सहानुभूति एक वैचारिक समर्थन अहसास है कि मुश्किलों में अपने को अकेला महसूस मत करो हम सभी तुम्हारे साथ तन मन धन से समर्पित हैं तुम्हारी हर संभव मदद करेंगे जिससे मन में अभय भाव ,निडरता , आक्रामकता आती है । उस दुखी एकाकी अवसाद ग्रसित जीव /मनुष्य में जीने का जज्बा पैदा होता है उसका मानसिक डर दूर होता है बुरी निगेटिव भावनाएँ ,बुरी कल्पनाएं पैदा होनी बंद होती हैं ।भविष्य में अनिष्टकारी मानसिक कथन विकल्प पैदा होने बंद हो जाते हैं जिससे उसका मन शांत सुरक्षित महसूस करता है।मस्तिष्क ठीक विचारों से युक्त होने पर सामान्य रूप से कार्य करता है ।तन मन के ठीक संतुलित होने से शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है । यह सब होता है उस मनुष्य के निकटतम परिवार जनों द्वारा उससे सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने से , यदि किसी परिवार के सदस्य से उपेक्षित व्यवहार किया जाता है सहानुभूति पूर्ण व्यवहार नहीं किया जाता है या किसी पर सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करना नहीं आता तो सहानुभूति अभिव्यक्ति कला विज्ञान विधा के न जानने से समय्क ज्ञान की कमी से मानव जीवन में क्या क्या, कैसे कैसे अनर्थ कारी मित्थया रोग उत्पन्न होते हैं उनमें से मात्र कुछ कि बानगी /नमूना का वर्णन जो मेरे निजी अनुभवओं पर आधारित है अक्षर शः सत्य है मानो न मानो ये आपकी पाठकों की मर्जी आप स्वतंत्र हैं इस बारे में क्रिया प्रतिक्रिया की सोच का विकल्प पाठकों का अपना है कृपया पुष्टि के लिए भविष्य में प्रश्न पत्र व्यवहार कोरा पर न करें।
इसे अंधविश्वास वृद्धि परक न समझा जाय इस प्रश्न का दो बार अनुरोध आया तब मैं इस पर लिखने को नैतिक बाध्य हुआ ।भविष्य में ऐसे प्रश्न मेरे प्रोफाइल पर न डाले जांय ।
सहानुभूति रोग ःः:- ये वो रोग हैं जिनका रोगी जीवों के शरीर के अन्दर कोई रोग कारक सूक्ष्म जीव वायरस, बैक्टीरिया ,प्रोटोजोआ , हैल्मिन्थ , निमैटोडा , सूक्ष्म आर्थोपोडा ( माईसिस ःः शरीर में गिंडार लार्वा कीड़े पड़ना ) , फ्यास से उत्पन्न गंजापन , चेहरे पर झाँई , आदि अन्य सूक्ष्म कवक दाद एक्जिमा और बाह्य परजीवी मक्खी , मच्छर,जहरीले सांप, अन्य जहरीले कीट से दंशन काटना डंक लगना ।आदि दूसरे सुक्ष्म या स्थूल बड़ा जीवों से उत्पन्न नहीं होता है । रोग का कारक नहीं होता है ।
सहानुभूति के सही समय पर सहानुभूति ना मिलने से या किसी जीव पशु पक्षी मनुष्य के प्रति अधिक लगाव /मोह रखने से जब वह बीमार होता है या मर जाता है तो उस बिमार होने वाले से लगाव रखने वाला भी सही सहानुभूति न मिलने से बिमार हो जाता है । ।या किसी की कोई विशेष इच्छा लम्बे समय तक पूरी नहीं होती ह जैसे महिलाओं / पुरुषों में कामपर्व इच्छा, या मातृत्व प्राप्ती इच्छा आदि पूरी नहीं होती है उसे समझाया नहीं जाता उससे सहानुभूति पूर्वक व्यवहार नहीं किया जाता है तो उनके शरीर का हार्मोन सिस्टम गड़बड़ी में आजाता है ।जिससे बहिर्मुखी हैं तो महिलाओं और पुरुषों को हिस्टीरिया मन उन्माद रोग ,चिड़चिड़ापन .बढ़ता हुआ हिंसक प्रदर्शन , अन्तर्मुखी हैं तो एकाकी पन मनोवृत्ति से अवसाद या डिप्रेशन जैसे अनेक मनोरोग हो जाते हैं ।मातृत्व प्राप्ती इच्छा विकृति महावारी में समस्या महींने में दो बार या दो महींने में एक बार ,ये समस्या उन महिलाओं के साथ ज्यादा होती है जिनके साथ परिवार में सहानुभूति पूर्वक व्यवहार नहीं होता है ।जिन महिलाओं से उनके पति उदासीन बेरूखी बेगौरी का व्यवहार करते हैं।परिवार में उनसे प्रेम व्यवहार नहीं होता है ।
अब सहानुभूति जनित अन्य रोग जिनका कारक सूक्ष्म जीव नहीं होते हैं लेकिन होते हैं जैसे ब्लडप्रेशर हाई ,या लो ( उच्च रक्तचाप या निम्न रक्तचाप ) हाई शुगर /मधुमेह /डाईबिटिज ।। लो शुगर /हाईपोग्लाईसीमियाँ अकारण कमजोरी थकान , रक्त में शर्करा का मानक स्तर से अचानक ज्यादा गिरने पर चक्कर आना ,खराब मानवीय व्यवहार , अल्पकालिक अंधापन या हृदय का अचानक काम करने से रुक जाना । पाईल्स /बवासीर ,फिशर या फिशट्युला , ।। बैक्टीरिया हीन या वायरस हीन सूखी खाँसी जो अधिक मानसिक तनाव में परीक्षा के दौरान छात्रों में पेपर के दौरान शुरुआत में होती है और आधा या एक घंटा बाद पेपर सही /ठीक से चल जाने पर बंंद हो जाती है ।
किसी प्रिय के बिछुड़ जाने पर डर के मारे बुखार आना मेरा अपना अनुभव ःः एक बार मेरा सबसे छोटा बेटा जो लगभग वह 3 वर्ष का होगा 2000की बात है ( मेरी बड़ी बेटी जो समय 13वर्ष की थी वह अपने छोटे भाई से दोनों बहनों की तुलना में अपने छोटे भाई से ज्यादा प्यार /लगाव रखती थी आज भी ऐसा ही है ।) एक दिन उसका मामा आया और उसे ननिहाल ले गया । छोटा बच्चा उस समय वियोग /बिछुड़ने को नहीं जानता था अगले दिन से उदास हो गया हमने इसे उसकी तबीयत खराब समझकर डॉक्टरओं को दिखाया बुलंदशहर के चाईल्ड स्पैशलिस्ट डॉक्टर एम.पी.अग्रवाल को , बेटे की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी बेटे की पैथोलॉजी रिपोर्ट नार्मल आयी । दिमाग खराब # मेरा , कौन सा रोग है ये जो बाल रोग विशेषज्ञ की समझ में नहीं आ रहा और पैथोलॉजी रिपोर्ट नार्मल है मैंने भी एम.एस.सी.में रोग विज्ञानपैरासाईटोलाँजी और माईक्रो बायोलॉजी पढ़ी थी ।अचानक शाम के समय बेटे को बुखार तेज होने लगा वह बुखार में बेहोशी की अवस्था में बड़बड़ाने लगा बड़ी मुश्किल से उसकी भाषा समझ में आयी :-वह नींद की बेहोशी में बोल रहा था हमारे एक लौन्डिया ( लड़की ) थी वो भी नहीं है कहाँ चली गयी है अब तक नहीं आयी है ।अब मैं क्या करूँ मैं भी वहीं जा रहा हू्ँँ । दिमाग खराब बुखार ज्यादा लेकिन मैं रोग का कारण समझ चुका था ,वह थोड़ी देर बाद बेहोशी की हालत में सो गया । अब मेरे चेहरे पर मुस्कान थी मैं तेज बुखार का कारण समझ चुका था मैंने कहा जब भी ये होश में आये बुखार हल्का हो तभी इसे बताना कि भाई कल तुझे गरिमा के पास ननिहाल नाना के घर ले चलेंगे । अगले दिन मैंने डॉक्टर के यहां से सीधे सीधे उसे उसके नाना के घर उसकी बड़ी बहन के पास डाक्टर को दिखाने के बाद दवाई सहित नाना के घर भेज दिया । चमत्कार हुआ अगले दिन जब बेटा गया था बुखार था शाम के समय , मामा के घर बड़ी बहन से मिलते समय ।, अब दवाएं असर दिखाने लगीं बुखार मंदा पड़ने लगा और पूरी रात बीतते बीतते अगले दिन बुखार पूरी तरह से उतर गया था।
ये था सहानुभूति का प्रभाव जिसकी कमी से बेटे मेंअसुरक्षा भाव से डर पैदा हुआ ।वह बड़ी बहन की मौजूदगी में अपने को सुरक्षित समझता था।हमनें उसके बहन के लगाव को समझा उससे सहानुभूति दिखाई उसे उसकि बहन के पास भेजने /मिलवाने का वायदा /विशवास दिलाया । बहन से मिलते ही उसमें सुरक्षा की भावना बनी और निर्भय भाव उत्पन्न होते हुए ही दवाओं ने असर करना शुरु कर दिया । जबकि डर की हालत में दवाएं असरहीन साबित हो रही थीं ।
अब दूसरी मेरी निजी घटना ःः मेरे मित्र की तीन साल पहले भीषण गर्मी में किडनी समस्या से मृत्यु हो गई उन्हें मरते समय बवासीर की फिशर अवस्था थी ।मैं सहानुभूति देने उनके परिवार में गया उनकी पत्नी की कमर टूटने से वह झुककर चलतीं थीं । मित्र के घर पर मित्र का फोटो माला चढ़ा दीवार पर लगा था ।मेरे अपने मित्र के परिवार से भावनात्मक जुड़ाव के संबंध हैंं भावी मित्र / पत्नी देखकर बहुत खुश हुई और मुझसे एक सप्ताह 7दिन घर रहने का वायदा लिया । ( मित्र का संयुक्त परिवार है उसमें उनका बेटा मुझे बेटी सभी पापा कहते हैं मैं भी उनके परिवार को अपना परिवार मानकर अक्सर गर्मी के अवकाश पर उनके परिवार में सपरिवार ।मिलने जाता हूँ।उनके बेटे बेटी को में अपनी धर्म संतान मानता हूँ उनकी पुत्रवधू मुझे ससुरसाहब के जैसा मान सम्मान किया करती है।) मित्र के परिवार को मैं अपना परिवार समझता हूँ ।एक दिन मैं शाम के समय खाना खा रहा था भावीजी पास बैठी हुई थीं ।वे अचानक भाई साहब के जीवन संस्मरण चर्चा करने लगीं ,मेरे और भाईसाहब के मिलते स्वभाव रंग कद की चर्चा करते समय रोने लगी अपने भाग्य को कि अब बुढ़ापे में समय काटने को तुम्हारे भाईसाहब भी नहीं हैं।किस से खाली समय में बातें करुँ चर्चा चलते संस्मरण उभरते वे भाईसाहब के पाईल्स फिशर की चर्चा करने लगीं ।मेरे मन ने भाईसाहब के रोग को सहानुभूति से संज्ञान में लिया।जब भी उनके फोटो पर नजर जाती उनकी पाईल्स फिशर जहन मेरे मन में कौंध जाती ।7 दिन बाद मैं भाईसाहब के यहाँ से अपने घर लौट आया । लगभग 15 दिन बाद मुझे भी पाईल्स फिशट्युला बन गया था । ये था अति निकटता से सहानुभूति रखने /दिखाने का दुष्परिणाम जो मुझे मिल चुका था ।मेरे अंदर अति संवेदनशील भावना से सहानुभूति रखने का मनोरोग हाईपोकोन्डिर्यास का बुरा नतीजा मुझे मिल चुका था ।
सीख मिली सहानुभूति मुँह से शब्दों से व्यक्त करो ,दिलो दिमाग से नहीं । किसी के भी रोग को उसका रोग समझो ,उसके रोग को अपना रोग मत मानो ,बाबर हुमायूं प्रकरण की तरह ।नहीं तो दूसरे का रोग संवेदनशीलता से सहानुभूति दिखाना पर तुम पर भी आ सकता है ।हाईपोकोन्डिर्यास मानसिक अवस्था ( दूसरे के रोग को सुनकर ये मान लेना कि मुझे भी यह रोग है / आगे भविष्य में हो सकता है ) के कारण संवेदनशील व्यक्ति पर आ सकता है ।
बाद में यह रोग बिना आपरेशन के होमयोपैथिक दवाई से होमयोचिकित्सक के निर्देशन में ,आयुर्वेद दवाओं से ठीक हो गया लेकिन अक्ल दे गया सहानुभूति को इतना सस्ता हल्का न समझें इसका मूल्य और आवश्यकता को समझकर अपनी सहानुभूति को योग्य जीवित व्यक्ति को उचित समय पर उचित शब्दों में सोचसमझकर व्यक्त करें ।
तीसरा संवेदनहीनता या सही सहानुभूति न वय्कत करने का खतरनाक /भयंकर परिणाम ःः मेरे गाँव में संवेदहीनता केचलते एक परिवार में बड़े बेटे ने बाप की हत्या कर दी ।बाद में छोटे बेटे ने बड़े भाई भावी की हत्या कर दी उनकी बूढ़ी माँ रह गई ।परिवार में क्रूरता से की गई हत्याओ से गाँव वालों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। अब अकेली बुढ़िया से कोई भी बात नहीं करता था उसे देखते ही बच्चे असभ्य व्यवहार करते बड़े मुँह फेरकर निकल जाते हर तरफ तिष्कार अपमान लगातार होते रहने से प्यार संवेदना सहानुभूति पूर्ण व्यवहार न मिलने से बुढ़िया अवसाद / डिप्रेशन में आ गई । शरीर पर फालिस /पक्षाघात हो गया चलना फिरना बंद , खाट में पड़ी रहती एक बेटे की मौत दूसरा बेटा जेल में, अब ऐसी विकट परिस्थिति में बुढ़िया में 60वर्ष के बाद रजोनिवृत्ति /मोनोपोज के बाद फिर से मातृत्व भाव उदय /पुनः पैदा हुआ और ब्लीडिंग शुरू हो गई जो उसके मरते समय तक 3 -4 माह तक चली होगी ।डाक्टरों ने इस प्रकार की आसामान्य ब्लीडिंग को कैंसर बताया था ।जबकि बुढ़िया की दुर्गति का कारण रहा सामाजिक बहिष्कार से उत्पन्न अकेलापन से उत्पन्न अवसाद ग्रस्त होने से मानसिक संतुलन बिगड़ जाने से उसको अन्त समय का गलत अहसास से उत्पन्न डर /भयभीत होना ।। जिसका कारण रहा बुढ़िया के परिवार जनो के द्वारा ,और उसके पड़ौसियों द्वारा उसे सहानुभूति पूर्ण व्यवहार न किया जाना ।यह रोग वृद्धावस्था में अकाल अवस्था में मित्थया /झूँठी माहवारी पुनः शुरू हो जाना ।
हमारे एक परिचित की पत्नी को एक बेटी पैदा होने के बाद बच्चे पैदा होने बंद हो गए उस पर उसके कुल के परिवार के पड़ौस की महिलाएं बाँझ का लाँछन लगाकर उसे अपमानित /प्रताड़ित करने लगतींं उसे 40 वर्ष बाद मित्थयागर्भ धारण का विकार उत्पन्न हुआ जब डाक्टर लोगों ने अल्ट्रासाउंड किया तो उसमें गर्भाशय में माँस का पिंड विकसित होता हुआ नजर आया जिसे आपरेशन से सर्जन डॉक्टर ने हटाया /बाहर निकाला । । कारण रहा महिला के साथ उसके कुल /परिवार जनों परिवार की महिलाओं द्वारा महिला से सहानुभूति पूर्ण व्यवहार व्यवहार न करना । बार बार के स्त्रियोचित लाँछन अपमान से उसमें मित्थया गर्भ के विकार का रोग बन गया । कारक रहा परिवार की महिलाओं के द्वारा महिला से सहानुभूति न रखने सहानुभूति न मिलने से लगातार अशांत मन बने रहने से सहानुभूति जनित मित्थया गर्भ विकार माँसपिंड का गर्भाशय में बनना ।
मेरी अम्मा इस सहानुभूति विधा की प्रकाँड ज्ञाता थीं उनका विचित्र अनुभव ःः एक बार हमारे पड़ोसी का जवान शादी शुदा बेटा मर गया उसकी मानसिक स्थिति खराब हो गई परिवारिक जिम्मेदारी छोड़ दी बस हर समय मरे बेटे की चर्चा उसके इस विचित्र बदले व्यवहार से सभी दुखी थे ।वह एक दिन अम्मा के पास आया और मरे बेटे की चर्चा शुरू उसने बताया चाची आज मैंने सुभाष को सपने में देखा उसे पीले अधो वस्त्र और लाल ऊपरी अंगवस्त्र ओं में एक औरत गोद मेंं लिए खिला रही है ।जब मैंने उससे अपना सुभाष बेटा माँगा तो मेरे बेटे ने मेरे पास आने से मना कर दिया सपने में ।अम्मा को उसके पूर्व वृत्तांत का पता था अम्मा बोली बेटा अंगन सुन तेरे परिवार पर देवी माता भवानी नगरकोट वाली की खोर है अब तू ऐसा कर अपने परिवार संग देवीदर्शन को जा । तुझे माता रानी बुला रही है तेरा बेटा माता रानी की गोद में है वह तुझे माता रानी के दरबार में मिलेगा जा अपने बेटे को माता रानी के दरबार से माँगकर ला । उसके दिमाग में अम्मा की बात बैठ गई खुश होकर देवी दर्शन का संकल्प लेकर घर से चला गया । बाद में मैंने अम्मा से पूछा अम्मा एक तो उसका बेटा मर गया तुमने उसे देवीदर्शन का नया धर्म भार डाल कर ठीक नहीं किया तब अम्मा ने बताया बेटा सुन वो जवान बेटे के बैराग में पागलों जैसा हो गया है उसने सभी परिवार की जरूरी जिम्मेदारी छोड़ दी है।अब गाँव बदलेगा, घर बदलेगा, जगह बदलेगी, लोग बदलेंगे, उसका मन भी बदलेगा ।मन बदलेगा तो बेटे का शोक घटेगा ।काम में लगेगा थकेगा थककर सोयेगा तो भूल पड़ेगी देख लेना अब ये एक हफ्ता में ठीक हो जायेगा काम पकड़ेगा, जिम्मेदारी लेगा ।भूल पड़ती चली जायेगी एक रोज अपने आप कहेगा मरे को कब तक रोऊँ मेरे और भी बालक हैं। चमत्कार हुआ अम्मा की बात अक्षरशः सही साबित हुई आज अब वह सामान्य है उस दिन मरे व्यक्ति के कर्म काँड का रहस्य समझ में आया
।कि ये मृतक के कर्म काँड करते हुए शोक पीड़ित व्यक्ति का मन बटता बदलता रहने से शोक धीरे धीरे कम होता जाता है व्यक्ति सामान्य होता जाता है।शोक पीड़ित परिवार में लोग साँत्वना देने सहानुभूति देने आते हैं ।यह था सहानुभूति देने का रहस्य जो जरूरी है ।लेकिन पंडित जनों की मंहगी दक्षिणा प्रथा ने खट्टा, मिर्ची ला बना कर जरूरी मृतक कर्मसंस्कार को अभिशाप मय बना दिया है।
कहने का मतलब है कि सहानुभूति मानव जीवन को अत्यंत महत्वपूर्ण है ।यदि यह सही समय पर सहानुभूति मिलती रहे तो अवसाद / डिप्रेशन न होने से आत्महत्या बंंद ,।रोग खत्म तो नहीं हो सकता लेकिन कम जरूर हो जाता है सही सहानुभूति मिलने पर ।ठीक भी होता है भविष्य में अब यह सहानुभूति दाता पर निर्भर है कि वह सहानुभूति देने आता है या सहानुभूति देने के बजाय सहानुभूति लेकर चला जाता है ।सहानुभूति प्रक्रिया में कमी करके ।
सभी रोग डर की अवस्था में जोर भरते बढ़ते हैं निडर होने पर रोग ठीक होने लगते हैं सहानुभूति दाता से सहानुभूति में मिले विचारों से बढ़े आत्मविश्वास से .।रोग विरोधी शक्ति बढ़ती है निडरता आती है सहानुभूति मिलने से ।सहानुभूति दवा से पहले का रोगी का मानसिक स्थिति ठीक करने की विधा है ।दिमाग ठीक तो शरीर अपने आप ठीक हो जाता है सहानुभूति के टाँनिक /पोषण से ।
सकारात्मक पौजिटिव सोच बनती है सहानुभूति से ।
ज्यादा जानकारी के लिए अवचेतन मन की शक्ति से रोग निवारण पढ़े पुस्तकें जोसेफ मर्फी ,और नार्मन पील की , जो सिखाती है हमें सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करना |
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