अंतर्मुखी और बहिर्मुखी लोगों के व्यवहार में क्या अंतर होता है? क्या आप कोई उदाहरण दे कर समझा सकते हैं?

बहिर्मुखी लोगों की मानसिकता /आदत ज्यादा बोलने , दूसरों को चुप करने , धमकाने , की होती है और अंतर्मुखी लोगों की मानसिकता /आदत चुप रहने , दूसरों की सुनने की , धमकाने खाने की/धमकी से डरके चुप होने की, होती है । बहिर्मुखी लोग ये हमेशा कुछ न कुछ बोलते मिलेंगे, ज्यादा बोलना इनकी फितरत है । ये बिना बात बेबात बोलने वाले जनरल टाकर होते हैं।अन्तर्मुखी अक्सर चुप चाप रहते हैं ।
बहिर्मुखी लोगों अक्सर अपने बारे में , अपने परिवार के बारे में , अपने समाज के बारे में बताते /बातचीत करते हुए मिलेंगे । ये उच्च ऊंची आवाज में बोलने वाले स्पष्ट वक्ता लेखक श्रैणी के होते हैं । जबकि अंतर्मुखी लोग सदैव दूसरों के बारे में नींची आवाज में मंद स्वर में बोलते बातचीत करते हुए मिलेंगे ये निंदक चुगलखोर श्रेणी के वाचक वक्ता होते हैं जो सदैव दूसरों में कमी निकालते ,/ढूंढने में लगे रहते हैं ।ज्यादातर चुपचाप रहना पसंद करते हैं ये जरूरत पर ही बोलने वाले स्पेशल टाकर होते हैं ।
बहिर्मुखी लोगों का ऊर्जा स्तर MNO मैकेनिकल, नोटोरिअस ,आपरेटर प्रकार का नेता ब्रांड जीवन में ये रिस्क लेने वाले खतरों से खेलने वाले नेता विप्र ( विशेष पुरुषायित ) व्यक्तित्व श्रेणी के लोग होते हैं ये जीवन में अधिकतम तरक्की करते हैं ।ये जिस जीवन स्तर में पैदा होते हैं अपनी जवानी में उस स्तर को बदलाव करके अगले श्रेष्ठ स्तर में जाकर जीवन यापन करते हैं अर्थात गरीबी में पैदा हो कर अमीरी में जीते हैं ।
जबकि अन्तर्मुखी लोगों का ऊर्जा स्तर K L काईनैटिक लेबर प्रकार का मजदूर ब्रांड जीवन स्तर होता है । ये रिस्क खतरों से बचने वाले बाबूलाल सामान्य व्यक्तित्व श्रैणी के लोग होते हैं । ये जीवन में ज्यादा तरक्की नहीं करते हैं । ये जिस जीवन स्तर में पैदा होते हैं उसी जीवन स्तर में जिन्दगी जीते हुए मरते हैं ये अपने जीवन स्तर में परिवर्तन /सुधार नहीं कर पाते हैं।

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