मुनि याज्ञवल्क्यजी कौन थे ?

मुनि याज्ञवल्क्य जी मिथिला नरेश राजा जनक के राज पुरोहित थे ।ये राजा जनक के सलाहकार थे । इनकी दो पत्नियाँ थीं गार्गी और मैत्रेयी इन दोनों पत्नियों के साथ याज्ञवल्क्य की यथार्थ वादी ज्ञान वार्ड का विवरण वृहद अरण्य उपनिषद में मिलता है । गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ व्यास रचित महाभारत में मिलता है
बृहद अरण्यक उपनिषद अध्याय 4 ब्राह्मण एक में याज्ञवल्क्य और राजा जनक का संवाद सर्ग में याज्ञवल्क्य को राजा जनक को ब्रह्म दर्शन का ज्ञान समझाते बताया गया है जिसमें याज्ञवल्क्य कथन —प्राण ही ब्रह्म है ःः में प्राण का आयतन ,आकाश प्रतिष्ठा श्ववसन प्रियता कथन ह को समझाया गया है प्राण हीन जीव मृत है ब्रह्म हीन है।प्रणहीन जीव अज्ञानी पशु समान है । ःःचक्षु ही ब्रह्म है ःःमें चक्षु का आयतन प्रतिष्ठा प्रियता को बताया गया है चक्षु का आयतन दृश्य दर्शन ,प्रतिष्ठा नेत्र और प्रियता सत्य है ।ःः नाद /ध्वनि ही ब्रह्म है ःःमें नाद का आयतन आकाश वायु है नाद की प्रतिष्ठा श्रोत /कान है दिशाएं प्रियता है। ःः मन ही ब्रह्म है ःः मन का आयतन अनन्त अन्तरिक्ष प्रतिष्ठा जिज्ञासा प्रियता आनन्द है । व्यवहार हृदय ही ब्रह्म है ःः तो हृदय का आयतन भूमंडल प्रतिष्ठा कर्म और प्रियता लेन देन आदान प्रदान व्यापार है ।
इसी प्रकार से अन्य ब्रह्म वाक्य कहे हैं जो सूत्रम कथन दर्शन मूल कथन कहे गये हैं जैसे प्रज्ञा ब्रहम है घटना घटने से पूर्व का ज्ञान अनुमान लगाना ब्रहम का गुँण हैप्रज्ञा का आयतन दृश्य पिंड पितर हैं प्रज्ञा की प्रतिष्ठा मूलक पितर शिष्य संतान श्रोता गण है। इस पर शंकराचार्य ने कहा है कि प्रज्ञात्मानम् ब्रहम है । स तत्वम् असि ।। इस पर याज्ञवल्क्य जी ने याज्ञवल्क्य स्मृति ग्रंथ में बताया है कि प्रज्ञा देने से उतना धन नहीं मिलता है जितना प्रज्ञा हरण करने से दूसरों को मूर्ख बनाने से धूर्तता करने से धन मिलता है ।ःः इसी प्रकार ब्रह्म विवेचना गुँण कथन हैं जैसे रति ( रात्रि कर्म )ब्रह्म है ःः रति का आयतन पूरक लिंग (स्त्री के लिए पुरुष लिंग ,पुरुष के लिए स्त्री योनि ) रति की प्रतिष्ठा प्रज्या अंग रति की प्रियता संतति संतान है ।
इस प्रकार से ब्रह्म की 16कला ओं की व्याख्या गुरु बुद्धि जन अपने विवेक से स्थापित करके अपने अनुभव से अपने शिष्यों को समझायें कि 5 ज्ञानेईन्द्रियाँ 5कर्मेन्द्रियाँ 11वाँ मन 12वाँ प्राण 13अन्न 14वाँ भोग /भूखतृप्ती 15 निद्रा 16 वाँ क्षेत्र या स्थिति युक्त जीव है ।

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