डी एन ए मैचिंग सिमिलरटी /डिस्क सिमिलरटी पैटर्न सिस्टम , जिसके अनुसार पितृवंश और मातृ वंश के ग्रुप बनते जा रहे हैं जिससे मनुष्य के पूर्वजता एनसैस्टरी का पता चलता है कि उसके पूर्वज कहां के निवासी थे ,निकासी कहां से है ? अमेरिका में इस पर एच जी पी प्रोजैक्ट ( ह्यूमन जीनोम प्रोजैक्ट ) के अन्र्तगत विभिन्न मातृ पितृ वंश N,F,H ,H ,W ,Iआदि आईडैन्टिफाईड क्लासिफाइड किये जा चुके हैं । इन्हें आप नैट पर पितर वंश ,मातृ वंश डालकर अध्ययन कर सकते हैं ।
पितर विद्या अनुवांशिक विज्ञान में पितृवंश मातवंश की जानकारी का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है । नई वर्तमान की अनुवांशिक विज्ञान के जनक मैंडल के अनुवांशिक नियमों के अनुसार जीवों में कुछ अनुवांशिक रोग होते हैं जिन्हें अनुवांशिक रोग या मैंन्डलियन आर्डर ,डिस्आर्डर रोग कहते हैं ।जो अपने माता-पिता से संतान में कन्डीनल रुप से आते हैं । कुछ रोग जो प्रभावी /डोमिनेट जीन गुण सूत्रों पर होते हैं वे अगली भावी पीढ़ियों में निरंतर चलते रहते हैं जैसे शुगर, मोतियाबिंद आदि में होमो जाईगस /समयुग्मक हैं या हैटरोजाईगस /विषमयुग्मकी अवस्था में हैं तो हर हाल में संतान में आयेंगे फर्क इतना है कि होमोजाईगस होने पर इनका इलाज डाक्टर के पास नहीं है ,हैटरोजाईगस दशा में है तो जीवन भर परहेज और द्वारा पूरा-पूरा जीवन जिया जा सकता है ।
कुछ रोग जोअप्रभावी /रिसैस्वि जीन गुण सूत्रों पर समसमान होमोजाईगस अवस्था में प्रभावी होते हैं आसमान विषमयुग्मकी हैटरोजाईगस अवस्था में होने पर दवे रहते हैं । जैसे भैंगापन कैंसर ए.डी.ए. एडिनोसिन डाईएमिनेज एफीसिएनसी ,हिमोफिलिया, वर्ण अंधता ,मस्कुलर डिसट्रोफी पेशी क्षय ,सिस्टिक फाईब्रोसिस ,स्पाईनाबाईफीडा, ह्यूमिनिन 14 ,हंटिंगड्न कोरिआ आदि रोग हैं । हिंदूओं में गोत्र विधान इस लिए बनाया गया था कि खतरनाक मारक रोग जैसे भैंगापन कैंसर आदि अनेक रोग जो समयुग्मकता में एक कुल गोत्र में व्यापक रूप से व्याप्त हो जाते हैं वे असमयुग्मकता /हैटरोजाईगोस्टी की अवस्था में दूसरे कुल गोत्र में विवाह शादी होने पर दबे रहते हैं ।
इसलिए हिन्दूओं में गोत्र व्यवस्था स्थापित की गई /बनाई गई जिससे लोगों को , डी एन ए मैचिंग पैटर्न का ध्यान रखें और अनेकानेक अनुवांशिक बिमारियों से बचें ।
डब्ल्यू एम रीड के अनुसार माता पिता के रोग 50 ०/० बच्चों में संतान में शरीर निर्माण जैविक अणु समानता के कारण आते हैं । हिंदूओं की पुरानी पितर विद्या ही अपभृंश रुप /परिवर्तित बदली हुई वर्तमान में अनुवांशिक विज्ञान या जैनैटिक्स या जींस गुंण सूत्र विधा ज्ञान है जो गोत्र के अपभ्रंश रुप में मनुस्मृति में दर्ज है।
No comments:
Post a Comment