शोषण का कोई धर्म नही। इसपर आप क्या कहेंगे?

जीवन जीने के लिए जीव तरह तरह की युक्तियाँ, प्रयुक्तियों को अपनाते हैं अपना जीवन जीने के लिए जिन्हें हम जीव धर्म /जैविक प्रयुक्ति कहते हैं जिनका आधार अनुवांशिक/जैनैटिक या जीनबेस / गुँण सूत्रम अनुसार होता है ।जैसे बिल्ली परिवार माँसाहारी होता है ,भूखों मरजायेंगे लेकिन घास /शाकाहार नहीं खायेंगे ।यह जैविक प्रयुक्तियाँ ही जीवों का स्वाभाविक धर्म ह ।लेकिन कुछ हथअखरी /अक्षर शिक्षित लोगों ने कृत्रिमता आधारित प्रयुक्तियों को तरह तरह से धर्म रुप नाम से परिभाषित किया है।जैसे जीवविज्ञान के परिस्थितिकी पाठ मेंं कुछ जीवन प्रयुक्तियाँ हैं जैसे :: म्युचुअलिज्म (द्विपक्षीय साझेदारी), ::कोमनसैल्जिम (एक पक्षीय साझेदारी) , :: अमनसैल्जिम (मैं जिंदा रहूँ मेरे प्यारे मेरे पास जिंदा रहें ,दूसरे कोई हमारे पास पनपने न पायें ) , ::एन्टागोनिज्म(अपनी रक्षा सुरक्षा के प्रति जागरूक रहते हुए दूसरों का विरोध करना, दूसरों को विकसित होने से पहले ही खत्म करना ,दूसरों के विकास को प्रतिबंधित/प्रतिबाधित रखना ) , :: पैरासाइटिज्म ( अपना जीवन जीने के लिए बिना कोई कर्म उद्योग प्रयुक्ति किए दूसरों के जीवन कर्मफल भोजन को हड़पने का रोजगार /शोषण वृत्ति को धर्म के रूप में मान्य /स्वीकार करना ) , :: विक्टिज्म (अपना जीवन जीने के लिए दूसरे जीवों को मारकर उनके शरीर को अन्न रुप खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग करना ,उनके शरीरको उनकी संतान के शरीर को संचित अन्न धन समझते हुए अपना जन्म सिद्ध खाद्य भोजन समझना , अन्नमानक को धन समपत्ति का उपयोग उपभोग स्वामी उपभोक्ता समझना , :: जीवन संघर्ष ( अपने स्वजनों स्वजातीय जनों से अकारण लड़ना झगड़ा करते हुए उनको उनके अपने भोजन स्रोतों अन्ना, स्त्रियों, जमीन , अतिरिक्त जमीन कृषिक्षेत्र से बाहर रखना, विशेष जमीन आवासीय भूमि क्षेत्र घर घेर हेर हार से बाहर करना ।मानव संसाधन से बाहर रखना।
अब आपके विषय प्रकरण शोषण का कोई धर्म नहीं : लगता है कि आप हद दर्जे से ज्यादा के समझदार धूर्त धुर्रा शातिराना बुद्धि मान हैं याफिर स्वयं तो भ्रमित हैं और दूसरों को भ्रमित करने का प्रयास प्रयोग कर रहे हैं ।
समाज विधा शास्त्र के अनुसार जीव के जीवन की तीन मुख्य प्रयुक्तियाँ हैं पोषण ,शोषण ,ओषण
पोषण विधा में जो जीव जितना ज्यादा पराक्रमी उद्यमी बुद्धिमान बलिष्ठ होता है वह उतना ज्यादा पोषण पाकर परिपुष्ट ;हष्टपुष्ट होता है ।।
:: शोषण विधा में पराक्रम की बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती है शोषण विधा में बुद्धि का अधितम प्रयोग किया जाता है और दूसरों के कर्मफल को हड़पने झपटने के लिए विशेष जागरूकता कीआवश्यकता होती है इसे चौर्य धर्म ,चोरी करना या चुराने की कला कहा जाता है इसका शुद्ध परिस्कृत सभ्य शब्द भृष्टाचार है। जिसके दो भाग हैं होस्ट जो दिखाई देता है एण्ड घोस्ट /पैरासाइट जो दिखाई नहीं देता और छिपकर चुपके चुपके चोरी चोरी होस्ट कर्मठ उद्योगपति उद्यमी किषान से पोषण अन्न धन प्राप्त करता रहता है।शोषण विधा के तींन प्रकार हैं 1 परमानेन्ट /स्थाई पैरासाइट जो होस्ट से स्थाई रुप से चिपक कर निरंजन/लगातार शोषण किया करते हैं अपने होस्ट का शोषण करके उसे उभरने समृद्ध होने नहीं देते उस होस्ट को रोगी बनाकर समय से पहले मरने को मजबूर कर देते हैं । प्रचंड शोषण द्वारा :: 2 टैम्प्रेरी /अस्थायी पैरासाइट ये होस्ट दाता के पास कभी कभी शोषण करने के लिए आते हैं निश्चित समय अवधि आवृत्ति पर समृद्धि कर दान चंदा टैक्स चौथ हफ्ता वसूली, लेने के लिए । :: 3 आँबलिगेट्री /क्षणिक पैरासाइट ये होस्ट /दाता के पास कभीकभी आते हैं शोषण करने के लिए ब्लैकमेलर /मच्छर कीतरह ,दाता के भोजन को लेने के बजाय शरीर में संचित अन्नसार खून पीने के लिए । ज्लदी और आसानी से मारे भी जाते हैं खून पीने की बुरी आदत के कारण ।
ओषण विधा दाता ग्राहकी की अपनी निजी शोषण पोषण को संचालित करने की योग्यता सिस्टम संचालन कला है जिसमें पोषण शोषण तंत्र का एक स्ट्रक्चर /ढाँचा बनाकर नियमित रूप से निर्बाध बिना किसी बाधा के शोषण और पोषण प्रक्रिया चलती रहती है ।दया , दान , दमन क्रियान्वयन के द्वारा जिसमें ग्राही शोषण कर्ता कभी अपने दाता के कमजोर मरणासन्न होने पर उस पर दया का नाटक करता है उसके परिपुष्ट होने तक ,दाता दयाल के परिपुष्ट होते ही उसके पास शोषण करने को आताहै दान ,भिक्षा ,टैक्स ,कर ,चंदा लेने के लिए । यदि दाता /होस्ट देने को मना किया करता है तो ग्राही दाता दयाल का दमन करने लगता है मारपीट करने लगता है चोरी डकैती लूटपाट में बदल जाती है ।जिसमें कभीकभी कभार उल्टा भी हो जाता है ।दाता ग्राही को मारकर उसके शोषण जाल से मुक्त हो कर अपना विकास करने लगता है लेकिन ऐसा कम ही होता है क्योंकि दाता मूर्ख बुद्धि हीन होता है ।
आपने कहा शोषण कर्ता का कोई धर्म नहीं होता है ।
लेकिन मैं कहता हूँ कि शोषण भी एक धर्म है तभी तो ग्राही धर्म धरता शोषण कर्ता श्रम परिश्रम मेहनत करना पसंद नहीं करता है अपने निकम्मेपन अड़ियलपन पर अड़ा रहता है अपने जीवन में अभाव भूख दरिद्रता सहन करता है लेकिन मेहनत करना पढ़ना लिखना समाज को उपयोगी बनना पसंद नहीं करता है । वह समाज का सृष्टि का परमानेन्ट उपभोक्ता बने रहना पसंद करता है /चाहता है । अभाव गरीबी दरिद्रता का रिस्क उठाता है लेकिन नया कुछ सीखने का प्रयास /प्रयुक्तियाँ नहीं अपनाया करता है । मौत की कीमत पर भी मरना पसंद करता है लेकिन श्रम करना समाज को उपयोगी बनना पसंद नहीं करता है ।
धर्म भी हमें यही सिखाता है अड़जाओ ,लड़जाओ ,मरजाओ ,पर बदलो मत अपने को /खुद को ।

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