भूत प्रेत किसी को वास्तव में पकड़ते हैं या सिर्फ एक ढोंग हैं ये सब इस दशा में क्या करना चाहिए डॉक्टर के पास जाना चाहिये या फिर किसी बाबा जी के पास ?

भूत प्रेत है क्या ?.यह सभी जीवों की मनुष्य की अदृश्य सूक्ष्म शरीर की अवस्था है जिसमें वह जन्म लेने से पहले रहते हैं और स्थूल शरीर नष्ट होने पर अकाल में या जीवन अवधि की पूर्ण होने पर काल वश नियमानुसार मरने के बाद चले जाते हैं ।भूतिक शरीर ही जीवों का वास्तविक /असली शरीर होता है ।जिसमेँ जीव के जीवन लक्षण /गुँण विद्यमान /मौजूद होते हैं ।जैसे अग्नि ,ताप /उष्मा , विद्युत ,चुम्बक, लचीलापन,प्रत्यास्थता ,पिंडत्व (अनेक पदार्थों /तत्वों के मिलने से एक आकर, आकृति बनना , ) भंगुरता ( पिंड का टूट फूट कर बिखर जाना ), प्रज्या, ( अपने जैसे जीवों को प्रजनन द्वारा पैदा करना ) और अन्य जैविक गुँण जैसे जीवन के लिए भोजन ग्रहण, शवसन, दर्शन, गंध , स्पर्श, कर्म भाव ,गति भाव, रक्षा भाव ,आक्रमण भाव ,अन्ना भाव ,(अन्न की शरीर में गति मैटाबॉलिज्म ) प्रज्या भाव (अपने जैसा जीव दूसरा अपने आप बनाना, या दूसरों जीवों की मदद से बनाना ) संतान पैदा करना आदि ये सभी गुँण जीव की भूतिहा अवस्था में ही होते हैं ,जीव की भूत हीन अवस्था भौतिक /स्थूल दृश्य शरीर में नहीं होते हैं ।
इसको समझने के लिए हमें किसी मरते हुए समय किसी आदमी या किसी भी जीव को ध्यान से देखना होगा कि जब वह जीव जिन्दा था हरकत मय था क्रिया की प्रतिक्रिया व्यक्त किया करता था ।अब जब वह मर गया तो उसमें से ऐसा क्या निकल गया /कम हो गया औ सोचना इस विषय पर तो पता लग जायेगा कि आदमी के जीते जी उसका शरीर गर्म था आदमी के मरने के बाद अब शरीर ठंडा हो गया प्राकृतिक रूप से, आखिर उस में ऐसा क्या था जो उस शरीर को उस आदमी के जीते जी उसे गर्म रखे हुए था । जी हाँ इसे अपने तरकशी दिमाग से सोचिये जबाब मिल जायेगा ।ना मिले तो मेरे लिखें को पढ़कर समझने का प्रयास करें ।
प्रत्येक जीव के स्थूल दृश्य मय शरीर के अन्दर उसका एक कारण रूपी संचालक सूक्ष्म रूप से विस्तारित रूप वाला शरीर होता है जिसमें सूक्ष्म विद्युत का , चुम्बकन का ,ताप का आकर्षण का प्रतिकर्षण का ,गति का ,पोषण शोषण का ,गुँण होता है जिसके शरीर में विद्यमान /उपस्थित होने पर ही जीव का स्थूल दृश्य शरीर जीवित होता है । जब यह अदृश्य शरीर जो सूक्ष्म शरीर इस दृश्य स्थूल शरीर में से अलग हो जाता है तो स्थूल शरीर में शरीर को नियंत्रित करने वाली विद्युत न होने से शरीर धारण कर्ता इन्द्रियाँ धर्म हीन हो जाती हैं आँखें हैं जग दर्शन क्रिया प्रतिक्रिया बंंद ,कान हैं सुनाई देना बंद, नाँक है गंध क्रियाएं बंंद ,मुख ह पर खाना बंंद, हाथ हैं कर्म बंद ,पैर हैं गति बंंद , जननाँग हैं पर जननक्रिया बंंद आखिर कौन था वो जो इस शरीर कोअपनी विद्युत शक्ति से सक्रिय बनाये हुए था ।जिसकी मौजूदगी से शरीर गर्म रहता था वही था अग्नि मय पुरुष हिरन्यगर्भा जो इस शरीर में गर्भस्थ शिशु अवस्था में छिपा हुआ रहकर इस स्थूल शरीर को नियंत्रित करके चला रहा था, ठीक उसी तरह से जैसे गर्भवती स्त्री के व्यवहार को उसका गर्भस्थ शिशु नियंत्रित करके उस गर्भवती के व्यवहार को अक्सर भ्रमित करता रहता है और उस गर्भवती स्त्री को भ्रमित व्यवहार करने का दौहृत (दो हृदय ) का मनोरोगी /मानसिक रोगी बना देता है जिससे उसका प्राकृतिक व्यवहार स्थिर स्थाई नहीं रहता है जो गर्भस्थ शिशु के लिंग के अनुसार बदलता रहता है कभी कभी वह स्त्री मरदाना व्यवहार पुरुषों के जैसा करती है तो कभी जनाना /स्त्रियोचित व्यवहार करती है ।ठीक ऐसा ही विचित्र भ्रम पूर्ण व्यवहार मनुष्य करता है उस हिरन्यगर्भा पुरुष अदृश्य की स्थूल दृश्य शरीर में उपस्थित होने पर ।इस हिरन्यगर्भा पुरूष की शरीर में मौजूदगी से यह जीवित भूतिक /भौतिक शरीर वाला प्राणी /मनुष्य भौतिक जग में से अपनी आवश्यकता के अनुसार दूसरे पदार्थों को वस्तुओं को खींच ले लिया करता है । अपने चुम्बकीय गुँण से , इस चुम्बकीय हिरन्यगर्भा पुरुष में अपनी शक्ति थी अपना ताप आप नियंत्रण करने की तथा यह इस स्थूल निर्जीव शरीर को भी गरम रखता था ,यह हिरन्यगर्भा पुरुष अपनी आवश्यकताओं के अनुसार दूसरे जीवों को मनुष्य को भौतिक वस्तुओं को अपनी ओर खींच लिया करता था । आकर्षण शक्ति थी इस हिरन्यगर्भा पुरुष में जो अब इसके शरीर में से बाहर निकल जाने से मरने के बाद अब इसकी आकर्षण शक्ति खत्म हो गई तो सभी इसे अपने अपने धर्म नियम से दुर करते हैं । कोई जलाकर, कोई दफना कर जो इसे पसंद नहीं था यह उसे अपने पास भी नहीं आने दिया करता था विरोध करता था अप्रिय का शत्रु का दूसरों को दूर करने की प्रतिकर्षण प्रतिक्रिया शक्ति थी ,जब यह हिरन्यगर्भा इस भौतिक /भूतों के रहने योग्य शरीर में था तो यह भौतिक शरीर जीवित था । जो अपनी इच्छानुसार अपनी शक्ति से विद्युत से गति करता था अब जब यह इस दृश्य स्थूल शरीर में नहीं हैक्योंकि शरीर को चलाने वाला नियंत्रित करने वाला हिरन्यगर्भा पुरुष तो इस शरीर में नहीं रहा इस शरीर को छोड़कर अन्यत्र चला गया जिसके इस भौतिक शरीर में न होने पर यह भौतिक शरीर समर्थ होते हुए सुरक्षित होते हुए अपने आप जीव की गतिविधियों को करते में असमर्थ हो गया है इस भौतिक निर्जीव शरीर को गति दूसरे लोग करा रहे हैं शमशान /मरघट की ओर अब यह अपनी रक्षा अपने आप नहीं कर सकता है शीघ्रता से बिखर जायेगा इस शरीर को अपनी चुम्बकीय शक्ति से एकत्रित करके रोकने /थामने चलाने वाला चुम्बकीय विद्युतमय हिरन्यगर्भा अब इस शरीर में नहीं है । मुरदा शरीर में आकर्षण प्रतिकर्षण का गुँण नहीं होता है केवल भूतिक शरीर में ही आकर्षित करने प्रतिक्रिया प्रतिकर्षण का गुँण होता है । तो वो भूत कहाँ गया ? इस शरीर को चलाने वाला इस शरीर का असली मालिक /स्वामी इसका भूत अब कहाँ है ?यकीनन वह अब अपने लिए दूसरा अच्छा शरीर खोजने गया है ।जिसमें घुस कर वह अब अपनी आगे की भविष्य में की इच्छाओं को पूरा करके अपना अगला भावि /भविष्य का जीवन जियेगा । जब यह अदृश्य शरीर वाला हिरन्यगर्भा भूत अदृश्य रुप में इस दृश्य शरीर के अन्दर था तो तभी तक यह शरीर अपने लिए पोषण और दूसरों का शोषण करने में समर्थ था । मरने के बाद जब यह अदृश्य शरीर वाला हिरन्यगर्भा अग्निवर्णा विद्युतीय शरीर नियंत्रक संचालक भूत इस दृश्य शरीर में से बाहर निकल गया है तो इस दृश्य शरीर ने पोषण शोषण का काम क्यों कर बंंद कर दिया न खाता ह न पीता है न साँस लेता है मुँँह में रखे खाने को भी नहीं निगल पाता है।क्या निकल गया है अब इस शरीर में से जो अब यह शरीर निष्क्रिय हो गया है । तो इसका सही जबाब है ,इसका भूत इसके शरीर में से निकल गया है ।कहाँ गया है वह अब #अपने लिए उचित अच्छा शरीर ढूंढने के लिए जिसमें वह शेष /बाकी इच्छाओं को पूरा किया करेगा ।
प्रत्येक जीव का भूत ही उसके शरीर का नियंत्रण कर्ता अग्नि वर्णा, चुम्बकीय, विद्युतीय, भंडारी, प्रज्यायी संतान उत्पन्न कर्ता/धर्ता स्वामी होता है ।। जब कभी कभार सामान्य रूप से नहीं ,कुछ अशरीरी आत्माएं अपने सभी भौतिक गुँण धर्म युक्त हिरन्यगर्भा आत्मा ( भूत )दूसरों के शरीर में घुस जाने पर दूसरे के शरीर को नियंत्रण करने में समर्थ होजाते हैं। तो वह भूत आवेशित व्यक्ति अपनी सामान्य खुराक से ज्यादा खाना खाने लगता है पर सेहत नहीं बनती भूख बढ़ जाती है तृप्ति नहीं होती, शारीरिक श्रम क्षमता सामान्य से अधिक बढ़ जाती है, पसींना ज्यादा हरदम अकारण ही आता है, बी.एम.आर.बढ़ जाता है शरीर का तापमान बढ़ा हुआ, शरीर गर्म रहने लगता है शवसन दर बढ़ जाती है शरीर का आक्सीकरण /मंद दहन दर बढ़ जाती है ,वह गोपनीय जानकारी आसानी से देने लगता है क्योंकि भूतात्मा की पकड़ मन के अवचेतन स्तर पर ज्यादा होती है और सामान्य शरीरी आत्मा की पकड़ मन के चेतन स्तर पर ज्यादा होती है ।सामान्य शरीरी आत्माएं मर्यादित प्रेम व्यवहार करती हैं जबकि अशरीरी आत्माएं भूत प्रेत आदि अमर्यादित प्रेम व्यवहार या शत्रु व्यवहार करते हैं।
भूत की शरीर में उपस्थित से शरीर धारी का व्यवहार खराब हो जाता है ठीक उसी तरह से जैसे जब एक मकान में दो मकान मालिक आ जाते हैं या एक मकान के दो मालिक बन जाते हैं ऐसे में एक मकान को जो उसका असली मालिक नहीं होता वह उसे तोड़ने फोड़ने खराब करने पर उतर आता है भूत स्वामी । और जो उस मकान का असली मालिक होता है जीवित व्यक्ति वह उसे बचाने सुरक्षित संरक्षित करने में लग जाता है ।और दुनिया देखती है तमाशा । भूत भूत के संग लगते हैं लोग लोग के संग लगते हैं ।दुर्गति दुर्दशा होती है उस मकान रुपी शरीर की । अर्थात उस भूतावेशित व्यक्ति को मल्टीपल करैक्टर डिस्आर्डर का नया मानसिक रोग लग जाता है जो उस व्यक्ति के शरीर में घुसे घुसे भूतों की संख्या पर निर्भर करता है यदि उस शरीर में एक भूत घुसा है तो एक शरीर के दो मालिक होने से डबल कैरेक्टर डिस्आर्डर या दोहरा चरित्र धारण का मनोरोग पैदा होता है यदि अपवाद स्वरूप दो या दो से ज्यादा भूत एक शरीर में घुस जाते है तब उस व्यक्ति को मल्टीपिल कैरेक्टर डिस्आर्डर /बहु चरित्र स्वामी का भयंकर /खतरनाक मारक घातक मानसिक रोग हो जाता है ।
भूत वह लोग /जीव बनते हैं जिनका दिमाग /मन सक्रिय अवस्था में रहता है अर्थात जिनको मरने से पहले आत्मविशलेषण का प्रकृति अवसर नहीं देती जो अकाल मौत दुर्घटनाओं में मरते हैं जिससे उनके मन की स्थिति उग्र व्यग्र बेचने दुखी होती है मन में इच्छाएं अतृप्त होती है मूर्त अमूर्त चिंतन चलरहा होता है किसी से बदला लेने ,हिसाब किताब चुकता करने की इच्छा चल रही होती है तो ऐसे में वह अतृप्त विवेक हीन आत्मा अपनी प्रवल इच्छा वश दूसरों के शरीर में बलपूर्वक घुस जाया करती है ।और प्रेत आवेशित व्यक्ति यानि भूत रूप में ,और परेशान हो जाता है वह जीव , जिसके शरीर में घुसकर वह भूतात्मा प्रवेश कर चुकी है। वजह है दूसरे के शरीर को उसकी बिना मर्जी के नियंत्रण करने की कुचेष्टा ,जिससे वह शरीर वाला दुखी होता है । दूसरे के वाहन कारण शरीर को बल पूर्वक चलाना ।अब अपने वाहन कारण शरीर की खुद को ज्यादा पता होती है ऐसी विचित्र परिस्थितियों में इच्छा वहन कारण शरीर की दुर्गति तय है ।शरीर ठीक से काम नहीं करता चले तो किसके नियंत्रण में परिणाम तः शरीर को बीमार कहा जाता है।
यह सब जो मैंने लिखा है वह मेरा अनुभव है एक बार अम्मा पर नाना जी की आत्मा आ गई मैं लगभग नौ साल का होउंगा तब में डर गया मदद के लिए पिताजी के पास जाने लगा ।रास्ते में डर के मारे रुलाई आ गई तब नानाजी के आवेश भूत ने घर पर पिता जी की बुआ और मेरी दादी को मेरी लोकेशन बताई और कहा अब में जा रहा हूँ मेरा मुन्ना रो रहा है डर रहा है रस्ते में मेरे , नानाजी मुझे लाड़ में मुन्ना कहते थे ।सभी मुझे नरेश नाम से जानते थे ।पिता जी की बुआ ने पूछा कि पंडित जी क्यों आये अपनी बेटी पर यानि कि मेरी अम्मा पर तब उन्होंने जबान दिया अपने मुन्ना को देखने आया था उस्से प्यार से पुचकारना चाहता था क्या करुँ अब वह डर गया है ।मैं अब कभी भी इस घर में नहीं आऊँगा जिस घर में मेरा मुन्ना मुझसे डरे , डर कै दूर भाग जाय और अकेला होकर रोये ।उस दिन के बाद फिर कभी भी नाना जी ने न हमारे घर न अपने घर मेरी ननिहाल में किसी को दर्शन परिचय दिया ।
ये ढोंग ज्यादा वास्तविक कम है , मनोरोग है ।आज के परिपेक्ष्य में ,विशेष कर आजकल के मंजे हुए तांत्रिकों का नया व्यवसाय रोजगार है । फिर भी कभी जब किसी व्यक्ति पर भूत प्रेत का आवेश आ जाय तो घबड़ायें नहीं और ना किसी डा०को दिखाएं हो सके तो भूत प्रेत आवेशित मनुष्य को किसी अच्छे मनो चिकित्सक को पहले दिखायें ।जब वह प्रमाणित कर दे कि वास्तव में यह व्यक्ति भूत प्रेत आवेशित है तो तब बिना फीस लिए ढीक करने वाले अच्छे चरित्र के गुनिया ओझा भगत को दिखायें ।भूत प्रेत व्याधि ग्रसित होने पर वही श्रेष्ठ, उत्तम चरित्र वाला भगत इन बुरी बलाओं से छुटकारा दिला सकता है।
ये बुरी आत्माएं संत स्वभाव के उत्तम प्रकृति के लोगों से दूर रहती हैं /बचती है।

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