आखिर ऐसा क्या है कि लोग समाज की परंपरा का पालन नहीं करते हैं?

समाज का निर्माण उन धूर्ततापूर्ण शातिर निकम्मे लोगों ने किया है ।जिनमें विशेष ज्यादा बुद्धि और बल नहीं था लेकिन उनमें अपने जीवन को लेकर उच्च स्तरीय सोच थी कि कैसे बिना कर्म किए ,बिना धर्म धारण किए श्रेष्ठ जीवन कैसे जिया जाए ?इसके लिए उन धूर्तों शातिर अपराधी सोच के लोगों ने विभिन्न बुद्धिमान लोगों को लालच से बलवान लोगों को भय /डर से नियंत्रित करके पहले पहल आदम संगठन बना कर कुशलता पूर्वक पशुओं का पुराने समय में शिकार करते थे बाद में यह शातिर लोग दूसरे समर्थ धनी लोगों का शिकार करने लगे उनसे संचित अन्न पशु चोरी चकारी डकैती करने लगे जिससे उनके छोटे से ग्रुप समूह में अशांति उपद्रव मचने लगे जिससे .कबीला पहला बिखर गया निकम्मे आलसी लालची लोग संकट ग्रस्त हो गए यह थी पहली मानवीय सामाजिक क्रांति तब समझदार लोगों ने समूह को मंद हिंसा के दौरान समूह को चलाने के लिए कुछ नियम बनाए जिसके बाद मानव समूह संगठन में समझौता हुआ कि डकैती से बहतर दैनिक वसूली साप्ताहिक वसूली की जाय । यह धूर्त शातिर लोगों की दैनिक साप्ताहिक मासिक वार्षिक वसूली का पोषण शोषण तंत्र पोषण शोषण ओषण लोगों की मजबूरी बन गया । जिसमें लोग मंद हिंसा पोषण शोषण ओषण को स्वतंत्र थे परन्तु तीव्र हिंसा मनुष्य का बाधक अवरोध होते हुए भी मारना ,स्त्रियों का छीनना ,पशु ओं का छीनना ,घर का छीनना ,जमीन का छीनना परम हिंसित कृत्य अपराध घोषित किया गया । नियम बन गए पर सोच वही रही बिना कर्म किये दूसरे के कर्मफल को येनकेन प्रकारेण हासिल करना ।यह आज भी ज्यों का त्यों चल रहा है नियम बनाये जाते हैं बुद्धिमान लोगों द्वारा बुद्धिहीन लोगों के लिए और बुद्धिहीन लोग बुद्धिमान लोगों का पोषण ओषण करते हैं बुद्धिमान लोग शोषण करते हैं बुद्धिहीन लोगों का । इसकी एवज बदले में बुद्धिमान बलवान लोग बुद्धिहीन बलहीन लोगों को सिस्टम में अपना जीवन शांतिपूर्ण तरीके से जीने देते हैं ।
यहीहै , ःःआपकी सोच का समाज जिसमें कर्म करनेवाले जो कर्मफल के अधिकतम स्वामी होने चाहिए उनके पास कर्मफल न्यूनतम आता है और जो कर्म न करनेवाले कर्महीन हैं बल बुद्धि युक्त हैं उनके पास बिना कर्म किए अधिकतम फल चला जाता है ऐसे में समाज क्या है उनकी परंपरा क्या है आप खुद से सोच लेना । इस लाईन में कम्ययुनिस्ट सबसे आगे हैं ।बिना कर्म किए सभी को समान फल प्राप्ती ,तो फिर मूर्ख हैं वो सभी जो कर्म करते हैं परिश्रम करते हैं मेहनत करते हैं और समझदार बुद्धि मान हैं वे सभी जो बिना कर्म किए अधिकतम उत्तम फल प्राप्त करते हैं नेता अफसर बन कर । इस तरह से समाज में अवैधता जो वैधता में समाज में बदल गयी है ।
समाज की सभी परंपरा आदम नियम पोषण ,ओषण ,शोषण पर आज भी तस की तस बनी हुई हैं ।
इसे मानव ने पशुओं से सीखा है सिर्फ लेना और लेना जो गरीबी का मुख्य गुँण है ।देवजन समाज का गुँण लेना नहीं लौटाकर ज्यादा देना है मानव समाज का गुँण लेना देना व्यवहार मानवता है आप ने इस सिस्टम को कहा से सीखा है मुझे नहीं मालूम शायद अंग्रेजीयत से सीखा है । इससे हमारे मानवीय सिस्टम में पशुता व्यापत है मानवता नहीं ,और आप बात मानवता की कैसे कहाँ से कह रहे हैं मैं इसे नहीं समझ पा रहा हूँ ।
इसके बाद चल पड़ा मानव समूह समाज को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने का सिलसिला जारी है पहले मनुस्मृति बनी फिर इसके बाद जो भी समर्थ समृद्ध राज्य पुरुष राजा सहायक मनस्वी मनु पुरुष हुए उन सभी ने अपने अपने राजाओं और राजा समर्थक लोगों और अपने अपने हित के अनुसार ५० से अधिक भारत में नियम ग्रंथों का निर्माण हुआ । जब ये ग्रंथ कम रह गये लोग पुराने नियम ग्रंथ स्मृतियों से संतुष्ट नहीं हुए तब १९४७ के बाद समस्त भारतीय लोगों की संतुष्टि के लिए भारत सरकार ने भारत संविधान ग्रंथ का निर्माण कराया ।
लेकिन भारत के सभी लोग इससे भी संतुष्ट नहीं हैं विशेष कर अति बुद्धिमान बलवान वर्ग मैरीटोरियस वर्ग जो इससे असंतुष्ट हैं वे इसमें परिवर्तन की मांग कर रहे हैं । लेकिन जो इससे संतुष्ट हैं जिनके हितों को साधने पूरा करने में यह संविधान उनके संतुष्टि मानकों पर सही उतरता है वे संविधान में धारा परिवर्तन का विरोध कर रहे हैं ।
बरहाल ऐसा कोई भी मानवीय संविधान नहीं बन सका है न बन सकेगा भविष्य में भी जो समाज के प्रत्येक व्यक्ति को /नागरिक को , नागरिकों के परिवारों को सभी लोगोगोत्र को जाति को धर्म को संस्कृति को पूर्णतः संतुष्ट /शांत कर सके । नियमों और यम में मर्यादाओं मर्यादाहीनता का अंतर तो रहेगा ।कारण है अपूर्ण आधी अधूरी सृष्टि का दोष सैक्सुअल डाईमौर्फिज्म एक जाति दो आधे अधूरे लिंगीय शरीर में ।जो पूरा होने को बार बार मिलने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन आज तक नहीं मिल पाते ।और उनके बीच में से भी आधे-अधूरे बच्चे नर नारी बेटा-बेटी के रूप में पैदा हो जाते हैं ।
तों भाई समता मूलक समाज के नारे उदघोष से नासमझ मत बनो यह समता मूलक शब्द भी किसी धूर्त्त शातिर का बनाया हुआ है लोगों को मूर्ख बनाने के लिए । शब्दों के जाल में मत उलझनों शब्दों को समझो उनके अर्थ मतलब को समझो उसमें अपना हित खोजों ,हित सिद्ध हो जाय तभी बोलो जय जय ःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःःनहीं तो भय भय भ भ बोलना शुरू कर दिया करो ।

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