नहीं आते कारण कि पिता के माईट्रोकोन्डिया उसके मिलन युग्मक/शुक्राणुओं की पूँछ में रहते हैं जो स्त्री युग्मक अण्डाणु से निषेचन /पूर्ण मिलन प्रक्रिया में अण्डाणु के नाभिक/केंद्र में नहीं प्रवेश कर पाते । पूँछ टूट कर अण्डाणु कोशिका से बाहर रह जाती है ।जिससे बच्चों का जैविक ऊर्जा संचालन ,नियंत्रण , जैविक निजी ऊर्जा स्तर उनकी माँ के समान होता है । इससे कहा जाता है कि बच्चों की सेहत ,स्वास्थ्य उनकी माँ से ड्राफ्ट होता है । सेहत का उत्तर दायी घटक माईट्रोकोन्डिया उनकी माँ से आता है ।
माईट्रोकोन्डिया में ही भोजन का पूर्ण आकसीकरण /दहन होता है ,जिससे जीव / बच्चों की जीवन जैविक क्रियाएं संचालित होती हैं ।ऊर्जा उत्पादन होता है । ग्लूकोज और फैट के आक्सीकरण /दहन से ।
भोजन के अनुसार यदि मानसिक शारीरक श्रम /कार्य किया जाता है ।तो वजन के बढ़ने की सम्भावना बिल्कुल भी नहीं है ।
वजन तब बढ़ता है जब खाये गये भोजन की कैलोरी मात्रा के अनुसार श्रम कैलोरी ऊर्जा व्यय नहीं की जाती है ।
यदि पौष्टिक भोजन में वसा ,फैट ज्यादा लेते हैं और शारीरिक श्रम उतना नहीं करते हैं वसा के प्रमाण के अनुसार तो वसामें आयी अतिरिक्त कैलोरी ऊर्जा शरीर में वसा/फैट में बदल कर शरीर का वजन बढा देती है । यदि काम/श्रम ज्यादा है भोजन में कारबोहाइड्रेट, वसा कम परिमाण में ली जाती है तो शरीर की रिजर्व संचित वसा जलकर शरीर का वजन घट जाता है ।
इसके अलावा शरीर में कारबोहाइड्रेट के अधिक सेवन/खाने से कारबोहाइड्रेट भी वसा में बदल जाता है जिस कारण चावल शुगर खाने से भी वजन बढ़ता है ।
अंतर सिर्फ इतना है कि कारबोहाइड्रेट से बनी बसा लचीली होने से वह आसानी से आक्सीकरण प्रक्रिया में जाकर शीघ्रता से जलकर जल्दी ऊर्जा देती है उतनी हानिकारक नहीं होती है जबकि जन्तु वसा घी चर्बी कठोर होती है । पादप वसा तेल की तुलना में , जिसके सेवन से कालेस्ट्राल सम्बंधित समस्या एं उत्पन्न होती है ।
अब यदि वजन घटाने में आप ज्यादा जागरुक हैं तो खाने के आईटम भोजन घटको का ज्यादा विशलेषण विवेचना करने की आवश्यकता नहीं है ।
जरुरत है ब्रैन माईट्रोकोन्डिया की अधिक संख्या देखते हुए ज्यादा से ज्यादा मानसिक श्रम करना सक्रिय रहना पढ़ाई लिखाई चित्रकारी वार्ता (बात चीत ) आदि बौद्धिक कार्य करना या फिर कठिन से कठिन अधिक तम परिश्रम करना । अपने को सक्रिय रखना , न्यूनतम जरूरी निद्रा लेना । गोपनीय कार्य करते रहने से शरीर के वजन बढ़ने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है ।
वजन उनका बढ़ता है जो न शरीर से श्रम /मेहनत करते हैं । न दिमाग को मेहनत करते देते हैं ,न चिंता करते हैं न चिंतन और न होते हैं चिंतित कैसी भी विषम विपरीत परिस्थितियों के पैदा होने पर भी ,जीते हैं अपने जीवन को बेफिक्र ई से ।

क्या आप मांगलिक कुंडली के बारे में जानकारी दे सकते हैं?

मंगल दोष जन्म कुंडली के 1, 4 ,8 ,12 वें भाग में अशुभ युति क्रूर भयंकर ग्रहों के सानिध्य से उत्पन्न होता है । जैसे 1 शनि 2 राहु 3 वरुण ,4 यम के सान्निध्य से निकटता से द्रष्टि से ।
यदि युति सानिध्य श्रेष्ठ ग्रह बृहस्पति, शुक्र, चंद्रमा मंगल के साथ में है तो मंगल दोष का प्रभाव क्रम शः घटता जा ता है
मंगल दोष तब अनुवांशिक होजाता है जब माता पिता दोनों मंगल दोष से ग्रस्त होते हैं तब मंगल दोष उनकी संतान में स्थानांतरित हो जाता है ईसे व्यर्थ मित्थया न समझेंं यह वास्तव में होता है । इस पर अमेरिका में 2002–3 में अध्ययन हुआ है । विधवा परित्यक्त आ अपराधी आक्रामक महिलाओं और लड़ाकिया विलेन माईन्ड लोगों पर अध्ययन किया गया , तो पाया कि उनके मस्तक पर v शेप में अतिरिक्त रूप से बाल पाये गये 75%महिलाओं के माथे पर यह v का निशान छोटे या बड़े रूप में पाया गया ,पुरुषों में लड़ाकू अपराधियों के माथे पर 60% से अधिक लोगों में पाया गया था इसे आप नैट पर vidow peak पर देख सकते हैं । वैज्ञानिक विवेचना आप नैट से , स्वयं पढ़ें ।
यदि कुंडली में मंगल 1,4,8,12 वें स्थान पर नहीं है परन्तु माथे पर छोटे या बड़े क्षेत्र में बाल हैं ।कलमची माथा है सामने पार्शव में माथे पर बाल नहीं हैंं । तो पंडित से पत्री कुंडली विवेचना की आवश्यकता नहीं है । जातक झगड़ू ,झगड़ालू ,झगड़े खोरा निकलेगा जिसका मतलब है मंगली या आक्रमण कारी ।
मंगली और मंगल दोष में यह अन्तर है कि मंगली लड़ाकू भिड़ंत -तिया होता है जिसकी अक्सर लड़ाई झगड़े में विजय /जीत होती है । जबकि मंगल दोष वाला पुरुष हो या मंगली स्त्री इनकी सदैव झगड़े में ,लड़ाई में हार /पराजय होती है परंतु इन्हें लड़ने में मजा /आनन्द आता है ,जिससे यह जीवन भर लड़ते हारते रहते हैं ।और लड़ाई की हार से कोई सबक शिक्षा नहीं लेते ।
किससे लड़ना है? कब तक लड़ना है ? कहाँ तक लड़ना है ? लड़ाई में ये लड़ते हुए मंगली दोष वाले कहीं तक ,किसी भी सीमा तक अनितिक क्रूर दुष्ट पन की मानवीय सीमा से परे पशुओं के भी स्तर से नीचे जा सकते हैं .।ज़नूनी ,वहशीपन से आगे ।
मंगल कुंडली में जिस भी स्थान पर भी होता है सिर्फ 3 तीसरे स्थान में अकेले होने पर शुभ होता है ,ऐसे लोग जीवन में सिर्फ जीतने को पैदा होते हैं ,इनकी कभी भी लडाई में हार नहीं होती । परन्तु यदि 3 रे घर में कमजोर ग्रह बुध आजाये तौ यह शुभ मंगल भी भ्रात दोष कृष्ण कुंडली में बदल जाता है ,ऐसे जातक का जीवन जिन्दगी भर अपनो से दूसरों से लडऩे में जाता है उसे मानसिक शांति नहीं मिलती , उसे अकारण असमय में भी अपने हो या पराये सभी लड़ाई का मजा लेने को ढूँढते रहते हैं और वह आजीवन दूसरों के लिए लड़ता ,लड़वाता रहता हुआ लड़ाई में खप जाता है यदि अच्छे सज्जन हितकारी लोगो में रहना नहीं सीखा ,तो उसका जीवन रण भूमि में पूरा होता है ।
शेष विवेचना अपने अनुभव से जातक स्वयं सीखेंगे ।
1 घर में पिता से ,2 में माता से 4 में पड़ोसियों मित्रों ,युगल सहायक ,पति का पत्नी से ,पत्नी का पति से वैर । 5वें में गुरु से 6 में शुक्र से 7 में विस्तार /वृद्धि से 8 वे में यम से यानि स्वयं ही स्वयं का शत्रु आत्महंता 9 शनि विवेक शत्रु अपने शुभ चिंतन कर्ता ओं का बुरा सोचने, करने वाला , 10 वाँ ईन्द्र शत्रु राजा से पंगा लेकर अपना अहित करने वाला शंम्मूक वंशी ,11 वें मे सेवक शत्रु 12वें में कुल शत्रु कुल हंता सिद्ध होता है । अपने झगडालू स्वभाव ,लड़ने की आदत से ।
यह रहा संक्षेप में लेख ःः लोगों में मंगल दोष को लेकर चिंता होती है ,परंतु मंगली दोष से बड़े बड़े भयंकर दोष है जैसे यदि इन 1,4,8,12में चंद्रमा आजाय तब चंद्र दोष से वंश ,कुल ,जाति ,पित्री भावी पीढ़ी दोष से युक्त पुरुष स्त्री जातक चंद्र बल की प्रधानता से भीरु ,स्त्री समान आचरण करने वाला अधिक पुत्रियों वाला ,पुत्रहीन, पुत्रशोक आदि सामाजिक समस्या ओं से ग्रस्त होता है । यदि स्त्री की कुंडली में इन स्थान पर विग्रही अशुभ युति नीच सूर्य आजाये तो स्त्री में सूर्य बल अतिरिक्त बढ़ जाने से सूर्य बली होती है जो भय हीन ,लज्जा हीन ,दुस्साहसी होने से पितर कुल को ,पति कुल को समस्या ओं से ग्रस्त करती रहती है । यदि इन ग्रहों में विग्रही नीच गुरु आजाये तो जातक को सुधारने में श्रेष्ठ से श्रेष्ठ गुरु भी असफल होता है । यदि इन ग्रहों में विग्रही नीच शनि आजाये तो जातक विवेक हीन हो जाता है सही निर्णय नहीं ले पाता जीवन भर , उसकी जिंदगी में उसके अधिकांशतः फैसले /निर्णय गलत होने से वह जीवन भर उचित अवसर चूकने /छोड़ने की महामूर्खता पूर्ण गलती दर गलती करता हुआ जीवन मर अभिशप्त जीवन जीता है ।
ज्योतिष शास्त्र आँकड़ों का साँख्यकि गणित है ,एक सेकेंड की काल त्रुटि हुई और फलित ज्योतिष का परिणाम कुछ का कुछ होता है ,कुंडली तक में बदलाव आता है ।अतः यह विश्वासनीय कम है ।जबकि गुणों का विज्ञान अनुवांशिकी , शरीर मुद्रा ज्ञान बाँडी लैंग्वेज आधुनिक होने से विश्वसनीय हैं ।
पर बुद्धिमानी इसी में है कि यदि अपनी कमी /भूल का पता लग /चल जाय तो ः
सुधार करो अपने स्वभाव में , आदत में सोच मेंं ,व्यवहार में ,कर्म में ,, ।
बदलो अपनी किशमत अपना भाग्य सिर्फ अपने लड़ाकू विचार व्यवहार त्याग /छोड़ कर ,ःःःःखोलो अपने दिमाग के द्वार , स्वागत करो ,स्वीकार करो ,ग्रहण करो नये आधुनिक विचार ।
लिखने वाले ने लिख दिया —विधाता ने , । बाँचने वाले पंडित ने बाँच दिया । सुनने वाले ने समझ लिया ,अब दोष किसी का नहीं ।
होनी होने को बनी ,शिक्षा रोकने को बनी ,इतने पर भी घटना घटित हो तो दोष किसी कि नहीं , विधाता बली है ।
राम राम भाई जी पढ़ने वाले को ..ःः पंडित जी की ।
यह कुंडली बाँचने की विधा है ।

क्या जानवर भी उकता जाते हैं?

हाँ बहुत जल्दी मानव की तुलना में शाकहारी जानवर जल्दी उकता कर अपनी जगह छोड़ कर अन्यत्र जगह जाने की सोचने लगते हैं ।इसका आभास उनके एक जगह स्थित स्थिर खड़े होने के बाद उनके पैर स्थान बदलने से उनके पलायन भावनाओं से स्थान परिवर्तन की मनोवृत्ति का अनुमान लग जाता है माँसाहारी यदि शिकार स्थल पर शिकार की शिकार बनाने की योजना बना रहे हैं तब वो देर तक घंटों तक नहीं उकता ते ,काफी देर तक एक ही शिकार मुद्रा में अपने को संयमित किए हुए रोके रहते हैं ।।शिकार पर आक्रमण करने तक नहीं उकताते ।

भूत हमेशा किसी को नुकसान क्यो पहुंचाते हैं हमने आज तक ये नहीं सुना कि भूत ने किसी कि जानकारी बचाई हो ऐसा क्यों?

यह प्रश्न ही गलत है कि भूत नुकसान पहुंचाते हैं सच यह है कि कुछ भीरु डर्रु ढीढ पंगेबाज दिमाग से खाली विचार हीन आस्थावान लोग जिनका अपने विचार स्रोत अपनी खोपड़ी पर अपना नियंत्रण नहीं होने पर उस खाली खोपड़ी, जिन्दा शरीर में भूत गण आसानी से ऐसे घुस जाते हैं जैसे किसी वीराने में बने मकान हवेलियों में ढीढ उदंड लोग घुस कर रहने लगते हैं ,या फिर लम्बे समय से किसी खाली मकान में साहसी हिम्मत वाले लोग पंगेबाज बहादुर लोग घुस कर रहने लगते हैं, विवाद ग्रसित संपत्ति मकान मेंं दूसरे लोग खाली पन का लाभ उठाकर रहने लगते हैं ।
ऐसे ही जिन लोगों की खोपड़ी में उनके अपने विचार नहीं होते, दूसरों के विचार भरे होते हैं तब ऐसे में उस खोपड़ी में जीनियस लोग ब्रैन वाश करके अपने विचार घुसा देते हैं या फिर उस खाली विचार हीन ,विचार शून्य अवस्था खोपड़ी में दूसरी अशरीरी आत्माएं घुस कर उस नियंत्रण हीन शरीर पर नियंत्रण कर लेती हैं जैसे कमजोर मन तन वाले मनुष्य के घर में दूसरे लोग बलपूर्वक रहने लगते हैं। परंतु यदि उस अपनी खोपड़ी में अपने विचार हैं तो उस भरी खोपड़ी में खाली जगह नहीं होने पर कोई दूसरी आत्मा/भूत नहीं घुस /प्रवेश कर सकता।
मैं आपको अपना निजी होशहवास का अनुभव शेयर कर रहा हूँ आप विश्वास करें ना करें यह आपकी मर्जी पर घटना सच्ची है जो मेरे साथ मेरे परिवार अम्मा पिता जी की मौजूदगी में घटित हुई ।
सन् 1978में 10वीं कक्षा में था सर्दी के मौसम में मैंने अपनीं जिवित भूदेवी चाची की आवाज ऐसे सुनीं जैसे वे घर के बाहरी कमरे दुबारी में भैंस बाँध रही होंं और भैंस ने उन पर हमला करके उन्हें नीचे गिरा कर मार रही हो, जनवरी माह के महीने की शाम का समय था में खाना खा रहा था ।पहले अम्मा ने कहा खाना छोड़ जा अपनी चाची को बचा उसे भैंस ने गिरा दिया है उसे भैंस मार रही है मैं अनसुनी कर खाना खाने में लगा रहा ,फिर पिता जी ने जोर से कहा तेरी चाची भैंस ने निचे गिरा दी है भैंस तेरी चाची को सींग अड़ाकर मार रही है मैं अनसुना कर खाना खाने में डटा रहा तब पिता जीन ने खाना सामने से हटा लिया और कहा जा पहले अपनी चाची को भैंस से बचा फिर खाना खा लेना । मैं परिवार में सबसे बड़ा लम्बे कद काठी का था मुझे भी बिगड़ैल पशु ओं से लड़ने भिड़ने में मजा आता था । मैं खूँटे से बंधे बैल भैंस के सींगों को पकड़ कर उनसे भिडंत करता रहता था ।
मैं रोष मेंं उठा लकड़ी का मोटा सा डंडा लिया और उस अंधेरे कमरे मे लड़ते हुए पशु ओं को हटाने वाली सिंहय आवाज करता हुआ आगे बढ़ने लगा जहाँ से भैंस और चाची की आवाज आ रही थी पिता जी कमरे के द्वार पर खड़े हो गए जिससे मेरा मन बल बढ़े पशु बल घटे ,तभी कमरे से आवाज आनी बंद हो गई ।मैं अंदाज से डंडा घुमाता ,खटकाता अंधेरे में आगे बढ़ता जाता था तब अंदाजन कमरे के अन्तिम स्थान तक गया था । देखा कमरा में कोई नहीं था ।मैं खूब हँसा अपनी मूर्खता पर ,पिता जी के चेहरे का रंग उड़ गया भूत भय से ।उस दिन पशु बाँधने चाची नहीं आयी थी चाचा और चचेहरे भाई पशु भैंस बैल बाँधने आये थे उस कमरे में घटना घटित के बाद में ।अगले दिन बाद में घटना की चाहिए से चर्चा की तब चाची ने कहा— अपनी कदकाठी पर मत इतना इतरा पशु ओं से भिडंत के शौक को छोड़ दे नहीं तो अंजाम भुगतना पड़ेगा तुझे तू भूतलाओं की नजर में आगया है । और सुन मैं तो क्या बड़ी बड़े की भी यदि उस कमरे से ऐसी आवाज आये तो उनको भी बचाने मत जाना तेरे साथ कहीं पर भी धोखा हो सकता है भूतों का ।
मेरा सारा नयी जवानी का जोश ठंडा पड़़ गया ।पशु भिडंत का ख्याल छोड़ मैं मनुष्य ओं से भी बचने/दूर रहने लगा ।सभी अचरज में आ गए मुझे क्या हो गया ,हँसना लड़ना भिड़ना बंद मैं चुप गुम सुम रह कर भूतों के वार की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगता । अब मेरे दिमाग में भूत भय पड़ गया पर मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया । पर अंतर्मन में भूतभय चढ़ चुका था ।
लगभग तीन वर्ष बाद मेरे साथ 19८1 मेंं जब मैं बी.एस.सी. प्रथम सत्र में था मेरे साथ जून माह में शुक्ल पक्ष में फिर भूत दर्शन हुआ चाँदनी रात में अबकी बार भूत नहीं भूतनी थी जिसके बारे में जब परिवार में चर्चा की हुलिया बताया गया तो पता लगा उस औरत की प्रसव पश्चात मौत हो चुकी थी वह अक्सर अपने परिवार वाले को कभी कभी सीमा लाँघने पर परेशान करती थी जिसमें यदि उसके घर वाले चले जायें तो उनको बीमारकर दिया करती थी लेकिन हमसे मैं अम्मा पिता जी मेरा छोटा भाई से कुछ नहीं कहती थी । उसके इस मर्यादा शील व्यवहार पर सभी को आश्चर्य होता था ।मृत्यु बाद भी वह हमारे परिवार के प्रति दयालु थी क्योंकि हमने कभी भी लोगों के कहने पर भी उसके प्रति उसे अपशब्द नहीं बोला करते थे।उसकी उसके घर में एक नियत निश्चित जगह थी मकान का दोनों दक्षिणी दिशा के ऊपर नीचे के चार कमरे यानि आधा मकान चार में से दो दक्षिणी कमरे उसके थे ।
इस घटना का ब्यौरा ःः
1981का जून माह गर्मी का समय था उसके घर वाले उसके भय से घर छोड़ कर बूलंदशहर में अपना मकान बनाकर शिफ्ट हो गये थे अब उनका खाली सारा मकान हमारे नियंत्रण में था अधिकार में नहीं हम उनके मकान का उपयोग कभी कभार सोने में करते थे , तभी एक रात लगभग11–12बजे के बीच खूब स्पष्ट चाँदनी खिली हुई थी अचानक मेरी आँख खुलीं मैंने मच्छर ओं के कारण खुद को ओढ़ने के कपड़े में पूरी तरह ढक रखा था ।एक औरत की पायलों की आवाज सुनी महसूस किया कि कोई औरत है जो मेरे चारपाई के चारों ओर घूम रही है मैं डर गया और सोचने लगा कि यह कौन सुन्दर सी औरत है जो इस चाँदनी रात में मेरे खाट के चक्कर लगा रही है यह यहां क्यों आयी है और अब क्या करेगी ।मैं उसके रूप से खुश हुआ वह बिरोजी रंग की साड़ी, और नीला ब्लाउज पहने भरे शरीर वाली हल्के गेहूँआँ रंग की थी ।उसनें मेरी खाट के दो चक्कर लगाये और अपने घर के दरवाजे पर रूककर कुछ सोचने लगी मैं इस इन्तजार में था कि यह अब क्या करेगी तभी उस स्पष्ट चाँदनी में मैंने देखा कि उसने अपने आप एक हाथ को उठाकर किवाड़ ओं के उपर साँकल के कुन्दे पर हाथ रखा और साँकल वाली किवाड़ को ऊपर उठाया और तभी साँकल को खींच कर नीचे गिरा दिया जिससे बड़े जोर की आवाज हुई और मेरे पास से कुछ दूर पर मेरी अम्मा भी सोये से जाग गई उसने मुझे जोर से आवाज दी नरेश और मैंने भी हुँकारा देकर अपनी सही सलामत स्थिति व्यक्त की ।वह दरवाजा काफी मजबूत था उन कुंडी लगी किबाड़ो को खोलना औरत तो क्या सामान्य कदकाठी के मजबूत शरीर के आदमी को खोलना आसान नहीं था ,जिसे उस औरत ने यूँ ही हल्के से हाथों से आसानी से खोल दिया था । तभी अम्मा को शंका हुई उसने सोचा शायद मैं किवाड़ खोल कर उनके घर के अंदर गया हूँ ।वह उठकर मेरे पास आयीं और इस तरह से बिना मौसम कि बिना हवा के इस घर का दरवाजा कैसे खुला इस पर पूछने लगीं तब मैंने बताया अम्मा अभी अभी बिरोजी साड़ी नीला ब्लाउज पहने एक औरत इस घर में किबाड़ खोलकर अंदर गयी है वह कौन है और इस रात में अकेली यहां क्यों आयी है बस फिर क्या था अम्मा सारा वाकया समझ गई और मुझे अपने साथ सुलाया सारी रात जागकर मेरी रखवाली की ।और रात भर दरवाजे पर नजर जमाये रही कि वह औरत अब कब दरवाजे से बाहर निकलेगी । रात बीत गई पर कोई भी दरवाजे से बाहर नहीं निकला सवेरे तक । सवेरे बाद दिन में देखा तो पता चला घर खाली था घर में कोई अन्दर नहीं गया था तो दरवाजा किसने और क्यों खोला यह चर्चा का विषय रहा ।बाद में उस औरत के बारे में पता चल गया कि वह इन्जीनियर साहब की पहली पत्नी थी जो अक्सर कभी कभार अपना घर देखने आया करती थी ।
एक और भूतिया घटना बाद में मेरे परिवार की ःः
मेरी अम्मा21 जुलाई 2015 को मर गयीं थीं । पर ठीक एक साल बाद 2016 को कड़ी ठंड के जनवरी माह की एक शाम को लगभग 10बजे रात्रि के अर्ध पूर्व मेरी मां की जैसी आवाज में कोई आवाज आयी पहले मेरे नाम से नरेश ओ भैया जिसे सुनकर मेरी बेटी दरवाजा खोलने की सोचने लगी डरते हुए ,तभी उसने मेरी छोटी बेटी को जगाया कहा कीर्ति बाहर अम्मा खड़ी है छोटी बेटी जगते ही बोली तेरा दिमाग ठीक नहीं है अम्मा तो पिछली साल मर चुकी है बरसात में अब एक साल बाद वह कैसे और क्यों कर आयेगी ।तभी उसने बड़ी बेटी को आवाज दी तब बड़ी बेटी बोली सुन अम्मा फिर से दोबारा अवाज दे रही है अबकी बार आवाज बड़ी बेटी गुड्डन के नाम से थी किबाड़ो के हिलाने /हिचकाने की आवाज भी आयी । तभी मेरी छोटी बेटी बोली बुढ़िया तेरा दिमाग ठीक है क्या तुझे मरे एक साल हो गया अब क्या लेने आयी है तभी मेरा काला कुत्ता जोर से भौंका भौंकने लगा । फिर सब कुछ शान्त हो गया ।पर बेटियाँ रातभर डर से लैम्प जलाकर जागती रहींं कहीं बुढ़िया यानि मेरी अम्मा कहीं किबाड़ो में से होकर न आ जाय ।मेरी छोटी बेटी मेरी अम्मा को बुढ़िया कहती थी ।क्योंकि अम्माँ उसे बहुत परेशान करती थीं लाड़ में । अगले दिन मेरे पड़ोसियों और मेरे छोटे भाई के परिवार ने बताया हँसते हुए खुशी खुशी कि रात अम्मा आयी थी हमने भी आवाज सुनी थी पर हमें ये भी पता था कि अम्मा मरे एक साल हो गया पर डर के मारे हमने किबाड़ो को इसलिए नहीं खोला भूत है अम्मा का अम्मा नहीं । और ये भूत प्रेत किसी के नहीं होते हैं कहीं हमें न परेशान करने लगें बाद में ।भाईसाहब यानि कि मैं टंटर मंटर खुद तो जानते हैं इनकी टोली में/मित्र मंडली में गुनिया ओझे भी हैं ये तो ऐसे भूतलाओं परेतों से निपट लेंगे । हमारे लिए मुश्किल हो जायेगी यदि अम्मा या अम्मा के फेर में कोई दूसरा भूत प्रेत धोका कर गया तो हमसे नहीं सुलटा जायेगा उस कपटी भूत से ।
इसके अलावा मुझसे कःई बार भूतों से मुलाकात हुई है लेकिन आज तक कोई भूत प्रेत ब्याधा ने मेरा बुरा नहीं किया है अपितु कःई बार मेरे दुश्मनों को छकाया परेशान किया है वजह में भूतों से पंगा परीक्षा नहीं लेता ।वे न मुझे छेड़छाड़ करते /परेशान करते हैं ।आखिर कुछ तो है इस शरीर में ऐसा ,जिसके कारण शरीर में सक्रियता है और जो ना हो ना रहे इस शरीर में तो शरीर निष्क्रिय मृत हो जाता है । वही भूत है इनकी भी एक अद्भुत दुनिया है ।जो गुप्त रूप से है । अतः इनसे पंगा परीक्षा न लो ।