बारिश का मौसम प्रकृति में अधिकाँश जीवों का वनस्पति जगत, प्राणी जगत का प्रजनन काल होता है आसमान से जल की बूँदों के साथ अधिकतर आत्माएंं जमीन की ओर आकर्षित होकर उतरा करती हैं ।जमीन पर जो जीव प्रसन्न होते हैं वे अक्सर प्रसन्नता के प्रभाव से हँसने नाचने गाने की मुद्रा में ऊपर बदलों की ओर देखने की चेष्टाएँ करते करते हैं ।
जब कोई जीव प्रसन्न होता है तो उस समय उसका आत्मा/प्राण मुखर /प्रवल होता है यह आत्मा की/प्राण शक्ति की एक प्रभावशाली अभिव्यक्ति मुद्रा होती है जिसमें वह अपना प्रभाव बढ़ाने दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने में अपना विस्तार करने में समर्थ होता है ।नाचना गाना ,खेलना ,कुदना ,उछलना , खाना ,और प्रज्या कर्म अपनी संतान पैदा करने को मिथुन /मैथुन करना ,ये सभी संसारिक जैविक कार्य जीव अपनी प्रसन्न अवस्था में ही करने में समर्थवान होते हैं ।प्रसन्न अवस्था में वे ऊर्जा से भरे होते हैं । दुखी अवस्था में सभी जीव हीन भावना के होने से ऊर्जा हीन होने पर वे ये सभी ऊर्जा पूरित वाली क्रियाएं नहीं कर सकते हैं विशेष रूप से मिथुन / मित्रता मिलन और मैथुन / प्राण पूरक से मिलन यौनसंबंध जैसे अधिक ऊर्जा वाले कार्य में असमर्थ होते हैं ।सामान्य तौर पर यौनसंबंध से पहले पूरक साथी के ऊर्जा स्तर की पहचान परीक्षा ली जाती है। उस पूरकजीवन साथी को श्रृंगार सजना सँवारने का काम ,नाच नचा कर, गाना गवाकर, खेल खिलाई कर ,उछल कूद कराकर खाना खिलाई करके मनुष्यों में भी यही जैविक क्रियाएं विवाह उत्सव पर्व में शादी के कारण रूप में देखी ,करी जाती हैं ।। अर्थात ये कामपर्व का आयोजन भी आदमी ने पशुओं से लड़ाई /चढ़ाई ( चढ़त प्रथा ) पक्षी संवर्ग से मिलन मैत्री मोरों से सीखा है ।
अब चर्चा मोर केन्द्रित
बरसात के मौसम में नर मोर का विशेष श्रृंगार प्रकृति करती है उसके पुच्छल पंख बढ़कर बड़े और ज्यादा हो जाते हैं उसका कंठ /गला बड़े परों से युक्त हो जाता है । कंठ स्वर प्रबल हो जाता है।शरीर ऊर्जा के प्रभाव से दीर्घकाय बड़ा हो जाता है ।ऐसे में जब वह अपने निकट अपने जीवन साथी मोरनी को देखता है तो अपने अंदर बढ़ीहुई ऊर्जा को मोरनी के अंदर डालने का उपक्रम /उद्योग करने की सोचने लगता है । अब जैसे ही जब भी कोई मोरनी उसे दिखाई देती है वह उसे अपने पास बुलाने को जोर शोर से चीखने चिल्लाने लगता है देरतक लम्बे स्वर में बोलता रहता है । अब उसकी आवाज सुनकर कोई भी एक या एक से अधिक मोरनियाँ उसके पास आती हैं वे उसके दीर्घकालिक नाच से उसकी शरीर की अधिक अतिरिक्त ऊर्जा की पहचान करतीं हैं ।अब जो भी मोरनी गर्म होती है जिसमें ऊर्जा स्तर ज्यादा होता है वह मोर के सान्निध्य में आकर नाचने लगती है बाकी मोरनियाँ जिनका ऊर्जा स्तर सामान्य होता है वे उस नाचते हुए मोर और नाचती हुई मोरनी का नाच देखतीं रहतीं है यह मोर मोरनी नाच एक घंटे से एक क पहर या तीन घंटो से ज्यादा चलता है प्राकृतिक रूप से नाचती हुए मोरनी मोर के जब अति निकट पहुँच जाती है तब दोनों का नाच बंद हो जाता है और मिलन समारोह पूर्ण बाकी मोरनियाँ उन उत्तेजित मोर मोरनी से अलग अलग चली जाती है ।
और शुरुआत हो जाती है मोर मोरनी के युग्ल की सुहाग रस्म या मैदुगुरी , मिथुन कर्म प्रज्या धर्म धारण ःःःःःः।
बारिश के मौसम में मोर इसलिए नाचते हैं ।
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